अमेरिकी सबप्राइम संकट: गहराते साम्राज्यवादी संकट की नयी अभिव्यक्ति

अभिनव

sub2001 में शुरू हुए ‘हाउसिंग बूम’ (अमेरिका में आवास बाज़ार में आई अभूतपूर्व तेज़ी का दौर) के दौरान अमेरिकी संसद के कुछ मान्य सीनेटरों व राष्ट्रपति ने कहा कि अमेरिकियों को यह समझ लेना चाहिए कि देशभक्ति का अर्थ क्या है। देशभक्ति का अर्थ है जमकर ख़र्च करना और जो उपभोक्ता सामग्रियों पर ख़र्च नहीं करता वह आज के अर्थों में सच्चा देशभक्त नहीं है! अगर सीधे-सीधे उद्धृत किया जाय तो शब्द कुछ यूँ थे- ‘स्पेण्ड योर वे आउट ऑफ़ रिसेशन’ (यानी, इतना ख़र्च करो कि मन्दी से बाहर निकला जा सके!) मार्क्स ने जब कहा था कि बुर्जुआ वर्ग का राष्ट्रवाद मण्डी में पैदा होता है तो उन्होंने शायद नहीं सोचा होगा कि पूँजीवादी विश्व के शीर्ष पर बैठे हुए देश का राष्ट्रपति इतने नंगे शब्दों में इस बात को स्वीकार करेगा!

2001 में डॉट-कॉम क्रैश के बाद के झटके से उबरने के लिए अमेरिका के केन्द्रीय बैंक फ़ेडरल रिज़र्व या फ़ेड ने ब्याज दरों को ज़बर्दस्त रूप से नीचे गिरा दिया। यह महामन्दी के दौर के बाद ब्याज दरों में की गयी सबसे बड़ी कटौतियों में से एक थी। कारण यह था कि डॉट-कॉम बुलबुले के फ़ूटने के बाद शेयर मार्केटों में भारी गिरावट आनी शुरू हुई, कई निवेश बैंक दिवालिया हुए और उपभोक्ता सामग्रियों की ख़रीद में भारी कमी आने लगी। नतीजा था, एक मन्दी। लेकिन अभी यह मन्दी पूरी तरह परवान भी नहीं चढ़ी थी कि फ़ेडरल बैंक ने ब्याज दरों में कटौती की ताकि उधार से वित्त पोषण करके उपभोक्ता सामग्रियों की ख़रीद को उन्हीं स्तरों पर बरकरार रखा जा सके जिन पर वह पहले थी, या उनसे भी ऊपर ले जाया जा सके। डॉट-कॉम बुलबुले के दौरान उपभोक्ता सामग्रियों की ख़रीद में वृद्धि करने के लिए जो ‘समृद्धि प्रभाव’ (वेल्थ इफ़ेक्ट) पैदा करना था उसका जरिया बना था शेयर मार्केट। इस बार तेज़ी का जरिया था रियल एस्टेट, यानी आवास उद्योग। घर ख़रीदने के लिए भारी पैमाने पर ऋण दिये गये। डॉट-कॉम बुलबुला दरअसल एक दूसरे संकट से उबरने का फ़ौरी नुस्खा था। वह संकट था 1997–98 का पूर्वी एशियाई देशों का मौद्रिक संकट जिसमें ‘एशियन टाइगर्स’ कही जाने वाली सशक्त पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएँ औंधे मुँह गिर गयी थीं। डॉट-कॉम बुलबुले के फ़ूटने के बाद आए संकट से उबरने के लिए ‘हाउसिंग बूम’ पैदा किया गया। दरअसल, आज जो संकट ‘सबप्राइम क्राइसिस’ के नाम से पूरे विश्व मीडिया पर छाया हुआ है और जिसके कारण 18 दिसम्बर को अमेरिका के सबसे बड़े निवेश बैंकों में से एक मॉर्गन स्टैनली को खुले तौर पर स्वीकारना पड़ा कि अमेरिका एक घातक मन्दी की ओर तेज़ी से फ़िसल रहा है और यह मन्दी तथाकथित ‘उभरती अर्थव्यवस्थाओं’ को बुरी तरह प्रभावित करेगा और कालान्तर में एक वैश्विक मन्दी का रूप ले लेगा, वह संकट इसी ‘हाउसिंग बूम’ के फ़टने के कारण आया है; ऐसा कैसे हुआ है, यह हम इस लेख में आगे देखेंगे। सितम्बर तक रॉबर्ट शिलर से लेकर जोसफ़े स्टिग्लिट्ज़ तक जैसे अर्थशास्त्री जिस संभावित मन्दी की बात कर रहे थे वह दिसम्बर आते-आते एक हकीक़त में तब्दील होने लगी है। इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि इस वित्तीय संकट ने एक बार फ़िर बुनियादी मार्क्सवादी सिद्धान्तों की वैधता को पूरे ज़ोर के साथ स्थापित कर दिया है। यह और कुछ नहीं अतिउत्पादन और साम्राज्यवाद या इजारेदार पूँजीवाद के दौर में पूँजी के बढ़ते अनुत्पादक चरित्र और उसकी सट्टेबाज़ प्रवृत्ति के कारण पैदा होने वाला साम्राज्यवादी आर्थिक संकट है, जो हर नये चक्र के साथ और अधिक गहराता जा रहा है और पूरी दुनिया को एक नयी उथल-पुथल की ओर धकेल रहा है। इस लेख में हम सबप्राइम संकट के जरिये अमेरिकी और मोटे तौर पर पूरी विश्व अर्थव्यवस्था के गहराते आर्थिक संकट के चरित्र, कालानुक्रम, उसकी दिशा और उसके भविष्य पर एक निगाह डालेंगे और उसे समझने का प्रयास करेंगे और साथ ही यह प्रदर्शित करेंगे कि यह साम्राज्यवाद के गहराते संकट और उसके अवश्यंभावी अंत का एक दिशा-संकेतक ही है।

