समाजवादी शिक्षा व्यवस्था: शिक्षा के क्षेत्र में समाजवादी चीन में हुए प्रयोगों पर एक संक्षिप्त चर्चा

सार्थक

आह्वान के पाठक यह जानते हैं कि पिछले साल फ़ासीवादी भाजपा सरकार ने अपने पूँजीपति आकाओं के हितों को साधने के मकसद से नयी शिक्षा नीति 2020 पारित किया। यह जनविरोधी शिक्षा नीति घनघोर लफ़्फ़ाज़ियों के धूम्रावरण के पीछे वास्तव में शिक्षा के क्षेत्र में देशी-विदेशी पूँजी निवेश और मुनाफ़ाखोरी को खुली छूट देने दस्तावेज़ है और इस पर अमल भी किया जा रहा है। शिक्षा एक बेहतर मानवीय जीवन की मूलभूत शर्तों में एक होती है। लेकिन आज़ादी के बाद से ही हमारे देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था ऐसी रही जो आम घरों के बेटे-बेटियों को बेहतर शिक्षा से कोसों दूर रखती थी। लेकिन जो भी थोड़ी बहुत गुंजाइश थी भी उसे यह शिक्षा नीति पूरी तरह से खत्म कर देगी। मुट्ठी भर पूँजीपतियों के हित में इस शिक्षा नीति के जरिये फासिस्ट मोदी सरकार शिक्षा को पूरी तरह से बाज़ार के हवाले करने की कानूनी वैधिक कवायद है।
नि:शुल्क-सार्वभौमिक-वैज्ञानिक शिक्षा के अधिकार की इस लड़ाई में भी सभी सामाजिक-राजनीतिक लड़ाइयों की तरह संघर्ष और निर्माण के पहलू एक दूसरे से द्वन्द्वात्मक तरीके से जुड़े हुए हैं। इस मौजूदा अन्यायपूर्ण शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ़ जुझारू संघर्ष किये बिना एक नयी न्यायसंगत शिक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ा नहीं जा सकता। अगर हम एक उन्नत और सच्चे मायनों में क्रान्तिकारी शिक्षा व्यवस्था के सैद्धान्तिक और व्यावहारिक पहलुओं को समझते हुए उसे व्यापक जनमानस तक विकल्प की तरह नहीं लेकर जाएँगे तो हमारा संघर्ष भी सुधारवाद की अँधेरी गलियों में रास्ता भटक जायेगा। अगर हम भारत के छात्र-युवा आन्दोलन के वर्तमान इतिहास पर एक नज़र डालें तो हम पाते हैं कि संघर्ष और निर्माण के इस द्वन्द्व में प्रधान पहलू मुख्यतः संघर्ष ही रहा है। मौजूदा पूँजीवादी शिक्षा व्यवस्था और उसके मानवद्रोही चरित्र के खिलाफ़ छात्रों-युवाओं का आन्दोलन कई उतार-चढ़ाव से होकर गुजरने के बावजूद एक नयी क्रान्तिकारी शिक्षा प्रणाली की वैचारिक और व्यावहारिक पहलुओं को समझने में बहुत हद तक असफल रहा है। इसके पीछे छात्र-युवा आन्दोलन की वैचारिक कमज़ोरी, छात्र-युवा आन्दोलन में संशोधनवादी-सुधारवादी विचारधारा की घुसपैठ, भारत की क्रान्तिकारी वाम आन्दोलन की वैचारिक कमज़ोरी, छात्र-युवा आन्दोलन का मज़दूर-मेहनतकश वर्ग के संघर्षों से अलगाव जैसे कई कारण हैं जिनकी विस्तार से चर्चा करना इस लेख का मुख्य उद्देश्य नहीं है।
इस लेख का मुख्य उद्देश्य एक नयी शिक्षा व्यवस्था की वैचारिकी पर काम करना और अपने संघर्षों की दिशा उस ओर मोड़ने का छात्रों-युवाओं के समक्ष ज़रूरी कार्यभार रखना है। वैसे तो एक नयी शिक्षा व्यवस्था के निर्माण का प्रश्न पूरी व्यवस्था के आमूलचूल परिवर्तन से जा कर जुड़ता है। लेकिन नयी शिक्षा व्यवस्था कैसी होगी? यह अपने आप में विचार मंथन और रचनात्मक सोच की माँग करता है। जिसमें समाजवादी प्रयोगों से अर्जित अनुभव हमारा मार्गदर्शन करेंगे। ऐसी समझदारी से लैस शिक्षा अधिकार का आन्दोलन न केवल इस पहलू में स्पष्ट होगा कि बुर्जुआ व्यवस्था से कैसी शिक्षा की माँग की जानी चाहिए? बुर्जुआ व्यवस्था की सीमाएँ क्या हैं? बल्कि वह संघर्ष को अगली मंजिल पर ले जाने के लिए भी तैयार होगा। भविष्योन्मुख शिक्षा व्यवस्था निश्चित तौर पर पुराने और नए द्वन्द्व से विकसित होगी; लेकिन अतीत के किन पहलुओं को रखना है, विकसित करना है या इतिहास के कचरापेटी में फेंकना है? एक क्रान्तिकारी शिक्षा व्यवस्था की चारित्रिक विषेशताएँ क्या होंगी? इस दिशा में प्रत्येक संवेदनशील और संजीदा छात्र और नौजवान को सोचने की ज़रूरत है।
समाजवादी देशों की शिक्षा के क्षेत्र में हुए नये-नये प्रयोग और अनुभव इस दिशा में सोचने में काफ़ी मददगार होंगे। सर्वहारा क्रान्तियों के आरम्भिक संस्करण जिन्होंने पिछली शताब्दी में इतिहास के कैनवास पर अपना रंग बिखेरा, उसके सृजनात्मक प्रभाव से शिक्षा, स्वास्थ्य, कला, संस्कृति, साहित्य आदि के क्षेत्रों में भी रंगीन स्याही से कई नये कीर्तिमान रचे गये, जो मानव इतिहास में अभूतपूर्व थे। समाजवादी व्यवस्था की स्थापना के बाद सोवियत संघ और चीन की जनता ने जो चौमुखी विकास के डग भरे उसने शताब्दियों का काम चन्द वर्षों में कर दिखाया। समाजवादी निर्माण प्रक्रिया के तमाम प्रयोगों में से सबसे महत्वपूर्ण प्रयोग रहें शिक्षा व्यवस्था सम्बन्धी प्रयोग। इन प्रयोगों ने एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था को जन्म दिया जो समाजवादी सत्ता तथा मेहनतकश वर्ग के हितों की सेवा करने के साथ-साथ नयी समाजवादी चेतना को गढ़ने में अग्रणी भूमिका अदा कर रही थी। महज़ कुछ सालों की समयावधि में निरक्षरता को जड़ से मिटाते हुए समाजवादी शिक्षा व्यवस्था एक वर्ग-विहीन शोषणमुक्त समाज की ओर संक्रमण में अहम भूमिका निभा रही थी। सोवियत संघ और चीन की समाजवादी शिक्षा व्यवस्थाओं के गहन अध्ययन और उनकी उपलब्धियों तथा कमज़ोरियों का सही मूल्यांकन किये बिना आज की ठोस परिस्थितियों में एक मुक्तिकामी शिक्षा परियोजना के निर्माण की कल्पना भी नहीं की जा सकती। क्रान्तियों और समाजवादी संक्रमण काल के इतिहास से सीखने की ज़रूरत को समझते हुए हम इस लेख में समाजवादी चीन की क्रान्तिकारी शिक्षा व्यवस्था के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा करेंगे।
