महामारी का साल, सरकार बजाए गाल
स्वास्थ्य बजट की कहानी, खर्च सिर्फ मुँहज़ुबानी

अनन्त

28 जनवरी 2021 की तारीख प्रधानमन्त्री मोदी विश्व आर्थिक मंच के दावोस संवाद में ऑनलाइन सम्बोधन कर रहे थे। भारत उस वक़्त कोरोना वायरस महामारी की पहले लहर को झेल ही रहा था, और सामने दूसरी लहर खड़ी थी। उस सम्बोधन में लप्पेबाज प्रधानमन्त्री पूरी दुनिया के सामने अपनी सरकार की वाहवाही में लम्बी-लम्बी डींगें हाँक रहा था। मोदी दावा कर रहा था कि दुनिया देखती रही और उसकी सरकार ने कोरोना को धूल में मिला दिया।
उस भाषण के महज़ दो महीने के भीतर भारत प्रतिदिन 3 लाख नए संक्रमित मरीजों के आँकड़े को छू रहा था, हमारा देश रोज़ाना नये संक्रमितों की संख्या में दुनिया में सबसे ऊँचे पायदान पर पहुँच रहा था, हर तरफ कोहराम मचा हुआ था। बीमारों को अस्पताल में जगह मिलना तो दूर, मुर्दों को श्मशान और कब्रिस्तान में जगह मुनासिब नहीं हो रहा था। दवा, अस्पताल, बेड, ऑक्सीजन, पर्याप्त चिकित्सक व अन्य चिकित्सा कर्मचारी आदि की भयंकर कमी सबके सामने थी। फेंकूचन्द की सारी सच्चाई उभर कर सारी दुनिया के सामने आ गई। भारत पूरी दुनिया में कोरोना से लड़ने में सबसे फिसड्डी साबित हुआ।
प्रधानमन्त्री के आडम्बरपूर्ण सम्बोधन के तीन दिन बाद वित्तमन्त्री निर्मला सीतारमण के द्वारा केन्द्रीय बजट पेश किया गया। इसको लेकर भी काफी हवा बनाई गई, जैसा कि यह सरकार और गोदी मीडिया हर बार घोषित करती है, इस बार के बजट को भी ऐतिहासिक बजट घोषित किया गया। और हर बार की तरह भी यह थोथा चना बाजे घना से अधिक कुछ भी नहीं था। महामारी के इस साल में कम से कम यह उम्मीद की जा रही थी कि मोदी सरकार बजट में अपने ही स्वास्थ्य मन्त्रालय द्वारा पेश किए गए राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 द्वारा अनुशंसित राशि स्वास्थ्य सेवा के लिए आवण्टित करेगी। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 सन् 2025 तक कुल सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 फ़ीसदी हिस्सा स्वास्थ्य सेवा पर खर्च करने का लक्ष्य रखती है। जिसकी शुरुआत जीडीपी के 1.15 फीसदी हिस्सा का स्वास्थ्य सेवा में खर्च करने के साथ किया जाना था। हालाँकि, भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था की बेहद लचर स्थिति के मद्देनज़र राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति द्वारा प्रस्तावित राशि पहले से ही काफ़ी कम है, किन्तु मोदी सरकार पिछले बजट से लेकर मौजूदा बजट तक में उस तर्ज पर राशि आवण्टित करने में विफल रही है। भारत, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कोरोना वायरस केस लोड है, 2019 के राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफ़ाइल (एनएचपी) के आँकड़ों के अनुसार, अपने सकल घरेलू उत्पाद का सिर्फ एक प्रतिशत (केन्द्र तथा राज्य सरकारों को मिलाकर) सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च करता है, जो देश की आबादी, जनसांख्यिकी और लगातार बढ़ते बीमारी के बोझ को देखते हुए काफ़ी कम है। साथ ही यह दुनिया की किसी भी प्रमुख अर्थव्यवस्था के लिए भी सबसे कम है। ऑक्सफैम की ‘कमिटमेण्ट टू रिड्यूसिंग इनइक्वलिटी’ रिपोर्ट के अनुसार, भारत स्वास्थ्य ख़र्च में 155वें, नीचे से चौथे, स्थान पर है।