सबप्राइम ऋण क्या है?

सबप्राइम संकट का रिश्ता सबप्राइम ऋण से है। अमेरिका में ऋणों को मानक तय करने वाले संस्थानों और बैंकों तथा वित्तीय मामलों पर केन्द्रित पत्रिकाओं ने कई श्रेणियों में बाँटा है। सबसे ऊँची श्रेणी होती है ‘एएए’ ऋण या प्राइम ऋण जिसमें जोखिम सबसे कम होता है। यानी, जिसके ब्याज सहित चुकता होने में न्यूनतम सन्देह है। इसके बाद, आती है ‘ऑल्ट-ए’ या ‘ऑल्टरनेटिव ए’ श्रेणी, जो इससे थोड़ा अधिक जोखिम वाले ऋण होते हैं। इसमें भी ऋण लेने वाले की जाँच आदि की जाती है, उसके दस्तावेज़ों को देखा जाता है। इसके बाद आती है ‘सबप्राइम’ ऋण की श्रेणी। यह सबसे ख़तरनाक किस्म के ऋण होते हैं। इसमें ऋण लेने वाले की भरोसेमन्दी की पूरी तरह जाँच नहीं की जाती है और उन लोगों को भी ऋण दिया जाता है जिनके उधार लेने का इतिहास और बैंक खाते की क्रेडिट हिस्टरी उनको ऋण की पात्रता से वंचित करती है। इसके बदले में उनपर अत्यधिक ब्याज लगाया जाता है। यह ब्याज कई मामलों में फ़िक्स्ड यानी स्थिर नहीं होता बल्कि वह परिवर्तनीय होता है। इसे ए.आर.एम (एड्जस्टेबल रेट मॉर्टगेज) भी कहा जाता है। और ऋण की पूरी अवधि में ब्याज दरें 2 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक जा सकती हैं। ऋणदाता सबप्राइम ऋण में निहित जोखिम से निपटने के लिए भारी ब्याज दरें लगाता है। जब तक सबप्राइम ऋण देने वालों को फ़ेडरल रिज़र्व से कम ब्याज पर ऋण मिलता रहता है तब तक तो ब्याज दरें थोड़ी कम रहती हैं और फ़ेड द्वारा ब्याज दरें बढ़ाए जाने के साथ ही प्रति माह ऋण की किश्त का भुगतान बढ़ता जाता है।