शिक्षा का वर्ग चरित्र : मार्क्स-लेनिन-माओ की शिक्षाओं का अनुसरण करते हुए क्रान्तिकारी चीनी शिक्षा व्यवस्था के संस्थापकों ने बुर्जुआ और संशोधनवादी शिक्षाविदों द्वारा फैलायी जा रही इस भ्रामक धारणा का पुरजोर विरोध किया कि शिक्षा का कोई वर्ग चरित्र नहीं होता या शिक्षा वर्ग और वर्ग संघर्ष से परे होती है या फिर शिक्षा अपने-आप में सभी वर्गों के लिए एक समान होती है। सोवियत संशोधनवादी शिक्षाविद इवान कैरोव से प्रेरित होकर चीनी संशोधनवाद के पितामह ल्यु श्याओ ची और शिक्षा के क्षेत्र में उनके सबसे वफ़ादार चेले लू दिंगयी चीन में इस “वर्ग-रहित” और “वर्ग-संघर्ष से परे” और “समान” शिक्षा की मिथकीय अवधारणा का प्रचार-प्रसार कर रहे थे, जिसके पीछे उनका मुख्य उद्देश्य शिक्षा के वर्ग चरित्र को धूमिल करना था। महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान इन संशोधनवादियों के सिद्धान्तों की धज्जियाँ उड़ा दी गईं और इनके स्मजवाद से गद्दारी को बेनकाब किया गया। क्रान्तिकारी चीनी शिक्षा व्यवस्था ने यह स्पष्ट तौर पर स्थापित किया की प्रत्येक वर्ग अपनी युवा पीढ़ी को अपनी वर्ग अवस्थिति के अनुकूल विश्व-दृष्टिकोण देता है; अपने वर्गीय राजनीतिक हितों के आधार पर शिक्षित-प्रशिक्षित करता है और इस प्रकार स्वयं अपने वर्ग हितों की रक्षा और सेवा के लिए अपनी नयी पीढ़ी तैयार करता है। इसलिए बुर्जुआ वर्ग की शिक्षा और सर्वहारा वर्ग की शिक्षा एक समान नहीं हो सकती। समाजवादी संक्रमण के दौरान बुर्जुआ वर्ग येन-केन-प्रकारेण अपने छिने स्वर्ग को दुबारा हासिल करने की पूरी कोशिश करेगा। इसलिये इस संक्रमण काल में वर्ग संघर्ष जारी रहेंगे जो सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक जीवन के विभिन्न पहलुओं में प्रदर्शित होंगे। शिक्षा व्यवस्था इन्हीं विभिन्न पहलुओं में से एक होगी। बुर्जुआ वर्ग शिक्षा व्यवस्था में घुसपैठ कर बुर्जुआ वर्ग हितों को साधने का प्रयास करेगा, जबकि सर्वहारा वर्ग की शिक्षा व्यवस्था बुर्जुआ वर्ग और सभी शोषक वर्गों का सम्पूर्ण उन्मूलन कर समाजवादी व्यवस्था को कम्युनिज़्म की ओर अग्रसर करने का लक्ष्य रखेगा। इस विषय पर ‘लेनिन’ के वक्तव्य का एक अंश बेहद प्रासंगिक है-“सामान्य रूप से विज्ञान की शिक्षा देते हुए सर्वांगीण शिक्षा हासिल किये इंसानों को पैदा करना पहले के स्कूलों का घोषित लक्ष्य हुआ करता था। हम जानते हैं कि यह सरासर झूठ है क्योंकि पूरा समाज शोषक वर्ग और शोषित वर्ग में विभाजित है और इसी पर बरकरार है, क्योंकि ये वर्ग भावना से पूरी तरह ओत-प्रोत होते हैं तो यह स्वाभाविक है कि पूराने स्कूल महज़ पूँजीपतियों के बच्चों को ही ज्ञान प्रदान करते थे। पूँजीपतियों के स्वार्थ के लिए हर एक शब्द में झूठ बोला गया। इन स्कूलों में मज़दूरों और किसानों की युवा पीढ़ी को शिक्षा नहीं मिलती थी बल्कि उनसे बस पूँजीपतियों के हित साधन की क़वायद करवायी जाती थी। उनका प्रशिक्षण ऐसे किया जाता था कि वे महज़ पूँजीपतियों के उपयोगी ग़ुलाम बन सकें और उनकी शान्ति और आराम में विघ्न डाले बना उनके लिए मुनाफ़ा पैदा कर सके।” (The Tasks of the Youth Leagues, page 285, Collected Works vol.31 , Progress Publishers, अनुवाद हमारा )
बुर्जुआ शिक्षा-शास्त्र से संघर्ष की प्रक्रिया में ही क्रान्तिकारी चीनी शिक्षा व्यवस्था का आरम्भ और विकास हुआ। शिक्षा के क्षेत्र में यह दो लाइनों का संघर्ष पूरे समाज और कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर चल रहे वर्ग संघर्ष की अभिव्यक्ति थी। यह 50 के दशक के उत्तरार्द्ध से लेकर 70 के दशक के मध्य तक अपने सबसे तीखे रूप में अभिव्यक्त हुई। हालाँकि यह कहा जा सकता है कि इस वर्ग संघर्ष के बीज चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा 1930 और 1940 के दशक में येनान के आधार इलाकों में पनपे थे। जब माओ के नेतृत्व में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने ख्रुश्चेव की संशोधनवादी लाइन और ल्यु श्याओ ची, देंग शियाओ पिंग और लिन प्याओ विजातीय प्रवृत्तियों पर राजनीतिक-वैचारिक हमला तेज़ किया तब शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त संशोधनवादी और बुर्जुआ विचारधारा, व्यवहार और प्रवृत्तियाँ भी इस हमले का निशाना बनी। बुर्जुआ विचारधारा, व्यवहार और प्रवृत्तियों के खिलाफ़ तीव्र संघर्ष करते हुए क्रान्तिकारी चीनी शिक्षा प्रणाली महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान अपने चरम बिन्दु पर पहुँची। इस तरह समाजवादी चीन की शिक्षा व्यवस्था ने दुनिया के सामने पूँजीवादी शिक्षा प्रणाली का एक समाजवादी विकल्प प्रस्तुत किया।
जिस तरह समाजवादी विचारधारा बिना किसी लाग-लपेट के स्पष्ट शब्दों में ऐलान करती है कि वह सर्वहारा वर्ग की विचारधारा है न कि “पूरे” समाज की, जिसका ढोंग अभी तक की सभी शोषक वर्ग की विचारधाराएँ करती चली आई हैं । ठीक उसी प्रकार क्रान्तिकारी चीनी शिक्षा व्यवस्था ने डंके की चोट पर यह ऐलान किया कि वह सर्वहारा वर्ग और सर्वहारा राज्य सत्ता के हितों की सेवा करती है। महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान माओ ने समाजवादी निर्माण के लिए “राजनीति को कमान में रखने” का जो आम नारा दिया उसे क्रान्तिकारी चीनी शिक्षा व्यवस्था पर भी लागू किया गया। माओ का यह नारा ल्यु श्याओ ची और देंग शियाओ पिंग जैसे संशोधनवादियों के “उत्पादन को कमान में रखने” की कार्यदिशा के खिलाफ़ जाता था। उत्पादन को अधिकतम सम्भव बढ़ाने पर बल देने की संशोधनवादियों की कार्यदिशा इस तर्क पर आधारित थी कि सर्वहारा क्रान्ति के बाद निजी सम्पति का नाश हो जाता है। उत्पादन के साधनों पर सर्वहारा राज्यसत्ता का अधिकार स्थापित हो जाता है। बुर्जुआ उत्पादन सम्बन्ध समाजवादी उत्पादन सम्बन्धों में बदल जाते हैं। इस प्रकार समाज से वर्ग और वर्ग संघर्ष विलोप हो जाता हैं। वर्ग अन्तरविरोध के विलोप हो जाने के बाद समाज में उन्नत उत्पादन सम्बन्ध और पिछड़ी उत्पादक शक्ति के बीच का अन्तरविरोध ही मुख्य अन्तरविरोध के रूप में बचा रह जाता है। उत्पादन को अधिकतम सम्भव बढ़ाकर ही इस अन्तरविरोध को हल किया जा सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में इस संशोधनवादी कार्यदिशा ने ज़बरदस्त घुसपैठ की। इस राजनीतिक कार्यदिशा को अपनाते हुए संशोधनवादियों ने एक ऐसी शिक्षा प्रणाली को बढ़ावा दिया, जिसका मुख्य लक्ष्य था-एक ओर तकनीकी और प्रबन्धक विशेषज्ञों की फ़ौज तैयार करना, जिनका मक़सद मात्र उत्पादकता बढ़ाना था और वहीं दूसरी ओर मज़दूर वर्ग और व्यापक मेहनतकश जनता को बस उतनी ही शिक्षा देना जितनी उन्हें तकनीशियन, सुपरवाइज़र और मैनेजर के अधीन काम करते हुए उत्पादन बढ़ाने के लिए ज़रूरी है। हम स्पष्ट देख सकते हैं कि इन संशोधवादियों की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह पूँजीवादी शिक्षा व्यवस्था के चरित्र को ही प्रदर्शित करती है। इस संशोधनवादी कार्यदिशा का असली मक़सद भूतपूर्व शोषक वर्गों के विशेषाधिकारों की हिफ़ाज़त करना था, जो ज्ञान को अपने वर्ग तक सीमित रख कर किया जाना था। विशेषाधिकारों वाली टेक्नोक्रेटों-ब्यूरोक्रेटों की एक नई श्रेणी पनप रही थी, जो बुर्जुआ वर्ग को उपयुक्त भौतिक आधार प्रदान कर उसके खोये हुये स्वर्ग को वापिस हासिल करने के सपने संजो रही थी। इसके बरक्स माओ के “राजनीति को कमान में रखने” के नारे को शिक्षा में लागू करने का मतलब था ऐसी युवा पीढ़ी को तैयार करना जो समाजवादी चेतना से लैस हो और सर्वहारा वर्ग हितों की सेवा करना जिसका एक मात्र उद्देश्य हो। माओ की इस कार्यदिशा का अनुसरण करते हुए क्रान्तिकारी शिक्षा व्यवस्था ने जिन विशेषज्ञों को पैदा किया वे महज़ विशेषज्ञ नहीं थे बल्कि “लाल और विशेषज्ञ” (Red and Expert) थे जिन्होंने सर्वहारा राजनीति को कमान में रखते हुए मज़दूर-मेहनतकश जनता को सभी रूपों से शिक्षित प्रशिक्षित करते हुए समाजवादी अर्थव्यवस्था को नयी ऊँचाइयाँ तक पहुँचाने में अपना योगदान दिया।
शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के अन्तर को समाप्त करना : यह एक स्थापित तथ्य है कि शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के अन्तर को समाप्त करने के उद्देश्य से चीनी शिक्षा के क्षेत्र में जो प्रयोग हुए वे सबसे ज्यादा चर्चा में रहें। सर्वहारा विचारधारा के समर्थकों ने जहाँ इसे एक बेमिसाल प्रयोग बताया वहीं बुर्जुआ और संशोधनवादी आलोचकों ने इसे एक भयानक अनुभव घोषित किया। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के बीच के अन्तर तथा सिद्धान्त और व्यवहार के बीच के अन्तर को मिटाने के लिए किये गये प्रयास बेहद रचनात्मक थे। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण प्रयास था उत्पादक शारीरिक श्रम को शिक्षा से जोड़ना और इसका प्रथम प्रयोग क्रान्ति से पहले येनान में ही शुरू हो गया था, फ़िर महान अग्रवर्ती छलाँग (ग्रेट लीप फ़ारवर्ड) के दौरान इसने तेज़ी पकड़ी और आख़िरकार महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान यह अपने शिखर पर पहुँचा।
शिक्षा को शारीरिक श्रम से जोड़ने के लिए उठाये गये ठोस क़दमों के बारे में चर्चा करने से पहले मार्क्सवादी-लेनिनवादी शिक्षा-सिद्धान्त की एक अति-संक्षिप्त चर्चा यहाँ प्रस्तुत करना प्रासांगिक होगा ताकि पाठकों को हम इस पूरे प्रयोग को उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि में समझा सकें। क्रान्तिकारी चीनी शिक्षा व्यवस्था मार्क्सवादी-लेनिनवादी ज्ञानमीमांसा की नींव पर मज़बूती से टिकी हुई थी। मार्क्सवादी ज्ञानमीमांसा का दृष्टिकोण स्पष्ट है कि अपने भौतिक जीवन के उत्पादन और पुनरुत्पादन की प्रक्रिया में इन्सान प्रकृति और दूसरे इन्सानों से अन्तःक्रिया करता है और यही अन्त:क्रिया ही ज्ञान का प्राथमिक स्रोत होती है। ज्ञान पैदा होने की इस प्रक्रिया में उत्पादक शारीरिक श्रम की एक अहम भूमिका होती है। एंगेल्स ने अपने बेहद महत्वपूर्ण लेख ‘वानर से नर बनने की प्रक्रिया में श्रम की भूमिका’ में लिखते हैं कि“हाथों के विकास और श्रम के साथ शुरू हुई प्रकृति पर विजय ने हर एक नयी उपलब्धि हासिल होने पर मानव परिप्रेक्ष्य को व्यापक बनाया। वह प्रकृति की अब तक अज्ञात अभिलाक्षणिकताओं की लगातार खोज कर रहा था।” (International Publishers , page 10, अनुवाद हमारा) अपने दर्शन सम्बन्धी निबन्धों में माओ इस मार्क्सवादी-लेनिनवादी ज्ञान-सिद्धान्त की विस्तार से चर्चा करते हैं। ‘व्यवहार के बारे में’ अपने निबन्ध में माओ बताते हैं कि “मार्क्सवादी लोग मनुष्य की उत्पादक कार्रवाई को सबसे बुनियादी व्यावहारिक कार्रवाई मानते हैं, एक ऐसी कार्रवाई जो उसकी अन्य सभी कार्रवाइयों को निश्चित करती है। मनुष्य का ज्ञान मुख्यतः उसकी भौतिक उत्पादन की कार्रवाई पर निर्भर रहता है, जिसके ज़रिये वह क़दम-ब-क़दम प्राकृतिक घटनाक्रम, प्रकृति के स्वरुप, प्रकृति के नियमों और अपने तथा प्रकृति के बीच के सम्बन्धों की जानकारी प्राप्त करता है; और अपनी उत्पादक कार्रवाइयों के ज़रिये वह क़दम-ब-क़दम मनुष्य और मनुष्य के बीच के निश्चित सम्बन्धों की जानकारी भी अलग-अलग मात्रा में प्राप्त करता जाता है। इस तरह का कोई भी ज्ञान, उत्पादक कार्रवाई से अलग रहकर प्राप्त नहीं किया जा सकता।” इसी निबन्ध में माओ आगे लिखते हैं कि ज्ञान व्यवहार-सिद्धान्त-व्यवहार की द्वन्दात्मक प्रक्रिया से होते हुए विकसित होता है। सिद्धान्त ठोस सामाजिक व्यवहार पर आधारित होता है और पलट कर ठोस सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करता है और इस द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया में सिद्धान्त और व्यवहार दोनों ही पहले से उन्नत धरातल पर पहुँचते हैं। सामाजिक व्यवहार न केवल सैद्धान्तिक ज्ञान का प्राथमिक स्रोत होता है बल्कि उसकी सटीकता का पैमाना भी होता है। सैद्धान्तिक ज्ञान सामाजिक व्यवहार में उतर कर ही ख़ुद की सटीकता या सार्थकता का प्रमाण दे सकता है। अतः उत्पादन प्रक्रिया और वर्ग संघर्ष में सक्रिय भागीदारी किये बिना अर्जित प्रकृति और समाज सम्बन्धी सारे ज्ञान अधूरे और छिछले ही रह जाते हैं। इसलिए मार्क्स ने भी बार-बार शिक्षा को उत्पादक शारीरिक श्रम से जोड़ने की वकालत की थी। पूँजी खण्ड-1 में मार्क्स बताते हैं कि मनुष्य के सम्पूर्ण विकास के लिए शिक्षा में उत्पादक श्रम और व्यायाम का तालमेल एक ज़रूरी शर्त है और ‘गोथा कार्यक्रम की आलोचना’ में इसे समाज परिवर्तन का एक प्रभावी साधन बताते हैं। रूस में अक्टूबर क्रान्ति के बाद अस्तित्व में आने पर सर्वहारा सत्ता ने भी शिक्षा को उत्पादक शारीरिक श्रम से जोड़ने की दिशा में कई प्रयोग किये। ये प्रयोग पहली पंच-वर्षीय योजना के दौरान सबसे उन्नत रूप में सामने आये। इसी मार्क्सवादी-लेनिनवादी ज्ञानमीमांसा को व्यवहार में उतारते हुए और सोवियत संघ के प्रयासों से सीख लेते समाजवादी चीन ने शिक्षा को उत्पादक शारीरिक श्रम से जोड़ने के महान प्रयोग किये।
जैसा कि हमने पहले बताया है की क्रान्ति से पहले 1940 के दशक में ही येनान के आधार इलाकों में शिक्षा को उत्पादक श्रम से जोड़ने के प्रयोगों के बीज बोये गये थे। ज्यादातर स्कूल, पार्टी संगठन और सेना की इकाइयों को अपने भोजन के लिए आवश्यक अनाज का एक हिस्सा ख़ुद ही उगाना पड़ता था और साथ ही सुअर पालन, फल-सब्ज़ी की खेती, जलावन की लकड़ी और अँगार का बन्दोबस्त, दस्तकारी इत्यादि भी ख़ुद करनी पड़ती थी। यहाँ ज्यादातर स्कूल ‘मीन-बान’ श्रेणी के स्कूल थे जिसका अर्थ था जनता और स्थानीय उत्पादन इकाइयों के द्वारा चलाये जा रहे स्कूल। इन मीन-बान स्कूलों में कक्षा में औपचारिक पढ़ाई और उत्पादक श्रम दोनों को ही एक समान समय और महत्व दिया जाता था। इन स्कूलों का कोई रेगुलर पाठ्यक्रम नहीं हुआ करता था और स्कूलों को अपनी स्थानीय परिस्थिति और ज़रूरतों के हिसाब से अपने पाठ्यक्रम बनाने की छूट थी। स्कूल की वार्षिक योजना स्थानीय बुआई-रोपाई-कटाई के चक्र के अनुसार और इलाके की अनाज और बाकी ज़रूरतों के अनुसार निर्धारित होती थी। इन स्कूलों के छात्र और शिक्षकों से यह उम्मीद की जाती थी कि वे न केवल उत्पादक श्रम में उत्साह के साथ हिस्सेदारी करें बल्कि उनमें स्थानीय व्यावहारिक समस्याओं को हल करने का भी सामर्थ्य हो।
