विजय माल्या तो झाँकी है, असली कहानी अभी बाकी है

शिशिर गुप्ता

हाल के दिनों में अय्याश पूँजीपति विजय माल्या द्वारा भारतीय बैंकों के 9,000 करोड़ रुपये लेकर चम्पत हो जाने की ख़बरें सुर्खियों में रहीं। इस प्रकरण से देश के ‘चौकीदार नम्बर वन’ होने का दम्भ भरने वाले नरेन्द्र मोदी की खूब किरकिरी हुई और मोदी के प्रचण्ड समर्थक भी इस प्रकरण के आने पर बगलें झाँकते नज़र आये। इसने एनडीए सरकार के पूँजीपतिपरस्त  चरित्र को जनता के सामने उघाड़ कर रख दिया। यह प्रकरण भले ही अपने नाटकीय घटनाक्रम और विजय माल्या की अय्याश जीवनशैली की वजह से अधिक चर्चित रहा, लेकिन विजय माल्या कोई अपवाद नहीं है। बैंकों के क़र्जों के ज़रिये देश की जनता को चूना लगाने वाले पूँजीपतियों की फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है। पूँजीपतियों द्वारा बैंकों से लिए क़र्ज़ रूपी पाप का घड़ा इतनी तेज़ी से भरता जा रहा है कि अब पूँजीवाद के दूरगामी हितों की रक्षा करने वाले अर्थशास्त्री और बुद्धिजीवी भी इन दिनों बैंकों के बढ़ते ‘नॉन परफार्मिंग एसेट्स’ (एन.पी.ए.) को लेकर चिन्ता ज़ाहिर कर रहे हैं।

malyaरिज़र्व बैंक के भूतपूर्व गवर्नर रघुराम राजन और उनके जैसे अर्थशास्त्री बैंकों के ‘एन.पी.ए.’ को काबू में करने के लिए ‘डिफ़ाल्टर’ पूँजीपतियों के ख़िलाफ़ कुछ सख्त क़दम उठाने की वकालत कर रहे हैं और भविष्य में ऐसी स्थिति न आये इसके लिए ‘बैंकिंग सेक्टर’ के नवीनीकरण की बात कर रहे हैं। लेकिन पूँजीपति वर्ग के ये सच्चे सेवक कभी भी इस सच्चाई पर बात नहीं करते कि पूँजीवादी समाज में बैंकों का अस्तित्व ही पूँजी की हितपूर्ति के लिए होता है और यदि उनके एन.पी.ए. न भी बढ़ें तो भी वे अन्तत: पूँजीपति वर्ग की ही सेवा में सन्नद्ध होते हैं। पूँजीवादी समाज में बैंकिंग व्यवस्था के चरित्र के बारे में मार्क्स ने कहा था कि बैंक एक-दो पूँजीपतियों के नहीं समूचे पूँजीपति वर्ग के लिए सार्वभौमिक बही खाते (‘यूनिवर्सल बुक कीपिंग’) रखने का काम करते हैं। दरअसल राजन जैसे अर्थशास्त्रियों की चिन्ता का सबब यह है कि बैंकों के बढ़ते एन.पी.ए. की वजह से यह बहीखाता गड़बड़ा रहा है।

बैंकों के बढ़ते एन.पी.ए. की कहानी, आँकड़ों की जुबानी

हाल के वर्षों में, विशेषकर सरकारी बैंकों के ग़ैर निष्पादनकारी परिसम्पत्तियों यानी ‘नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स’ संक्षेप में ‘एन.पी.ए.’, में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुई है। एन.पी.ए. का तात्पर्य बैंकिंग व वित्त उद्योग में ऐसे ऋण (लोन) से है, जिसका वापस भुगतान संदिग्ध हो। बैंक कई किस्म के ऋण देते हैं जैसे किसानों को दिये जाने वाले लोन, क्रेडिट कार्ड पर दिया जाने वाला लोन, लघु उद्योगों के लिए लोन, घर या कार खरीदने के लिए लोन, बड़े उद्योगपतियों को दिये जाने वाले लोन इत्यादि। ‘फर्स्ट पोस्ट’ ऑनलाइन पत्रिका में प्रकाशित ख़बर के अनुसार भारतीय बैंकों (सरकारी और प्राइवेट) का कुल एन.पी.ए. सितम्बर 2008 में रु. 53,917 करोड़ से बढ़कर सितम्बर 2015 तक आते-आते रु. 3,41,641 करोड़ तक पहुँच चुका है जो उनके द्वारा दिए गये  कुल ऋण का 5.08 प्रतिशत है। इसमें उच्चतम एन.पी.ए. प्रतिशत वाले शुरू के 10 बैंकों में 2008 में मुख्यतः प्राइवेट बैंक थे। 2015 तक आते-आते शीर्ष के बैंकों में मुख्यतः सरकारी बैंक आ गये।