subprime crisisसबप्राइम ऋण देनेवाले और लेनेवाले दोनों के लिए ही घातक होता है। इसका कारण होता है, लेनेवाले की खराब आर्थिक स्थितियाँ और अत्यधिक ऊँची ब्याज दर। सबप्राइम ऋण कई किस्म के क्रेडिट उपकरणों का उपयोग करके दिया जाता है। इसके प्रमुख रूप हैं सबप्राइम मॉर्टगेज, जिसमें सबप्राइम ऋण लेने वाला संपत्ति गिरवी रखकर ऋण लेता है, और सबप्राइम क्रेडिट कार्ड, जिसमें उपभोक्ता को खर्च के लिए सबप्राइम ऋण क्रेडिट कार्ड के माध्यम से दिया जाता है। सबप्राइम ऋण की शुरुआत दिखावे के लिए जनता के हित में हुई थी। यह कहा गया कि यह उन ग़रीब लोगों को भी ऋण का पात्र बना देता है जिनकी क्रेडिट हिस्टरी उनको प्राइम श्रेणी के ऋणों का अधिकारी नहीं बनाती। लेकिन यह नहीं बताया गया कि इसमें कई बार ब्याज दर इतनी अधिक बढ़ सकती है कि उसकी एक किश्त मूलधन से भी अधिक हो जाए, या फ़िर जिस संपत्ति को गिरवी रखकर वह ऋण लिया गया है, उस संपत्ति की कीमत से भी अधिक हो जाए। लोगों को फ़ँसाने के लिए पहले कुछ महीने ब्याज दरें कम रखी जाती हैं ताकि लोग सबप्राइम ऋण लेते रहें। और उसके बाद ब्याज दरें बढ़ना शुरू होती हैं और यह दरें कई बार 30 प्रतिशत तक पहुँच जाती हैं।

सबप्राइम ऋण की शुरुआत का कारण था वित्तीय बाज़ार की बढ़ती अस्थिरता और एक भारी आबादी का विकास जिसकी क्रेडिट रेटिंग इतनी नहीं थी कि उन्हें ऋण देने के काबिल समझा जाय। अमेरिका का संस्थान फ़िको क्रेडिट ब्यूरो रिस्क स्कोर देता है जिसके अनुसार किसी व्यक्ति की ऋण की पात्रता निर्धारित होती है। 25 प्रतिशत अमेरिकियों का क्रेडिट स्कोर 620 अंक से कम है, जो उन्हें प्राइम ऋण या ऑल्ट-ए ऋण की श्रेणी से बाहर कर देता है। लेकिन अमेरिकी वित्तीय बाज़ार 25 प्रतिशत अमेरिकी जनता को छोड़ नहीं सकता। दूसरी बात यह कि उसके पास पूँजी की इतनी प्रचुरता है कि प्राइम व ऑल्ट-ए ऋण का बाज़ार संतृप्त होने के बाद भी उसके पास भारी मात्रा में पूँजी बच जाती है। अब इस पूँजी का संचरित कराना उसके लिए अस्तित्व का प्रश्न होता है। इसलिए एक नये ऋण उपकरण का आविष्कार किया गया- सबप्राइम लोन!! और उसे इस लफ्फ़ाजी भरे तर्क की चाशनी में लपेटा गया कि यह ग़रीब लोगों को भी ऋण की पात्रता के दायरे में लाकर एक क्रान्तिकारी काम को अंजाम देता है।