महान अग्रवर्ती छलाँग (ग्रेट लीप फ़ारवर्ड) के दौरान ‘आधा काम-आधी पढाई’ के स्वरूप वाले ‘मीन-बान’ स्कूलों का पूरे देश में प्रचार-प्रसार किया गया। ग्रामीण इलाकों में न केवल प्राथमिक स्कूल बल्कि माध्यमिक स्कूल भी ‘मीन-बान’ सिद्धान्त से चलते थे। इनमें से कृषि-सम्बन्धी माध्यमिक स्कूल और तकनीकी माध्यमिक स्कूल ख़ासे लोकप्रिय थे और 1958 में शुरू हुए सामूहिकीकरण की सफलता और कृषि-कम्यूनों के उभार में इन स्कूलों ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। सामूहिकीकरण की सफलता के लिए ज़रूरी कृषि विशेषज्ञ और टेकनीशियनों का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं माध्यमिक स्कूलों से आता था जो स्थानीय परिस्थितियों और उत्पादन प्रणालियों से अच्छा-ख़ासा वाक़िफ़ था। ‘मीन-बान’ स्कूलों की सफलता का एक सबूत यह है कि 1957 और 1958 के बीच चीन में माध्यमिक शिक्षा में नामांकन दोगुना हो गया। शहरों के सभी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों को वर्कशॉप और छोटे कारख़ाने लगा कर उत्पादन प्रक्रिया शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। जो शिक्षा संस्थान कारख़ाने या वर्कशॉप बनाने में सक्षम नहीं थे, उन्हें पास के किसी कारख़ाने में कुछ समय के लिए काम करना था। साथ ही सभी बड़े कारख़ानों को भी अपने परिसर में स्कूल स्थापित करने को कहा गया। विज्ञान के छात्रों की प्रयोगशाला अब उनके स्कूल या कॉलेज के एक छोटे से कमरे तक सीमित नहीं थी, बल्कि कारख़ाने और बड़े-बड़े खेत उनकी प्रयोगशाला बन गये थे, जहाँ वे वास्तविक उत्पादन प्रक्रिया में सक्रिय हिस्सा लेते हुए अपने सैद्धान्तिक ज्ञान को परख रहे थे और उसे विकसित कर रहे थे। स्कूल और उत्पादन स्थल के बीच पहले जो दीवार हुआ करती थी, वह अब गिरने लगी थी। शहरों से छात्रों को ग्रामीण इलाकों में किसानों के साथ मिलकर काम करने और उनकी दुनिया और उनकी ज़िन्दगी में कुछ समय के लिए जीने के लिए भी भेजा गया।
महान अग्रवर्ती छलाँग के समाप्त होने के बाद जब पार्टी और राज्यसत्ता के ऊपर संशोधनवादी लाइन हावी होने लगी, तब शिक्षा में लाये गए इन रेडिकल प्रयोगों को भी तिलांजलि देने की प्रक्रिया शुरू हो गयी। करीब पाँच साल तक शिक्षा में चली प्रतिक्रान्ति की लहर को महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति ने 1966 में निगल लिया और क्रन्तिकारी चीनी शिक्षा ने फ़िर से अपने विकास-मार्ग पर दृढ़ता के साथ कूच किया। शिक्षा को उत्पादक शारीरिक श्रम से जोड़ने का जो बीज येनान में बोया गया था और जो महान अग्रवर्ती छलाँग के दौरान एक सुन्दर पौधा बन गया था, महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति में मिले अनुकूल परिवेश में वह पौधा एक विशाल वृक्ष में बदल गया। इस दौरान महान अग्रवर्ती छलाँग के प्रयोगों को काफ़ी व्यापक पैमाने पर लागू किया गया। सर्वहारा क्रान्ति के साथ खड़े छात्र, शिक्षक, बुद्धिजीवी और विशेषज्ञ सभी ने उत्पादक शारीरिक श्रम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।
शिक्षा संस्थानों को, विशेष तौर पर विज्ञान की पढ़ाई को “खुली द्वार नीति” (ओपन डोर पॉलिसी) के तहत चलाया गया जिसका अर्थ था – शिक्षा को कक्षा के चौहद्दियों से आज़ाद करना और स्कूल को व्यापक समाज के साथ जोड़ना। एक ओर स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय के छात्र खेतों और कारख़ानों में काम करते और अपने सैद्धान्तिक ज्ञान को व्यवहार में उतारते। वहीं दूसरी ओर मज़दूर और किसान स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए जाते जहाँ उन्हें अपने व्यावहारिक ज्ञान के सैद्धान्तिक पहलुओं को समझने की शिक्षा मिलती। इस प्रक्रिया में उन्हें अपने इन्द्रिय-ग्राह्य ज्ञान (perceptual knowledge) को तर्कसंगत ज्ञान (rational knowledge) के धरातल पर विकसित करने का ज्ञान हासिल होता। “कम्यून से स्कूल और स्कूल से कम्यून” तथा “कारख़ाने से स्कूल और स्कूल से कारख़ाना” के नारे दिये गये जिसके तहत कारख़ाने और कम्यून अपने चुने हुए मज़दूरों और किसानों को स्कूल और कॉलेजों में उच्च शिक्षा के लिये भेजते। कुछ महीने या कुछ साल उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद मज़दूर और किसान कम्यून और कारख़ानों में वापस लौट आते थे। यह साफ़ देखा गया कि जब इन मज़दूरों के वर्षों के व्यावहारिक अनुभव को सैद्धान्तिक ज्ञान की रौशनी मिली तो न केवल उनकी उत्पादकता में बढ़ोत्तरी हुई बल्कि वे वैज्ञानिक और तकनीकी शोध कार्य में भी अपना योगदान देने लगे। इस मामले में शंघाई मशीन टूल कारख़ाना पूरे देश में ऐसा मशहूर कारख़ाना बना, जिसमें मज़दूरों ने तकनीकी शिक्षा हासिल करने के बाद बेहतर किस्म की मशीनों को डिज़ाइन करने में प्रशिक्षित इंजीनियरों और तकनीशियनों को भी पीछे छोड़ दिया था। कम्यून और कारख़ानों से किसान और मज़दूर महज़ पढ़ने के लिए ही स्कूल, कॉलेजों में नहीं जाते थे, बल्कि उनमें से सबसे उन्नत तत्व स्कूल और कॉलेजों में पढ़ाते भी थे। मजदूर वर्ग से आने वाले छात्रों और शिक्षकों की आलोचनाओं और टिप्पणियों से प्रशिक्षित शिक्षक और प्रोफ़ेसर भी शिक्षा लेते थे और ग़लतियाँ भी सुधारते थे। इस आलोचना-आत्मालोचना की प्रक्रिया में शिक्षक और प्रोफ़ेसरों ने अमेरिकी तथा सोवियत शिक्षा व्यवस्था का अन्धा अनुसरण करने की प्रवृत्ति से भी स्वयं को मुक्त किया। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि शिक्षा को उत्पादक शारीरिक श्रम से जोड़ने के प्रयोग से ऐसे विशेषज्ञ और बुद्धिजीवी पैदा हुए जो सक्रिय तौर पर उत्पादक शारीरिक श्रम करने में समर्थ थे और ऐसे मज़दूर-किसान तैयार हुए जो बौद्धिक श्रम भी भली-भाँति कर सकते थे।
