मायावती का निरंकुश, स्वेच्छाचारी शासन
सत्ता में दलित नहीं, पूँजीपति, ठेकेदार और अपराधी हैं!

शिवार्थ

उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। वैसे मायावती की मानें तो जल्द ही इनका सितारा राष्ट्रीय राजनीति में भी बुलन्द होने वाला है, लेकिन ऐसा हो इसकी उम्मीद न के बराबर है। फिलहाल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव सिर पर है, इसीलिए भजपा, सपा और काँग्रेस जैसी ठेठ चुनावी पार्टियों से लेकर सी.पी.आई.(माले) लिबरेशन तक ने आरोप-प्रत्यारोप की शुरूआत कर दी है। कभी राहुल गाँधी किसानों की पंचायत करते हैं, कोई रोजा-इफतार में शामिल होकर मुस्लिमों को साथ ले रहा तो कोई अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में शमिल होकर देश से भ्रष्टाचार को मिटाने की बात कर रहा है। इसी प्रक्रिया में सत्तासीन पार्टी के विरुद्ध सत्याचुत पार्टियाँ घोटाले, दमन इत्यादि के कच्चे चिट्ठे उजागिर करने में भी काफी ऊर्जा खर्च कर रही है। इसी के परिणामस्वरूप, पिछले लंबे समय से प्रदेश के विभिन्न अखबारों से लेकर टीवी चैनलो पर आने वाली खबरों में स्वयँभू दलित चिन्तक और नेतागण ‘दलित की बेटी’ के राज में दलितों की स्थिति पर काफी हाय-तौबा मचा रहे हैं। ये बात बिल्कुल ठीक है कि पिछले चार सालो के दौरान प्रदेश के व्यापक गरीबों-मजदूरों की हालत बदतर हुई है और पूरे देश में जारी उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों की मार, प्रदेश में आबादी के हर संस्तर पर कमोबेश वैसे ही पड़ रही है जैसे देश के विभिन्न राज्यों में।

अगर याद किया जाए तो, आज से करीब 15 वर्ष पहले जब बहुत जोड़-तोड़ करके मायावती सत्ता के शीर्ष पर पहुँची तो विभिन्न बुद्धिजीवियों से लेकर दलितो के बीच से समृद्धशाली होकर उठी एक छोटी सी आबादी ,जो महानगरों में शिक्षा-दीक्षा ग्रहण कर रही है, वो इस बात पर खुशी जाहिर कर रही थी कि एक ‘दलित की बेटी’ का सत्ता के शीर्ष पर पहुँचना दलितों के उत्थान का एक प्रतीकात्मक उदाहरण है। उनके अनुसार अगर बहुत कुछ नहीं बदला तो भी दलितो की स्थिति में सापेक्षिक तौर पर फर्क तो पड़ेगा ही। बाद में जब भ्रष्टाचार और लूट की बाते सामने आई है तो यहाँ तक कहने से नहीं चूकते थे कि ‘लूटते थे तो सब थे, आज दलित की बेटी लूट रही तो सब लोग बहुत नाक-भौ सिकोड़ रहे हैं।’

चुनावी समीकरणों से भी चले तो मायावती का उत्तर-प्रदेश में सत्तासीन होना एक विशेष परिस्थिति के अन्तर्गत ही संभव हो पाया है। संख्या के लिहाज़ से उ.प्र. में करीब साढ़े तीन करोड़ दलित हैं,जो कि देश में सबसे ज्यादा है। आबादी में बहुसंख्या के लिहाज से इनका प्रतिशत 21.1 है; जो कि पंजाब, जहाँ यह आँकड़ा 28 प्रतिशत है, के बाद दूसरे नंबर पर आता है। उत्तर प्रदेश के दलितों के बीच, 80 प्रतिशत आबादी सिर्फ दो उपजातियाँ चमार और जाटव के बीच से आती है। इस प्रकार की स्थिति देश में और कहीं नहीं है। इसके अलावा, लम्बे समय से उत्तर प्रदेश में दलितो के प्रतिनिधित्व के लिहाज से एक निर्वात की स्थिति कायम रही है। रिपब्लिकन पार्टी के अवसान के बाद, कांशीराम-मायावती का दौर ही याद आता है। ऐसी अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद मायावती को पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के लिए सवर्ण-कार्ड से लेकर ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का सहारा लेना पड़ रहा है। इससे एक बात तो स्पष्ट है कि टुटपुजियाँ बुद्धिजीवी और प्रतिक्रियावादी दलितों की चाहे जो भी मान्यताएँ हो, आम दलितों का एक बड़ा हिस्सा मायावती और उनकी असलियत से वाकिफ है। वोट बैंक राजनीति में, अगर किसी तात्कालिक फायदे के अन्तर्गत के बसपा को वोट देता भी है, तो सिर्फ विकल्पहीनता के कारण।