सन 2008 के वित्तीय संकट से पैदा हुई विश्वव्यापी मन्दी से पहले भारत ने विश्व अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की थी। पर तब से अब तक परिदृश्य काफ़ी कुछ बदल चुका है। भारत में उद्योग और कृषि क्षेत्र में मन्दी का असर दिखने लग गया है। और इसी के साथ ही बैंकिंग सेक्टर में ख़राब लोन के जबरदस्त संचय की समस्या भी उभर कर आयी है। रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों के अनुसार तकनीकी तौर पर अथवा चालाकी से बट्टे खाते (‘सस्पेंस अकाउंट’) में डाले जाने वाली रकम गैर-निष्पादित ऋण है जो बैंक की शाखाओं के बहीखाते में बकाये के रूप में होती है लेकिन मुख्यालय स्तर पर उसे बट्टे खाते (पूरा या आंशिक तौर पर) में डाल दिया जाता है। बट्टे खाते में डालने के बाद विभिन्न तरीकों से वसूली की प्रक्रिया जारी रहती है जैसे कि एन.पी.ए. को किसी ‘एसेट रिकंस्ट्रक्शन कम्पनी’ को बेच देना, लोन को ‘इक्विटी’ में बदल देना आदि। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने बीते तीन साल के दौरान 1,14,000 करोड़ रुपये की रकम बट्टे खाते में डाली है। इस वित्तीय वर्ष में भी बैंक 52,227 करोड़ रुपये की रकम के बारे में यही सोच रहे हैं। इससे बैंकों के मुनाफ़े में भारी गिरावट आयी है, जिससे सरकार द्वारा इन बैंकों के पुनर्पूंजीकरण की माँग ज़ोर पकड़ती जा रही है। और इस वर्ष के केन्द्रीय बजट में इसी उद्देश्य से 25,000 करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया है।

एन.पी.ए. में इतनी बढ़ोत्तरी कैसे हुई?

सामान्यत: बैंकों के इस दिवालियेपन की तरफ़ बढ़ने के पीछे ‘विलफुल डिफ़ॉल्टर’ (अच्छे कारोबार के बावजूद निर्धारित समय में जानबूझकर लोन न चुकाने वाले), बैंकों द्वारा अपनी बैलेंस शीट बढ़िया दिखाने के लिए लगातार ख़राब लोन को छुपाया जाना, काँग्रेस सरकार की ख़राब आर्थिक नीतियों इत्यादि को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है मगर इतने से ही इसकी व्याख्या पूरी नहीं हो पाती बल्कि ये सब तो द्वितीयक वजहें हैं। असल में भूमण्डलीकरण के इस दौर में किसी भी वैश्विक परिघटना से बहुत देर तक अछूता रह पाना किसी भी देश के लिए अब सम्भव नहीं है। यही वजह है कि भारत और चीन जैसे देश जो 2008 की मन्दी से शुरू में अछूते जान पड़ रहे थे, अब अन्ततः अवश्यम्भावी रूप से इसकी गिरफ़्त में आने लगे हैं और कहा जाय तो आ ही चुके हैं।