जनवरी माह के आखिरी सप्ताह में जारी किए गए आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट 2020-21का एक अध्याय का शीर्षक था “स्वास्थ्य सेवा आखिरकार केंद्र में”। सरकार स्वास्थ्य पर खर्च के नाम पर पूरी भूमिका बना रही थी। फ़रवरी में स्वास्थ्य बजट के आवण्टन को लेकर गोदी मीडिया बड़े-बड़े आँकड़ों की बाज़ीगरी करने लगा, बताया गया कि स्वास्थ्य सेवा के लिए इस बार बजट पिछले साल की बरक्स 137% अधिक है यानी दो गुना से भी अधिक। इस बार बजट में स्वास्थ्य सेवा के ऊपर करीब दो लाख चौबीस हजार करोड़ की राशि आवण्टित की गयी है, यह कुल जीडीपी का करीब 2 फ़ीसदी हिस्सा है, आदि, आदि। किन्तु, असलियत कुछ और है, बजट पर थोड़ा बारीक नज़र डालते ही पता चलता है कि इस साल फरवरी में पेश बजट में बजट एस्टीमेशन में जितनी राशि आवण्टित की गयी है, वह पिछले साल रिवाइज्ड एस्टीमेशन से भी कम है। दरअसल हक़ीक़त यह है कि इस बार का स्वास्थ्य बजट ले दे कर कुल जीडीपी का मात्र 0.34 प्रतिशत हिस्सा है। लेकिन मोदी सरकार द्वारा इसका इस तरह तूमार बाँधा गया कि इस बार का स्वास्थ्य बजट “जन-कल्याण” हेतु सीधे अम्बर से धरा पर लाया गया है!
आइए थोड़ा विस्तार से इस बार के बजट में स्वास्थ्य सेवा के लिए आवण्टित राशि के पीछे की गई आँकड़ों की बाजीगरी को देखते हैं। भयंकर जन-विरोधी फ़ासीवादी मोदी सरकार जनता को महज छलने, ठगने, लूटने, भ्रम में रखने का ही काम कर सकती है, और कर रही है। यही काम बजट आवण्टन में भी किया गया है। इन पूँजी के चाकरों के लच्छेदार, घुमावदार भाषणों, अल्फ़ाज़ों के बीच जो सच्चाई होती है, वह बेहद ही कुरूप और डरावनी होती है। वित्त मन्त्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में बजट को छह स्तम्भों पर आधारित बताया था, जिसमें पहला स्थान ‘स्वास्थ्य और कल्याण’ का था। लेकिन उन्होंने यह उल्लेख नहीं किया कि अपने तमाम चमक-दमक के बावजूद इस स्तम्भ को कितना खोखला और खाली रखा गया है। उन्होंने अपने भाषण में “स्वास्थ्य के लिए समग्र दृष्टिकोण” पर जोर दिया, जो “तीन क्षेत्रों को मजबूत करने: रोकथाम, उपचारात्मक और कल्याण” पर केन्द्रित है, और अपना काम इन्हीं “नेक उपदेशों” तक सीमित रखा।
कुल मिलाकर, स्वास्थ्य बजट – जैसा कि बजट के ‘प्रमुख वस्तुओं के व्यय’ विवरण से देखा जा सकता है – 67,484 करोड़ रुपये (बीई 2020-2021) से बढ़कर 73,931.77 (2021-2022) हो गया है। यह पिछले वर्ष के अनुमानित बजट (बजट एस्टीमेशन, बीई) से लगभग 10% की वृद्धि है, किन्तु यह आवण्टन वास्तव में 2020-2021 के संशोधित अनुमान (रिवाइज्ड एस्टीमेशन, आरई) 85,089 करोड़ रुपये से कम है। यानी सरकार की योजना मौजूदा वित्त वर्ष में पिछले वित्त वर्ष किए गए ख़र्च से भी कम ख़र्च करने की थी। जबकि, तमाम वैज्ञानिकों विशेषज्ञों ने दूसरी लहर को अपरिहार्य बताया था, और सरकार को लागतार इस बाबत आगाह किया था। इसलिए, इस वर्ष वास्तविक अर्थों में स्वास्थ्य बजट को कई गुणा बढ़ाना चाहिए था।
अब 137% बजट बढ़ोतरी के दावे को थोड़ा और करीब से देखते हैं। इस वृद्धि में कई ऐसी चीजें हैं जो स्वास्थ्य पर केन्द्रीय बजट से सम्बन्धित नहीं है। 2,23,846 करोड़ रुपये में से पोषण, जल और स्वच्छता पर किए जाने वाला खर्च भी शामिल है। पोषण, जल एवम् स्वच्छता की अपनी महत्ता है, किन्तु साथ ही इनका अपना स्वायत्त विभाग तथा मन्त्रालय है। इनके लिए खर्च की जाने वाली राशि को स्वास्थ्य व्यय के हिस्से के रूप में नहीं लिया जा सकता है!
