पाकिस्तानी शायर अफ़जाल अहमद की कविताएँ

शायरी मैंने ईजाद की

काग़ज़ मराकशियों ने ईजाद कियाafzal
हरुफ़ फ़ीनिशियों ने
शायरी मैंने ईजाद की

 

कब्र खोदने वाले ने तन्दूर ईजाद किया
तन्दूर पर कब्‍ज़ा करने वालों ने रोटी की पर्ची बनाई
रोटी लेने वालों ने कतार ईजाद की
और मिलकर गाना सीखा
रोटी की कतार में जब चीटियाँ भी आ खड़ी हो गईं
तो फ़ाका ईजाद हुआ
शहतूत बेचने वालों ने रेशम का कीड़ा ईजाद किया
शायरी ने रेशम से लड़कियों के लिबास बनाये
रेशम में मलबूस लड़कियों के लिए कुटनियों ने महलसरा ईजाद की
जहाँ जाकर उन्होंने रेशम के कीड़े का पता बता दिया
फ़ासले ने घोड़े के चार पाँव ईजाद किये
तेज़ रफ्तारी ने रथ बनाया
और जब शिकस्त ईजाद हुई
तो मुझे तेज़ रफ्तार रथ के आगे लिटा दिया गया

 

मगर उस वक्त तक शायरी ईजाद हो चुकी थी
मुहब्बत ने दिल ईजाद किया
दिल ने खेमा और कश्तियाँ बनाईं
और दूर-दराज मकामात तय किये

 

ख़्वाज़ासरा ने मछली पकड़ने का काँटा ईजाद किया
और सोये हुए दिल में चुभोकर भाग गया
दिल में चुभे हुए काँटे की डोर थामने के लिए
नीलामी ईजाद की
और
ज़बर ने आख़िरी बोली ईजाद की

 

मैंने सारी शायरी बेचकर आग ख़रीदी
और ज़बर का हाथ जला दिया

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मराकिशी-मोरक्को के मिराकिश शहर निवासी
फ़ीनिशी-फ़ीनिश के निवासी
महलसरा-अन्तःपुर, हरम
खेमा-तम्बू
ख़्वाज़ासरा-हरम का रखवाला हिंजड़ा
ज़बर-अत्याचार

 

अगर उन्हें मालूम हो जाये

 

अगर उन्हें मालूम हो जाये
हमें कैसे मारा जा सकता है
वो ज़िन्दगी को डराते हैं
मौत को रिश्वत देते हैं
उसकी आँख पर पट्टी बाँध देते हैं

 

वो हमें तोहफ़े में खंज़र भेजते हैं
और उम्मीद रखते हैं कि
हम खुद को हलाक कर लेंगे

 

वो चिड़ियाघर में
शेर के पिंजरे की जाली को कमज़ोर रखते हैं
और जब हम वहाँ सैर को जाते हैं
उस दिन वे शेर का रातिब बन्द कर देते हैं
जब चाँद टूटा-फ़ूटा नहीं होता
वो हमें एक जज़ीरे की सैर को बुलाते हैं
जहाँ न मारे जाने की जमानत का काग़ज़
वो कश्ती में इधर-उधर कर देते हैं

 

अगर उन्हें मालूम हो जाये
वो अच्छे कातिल नहीं
तो वो काँपने लगें
और उनकी नौकरियाँ छिन जायें

 

वो हमारे मारे जाने का ख़्वाब देखते हैं
और ताबीर की किताबों को जला देते हैं
वो हमारे नाम की कब्र खोदते हैं
और उसमें लूट का माल छिपा देते हैं

 

अगर उन्हें मालूम भी हो जाये
कि हमें कैसे मारा जा सकता है
फ़िर भी वे हमें नहीं मार सकते

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रातिब-दाना-पानी
जज़ीरा-टापू

 

गुलदस्ते और दावतनामा

 

हम जो मौसिक़ी सुनने पहुँच जाते हैं
मौसिकार के लिए
किसी गुलदस्ते के बग़ैर
और नहीं जानते
पियानो के कितने पाये होते हैं
हम जिन्हें देखकर
कोई किसी खाली नशिस्त की तरफ़ इशारा नहीं करता
हम जो दीवार से लगकर खड़े हो जाते हैं
जहाँ बिल अखिर हमें खड़ा किया जाना है
क्वालीकोड से पियानो तक
मौसिक़ी ने बड़ा सफ़र तय किया है
जैसे हमने
खुद को दावतनामे के बगैर
बड़े दरवाज़े से आख़िरी दीवार तक पहुँचाया है
अपनी पेशकश के बाद
मौसिकार
तशक्कुर में झुक रही है
अब उसे फ़र्श पर खून नज़र आयेगा
हमारा खून
जो हर जगह
गुलदस्ते
और दावतनामे के बग़ैर
हमसे पहले पहुँच जाता है

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नशिस्त-सीट
बिल अखिर-अन्त में
तशक्कुर में-आभार में

तौक़ और ताबीज़

 

उस वक्त का
जब तहरीर ईजाद हो चुकी थी
काँसे का एक टुकड़ा
नाकाबिले शिकस्त शीशों के पीछे
महफ़ूज़ है

 

कभी एक तौक से बँधे हुए इस टुकड़े पर
‘कहीं मैं भाग न जाऊँ
मुझे पकड़ लो
और मेरे आका विवेण्टियस की ज़मीनों पर
वापस कैलिस्टस भेज दो’

 

नीचे लिखा है…
माहिरीन
इस ताबीज़ को किसी कुत्ते की गर्दन से
मुनसलिक करते हैं

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तहरीर–लिखावट
नाकाबिले शिकस्त-जिन्हें तोड़ा न जा सके
मुनसलिक करना-जोड़ना
तौक़-क़ैदियों के गले में ज़ंजीर से लटकाया जाने वाला वज़नदार बिल्ला

 

 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जनवरी-मार्च 2008