भारत में पिछले दशक में ही क्रेडिट के आधार पर अर्थव्यवस्था का पहिया खींचने की कोशिशें शुरू हो चुकी थीं। वाणिज्यिक बैंकों में बकाये और सकल घरेलू उत्पाद (‘जी.डी.पी.’) का अनुपात 1989-90 से शुरू हुए दशक में 22% पर रहने के बाद 1999-2000 में बढ़ना शुरू हुआ जो 2005-06 तक 44.4% और 2014-15 तक 60% तक पहुँच चुका था। इसका स्पष्ट मतलब है कि माँग और वृद्धि बरकरार रखने के लिए वित्तीय व्यवस्था द्वारा प्रदान किये जाने वाले लोन का व्यापक पैमाने पर प्रयोग किया जा रहा था जो अब संकट में फँस चुका है क्योंकि विश्व बाज़ार में लगातार बनी हुई मन्दी की वजह से माँग काफ़ी कम हो चुकी है। माँग कम होने से पूँजीपति बैंकों से लिया गया भारी कर्ज चुका पाने में अक्षम साबित हो रहे हैं। इस तरह हम देखते हैं कि ‘क्रेडिट’ (‘लोन’) के दम पर लगातार बैंकों में विदेशी मुद्रा के प्रवाह को बरकरार रखने (यदि बैंक लोन न दें तो उनमें कोई निवेश नहीं करेगा), नकली माँग पैदा करने और विश्व अर्थव्यवस्था के पटरी पर आ जाने की उम्मीद में जो जुआ भारतीय बुर्जुआ वर्ग ने खेला था वो फ़िलहाल डूबता हुआ नज़र आ रहा है।

भारत में इस ‘क्रेडिट बूम’ के पीछे की मुख्य वजह 2003 के बाद से विदेशों से भारी मात्रा में चलनिधि (‘लिक्विडिटी’) का आना है। शुरुआत में तो भारी राजकोषीय घाटे में चलने वाली सरकार के द्वारा ही काफ़ी बड़ी मात्रा में लोन लिया जाता था। पर चूँकि विदेशी निवेशक राजकोषीय घाटे को लेकर सशंकित होते हैं जिससे निवेश प्रभावित हो सकता है इसलिए केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा नियम बनाकर सरकार द्वारा लिये जाने वाले लोन की सीमा तय कर दी गयी। जिसके बाद बैंक प्राइवेट सेक्टर की तरफ़ मुड़े और खुदरा क्षेत्र (‘रिटेल सैक्टर’) यानि मकान लोन, कार लोन इत्यादि दिये जाने की भारी मात्रा में शुरुआत हुई। 1996 में खुदरा क्षेत्र में दिया जाने वाला लोन बैंकों द्वारा दिये जाने वाले कुल लोन का 9% था जो 2010 तक बढ़ कर लगभग 25% हो चुका था। जिसके कारण भारत में अमेरिका के ‘सबप्राइम मॉर्टगेज’ जैसा संकट पैदा होने की सम्भावना भी व्यक्त की गयी। मगर 2008 के बाद एक छोटी सी अवधि को छोड़ दें तो निवेश लगातार होता रहा और जिससे लोन देने का दबाव बना रहा।

तब बैंकों ने अवरचनागत (‘इन्फ्रास्ट्रक्चर’) क्षेत्र में पैसा लगाना शुरू किया। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा इस क्षेत्र में दिया जाने वाला लोन मार्च-2000 में 4% से बढ़कर मार्च-2004 में 16.4% और मार्च-2011 में 33.5% तक पहुँच चुका था। जबकि सामान्य परिस्थितियों में बैंक अवरचनागत क्षेत्र में इतना लोन नहीं देते हैं क्योंकि इस क्षेत्र में परिसम्पत्ति अचल होती है और ‘प्रोजेक्ट’ पूरा होने में काफ़ी वक़्त लगता है। कोई आश्चर्य नहीं कि प्राइवेट बैंकों ने ये ख़तरा ज़्यादा नहीं उठाया और सम्भवत: सरकार के प्रोत्साहन से ‘पब्लिक सेक्टर’ बैंकों ने ही इस क्षेत्र में ज़्यादा निवेश किया। पर क्योंकि प्रोजेक्ट पूरा होने में देरी की वजह से इस क्षेत्र में ‘प्रमोटर’ शुरू में ‘इक्विटी’ नहीं जुटा पाते और उन्हें भारी मात्रा में लोन पर निर्भर रहना पड़ता है और समय ज़्यादा लगने की वजह से कुल ब्याज की मात्रा काफ़ी ज़्यादा हो जाती है, इसलिए अन्ततः बैंकों द्वारा दिये गये लोन की वापसी खतरे में पड़ जाती है।

कौन हैं डिफ़ॉल्टर?