मायावती का यह और इसके पहले के तीन कार्यकाल इस बात को और पुष्ट करते हैं। आर्थिक मानदण्डो पर इनकी नीतियों का जायज़ा लिया जाए तो, उसकी गति पूर्णतया राष्ट्रीय स्तर पर जारी उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के अन्तर्गत ही है। अलीगढ़ में टप्पल से लेकर नोएडा में भट्टा-पारसौल तक किसानो से जबरन कौड़ियों के मोल पर पूंजीपति बिल्डरो और माफियाओं के लिए भूमि-अधिग्रहण किया गया। उ.प्र. राज्य चीनी निगम की चीनी मिलों को औने-पौने दामों पर निजी हाथों में बेच दिया गया। (जिस चीनी मिल के जमीन की कीमत महज़ 93 करोड़ थी, उसे 42 करोड़ रुपये में बेच दिया गया) बुंदेलखण्ड़ सहित पूरे प्रदेश में खनिज, बालू के अवैध खनन के नए कीर्तिमान स्थापित किए जा रहे हैं। यह इन नीतियों का ही प्रकोप का ही पिछले पाँल सालों के दौरान सिर्फ बुंदेलखण्ड में 200 किसानों ने आत्महत्या की है, और करीब 250 लोग भुखमरी के चलते मारे गये हैं। सरकारी आँकड़ों के अन्तर्गत प्रदेश में कुल 5.18 करोड़(कुल आबादी-15 करोड़) गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने को मजबूर हैं इससे इतर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बिजली, साफ-पानी की उपलब्धता इत्यादि मानकों के लिहाज़ से उत्तर प्रदेश भारत के विभिन्न राज्यों में सबसे निचले पायदानों पर आता है।

यह आर्थिक नीतियाँ सबसे सघन रूप से पिछले चार साल के दौरान लागू हुई जबसे बसपा सरकार के पास पूर्ण बहुमत हैं। इन नीतियों को किर्यान्वित करने के तरीका और उसके अन्तर्गत पैदा हुई सामाजिक स्थितियों की तस्वीर और भी भयावह है।

