नाज़िम हिक़मत की लम्बी कविता का अंश
‘तुम्हारे हाथ और उनके झूठ’

अनुवाद : सुरेश सलिल

तुम्हारे हाथ
पत्थरों जैसे मज़बूत
जेलखाने की धुनों जैसे उदास
बोझा खींचने वाले जानवरों जैसे भरी-भरकम
तुम्हारे हाथ जैसे भूखे बच्चों के तमतमाये चेहरे
तुम्हारे हाथ
शहद मक्खियों जैसे मेहनती और निपुण
दूध भरी छातियों जैसे भारी
कुदरत जैसे दिलेर तुम्हारे हाथ,
तुम्हारे हाथ खुरधरी चमड़ी के नीचे छिपाये अपनी
दोस्ताना कोमलता
दुनिया गाय-बैलों के सींगों पर नहीं टिकी है
दुनिया को ढोते हैं तुम्हारे हाथ।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,मई-जून 2016