हमें यहाँ इस बात पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि शिक्षा को उत्पादक शारीरिक श्रम से जोड़ने का एक मात्र लक्ष्य सिद्धान्त और व्यवहार के बीच के अन्तर को समाप्त करना नहीं था बल्कि इसका एक और महत्वपूर्ण उद्देश्य था छात्रों, बुद्धिजीवियों और कम्युनिस्ट काडरों को मज़दूर वर्ग और आम मेहनतक़श जनता की ज़िन्दगियों के करीब लाना, उनके साथ जीवन्त सम्पर्क स्थापित करना था । माओ का यह साफ़ मानना था कि मज़दूरों-किसानों के साथ उत्पादन प्रक्रिया और वर्ग संघर्ष में भागीदारी किये बग़ैर छात्र और बुद्धिजीवियों में सच्ची समाजवादी चेतना का सृजन करना असम्भव था। मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की शिक्षाओं को आत्मसात करने, सर्वहारा राजनीति को कमान में रखने, मज़दूरों-किसानों के साथ ख़ुद को जोड़ने, उनसे शिक्षित होने और उनकी सेवा करने की प्रक्रिया में ही छात्र, नौजवान और बुद्धिजीवी अपने आप को बुर्जुआ विचारों और प्रवृतियों के प्रभाव से मुक्त कर सकते हैं और अपना क्रान्तिकारी रूपान्तरण कर सकते हैं। युवाओं को मज़दूरों-किसानों के जनसमूह से ख़ुद को जोड़ने की ज़रूरत को रेखांकित करते हुए माओ लिखते हैं “हम इसका फ़ैसला कैसे करेंगे कि कोई नौजवान क्रान्तिकारी है या नहीं? हम कैसे बता सकते हैं? इसे परखने का बस एक ही पैमाना है कि क्या वह नौजवान मज़दूरों और किसानों के व्यापक जनसमुदाय के साथ जुड़ने के लिए तैयार है और क्या वह ऐसा व्यवहार में करता है? अगर वह ऐसा करने के लिए तैयार है और वह वाकई ऐसा करता है तो वह एक क्रान्तिकारी है; नहीं तो वह एक ग़ैर-क्रन्तिकारी या प्रति क्रान्तिकारी है।” (“The Orientation of the Youth Movement” (May 4, 1939), Selected Works, Vol. II, p. 246, अनुवाद हमारा)
महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान मेहनतकश जनता के साथ एक होने, उनसे सीखने और उनकी सेवा करने का नारा सबसे मुखर तौर पर बुलन्द किया गया और इस नारे को व्यवहार में उतारने का एक महत्वपूर्ण साधन बना शिक्षा को उत्पादक श्रम से जोड़ना। उच्च शिक्षा या कोई नौकरी पाने के लिए माध्यमिक स्कूल से उत्तीर्ण होने के बाद छात्रों का कम से कम एक से दो साल ग्रामीण इलाकों में उत्पादक श्रम में भागीदारी करना एक ज़रूरी शर्त बना दिया गया। एक लेखक के अनुसार 1968 और 1977 के बीच 1.2 करोड़ छात्र शहरों से अपनी माध्यमिक शिक्षा खत्म कर गाँवों में आ गये जहाँ जीवन शहरों की तुलना में ज्यादा कठिन था। मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के अन्तर को कम करने के साथ-साथ इस प्रयोग के द्वारा गाँवों और शहरों के अन्तर को भी कम करने की कोशिश की गयी।
प्रवेश परीक्षा की परम्परा की पूरी समाप्ति : उस समय चीन में इंजीनियर, डॉक्टर, प्रोफेसर बनने का या कोई और अच्छी सरकारी नौकरी पाने के लिए परीक्षाओं में अच्छे अंक लाकर देश के सबसे अच्छे स्कूलों और कॉलेजों में दाखिला लेना सबसे बेहतर रास्ता हुआ करता था। इन परीक्षाओं में प्रतिस्पर्धा बहुत अधिक हुआ करती थी। यह ज़ाहिर सी बात थी कि शासक वर्गों से आने वाले छात्र ही ज्यादातर इन प्रवेश परीक्षाओं में उत्तीर्ण हुआ करते थे क्योंकि उनके पास सदियों के सांस्कृतिक और शैक्षणिक प्रभुत्व का अनुभव हुआ करता था। लम्बे समय से मज़दूरों, किसानों, सैनिकों, क्रान्तिकारी छात्रों और शिक्षकों के व्यापक जनसमुदाय ने यह बता दिया था कि वे पारम्परिक प्रवेश परीक्षा की व्यवस्था से खुश नहीं हैं और इसलिए वे इसे समाप्त करने की माँग कर रहे थे। जून 13,1966 को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय कमेटी ने पुरानी प्रवेश परीक्षा की व्यवस्था को ख़त्म करने की घोषणा की। यह महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान शिक्षा के क्षेत्र में किया गया पहला बड़ा परिवर्तन था। क्रान्तिकारी चीनी शिक्षा के समर्थकों का यह स्पष्ट मानना था कि स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय में प्रवेश परीक्षा में मिले अंक के आधार पर दाख़िले की व्यवस्था के कारण ज्यादातर मज़दूरों, छोटे और निम्न-मध्यम किसानों, क्रान्तिकारी काडरों, क्रान्तिकारी सैनिकों, क्रान्तिकारी शहीदों के बच्चों को दाख़िला नहीं मिल पता पता है। इसके ज़रिये पुराने शोषक वर्ग शिक्षा संस्थानों पर अपना आधिपत्य बनाए रखने में कामयाब होते हैं। इन संस्थानों में वे अपने खोये हुए स्वर्ग को दुबारा हासिल करने के उद्देश्य से अपनी नयी पीढ़ी को शिक्षित-प्रशिक्षित करते हैं। यह व्यवस्था नौजवानों की चेतना के क्रान्तिकारी होने में बाधा डालती है और उनमें व्यक्तिगत शोहरत और ओहदे की भूख पैदा करके उन्हें बुर्जुआ पेशेवर बनने के लिए प्रेरित करती है। शिक्षा के क्षेत्र में चल रहे वर्ग संघर्ष को सर्वहारा वर्ग के पक्ष में मोड़ने के लिए यह ज़रूरी था कि स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय में दाख़िले की नीति सर्वहारा वर्ग और उसके सहयोगी वर्गों के अनुकूल हो। क्रान्तिकारी चीनी शिक्षा व्यवस्था ने यह ऐलान किया कि जहाँ तक इम्तहानों में अंक हासिल करने की बात है तो “अंको के हिसाब से सब एक समान” नहीं होते हैं और शिक्षा संस्थानों में दाख़िले के सन्दर्भ में भी सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व स्थापित किया जाएगा।
दाख़िले की पुरानी संयुक्त राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा के समाप्त होने के बाद जो नयी प्रणाली लायी गयी, उसके अनुसार निर्धारित उत्पादन इकाइयाँ (कारख़ाने, कम्यून, उत्पादन ब्रिगेड आदि) और सेना की इकाइयाँ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के दाख़िले के लिए कुछ उम्मीदवारों के नाम सुझाव के तौर पर भेजती थीं और उम्मीदवारों का अन्तिम चयन कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की क्रान्तिकारी कमेटियाँ किया करती थीं। ये क्रान्तिकारी कमेटियाँ क्रान्तिकारी छात्रों, शिक्षकों, सैनिकों, काडरों और मज़दूरों-किसानों की संयुक्त कमेटियाँ हुआ करती थीं जो सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान ही अस्तित्व में आयी थीं। (यह क्रान्तिकारी कमेटियाँ सिर्फ़ शिक्षा में ही नहीं बल्कि उत्पादन और अधिरचना के सारे क्षेत्रों में बनी थीं और कहा जा सकता है कि ये कमेटियाँ महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के तृणमूल स्तर की मुख्य संचालक इकाइयाँ थीं।) छात्रों के चयन में मज़दूर-किसान वर्ग से आने वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जाती थी और उम्मीदवारों के अतीत के राजनीतिक व्यवहार और उत्पादक श्रम और वर्ग संघर्ष में सक्रिय भागीदारी को ध्यान में रखा जाता था।