‘चढ़ गुण्डन की छाती पर, मोहर लगेगी हाथी पर’ के नारे पर सवार होकर सत्ता तक पहुँची मायावती ने चुनावों के दौरान कुल 23 ऐसे लोगो को टिकट दिया जो आपराधिक पृष्ठभूमि के थे। इसके बाद पिछले 4 सालों के दौरान दलितों से लेकर महिलाओं और आम जनता पर इन नेताओं-मंत्रियों ने जो कहर बरपाया है, उसकी मिसाले हाल-फिलहाल में नहीं मिलती। सिर्फ पिछले 18,19 एवं 20 जून, को 72 घंटे से भी कम समय में एक के बाद एक महिलाओं के साथ बलात्कार या बलात्कार की कोशिश की कुल 11 घटनाएँ हुई, जिनमें से कुछ महिलाओं की हत्या भी कर दी गई । ये वो घटनाएँ है जिनकी एफ.आई.आर. थाने में दर्ज करा दी गई। हर एक ऐसी दर्ज रिपोर्ट पर कस से कम पाँच ऐसी घटनाएँ होती है, जिनकी एफ.आई.आर. दर्ज नहीं होती। अगर पिछले चार सालों के दौरान हुई कुछ प्रतिनिधिक घटनाओं की बात करें तो स्थिति कुछ इस प्रकार है। 10 जून, 2011 को लखीमपुर-खीरी कस्बे के निहासन गाँव में 14 साल की सोनम की पुलिसवालों द्वारा बलात्कार और हत्या कर दी गई; सितम्बर, 2010 में कानपुर में एक स्कूल के मालिक के बेटे द्वारा 12 वर्ष की छात्र दिव्या के साथ बलात्कार किया गया, जिसके बाद बच्ची की अस्पताल में मृत्यु हो गई; दिसम्बर, 2010 में बॉदा जिले में नरौनी के बसपा विधायक पुरषोत्तम नरेश द्विवेदी ने अन्य के साथ मिलकर शीलू निषाद का सामूहिक बलात्कार किया; मई, 2008 में बदॉयु जिले के बिलसी से विधायक योगेन्द्र सागर और उनके गुर्गो द्वारा एक 24 वर्षीय लड़की का अपहरण और उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया; इटावा का सोनम कांड जहाँ स्कूल के प्रधानाध्यापक द्वारा अध्यापिका का बलात्कार किया गया, इस पर इलाके के विधायक शिव प्रसाद यादव द्वारा पुलिस से साँठ-गाँठ करके प्रधानाध्यापक के बजाए अध्यापिका को ही जेल भिजवा दिया गया; अक्टूबर 2007 में फैजाबाद जिले के साकेत महाविद्यालय की 24 वर्षीय छात्र शशि का हत्याकांड, जिसे मिल्कीपुर विधानसभा क्षेत्र के बसपा विधायक व खाद्य प्रसंस्करण राज्य मंत्री आनन्द सेन यादव द्वारा अंजाम दिया गया क्योंकि शशि से उनके प्रेम सम्बन्ध थे और वह गर्भवती हो गई थी। 2009 में राष्ट्रीय अपराध लेखा ब्यूरो द्वारा जारी रिपोर्ट के अन्तर्गत उत्तर प्रदेश दलितों के खिलाफ होने वाले अपराध के लिहाज़ पिछले कई साल से सबसे ऊपर रहा है। 2009 में राष्ट्रीय स्तर पर दलितों के खिलाफ कुल 33,954 अपराध दर्ज किए गए, जिसमें सबसे अधिक 22.4 प्रतिशत अपराध  उ.प्र. में हुए। यह स्थिति तब है जब मायावती के द्वारा प्रशासन को दलितों के खिलाफ होने वाले अपरोधों की रिपोर्ट कम से कम दर्ज रने के सख्त आदेश है, ताकि कुल आँकड़ा बहुत कम रहे। मायावती के आदेश के अनुसार सिर्फ बलात्कार और हत्या के जुर्म ही, अनुसूचित जाति/जनजाति उत्पीड़न निरोधी कानून, 1989 के अन्तर्गत दर्ज किए जाए, दलितों के खिलाफ होने वाले बाकी अपराधो को सामान्य भारतीय दंड संघिता के अन्तर्गत ही दर्ज किया जाए। इस समय बसपा सरकार के मंत्रीमण्डल में करीब दर्जन भर मंत्री बलात्कार और अपहरण के मामलों में अभियुक्त है। इनमें से ज्यादातर मामले दलित महिलाओं और बच्चों से जुड़े हैं। एशियन सेन्टर फॉर ह्यूमन राइट्स के द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार पिछले आठ सालों के दौरान करीब 1,187 लोग भारत के पुलिस हिरासत में मारे गए। इनमें से सबसे अधिक हिरासती मौतों में भी उ.प्र. का महाराष्ट्र के बाद दूसरा नंबर है। रिपोर्ट में आगे यह भी कहा गया है कि ये आँकड़े सच्चाई की बहुत छोटी तस्वारी प्रस्तुत करते हैं, क्योंकि ज्यादातर हिरासती मौतों को मानवअधिकार आयोग के समक्ष दर्ज ही नहीं कराया जाता है। 2008 में उ.प्र. पुलिस के विरुद्ध दायर की गई 6015 मानव अधिकार के उल्लंघन के मामलो में सिर्फ एक मामले में तीन पुलिस वालों के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किए गए। कुल मिलाकर पुलिस से लेकर पूरे प्रशासन को मुख्यमंत्री मायावती द्वारा पूर्ण संरक्षण मुहैया कराया जाता है। इनके साथ ही पिछले एक साल से चिकित्सा विभाग के दो चिकित्सा अधिकारों की दिन-दहाड़े गोलियों से भूनकर की गई हत्या और पिछली 22 जून को लखनऊ जिला जेल में बन्द उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी(परिवार कल्याण) योगेन्द्र सिंह सचान की रहस्यमय मौत पूरे प्रदेश में स्थापित कानून व्यवस्था की तस्वीर को भलीभॉति चित्रित करता है। 2009 में बसपा विधायक शेखर तिवारी द्वारा पी.डब्लू.डी के इंजीनियर मनोज गुप्ता द्वारा धन-उगाही की खिलाफत करने पर की गई नृशंस हत्या को कौन भूल सकता है।