मौजूदा सबप्राइम संकट का कारण दरअसल सबप्राइम मॉर्टगेज बाज़ार में आया संकट है। सबप्राइम ऋण का यह सबसे प्रमुख उपकरण है। इसमें किसी संपत्ति को सिक्योरिटी के रूप में रखकर ऐसे व्यक्तियों को ऋण दिया जाता है जो एएए श्रेणी का या ऑल्ट-ए श्रेणी का ऋण प्राप्त करने के लिए पूरे किये जाने वाले मानकों को पूरा नहीं करते। मूडीज़ इन्वेस्टर्स सर्विस के प्रमुख अर्थशास्त्री जॉन लांस्की का कहना है कि 2004 से 2006 तक अमेरिका में दिये गये सारे ऋणों में से 21 प्रतिशत सबप्राइम ऋण थे। 2006 में सबप्राइम मॉर्टगेज के तहत 600 बिलियन डॉलर का ऋण दिया गया जो अमेरिका के कुल आवास ऋण बाज़ार का 20 प्रतिशत था। इसी आँकड़े से सबप्राइम ऋण की पहुँच को समझा जा सकता है। सबप्राइम ऋण के उदय को समझने के लिए यह समझना बेहद ज़रूरी है कि द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर काल में ऋण का एक माल के रूप में विकास हुआ और इसी के साथ विकसित हुआ एक ऋण बाज़ार। वित्तीय पूँजी के विस्तार के साथ यह होना लाज़िमी था। इसका प्रमुख उदाहरण डिबेंचर इशू को माना जा सकता है जिसमें कम्पनियाँ लोगों से ऋण लेती हैं, जिसके बदले में वे उन्हें ब्याज लेने और ऋण के भुगतान प्राप्ति का अधिकार देती हैं। लाभ के दौर में तो यह उपकरण निवेशकों के लिए फ़ायदेमन्द होता है, लेकिन मन्दी के दौर में यह दोगुना नुकसानदेह साबित होता है। ऋण की इस खरीद-फ़रोख्त में वित्तीय बाज़ार में पूँजी की प्रचुरता के साथ भारी बढ़ोत्तरी हुई है। पूँजी के बाज़ार पर भी हर बाज़ार की तरह संतृप्त होने का नियम लागू होता है। यहाँ भी लाभ के दर में लगातार गिरावट की प्रवृत्ति होती है। यही कारण है, कि प्राइम ऋण के बाज़ार के संतृप्त होने के बाद अब बदहवासी में निवेश बैंकों और मॉर्टगेज बैंकों ने अन्धाधुन्ध सबप्राइम ऋण दिये। यह फ़ौरी मुनाफ़े के लिए और संकट को रोकने के लिए एक ललचा देने वाला रास्ता था। इस बदहवासी में ही बैंकों ने ऋणों का पैकेज बनाकर बेचने के तमाम नायाब तरीके निकाले। इन निवेश बैंकों ने अन्य वित्तीय संस्थाओं जैसे हेज फ़ण्ड्स, बैंकों और बीमा कम्पनियों को ये ऋण पैकेज बेचे। इससे यह उम्मीद की गयी कि जोखिम का वितरण हो जाएगा और विस्फ़ोटक कचरा सामग्री (बुरे जोखिम भरे ऋण) किसी एक जगह पर एकत्र नहीं होंगे। इससे कोई एक बैंक बुरे ऋणों के संकट के तहत ध्वस्त नहीं होगा। लेकिन ऋण को दूसरों के मत्थे डालने के इस चमत्कारी मंत्र ने कई ऋणदाताओं को अपने ऋण देने के मानकों को बेहद ढीला कर देने के लिए प्रेरित किया। सबप्राइम ऋणों को और आकर्षक बनाने के लिए उनकी पैकेजिंग अन्य प्राइम व ऑल्ट-ए ऋणों के साथ की गयी और इन ऋण उत्पादों को कोलेटरल डेट ऑब्लिगेशन (संपार्श्विक ऋण देनदारी) कहा गया। इन ऋणों को तमाम संस्थानों द्वारा अच्छी क्रेडिट रेटिंग दी गयी और फ़िर इन निवेश बैंकों ने इन्हें जमकर हेज फ़ण्ड्स और बैंकों को बेचा। लेकिन जैसे ही सबप्राइम ऋण की ब्याज दर बढ़नी शुरू हुई और इन ऋणों के भुगतान का असफ़ल होना शुरू हुआ वैसे ही इन हेज फ़ण्ड्स और बैंकों को पता चला कि जिन ऋणों को वे कम जोखिम वाला समझ रहे थे वे वित्तीय कचरा थे और फ़िर शुरू हुआ बैंकों और हेज फ़ण्ड्स के दीवालिया होने का सिलसिला और सबप्राइम संकट का प्रारंभ!

सबप्राइम संकट

सबप्राइम संकट का आरंभ 2006 के उत्तरार्द्ध में, मोटा-मोटी अगस्त में हुआ। सबप्राइम ऋण लेने वाले ऋण के ब्याज का भुगतान करने में स्वयं को असमर्थ पाने लगे और फ़िर शुरू हुआ नीलामियों (फ़ोरक्लोज़र्स) का सिलसिला। नतीजा यह हुआ कि सबप्राइम ऋण देने वाले तमाम बड़े बैंक एक-एक करके धराशायी होने लगे। 100 से अधिक सबप्राइम ऋणदाताओं ने या तो अपने आपको दीवालिया घोषित कर दिया या फ़िर वे बंद हो गये। इसमें न्यू सेंचुरी फ़ाइनेंशियल कॉर्पोरेशन भी शामिल था जो देश का दूसरा सबसे बड़ा सबप्राइम ऋणदाता था। इन कंपनियों के औंधे मुँह गिरने के कारण अमेरिका का 6.5 ट्रिलियन (दस खरब) डॉलर का मॉर्टगेज बाज़ार ढह गया और इसका अमेरिकी आवास बाज़ार और पूरी अर्थव्यवस्था पर भयंकर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। यह संकट अब इस हद तक पहुँच गया है कि तमाम अर्थशास्त्री इसे एक मन्दी का नाम दे रहे हैं और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के भयंकर रूप से संकटग्रस्त होने की घोषणा कर रहे हैं।

