‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की 69वीं वर्षगाँठ के अवसर पर
‘भारत छोड़ो आन्दोलन’: भारतीय जनता की क्रान्तिकारी विरासत का अभिन्न अंग

शमीम, गाज़ियाबाद

औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति के संघर्ष में भारत छोड़ो आन्दोलन का निर्णायक महत्व था। यह आन्दोलन एक ऐतिहासिक जनान्दोलन था। लेकिन साथ ही इस आन्दोलन ने राष्ट्रीय बुर्जुआ नेतृत्व की पक्षधरता, क्रान्तिकारी वाम शक्तियों की निर्बलता तथा जनता की मुक्ति महत्वाकांक्षा को गहराई से रेखांकित किया था। 9 अगस्त 1942 के आन्दोलन में औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति हेतु छटपटाती भारतीय जनता (विशेषकर नवयुवकों) ने अपने साहस व बलिदान की एक मिसाल कायम की जिसने ब्रिटिश साम्राज्य का अन्त सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालाँकि इस क्रान्तिकारी संघर्ष की निरन्तरता कायम न रह सकी तथा अन्ततोगवा नेतृत्व जनता के हाथों से निकलकर समझौतापरस्त कांग्रेस के हाथों में आ गया जिसकी परिणति 15 अगस्त 1947 की खण्डित-विकलांग आजादी थी।

quit-india-movement1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन इतिहास के एक ऐसे दौर में शुरू हुआ जब ब्रिटिश साम्राज्य संकट के दौर में था तथा साम्राज्यवादी जापान एशिया पर अपना अधिपत्य स्थापित करने का प्रयास कर रहा था जो निश्चित ही ब्रिटिश साम्राज्यवादी अधिपत्य को संकट में डाल सकता था। इसके साथ ही जापानी आक्रमण की आशंका ने भारतीय बुर्जुआजी को दोहरे खतरे में डाल दिया था। प्रथमतः जापानी आक्रमण से द्वितीय ब्रिटिश साम्राज्य से । जापानियों की बमबारी से सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को ही नुकसान नहीं होता बल्कि भारतीय पूँजी को भी नुकसान होता, जो कि अभी अपनी किशोरावस्था में ही पहुँची थी। जापानी आक्रमण का प्रतिरोध करने के अर्न्तगत ब्रिटेन की रणनीति का यह अहम अंग था कि पीछे हटने पर वे सभी कारखाने नष्ट कर देंगे। अतः भारतीय नेताओ के सामने यह समस्या थी कि भारतीय बुर्जुआजी के आर्थिक हितों (जो अब तक इतने बड़े संकट का शिकार नहीं थे) की सुरक्षा कैसे की जाए?

भारतीय बुर्जुआ वर्ग के सामने तत्कालिक तौर पर तीन मुख्य समस्यांए थी। (1) युद्ध से होने वाले मुनाफे की रक्षा,(2) कल कारखानों की रक्षा (3)  राष्ट्रीय सरकार की स्थापना। इन समस्याओं के समाधान हेतु राष्ट्रीय नेताओं में परस्पर मतभेद थे।

सितम्बर 1941 से पहले दो फासीवाद-विरोधी देश अमेरिका व ब्रिटेन ने संयुक्त रूप से ‘‘अटलांटिक चार्टर’’ प्रकाशित किया था। इसमें यह व्यवस्था थी कि ‘दुनिया के हर देश के लोग अपने ढंग का शासन चुन सके और जो राष्ट्र अपनी संप्रभुता खो चुके है वे उसे पुन: प्राप्त कर सकें,’ हालाँकि दोनों ही (ब्रिटेन व अमेरिका) साम्राज्यवादी देश थे। लेकिन ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल ने कहा कि ‘‘अटलाटिक चार्टर’’ भारत पर लागू नहीं होता है। उसके इस वक्तव्य का आधार राष्ट्रीय नेतृत्व के आन्तरिक मतभेद थे।