किन्तु, जल एवम् स्वच्छता के लिए 60,030 करोड़ रुपये का आवण्टित बजट भी स्वास्थ्य परिव्यय में बण्डल किया गया है। इसी तरह, कोविड-19 टीकों के लिए घोषित 35,000 करोड़ रुपया एक बार का खर्च है और इसे नियमित स्वास्थ्य बजट के हिस्से के रूप में शामिल नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा, संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 275(1) के तहत वित्त मंत्रालय द्वारा दिया जाने वाला वित्त आयोग अनुदान को भी इसमें शामिल किया गया है। यह बजटीय समर्थन भी केवल एक बार के लिए है, जिसके तहत स्वास्थ्य के लिए करीब 13,000 करोड़ तथा जल एवम् स्वच्छता के लिए 36,000 करोड़ की राशि आवण्टित है। उपरोक्त घालमेल के परिणामस्वरूप बजट में कुल मिलाकर 137% की बढ़ोतरी हुई है, जोकि महज एक झूठ है। यानी संक्षेप में कहें तो अन्य विभागों और मन्त्रालयों और साथ ही एक बार खर्च किया जाने वाले खर्चों को एक साथ जोड़कर “स्वास्थ्य तथा कल्याण” के नाम पर भारी-भरकम आँकड़ों की बाजीगरी की गई है। दरअसल, केन्द्रीय स्वास्थ्य बजट अभी भी सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 0.34% पर बना हुआ है – जोकि पिछले वर्ष अनुमानित बजट (बीई) 0.31% से मामूली वृद्धि है। जबकि, वित्त वर्ष 2020-2021 के लिए संशोधित अनुमान (आरई) 82,445 करोड़ रुपये, मौजूदा वित्त वर्ष 2021-2022 के अनुमानित बजट से 22% अधिक था। लफ्फाजी और मोदी सरकार एक दूसरे का पर्याय है। पिछले सात सालों के इतिहास ने इस तथ्य की पुष्टि बारम्बार की है।
सरकार समय-समय पर अलग-अलग झुनझुना भी लोगों को थमाती रहती है। इस बार के बजट में ‘प्रधानमन्त्री आत्मनिर्भर स्वस्थ भारत योजना’ (PMASBY) का झुनझुना थमाया गया। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के समान्तर इस योजना को भी चालू किया गया है। इसके लिए वित्तमन्त्री ने अगले छह वर्षों में 64,180 करोड़ रुपये के आवण्टन की घोषणा की। हालाँकि, इस राशि का बँटवारा किस प्रकार से होगा, इस बाबत कोई स्पष्ट बात नहीं की गई।
स्वास्थ्य व्यय को दी गई कम प्राथमिकता सरकार द्वारा कुल व्यय में इसके हिस्से में भी परिलक्षित होती है, जो कि केवल 4% है, जबकि वैश्विक औसत लगभग 11% है।
स्वास्थ्य पर यह खराब ख़र्च दर अपर्याप्त संसाधनों और बुनियादी ढाँचों समेत मानव संसाधनों में कमी और आमतौर पर लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच में जाहिर होता है। एकाउण्टेबिलिटी इनिशिएटिव के बजट ब्रीफ के अनुसार, 20 नवंबर, 2020 तक केवल 50,069 हेल्थ एण्ड वेलनेस सेण्टर काम कर रहे थे, जो वित्त वर्ष 2020-21 के लिए संचयी लक्ष्य का 65% है। इसके अलावा, 2019 के ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी के अनुसार, 10% से भी कम प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानक मानदण्डों के अनुसार वित्त पोषित किया जाता है, जिसमें एक चौथाई चिकित्सा अधिकारी पद खाली हैं। नतीजतन, अधिकांश लोग निजी क्षेत्र की बेहद ही महँगी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर रहने के लिए मजबूर हैं। असल में अधिकांश मरीजों के इलाज की जिम्मेदारी तथा खर्च का भार सरकार उठाती ही नहीं है।
भारत में 70% बहिरंग रोगी तथा 58% अन्तरंग रोगी अपनी जेब से खर्च कर निजी क्षेत्र में इलाज कराने के लिए विवश हैं। देश में स्वास्थ्य पर होने वाले कुल खर्च का 60% से अधिक हिस्सा मरीजों की जेब से जाता है। यह दुनिया के अन्य मुल्कों की तुलना में सबसे अधिक है – जबकि डब्ल्यूएचओ का अनुशंसित मानदण्ड भी 15-20% है। हालाँकि, न्यायोचित यही है कि सरकार निशुल्क सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करे। सरकार द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर किए जाने वाला बेहद कम खर्च, बाज़ार द्वारा स्वास्थ्य के नाम पर भयंकर लूट के लिए दरवाजे खोलने का काम करता है।