लेकिन बात यही पर आकर नहीं रुकती। यह वहीं मायावती है, जिन्होंने पूरे प्रदेश में विश्वविद्यालयों के छात्रों से लेकर आम जनता के ऊपर हाल-फिलहाल का सबसे निरंकुश और स्वेच्छाचारी राज्य कायम किए हुए हैं। प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों में, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की अवमानना करते हुए छात्र संघ को भंग कर दिया गया है; प्रशासन को बी-एड के एडमिशन से लेकर विभिन्न अकादमिक गतिविधियों में मनमाना शुल्क वसूल करने और घपलेबाजी करने और आम छात्रे से धन-उगाही करने की खुली छूट दी गई है; छात्रों के मुँह पर ताला लगाने के लिए प्रशासन को तानाशाह होने की हद तक की ताकत और कैम्पस को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया है। इसी वर्ष प्रदेश सरकार द्वारा धरना प्रर्दशन सम्बन्धी ऐसा अध्यादेश जारी किया गया, जो सामान्य स्थितियों में भारत के किसी राज्य में नहीं लागू है। इसके अन्तर्गत धरना प्रदर्शन के लिए अनुमति प्राप्त करने की मियाद प्रदर्शन के सात दिन पूर्व तय कर दी है, और उस पर भी प्रक्रिया इतनी दुरुह कि आम आदमी इसके बारे में सोच भी नहीं सकता। प्रदेश की राजधानी लखनऊ में घरना-प्रदर्शन के लिए तो ऐसी जगह नियुक्त की गई है; जहाँ कुत्ते भी टहलने से परहेज करते हैं, आम जनता तो दूर की बात है। इस नए अध्यादेश के द्वारा संविधान द्वारा आम जनता को शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होकर अपना विरोध जाहिर करने के अधिकार का सीधे-सीधे हनन किया जा रहा है। यह नया शासनादेश, शिक्षा मित्रों एवं ग्राम रोजगार सेवको द्वारा उनके शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर की गई पुलिसिया दमन, जिससे सरकार की काफी किरकिरी हुई थी के बाद लाया गया है।