क्रिप्स मिशन वार्ता के समय ही भारत की पूर्वी सीमाओं पर जो स्थिति थी उसने मित्र राष्ट्रो को चिंता में डाल दिया (विशेषतः ब्रिटेन को)। जापानी सेना भारत-बर्मा मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ रही थी। उसने रास्ते में पड़ने वाले ब्रिटिश शासित क्षेत्रों सिंगापुर, वर्मा, मलाया व अंडमान को जीत लिया था। बंगाल की खाड़ी में जापानी नौसैनिको ने हमले किए। भारत के पूर्वी तट के शहर विशाखापट्नम व काकीनाडा पर जापान ने बमबारी की । यह आशंका बढ़ रही थी कि अन्य एशियाई देशों की तरह भारत भी जापानी साम्राज्यवाद का शिकार हो सकता था जो ब्रिटेन के हितों के प्रतिकूल होता।

इसी दौरान जब क्रिप्स मिशन असफल हो गया तो अपने एक वक्तव्य में कांग्रेसी नेता अबुल कलाम आजाद ने भारतीय बुर्जुआ वर्ग की नीति को अप्रत्यक्ष रूप से प्रकट करते हुए कहा था कि ‘‘युद्ध ने भारत को अपनी स्वतन्त्रता प्राप्त करने का अवसर दिया है। सिर्फ वादों पर निर्भर रहकर इसे खोना नही होगा।’’ भारतीय बुर्जुआ वर्ग की नीति स्पष्ट थी कि वह युद्ध के दौरान भारत की राजनैतिक सत्ता पर अधिकार करना चाहता था लेकिन सिर्फ समझौता-दबाव-समझौता के द्वारा। गांधी इससे पहले अक्सर कहा करते थे कि ‘जब दुश्मन मुसीबत में हो तो उस वक्त उसके खिलाफ कुछ भी करना हिंसा है’। बुर्जुआ वर्ग के आर्थिक हितों पर संकट आते ही हिंसा व अहिंसा का यह सिद्धान्त बेमानी हो गया।

ऐसी परिस्थितियों में कांग्रेस ने तुरन्त सत्ता हस्तांतरण की मांग की तथा प्रतिरक्षा विभाग भारतीय जनता के प्रतिनिधियों को सौपने को कहा क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्य एक ऐसी सेना का नेतृत्व कर रहा था जो जापान के सामने मैदान छोड़कर भाग रही थी। ब्रिटिश हूकूमत इसके विरोध में थी जिसकी परिणति दिल्ली वार्ता का विफल होना था। इसके कारण जनता के गुस्से में वृद्धि हो रही थी एवं जब क्रिप्स मिशन बुर्जुआ प्रतिनिधियों को कुछ भी देने को तैयार नहीं हुआ तो बुर्जुआ वर्ग बहुत झल्लाया जिसके चलते कांग्रेसी नेताओं ने ‘करो या मरो’ तथा ‘आजादी या मौत’ के नारे दिये!

14 जुलाई 1942 को कांग्रेस की वर्धा बैठक में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ का प्रस्ताव पास किया गया। कार्यसमिति की बैठक के बाद गाँधी जी ने समझौते का मार्ग खोलना चाहा जो ‘‘संघर्ष के उनके तरीके का अभिन्न अंग था’’। उन्होंने वायसराय को कार्यसमिति के प्रस्ताव तथा संघर्ष के भावी स्वरूप की सूचना देने का असफल प्रयास किया। 9 अगस्त को तड़के व्यापक गिरफ़्तारियों के साथ भारतीय जनता के इस अभूतपूर्व संघर्ष की शुरूआत हुई। आरम्भ में आन्दोलन शांतिपूर्ण था परन्तु ब्रिटिश सरकार की दमनात्मक कारवाइयों ने जनता को उद्वेलित कर दिया जिसके फलस्वरूप जनसमुदाय ने रेल लाइनों, डाकघरों व सरकारी इमारतों में तोड़फोड़ की। जनता ने हर उस चीज को नष्ट करने का प्रयास किया जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद का प्रतीक थी।

इस आन्दोलन की एक महत्वपूर्ण घटना थी अल्पसमय के लिए इसका संगठित रूप लेना!