समान स्कूल व्यवस्था की स्थापना : 1958 में महान अग्रवर्ती छलाँग के दौरान देश भर में ‘मीन-बान’ और ‘आधा काम-आधी पढ़ाई’ वाले स्कूलों की शुरुआत होने के बावजूद कई अलग-अलग क़िस्म के स्कूल मौजूद थे जो गुणवत्ता, पाठ्यक्रम, प्रबन्धन और वित्तपोषण में एक दूसरे से काफ़ी अलग थे। इन स्कूलों को मुख्यतः दो व्यापक धाराओं में बाँटा जा सकता है – पहली धारा थी राज्य द्वारा चलायी जाने वाली नियमित स्कूलों की और दूसरी थी उत्पादन ब्रिगेड, कम्यून या कारख़ानों द्वारा चलाये जा रहे मीन-बान या ‘आधा काम-आधी पढ़ाई’ वाले स्कूल। पहली धारा के स्कूलों को बेहतर स्कूल माना जाता था जहाँ पढ़ाई -लिखाई पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाता था और उत्पादक श्रम पर ज़ोर कम रहता था। जहाँ राज्य द्वारा वित्तपोषित होने के कारण बेहतर संसाधन और ज्यादा क़ाबिल शिक्षक थे। इन नियमित स्कूलों में ‘की-पॉइन्ट’(key point) सबसे कुलीन स्कूल हुआ करते थे जिन्हें देश के चुनिन्दा सबसे बेहतरीन स्कूलों में गिना जाता था। इन ‘की-पॉइन्ट’ स्कूलों को सरकारी अनुदान का सबसे बड़ा हिस्सा मिलता था। इन स्कूलों में मुख्यतः ऊँचे ओहदे वाले सरकारी अफ़सर, वरिष्ठ काडर, विशेषज्ञ और बुद्धिजीवियों के बच्चे ही दाखिला पाते थे। इसलिए मज़दूरों-किसानों और क्रान्तिकारी छात्रों को इन की-पॉइन्ट स्कूल के साथ साथ मौजूद बहु-स्तरीय स्कूल व्यवस्था उतनी ही नापसन्द थी जितनी उन्हें प्रवेश परीक्षा नापसन्द थी। इसलिए महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के शुरू होने के बाद इन ‘की-पॉइन्ट’ स्कूलों के सभी विशेषाधिकारों को ख़त्म कर दिया गया और बहु-स्तरीय स्कूल व्यवस्था के बदले एक समान स्कूल व्यवस्था स्थापित की गयी। ग्रामीण इलाकों में नियमित और मीन-बान स्कूलों में अन्तर को ख़त्म करके ज्यादातर स्कूलों को उत्पादन ब्रिगेड और कम्यूनों को सौंप दिया गया और राज्यों से उन्हें बस छोटे पैमाने का अनुदान मिलता था। ग्रामीण स्कूलों के इस प्रबन्धन का शहरों में हूबहू नक़ल नहीं किया जा सकता था। इसलिए शहरों के सारे स्कूलों को राज्य प्रबन्धन के अन्तर्गत लाया गया और ‘की-पॉइन्ट स्कूल’ और प्रवेश परीक्षाओं के जड़मूल से समाप्त होने के बाद उनके बीच के तथाकथित गुणात्मक अन्तर भी समाप्त हो गये। सारे स्कूलों में अब औपचारिक पढ़ाई और उत्पादक शारीरिक श्रम को समान समय और समान महत्व दिया जाता था। इसके अलावा काडरों के बच्चों के लिए विशेष स्कूल, बालिकाओं के लिए अलग स्कूल, सैनिकों के बच्चों के लिए विशेष स्कूल, विश्वविद्यालय परिसर में चल रहे विशेष स्कूल आदि के भी विशेषाधिकारों को ख़त्म करके उनको राज्य द्वारा चलाये जाने वाले साधारण स्कूल की श्रेणी में ले आया गया।
शिक्षा में जनता की पहलक़दमी : महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान माओ ने जनता की पहलक़दमी और प्रबन्धन और निर्णय की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी पर ख़ासा ज़ोर दिया। जनता की अपार क्रान्तिकारी और सृजनात्मक ऊर्जा को उभारकर उसे सही दिशा में इस्तेमाल करने के लिए पार्टी और जनता के बीच के द्वन्द्वात्मक समबन्ध को रेखांकित किया गया और पार्टी को जनता से सीखते हुए जनता को सही नेतृत्व प्रदान करने की ज़रूरत पर बल दिया गया। इस दौरान चीनी समाज के अन्य सभी क्षेत्रों की तरह ही शिक्षा के क्षेत्र में भी जनता की पहलक़दमी और सृजनात्मकता की बेहतरीन मिसालें देखने को मिलीं। स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय के प्रबन्धन की ज़िम्मेदारी क्रान्तिकारी कमेटियों के कन्धों पर आ गयी। शिक्षा अनुष्ठानों में यह क्रान्तिकारी कमेटियाँ मज़दूर-किसान, पार्टी काडर और क्रान्तिकारी छात्रों-शिक्षकों के संश्रय से बनती थी जो पार्टी कमेटियों के अधीन थी। छात्रों का दाखिला, शिक्षकों की भर्ती, पाठ्यक्रम की विशेषताओं का निर्धारण, वित्तीय लेखा-जोखा इत्यादि सभी छोटे से छोटे और बड़े से बड़े कामों में इन क्रान्तिकारी कमेटियों की विशेष भूमिका होती थी। क्रान्तिकारी कमेटियों का अस्तित्व में आना “बुर्जुआ वर्ग के ऊपर सर्वहारा वर्ग के चौमुखी अधिनायकत्व” को सुदृढ़ करने की ओर एक निर्णायक क़दम था।
इसके साथ ही छात्र-शिक्षक सम्बन्ध में भी आमूलचूल परिवर्तन आये। शैक्षणिक संस्थाओं का प्रबन्धन, पाठ्यक्रम की रूप-रेखा तैयार करना इत्यादि तमाम निर्णय प्रक्रियाओं में छात्रों को सक्रिय हिस्सेदारी प्राप्त हुई। इसके अलावा पढ़ने-पढ़ाने की प्रक्रिया में भी बुनियादी बदलाव लाये गये। छात्रों और शिक्षकों के बीच एक द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध बना जिसके अनुसार शिक्षक न केवल छात्रों को पढ़ाते थे, बल्कि उनसे सीखते भी थे। महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान क्रान्तिकारी छात्रों के द्वारा शिक्षकों के पढ़ाने के तरीकों पर और उनकी बुर्जुआ प्रवृत्तियों पर खुल कर बेझिझक आलोचना करना एक आम बात बन गयी थी। छात्रों के पास अब यह ताक़त थी कि वे मज़दूर-किसान और क्रान्तिकारी काडरों के साथ मिल कर इस बात का निर्धारण करें कि उन्हें कौन पढ़ायेगा? कैसे पढ़ायेगा? और क्या पढ़ायेगा? दूसरे शब्दों में कहा जाए तो उनकी शिक्षा की कमान अब स्वयं उनके अपने हाथों में थी।
महान अग्रवर्ती छलाँग और ख़ास करके महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान शिक्षा एक जन आन्दोलन बन गयी। न केवल शैक्षणिक संस्थानों के प्रबन्धन में जन कार्यदिशा लागू की गयी, बल्कि पढ़ने और पढ़ाने जैसी बुनियादी शिक्षा प्रक्रिया भी एक जन कार्रवाई बन गयी। मज़दूरों-किसानों का पढ़ना, पढ़ाना और शोध करना इसका एक उदाहरण है, जिसके बारे में हम ऊपर चर्चा कर चुके हैं। सही मायनों में जनता की शिक्षा तक पहुँच क्या होती है? इसके बारे में शशि प्रकाश ने अपने लेख ‘समाजवाद की समस्याएँ, पूँजीवादी पुनर्स्थापना और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति’ में लिखा है“माओ ने ज्ञान के व्यक्तिगत सम्पत्ति होने के बुर्जुआ दर्शन पर प्रहार करते हुए जनसमुदाय को बताया कि ज्ञान एक सामाजिक सम्पत्ति है और इस पर कुछ लोगों का अधिकार बुर्जुआ वर्ग की सत्ता का एक प्रबल भौतिक आधार है। द्वन्द्ववाद और अन्य दार्शनिक विषय जो अब तक जनता के लिए अबूझ माने जाते थे और उसकी पहुँच से बाहर थे, उनका सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान व्यापक प्रसार हुआ और आम मेहनतकश जनता ने इन्हें आत्मसात करके दैनन्दिन व्यवहार में लागू करने की चमत्कारी मिसालें क़ायम कीं।” इसी प्रक्रिया का एक विस्तृत उदाहरण हमें ‘दर्शन कोई रहस्य नहीं’ लेख में देखने को मिलता है जिसमें चेकियांग प्रान्त के चिंचिएन उत्पादन ब्रिगेड के किसानों के अनुभव का वर्णन किया गया है कि किस प्रकार उन्होंने माओ के अन्तरविरोध सम्बन्धी लेखों का गहन अध्ययन करके उत्पादन सम्बन्धी स्थानीय समस्याओं को हल किया, उत्पादन को कई गुना बढ़ाया और संशोधनवादियों द्वारा समूहिकीकरण की प्रक्रिया में अड़चन डालने के प्रयासों को परास्त किया। देश भर में सैकड़ों मज़दूरों और किसानों के ‘दर्शन-अध्ययन समूह’ बने जिन्होंने न केवल मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी विज्ञान का जनता के बीच प्रचार-प्रसार किया बल्कि खुद कई दर्शन सम्बन्धी लेख भी लिखे। विश्वविद्यालयों और अकादमिक दायरों को लाँघते हुए दर्शन और विज्ञान कारख़ानों और खेत-खलिहानों में जा स्थापित हुआ। जनता की पहलक़दमी और सृजनात्मक शक्ति को निर्बन्ध करने में मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद उनका हथियार बना तथा माओ के नेतृत्व में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी उनकी पथ प्रदर्शक।