इन नीतियों के अलावा मायावती का सामाजिक आचरण हिन्दुस्तान के सबसे भ्रष्ट और तानाशाह नेताओं को भी बगले झॉकने के लिए मजबूर कर सकता है। पूरे प्रदेश में कांशीराम और खुद की मूर्तिया लगवाने की ऐसी मिसाल कायम की जा रही है, जिसका उदाहरण आजाद भारत में तो नहीं मिलता। इतना जरूर है कि ऐसा आचरण पुराने राजा-महाराजाओं की जरूर याद दिलाता है। इस नीति पर कोई कानूनी अडंगा न पड़े, इसलिए बहुत योजनाबद्ध तरीके से 2008-09 के बजट में प्रदेश सरकार द्वारा 194 करोड़ रूपये विभिन्न महापुरुषों की मूर्तियाँ खड़ा करने के नाम पर आवंटित कर दिया गया। लखनऊ विकास प्राधिकरण से प्राप्त आँकड़ो के अनुसार उ.प्र. सरकार ने करीब 7 करोड़ रूपये मायावती ओर कांशीराम की मूर्ति बनवाने के मद में, 52 करोड़ रूपये अम्बेड़कर मेमोरियल में खड़े किए गए दो मार्बल के हाथियों को तैयार करने के मद में, और 90 करोड़ रूपये कांशीराम पार्क के रख-रखाव के मद में आंवटित किए गए हैं। इसके अलावा मायावती के जन्मदिन की कहानियाँ जिसमें कभी वो 22 करोड़ की माला पहनती है, तो कभी जन कल्याणकारी दिवस के रूप में मनाती है; अखबारों की सुर्खियाँ बनती रही है। अपने पन्द्रह साल के राजनीतिक कैरियर में मायावती द्वारा 2007 में घोषित आँकड़ो के अनुसार, उनकी चल-अचल संपत्ति का कुल ब्यौरा 52 करोड़ रूपये हैं। यह वाकई में कितनी होगी, इसका अनुमान बस इसी बात से लगाया जा सकता है कि मायावती अपने घर के वार्डरोब और अलमारियों में करेाड़ो रूपयों की नोटो की गड्डिया भरकर रखती है।

अगर इन सभी बातों को एक साँचे में रखकर देखा जाए तो मायावती के रूप में भारतीय पूँजीवादी राजनीति का सबसे निरंकुश, स्वेच्छाचारी और जनविरोधी चरित्र उभर कर सामने आता है। जाहिरा तौर पर इसका सबसे अधिक खामियाजा समाज के सबसे निचले तबकों यानी मज़दूरों और किसानों को उठाना पड़ता है।

जो बात यहाँ पर गौर करने वाली है कि समाज के सभी उत्पीडित संस्तरो में विशेषकर दलितो ओर महिलाओ का शोषण किसी भी रूप में कम होने के बजाए और भी मुखर हो गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि दलितों का शोषण भारतीय पूंजीवाद की एक संरचनागत अभिलाक्षिणकता है, और यह किसी व्यक्ति की चाहत से परे हैं इसके। कुछ ऐसे ही समझा जा सकता है, जैसे वैश्विक पूंजीवाद के अन्तर्गत होने वाल महिलाओं का शोषण। जाहिरा तौर पर यह सांमन्ती शोषण के स्वरूप से भिन्न है, लेकिन विभिन्न देशो में आए पूँजीवाद ने श्रम के शोषण के साथ ही पूर्व के सामाजिक ढॉचों के अन्तर्गत होन वाले विभिन्न प्रकार के शोषण को अपनी जरूरत के लिहाज से समायोजित कर लिया। आम तौर पर इन शोषणकारी जमातों से सत्तासीन हुए व्यक्ति, शोषण की पूरी प्रक्रिया को सामान्य स्तर से ज्यादा प्रतिक्रियावादी तरीके से लागू करते हैं। शोषित जब शोषक बनता है, तो प्रतिक्रियावादी उसे विरासत में मिलता है, और आम जनता के लिए यह स्थिति और कष्टदायी बन जाती है।

पूँजीवादी व्यवस्था में मायावती या शोषित तबको से आने वाले किसी भी व्यक्ति के सत्ता सीन होने की पूरी प्रक्रिया को इसी रूप में समझा जा सकता है। पूँजीवादी व्यवस्था के संरचनागत विशलेषण से इतर, इनका कोई व्यक्तिगत विशलेषण किसी सही निष्कर्ष पर नहीं ले जा सकता। आज दलित-मुक्ति की कोई भी परियोजना पूँजीवाद-साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष की परियोजना के अन्तर्गत ही कार्यान्वित की जा सकती है।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जुलाई-अगस्‍त 2011

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