इसके अर्न्तगत अंसगठित गातिविधियों को संगठित रूप दे दिया गया। प्रान्तीय स्तर पर व इससे निचले स्तर के जो नेता गिरफ़्तारी से बच गये थे उन्होनें एक गुप्त केन्द्रीय संग्राम समीति का गठन किया तथा प्रान्तीय कांग्रेस कमेटियों को एक परिपत्र (सर्कुलर) भेजा गया। देश के अधिंकाश क्षेत्रों में (विशेषता उत्तरी भारत में) गुप्त संगठनों की शुरुआत हुई। जिसके तहत हथियार जुटाने, बम बनाने, सरकारी खजाने पर कब्जा करने जैसी अन्य संगठित गतिविधियां शुरु हुई। इन गतिविधियों ने भारत छोड़ो आन्दोलन को एक संगठित रूप दिया जो उस कांग्रेसी ढर्रे से एकदम जुदा था जिसमें जनपहल कदमी के उन्नत धरातल पर पहुँचते ही आन्दोलन वापस ले लिया जाता था। सशस्त्र संगठित विरोध के प्रारम्भ के चलते कुछ प्रान्तो में सरकारी तन्त्र लगभग पूरी तरह असफल हो गया। आम किसान मजदूर व छात्र आबादी ने जगह-जगह समानान्तर सरकारों की स्थापना की। उत्तर-प्रदेश के बलिया, बिहार के भागलपुर,मुंगेर, बंगाल के मिदनापुर मध्यप्रदेश के सतारा आदि जिलों में समानान्तर सरकारों ने काम करना शुरु कर दिया। इस दौरान जनाक्रोश ने हर उस चीज को नष्ट करने का प्रयास किया जो ब्रिटिश शक्तिमत्ता का प्रतीक थी। बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी 1945 की रिपोर्ट के मुताबिक इस आन्दोलन में 9 अगस्त से 31 दिसम्बर तक 60,229 लोगो को गिरफ़्तार किया गया आन्दोलन को कुचलने हेतु 50 बटालियनो का प्रयोग किया गया। 18 हजार लोगों को भारत सुरक्षा कानून के अर्न्तगत नजरबन्द किया गया। तकरीबन 1000 लोग शहीद हुए। कई स्थानों पर किसानों ने कर अदायगी से इंकार कर दिया। अहमदाबाद की कपड़ा मिले 3 महीनों तक बन्द रही। छात्रों-नौजवानों की भागीदारी ने आन्दोलन को नवीन ऊर्जा प्रदान की। ढाका से दिल्ली तथा लाहौर से मद्रास तक लगभग सभी विश्वविद्यालयों में कक्षाओ का बहिष्कार किया गया।

निश्चित ही इस आन्दोलन ने जन पहलकदमी को खोलने का काम किया। लेकिन नेतृत्व बुर्जुआ नेतृत्व के हाथ में ही रहा और वह इसे उस मंजिल तक कतई नहीं ले जा सकता था जो उसे जनक्रान्ति में तब्दील कर दे।