आर्थिक सर्वेक्षण, 2021 के मुताबिक अगर भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को मौजूदा स्तरों से बढ़ाकर जीडीपी के 3% हिस्से तक किया जाए तो यह आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च (ओओपीई), यानी मरीज की जेब से होने वाला खर्च, को वर्तमान के 60% से लगभग 30% तक कम कर सकता है। ग़ौरतलब है की फ़िलहाल सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय, जैसा कि हमने पीछे देखा है, जीडीपी का महज़ 0.34% हिस्सा है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि स्वास्थ्य पर ओओपीई न केवल गरीब मेहनतकश आबादी की कमर तोड़ता है, बल्कि इस देश के मध्यम वर्ग पर भी अच्छा-खासा बोझ डालता है। दुनिया की 20 फ़ीसदी बीमारियों का भार ढोने वाला भारत वर्तमान में स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता और पहुँच के दृष्टिकोण से 180 देशों में से 145वें तथा सरकारी बजट में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने वाले 189 देशों में से 179वें स्थान पर है।
यह सच है कि कोरोना महामारी ने वैश्विक स्वास्थ्य संकट पैदा करने का काम किया है। किन्तु,भारत के सन्दर्भ में यह कहने की आवश्यकता नहीं कि इसने पहले से ही चौपट स्वास्थ्य व्यवस्था को उजागर मात्र किया है। भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र पहले से ही संकट में था। बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था से निपटने के लिए भारतीय राज्यसत्ता ने जनस्वास्थ्य सुविधाओं को विस्तारित करने के बजाए निजीकरण को ही बढ़ावा देने का काम किया। पीपीपी मॉडल के नाम पर जिला अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों आदि को भी निजी हाथों में सौंपने की कवायद जारी है। महामारी के काल में सरकार द्वारा चिकित्सा बजट के नाम पर झूठी हवाबाज़ी किसी अपराधिक गलती से कम नहीं है। कोरोना से मरने वालों की संख्या आधिकारिक आँकड़ों से कई गुना अधिक है; जिनमें से ज्यादातर जानें बिल्कुल बचायी जा सकती थीं, जो सिर्फ़ इसलिए नहीं बचायी जा सकी, क्योंकि सत्ता में बैठे हुक़्मरानों ने समय रहते कोई तैयारी नहीं की थी। स्वास्थ्य के क्षेत्र में पूँजी का नंगा खेल लोगों को मौत के मुँह में धकेलने के लिए जिम्मेदार है। सत्ता में बैठे फासिस्टों ने इस खेल को और किस अंजाम तक पहुंचाया इसकी एक बानगी गंगा में बहती लावारिश लाशों ने पेश की।
आज भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा की आवश्यकता है। सवाल महज़ लोगों की जेब पर पड़ रहे बोझ को थोड़ा हल्का करने मात्र का नहीं है; बल्कि पूरी की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था का राष्ट्रीकरण कर हर किसी को निःशुल्क स्वास्थ्य के अधिकार की गारण्टी देना है। तमाम निजी अस्पतालों, नर्सिंग होमों, निजी पैथोलॉजिकल लैबों, दवा कम्पनियों, कोरोना वैक्सीन फैक्टरियों और अन्य चिकित्सा-सामग्री निर्माण उद्योगों का राष्ट्रीकरण कर हर किसी के लिए स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित किया जा सकता है।
ऐसा करना बिलकुल सम्भव है। दुनिया के कई देशों में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा लागू है। किन्तु, यह भी स्पष्ट है कि मौजूदा फ़ासीवादी निजाम स्वयं किसी रोज़ ऐसा कुछ नहीं करने वाला। इसके लिए तमाम इंसाफपसन्द, प्रगतिशील लोगों, छात्रों, नौजवानों को आम मेहनतकश आबादी के साथ मिलकर सत्ता पर दबाव बनाना होगा।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, मार्च-जून 2021

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