‘कैचन्यूज़’ में प्रकाशित ख़बर के अनुसार भारत के रिलायंस, वेदान्ता, अदानी, जेपी जैसे सबसे बड़े औद्योगिक घराने ‘लोन डिफ़ॉल्टरों’ में सम्भावित रूप से शामिल हैं। मात्र राज्य नियंत्रित बैंकों का ही कुल ‘एन.पी.ए.’ 3.04 लाख करोड़ रुपये है। ये रक़म कितनी बड़ी है इसका अन्दाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये भारत के कुल शिक्षा बजट का चार गुना है। ऐसा माना जा रहा है कि इसमें से एक बहुत बड़ी रकम कभी भी वापस बैंकों के पास नहीं जायेगी। स्वाभाविक ही सबसे बड़े लोन बड़े-बड़े उद्योग घरानों द्वारा लिये जाते हैं। हालाँकि रिज़र्व बैंक सहित कोई भी बैंक इन बड़े डिफ़ॉल्टरों का नाम तो सार्वजनिक नहीं करता मगर इन कम्पनियों की बैलेंस शीट से काफ़ी कुछ स्पष्ट हो जाता है। मार्च 2015 में अकेले रिलायंस समूह के ऊपर कुल कर्जा रुपये 1.25 लाख करोड़ का था, कमोबेश यही हालात देश के बाकी अन्य उद्योग घरानों के भी हैं। स्पष्ट है कि इस कुल कर्जे का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा बैंकों से लिए लोन से भी आता है। स्वाभाविक ही ये उद्योग घराने ही सबसे बड़े डिफ़ॉल्टर भी होते हैं।

पूँजीपतियों से यारी है, जनता से गद्दारी है!

वैसे तो कई बार किसान भी लोन चुकता नहीं कर पाते, और पुलिस की छापेमारी व बैंक वालों के चक्कर लगाने से उनमें से कई मजबूर होकर आत्महत्या तक कर लेते हैं। पर बड़े उद्योगपति ऐसा करके भी अपनी अय्याशी भरी ज़िन्दगी आराम से जीते हैं। विजय माल्या का उदाहरण हमारे सामने है।

गौरतलब है कि प्राइवेट बैंकों के मुक़ाबले सरकारी बैंकों के दिवालिया होने की स्थिति में राज्य द्वारा मदद करके उन्हें बचा लिया जाना ज़्यादा आसान है। सरकारी बैंकों के मामले में संशोधनवादी वामपन्थी उतना हो-हल्ला नहीं मचाते हैं क्योंकि इनके लिए राष्ट्रीयकरण ही समाजवाद होता है। राज्य द्वारा अगर बैंकों को पैसा दिया जाता है तो वो जनता का ही पैसा होता है, जिसे जनता की खून-पसीने से कमायी गयी रकम पर भाँति- भाँति के टैक्स लगाकर निचोड़ा जाता है। पर बैंक यदि राज्य द्वारा ही संचालित हों तो राष्ट्रीय गौरव की आड़ में जनता को धोखा देना आसान होता है जबकि इसका सीधा सा मतलब होता है बड़े औद्योगिक घरानों को हज़ारों करोड़ रुपये की खैरात बाँटना। वैसे इसमें कोई आश्चर्य वाली बात भी नहीं है। पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी पूँजीपतियों के हितों के लिए ही तो काम करेगी!

