शमशेर बहादुर सिंह के 101वें जन्मदिवस (13 जनवरी के अवसर पर)
य’ शाम है…
य’ शाम है
कि आसमान खेत हैं पके हुए अनाज का
लपक उठीं लहू-भरी दराँतियाँ
-कि आग है :
धुआँ-धुआँ
सुलग रहा
ग्वालियार के मजूर का हृदय
कराहती धरा कि हाय-मय विषाक्त वायु
धूम्र तिक्त आज
रिक्त आज
सोखती हृदय
ग्वालियार के मजूर का।
ग़रीब के हृदय
टंगे हुए
कि रोटियाँ
लिये हुए निशान
लाल-लाल
जा रहे
कि चल रहा
लहू-भरे ग्वालियार के बज़ार में जुलूसः
जल रहा
धुआँ-धुआँ
ग्वालियार के मजूर का हृदय।
(ग्वालियर के मज़दूरों के जुलूस पर सामन्ती रियासत ने बेरहमी से गोलियाँ बरसाईं। इस गोली काण्ड के बाद शमशेर बहादुर सिंह ने यह कविता लिखी थी।)
मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जनवरी-फरवरी 2012