सर्वहारा वर्ग की राजनीति को कमान में रख कर शिक्षा को एक जन आन्दोलन का रूप दिया गया, इसे उत्पादक शारीरिक श्रम के साथ जोड़ते हुए मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के अन्तर को मिटाया गया और प्रवेश परीक्षाओं को समाप्त कर समान स्कूल व्यवस्था की स्थापना की गयी। इन क्रान्तिकारी राजनीतिक प्रयासों का ही परिणाम था कि उच्च शिक्षा में मज़दूर और किसान वर्ग के छात्रों की हिस्सेदारी क्रमशः बढ़ती गयी। 1952 में उच्च शिक्षा में मज़दूर और किसान वर्ग के छात्रों का अनुपात 21 प्रतिशत था जो 1958 में बढ़ कर 48 प्रतिशत, 1962 में 67 प्रतिशत हो गया और 1970 आते आते यह दर 90 तक पहुँच गय।
वैज्ञानिक व तकनीकी शोध और विकास : समाज के सभी क्षेत्रों की तरह वैज्ञानिक व तकनीकी शोध और विकास में भी जन कार्यदिशा लागू की गयी और जनता की पहलक़दमी और सृजनात्मकता और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चीन में विज्ञान और तकनीकी विकास ने, ख़ासकर महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान, तीव्र गति पकड़ी । चीन के क्रान्तिकारी वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और मज़दूर-किसानों ने पूँजीवादी देशों में प्रचलित इस बुर्जुआ प्रथा को समाप्त किया कि शुद्ध-वास्तविक शोध सिर्फ़ ‘आदर्श’ परिवेश में, प्रयोगशालाओं के बन्द दरवाज़ों के पीछे, आम मेहनतकश जनसमुदाय के वर्ग संघर्ष और शारीरिक श्रम से कट कर, महज़ बौद्धिक चिन्तन-मनन करते हुए ही किया जा सकता है। जैसा कि हमने पहले चर्चा की है कि मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के अन्तर को मिटाने की प्रक्रिया में ऐसे बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ पैदा हुए जो उत्पादक शारीरिक श्रम और वर्ग संघर्ष में भी सक्रिय हिस्सेदारी करते थे और ऐसे मज़दूर-किसान निकले जो बौद्धिक श्रम और वैज्ञानिक शोध भी करते थे। सारी उत्पादन इकाइयों में शोध कार्य मज़दूरों-किसानों, तकनीकी विशेषज्ञों-वैज्ञानिकों और पार्टी काडरों के संश्रय से बने ‘एक में तीन’ समूहों (3-in-1 groups) के द्वारा किये जाते थे। वैज्ञानिक प्रयोग और शोध में बड़े पैमाने में जनता की भागीदारी का एक उदाहरण है ग्रामीण प्रयोग समूहों (rural experimentation groups) का बनना जो ज़िला विज्ञान विभाग के साथ सम्पर्क रखते हुए स्थानीय स्तर पर वैज्ञानिक व तकनीकी शोध कार्य किया करते थे। सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान एक करोड़ से ज़्यादा मज़दूर, किसान और युवा तकनीशियन इन समूहों का हिस्सा बने थे। क्रान्तिकारी चीनी वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने वैज्ञानिक शोध और तकनीकी विकास के क्षेत्र में मार्क्सवादी पहुँच और पद्धति के प्राधिकार को स्थापित किया और वैज्ञानिक दायरों में फैले हुए भाववादी, अधिभूतवादी और अनुभववादी पद्धतियों और सिद्धान्तों के खिलाफ़ अनवरत संघर्ष चलाया।
इस दौरान चीन ने कृषि विज्ञान, भूविज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, परमाणु शक्ति, अन्तरिक्ष शोध, सामरिक शोध, अर्धचालक (semiconductor) सम्बन्धी शोध इत्यादि में विशेष तरक्की हासिल की। चीनी वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति की एक ऊपरी समझ पाने के लिए हम भारत और चीन की वैज्ञानिक उपलब्धियों की एक सरसरी तुलना कर सकते हैं। प्रथम परमाणु बम के परीक्षण में और अन्तरिक्ष में खुद अपने कृत्रिम उपग्रह छोड़ने में चीन भारत से दस साल आगे था और इन उपलब्धियों को हासिल करने वाला दुनिया का महज़ पाँचवा देश था। यह ध्यान देने की बात है कि भारत को उस दौरान दोनों महाशक्तियों से वैज्ञानिक और तकनीकी मदद मिलती थी। जबकि चीन को किसी विकसित पूँजीवादी देश से कोई मदद तो दूर, यहाँ तक कि ख्रुश्चेव के आने के बाद सोवियत संघ से जो कुछ मदद मिलती थी, वह भी मिलनी बन्द हो गयी। इसके विपरीत दोनों महाशक्तियाँ चीन के वैज्ञानिक और तकनीकी विकास में रोड़ा अटकाने का प्रयास करने लगीं। इन प्रतिकूल अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का सामना करते हुए क्रान्तिकारी चीन ने इतनी वैज्ञानिक और तकनीकी तरक्की कर ली कि वह तीसरी दुनिया के पिछड़े देशों और राष्ट्रीय मुक्ति में संघर्षरत जनता को वैज्ञानिक और तकनीकी मदद प्रदान करने की स्थिति में आ गया। यह ज़ाहिर है कि जब पूरे जनसमुदाय को बचपन से ही एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण दिया जाता है और जब विज्ञान चन्द पूँजीपति घरानों की निजी सम्पत्ति की जगह जनसमुदाय के प्राधिकार में सामाजिक सम्पत्ति बन जाता है, जिस पर पूरे जनसमुदाय का अधिकार हो तब विज्ञान इंसान की सारी ज़रूरतों को पूरा करते हुए तेज़ी से आगे बढ़ता है। ऐसे विज्ञान के विकास की कोई सीमा नहीं होती जिसके विकास में करोड़ों मेहनतकश लोगों की सृजनात्मक शक्ति लगी होती है।