यदि क्रान्तिकारी वामधारा की शक्तियों द्वारा परिस्थितियों का ठोस मूल्यांकन किया गया होता तथा वैचारिक ढुलमुलपन का अभाव न होता तो निश्चित ही जनमुक्ति के स्वप्न को साकार करने के प्रयास में यह संघर्ष एक मील का पत्थर साबित होता। प्रायः संसदीय वामपंथी व कुछ अन्य इतिहासकार यह तर्क देते हैं कि कानूनी प्रतिबंध तथा परिस्थितियों के प्रतिकूल होने के कारण राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष का नेतृत्व हासिल करने में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी विफल रही तथा फासीवाद विरोधी मुहिम के अर्न्तगत मित्र राष्ट्रों का समर्थन (जिसमें ब्रिटेन भी शामिल था) अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुकूल था। जबकि यह इतिहास का कड़वा सत्य है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इतिहास की अभूतपूर्व गलती की थी। फासिस्ट जर्मनी के सोवियत संघ पर आक्रमण के चलते भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने फासीवाद विरोधी ‘जनयुद्ध’ को पूर्ण समर्थन देने का रास्ता अख्तियार किया। भले ही उसने स्वतन्त्रता तथा तत्काल राष्ट्रीय सरकार के गठन की मांग को भी उठाया। लेकिन इन मांगों के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर किसी आन्दोलन को खड़ा करना उसकी रणनीति का हिस्सा नहीं था क्योंकि वह (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) फासीवाद विरोधी मोर्चे (सोवियत संघ के साथ ब्रिटेन भी शामिल था) को कमजोर नहीं करना चाहती थी लेकिन तत्कालिक तौर पर उसका यह निर्णय वस्तुगत परिस्थितियों के प्रतिकूल था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने विश्व स्तर पर प्रधान अन्तरर्विरोध को राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रधान अर्न्तविरोध मान लिया था। विश्व स्तर पर मित्र राष्ट्रों का सोवियत संघ के साथ मोर्चा बनाना (धुरी राष्ट्रो के विरुद्ध) ब्रिटेन व सभी पश्चिम साम्राज्यवादियों की मजबूरी थी। आज यह स्थापित हो चुका है कि ब्रिटेन व उसके साम्राज्यवादी मित्रों की यह नीति थी कि समाजवाद के गढ़ को ढहाकर, फासिस्ट शक्तियों को पराजित किया जाए। युद्धकालीन प्रधानमंत्री चर्चिल का कहना था कि ‘‘अगर हिटलर जीत की तरफ बढेगा तो हम सोवियत संघ का साथ देंगे और यदि सोवियत संघ जीत की ओर बढे़गा तो हम हिटलर का साथ देंगे।’’ हिटलर की 200 डिविजनों का मुकाबला अकेले रूस कर रहा था लेकिन बार-बार कहने के बावजूद तीसरा मोर्चा बहुत देर से खोला गया, जब हिटलर की हार सुनिश्चित हो चुकी थी।

भारत छोड़ो आन्दोलन का नेतृत्व हासिल करने में कम्युनिस्ट पाटी की असफलता का कारण उसके पूरे ढांचे, कार्य प्रणाली तथा कार्यक्रम में निहित था। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने 1951 में संसदीय वामपंथ का रास्ता अख्‍त़ियार कर मेहनतकश वर्ग के पीठ में छुरा भोंकने से पहले कुर्बानियों की ढेरों मिसाल कायम की थी। लेकिन तमाम ईमानदारी और साहस के बावजूद यह एक कड़वा सत्य है कि भारत की ठोस परिस्थितियों का उसने कभी ठोस अध्ययन और विश्लेषण नहीं किया था। विचारधारात्मक और राजनीतिक समझ के अभाव में और भारत में क्रान्ति के कार्यक्रम के सवाल पर कभी मौलिक रूप से और गम्भीरता से विचार न करने के चलते एक नाजुक मौके पर पार्टी अन्तरविरोधों की सही-सही पहचान करने में चूक गयी। नतीजा यह हुआ कि एक शक्तिशाली जनान्दोलन जो कई शानदार बग़ावतों के साथ भारत में जारी था, सही क्रान्तिकारी नेतृत्व से वंचित रह गया। उसका नेतृत्व भारत के पूँजीपति वर्ग की नुमाइन्दगी करने वाली कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में चला गया और नतीजतन हमें वह आज़ादी नहीं मिली जिसके हम हक़दार थे।

लेकिन फिर भी ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ देश की जनता की क्रान्तिकारी विरासत का एक अहम हिस्सा है। नेतृत्व के अभाव और गलतियों के बावजूद जनता ने ज़बर्दस्त क्रान्तिकारी पहलकदमी का परिचय दिया था और ब्रिटिश साम्राज्यवाद की चूलें हिला दीं थीं। इस आन्दोलन के बूते पर ही कांग्रेस वह सौदा कर सकी जो उसने किया।

 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जुलाई-अगस्‍त 2011

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