एक तरफ़ जहाँ हर साल बजट में उद्योगपतियों को टैक्स पर विभिन्न तरीकों से भारी छूट दी जाती है, निवेश प्रक्रिया को आसान करने के नाम पर नियमों-कानूनों को आसान कर प्राकृतिक संसाधनों के नंगे दोहन की आज़ादी दी जाती है और लाखों करोड़ों के कर्जे माफ़ किये जाते हैं तो दूसरी ओर किसी आम आदमी के कर्जे को वापस लेने के लिए यही बैंक एड़ी-चोटी का जोर लगा देते हैं। पूँजीपतियों के साथ इनका याराना इतना गहरा है कि कोई भी बैंक बड़े डिफ़ॉल्टरों का नाम तक बताने को तैयार नहीं है। जबकि भारतीय स्टेट बैंक ने अगस्त 2011 में मात्र रुपये 80,000 के लोन में से रुपये 52,264 नहीं चुकता कर पाने के कारण एक महिला को जलील करने के लिए उसकी फ़ोटो सहित अख़बार में विज्ञापन दिया था और वह भी तब जबकि उस महिला का नाम अभी तक केवल ‘डिफ़ॉल्टरों’ की सूची में था न कि ‘विलफुल डिफ़ॉल्टर’ रूप में। जबकि एक अन्य सरकारी बैंक ‘कारपोरेशन बैंक’ ने तो एक कदम आगे जाते हुए सार्वजनिक रूप से ‘डिफ़ॉल्टरों’ की तस्वीरों की होर्डिंग लगवाई थी, जिसमें 2008 की वैश्विक मन्दी की मार खाए कुछ छोटे व्यापारी भी थे।

जनता के लिए एन.पी.ए. के मायने क्या हैं?

आने वाले दिनों में मौजूदा बैंकिंग संकट पहले से ही पूँजीवादी जुए तले कराह रही आम मेहनतकश आबादी के कन्धों के बोझ को और भी बढ़ाने वाला है, भले ही इस संकट को इस मुकाम तक पहुँचाने में उसकी कोई भूमिका न रही हो। जिन परजीवी पूँजीपतियों की वजह से यह संकट इस मुकाम तक पहुँचा है उनमें से अधिकांश की नरेन्द्र  मोदी से क़रीबी है। नरेन्द्र  मोदी नीत एनडीए सरकार को पूँजीपति वर्ग ने राज्यसत्ता की कमान इसीलिए सौंपी है ताकि उनको दोषमुक्त किया जा सके। इस सरकार से यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि वह इन पूँजीपतियों पर नकेल कसेगी। ऐसे में भाड़े के पूँजीवादी अर्थशास्त्रि‍यों ने इस संकट का बोझ जनता के कन्धों पर डालने की नयी-नयी तिकड़में निकालना पहले से ही शुरू कर दिया है। ‘एसेट रिकंस्ट्रक्शन कम्पनी’ और कर्जों के नवीनीकरण (‘रीस्ट्रक्चरिंग’) की जो कवायदें चल रही हैं वह दरअसल पूँजीपतियों को अपराध के स्थान से निकल भागने का मौका देने या बड़े अपराध की मामूली ‘पेनाल्टी’ देकर मामले को रफ़ा-दफ़ा करने के समान है। इसके अतिरिक्त, जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है, बैंकों के पुनः पूँजीकरण की शुरुआत पहले ही हो चुकी है। या यूँ कहें कि इस संकट का बोझ जनता के कन्धों पर लादने की शुरुआत भी हो चुकी है।

असल में कोई भी पूँजीवादी राज्यसत्ता यह नहीं चाहेगी कि उसके यहाँ के बैंक तबाह हों, क्योंकि ऐसा होने पर पूरे पूँजीवादी ढाँचे के लिए खतरे की घण्टी होगी। पर राज्यसत्ता कितना भी हाथ-पाँव मार ले; वह उत्पादन की प्रक्रिया के समाजीकरण और उसके मुनाफ़े के महज़ चन्द लोगों तक सीमित होने के मूलभूत अन्तर्विरोध को कभी दूर नहीं कर सकती और इसी मूलभूत अन्तर्विरोध की वजह से समय-समय पर संकट उभरते रहते हैं। पूँजीवादी राज्यसत्ता चाह कर भी ऐसी परिस्थितियों पर लगाम नहीं लगा सकती और इसलिए जब तक पूँजीवादी व्यवस्था बनी हुई है और इसे नष्ट करके नया विकल्प खड़ा नहीं किया जाता तब तक जनता को भाँति- भाँति के संकटों के ज़रिये इसकी चोट खानी ही पड़ेगी। l

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,मई-जून 2016

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