जगह की सीमा के कारण समाजवादी चीन में हासिल की गयी वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों के बारे में हम यहाँ विस्तार से चर्चा नहीं कर पा रहे हैं। मगर वैज्ञानिक और तकनीकी शोध के बारे में यहाँ यह संक्षिप्त चर्चा इसलिए आवश्यक थी क्योंकि माओ की मृत्यु के बाद जब चीन में पूँजीवादी पुनर्स्थापना हो गयी तो देंग श्याओ पिंग और उसके संशोधनवादी समर्थकों ने महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति और क्रान्तिकारी शिक्षा व्यवस्था की उपलब्धियों को नकारते हुए उसे एक ‘महान विपदा’ साबित करने के लिए इस बात का काफ़ी शोर मचाया कि सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान बुद्धिजीवियों के साथ बहुत नाइंसाफ़ी हुई, जिसकी वज़ह से देश में वैज्ञानिक और तकनीकी विकास बाधित हुए। उस दौर में चीन की यात्रा करने वाले पश्चिमी देशों के बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के विस्तृत विवरणों से तथा कुछ नए शोधों से यह बात साफ़ हो गयी है कि देंग और उसके समर्थकों के द्वारा फैलाया गया यह एक झूठ था, सफ़ेद झूठ। यह बिल्कुल ग़लतबयानी है कि सांस्कृतिक क्रान्ति के दौर में वैज्ञानिक शोध और तकनीकी विकास रुक गया था। तथ्य इसके विपरीत बात करते हैं। पश्चिमी वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों के विवरणों से पता चलता है की वे चीनी समाज में आम जनता की विज्ञान तक सीधी पहुँच को देख कर प्रभावित थे। इतना ही नहीं, जनता की बुनियादी समस्याओं को हल करने में विज्ञान के सक्रिय उपयोग से भी वे बेहद प्रभावित थे। यह सच है कि सांस्कृतिक क्रान्ति के शुरुआती दिनों में वर्ग संघर्ष की जो भीषण लपटें संशोधनवादियों के छुपे भूमिगत आशियानों पर धावा बोल रही थीं, उन लपटों की ज़द में कुछ ऐसे बुद्धिजीवी भी ज़रूर आ गए थे जो मुख्यतः स्वयं संशोधनवादी या उनके समर्थक भी नहीं थे। यह भी सच है कि कई स्कूल और कॉलेजों में संशोधनवाद के खिलाफ़ वैचारिक-राजनीतिक संघर्ष ने छात्र गुटों के बीच हाथापाई की शक्ल भी ले ली थी। मगर जैसा माओ ने कहा था “क्रान्ति एक प्रीतिभोज नहीं है, या एक रचना लिखने या चित्रकारी करने या कढ़ाई करने के सामान भी नहीं है ; यह इतना सभ्य, इतना मन्थर और सौम्य, इतना शान्त, दयालु, शालीन, संयमित और उदार नहीं हो सकती। क्रान्ति एक विद्रोह है, एक हिंसक परिघटना है जिसमें एक वर्ग दूसरे वर्ग को बल पूर्वक उखाड़ फेकता है।” (“A revolution is not a dinner party, or writing an essay, or painting a picture, or doing embroidery; it cannot be so refined, so leisurely and gentle, so temperate, kind, courteous, restrained and magnanimous. A revolution is an insurrection, an act of violence by which one class overthrows another.”) आमूलचूल क्रान्तिकारी परिवर्तन के दौरान ऐसी कुछ गलतियों से बच पाना कठिन होता है क्योंकि यह परिवर्तन इतना वेगवाही होता है कि एक-एक पहलू को नियन्त्रण में रख पाना लगभग असम्भव होता है। लेकिन चूँकि ऐसे परिवर्तनों का सार सर्वहारा अधिनायकत्व की रक्षा करते हुए वर्ग संघर्ष को आगे बढ़ाना होता है तो पूरा यक़ीन होता है कि चीज़ें बेहद ज़ल्द नियन्त्रण में कर ली जाएँगी।
समाजवादी चीन में शिक्षा के क्षेत्र में हुए क्रान्तिकारी प्रयोग के कुछ विशेष पहलुओं पर हमने यहाँ चर्चा की है। 1976 में माओ की मृत्यु के बाद ‘गैंग ऑफ़ फोर’ और अन्य क्रान्तिकारी नेताओं को क़ैद करने के बाद चीन में देंग श्याओ पिंग के नेतृत्व में पूँजीवादी पुनर्स्थापना शुरू हो गयी। इसके बाद चीनी शिक्षा व्यवस्था में भी संशोधनवादियों का दबदबा कायम हो गया। एक-एक करके क्रान्तिकारी चीनी शिक्षा व्यवस्था के सभी क्रान्तिकारी प्रयोगों का परित्याग कर दिया गया। 1977 में ही संयुक्त प्रवेश परीक्षा और ‘की-पॉइन्ट’ स्कूलों को बहाल कर दिया गया और 1980 आते आते शिक्षा को शारीरिक श्रम से जोड़ने के प्रयोग को समाप्त कर दिया गया। स्कूलों और कॉलेजों में शारीरिक श्रम को महज़ एक औपचारिक काम बना कर छोड़ दिया गया। आज चीन की शिक्षा व्यवस्था किसी भी अन्य पूँजीवादी देश की शिक्षा व्यवस्था जैसी रह गयी है। पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बाद शिक्षा के प्रतिक्रान्तिकारी रूपान्तरण की प्रक्रिया की भी यहाँ विस्तार से चर्चा नहीं की जा सकती है। यह लेख हमारे पाठकों को समाजवादी चीन और सोवियत संघ में शिक्षा के क्षेत्र में किये गए प्रयोगों से परिचित करवाने का एक छोटा प्रयास था। समाजवादी शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा पद्धति की गहन समझदारी के लिए चीन और सोवियत संघ में हुए व्यापक प्रयागों के गम्भीर अध्ययन की आवश्यकता है। इसके साथ ही दूसरे अन्य देशों में भी हुए कुछ अपेक्षाकृत छोटे प्रयागों का भी अध्ययन ज़रूरी है। परिवर्तन का सपना देखने वाले सभी छात्रों और नौजवानों को इन तमाम प्रयोगों की उपलब्धियों और कमज़ोरियों से सबक़ लेने की आज बेहद ज़रूरी है। हमें समझना होगा कि एक समान-नि:शुल्क-वैज्ञानिक शिक्षा हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और अगर हमें यह हासिल नहीं है तो चीन के सर्वहारा वर्ग और आम मेहनकश जनता की तरह उन्नत और न्यायसंगत शिक्षा व्यवस्था के लिए महान संघर्ष छेड़ना होगा। आज अपने आप को इसी शिक्षा व्यवस्था में कहीं खपा कर या इससे वंचित रह कर चुप-चाप अज्ञानता में जीते चले जाने की जगह हमें यह सवाल पूछना होगा कि हमारी शिक्षा व्यवस्था का वर्ग चरित्र क्या है? यह किन वर्गों के हितों की नुमाइन्दगी करती है? क्या आज शिक्षा और ज्ञान सही मायनों में हर किसी की पहुँच में है? क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें श्रम की गरिमा सिखाती है? देश के बहु-स्तरीय स्कूली व्यवस्था और बहुस्तरीय उच्च शिक्षा का असली मक़सद क्या है? क्या यह हमें व्यापक जनसमुदाय के जीवन से सही मायनों में जुड़ने का अवसर देती है? क्या आज की शिक्षा हमें समाज को बदलने की प्रक्रिया में ख़ुद को भी बदलना सिखाती है? क्या हमें यह एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान करती है? क्या आज की शिक्षा सिद्धान्त को व्यवहार से अलग करके मानव ज्ञान के पैरों में बेड़ियों का काम नहीं कर रही? हमारे पाठ्यक्रमों में जो लिखा है क्या वह व्यापक जनसमुदाय की बुनियादी समस्याओं को हल करने का सामर्थ्य रखता है?
आज हमें महज़ फीस वृद्धि के खिलाफ संघर्ष और सबके लिए समान नि:शुल्क शिक्षा की माँग से आगे बढ़ते हुए एक क्रान्तिकारी शिक्षा की माँग करनी चाहिए। इस व्यवस्था की चौहदि्दयों के भीतर इन सवालों का जवाब मिलना असम्भव है लेकिन इससे कम में ज्ञान और शिक्षा का सामाजीकरण भी असम्भव है। हमें अपनी शिक्षा से सम्बन्धित संघर्षों को व्यापक वर्ग संघर्ष से जोड़ना होगा। समाजवादी शिक्षा और शिक्षा व्यवस्था के प्रयोगों के बारे में आम छात्रों को अवगत कराते हुए बताना होगा कि बेहतर शिक्षा हासिल करने का संघर्ष मानव मुक्ति के ऐतिहासिक संघर्ष से जुड़ा हुआ है।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, मार्च-जून 2021

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