इस संकट का कारण यह था कि भारी राष्ट्रीय ऋण और व्यापार घाटे के कारण अमेरिकी केन्द्रीय बैंक फ़ेडरल रिज़र्व को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ीं। नतीजतन, निवेश बैंकों और मॉर्टगेज बाज़ार के बड़े खिलाड़ियों को अपनी ब्याज दरें बढ़ानी पड़ीं। इसके कारण सबसे भारी चोट पड़ी सबप्राइम ऋण लेने वालों को क्योंकि वे परिवर्तनीय ब्याज दर के तहत ऋण प्राप्त करने वाले लोग थे। यह दरें तेज़ी से ऊपर गयीं और नतीजे के तौर पर भारी संख्या में सबप्राइम ऋण लेने वाले लोगों ने ऋण के भुगतान में अपनी असमर्थता जता दी। घरों की नीलामी शुरू हुई। लेकिन सबप्राइम संकट के कारण जो नीलामियाँ शुरू हुईं उसने अमेरिका के ‘हाउसिंग बूम’ का भी निर्णायक रूप से क्रिया-कर्म कर दिया जो पहले से ही संकट का शिकार था। ‘हाउसिंग बूम’ के पैदा होने और ख़त्म होने की कहानी को हम एक अलग उपशीर्षक के तहत बयान करेंगे। हाउसिंग बूम के ख़त्म होने के कारण घरों की कीमत में भारी कमी आनी शुरू हुई और लोगों की मकान खरीदने में दिलचस्पी ख़त्म होने लगी। यानी कि अब उन नीलामियों का कोई फ़ायदा नहीं था जो सबप्राइम के कारण होनी शुरू हुईं क्योंकि कोई ख़रीदार ही नहीं था। परिणामतः, पूँजी बाज़ार के खिलाड़ियों की पूँजी फ़ँसनी शुरू हो गयी और एक लिक्विडिटी क्रंच की स्थिति पूँजी बाज़ार में पैदा हो गयी। लिक्विडिटी या तरलता का अर्थ होता है अर्थव्यवस्था में पूँजी की मौजूदगी। तरलता में कमी के कारण कई बड़े निवेश बैंक असमाधेयता (इनसॉल्वेंसी) का शिकार हो गये और एक क्रेडिट क्रंच (ऋण में कमी) पैदा हो गयी। बड़े निवेश बैंकों और हेज फ़ण्ड्स के दीवालिया होने के कारण स्टॉक मार्केट में भी पतन का ख़तरा पैदा हो गया। कारण यह था कि हेज फ़ण्ड्स और सबप्राइम ऋण लेने वाले सभी निवेशक या तो पूँजी की कमी का या फ़िर असमाधेयता और दीवालियेपन का शिकार हो गये और उनके शेयरों के दाम गिरने लगे। हेज फ़ण्ड्स में निवेश करने वाले लोगों ने अपने शेयर बेचने शुरू कर दिये। कोई निवेश बैंक या हेज फ़ण्ड्स नहीं जानता था कि उसने जो कोलेटरल डेट ऑब्लिगेशन वाले बॉण्ड्स खरीदे हैं उसमें कितना जहरीला वित्तीय कचरा है, यानी उसमें कितना सबप्राइम ऋण है। इन निवेश संस्थानों ने अपने जोखिम का नये सिरे से मूल्यांकन शुरू किया, या कहा जाय कि वे ऐसा करने को बाध्य हो गये। उपभोक्ताओं का भरोसा डगमगा गया और उन्होंने और ख़र्च करने और अपनी उपभोक्ता ख़रीदारियों को वित्त पोषित करने की क्षमता खो दी। मतलब यह कि उपभोक्ता सामग्रियों पर ख़र्च में भारी कमी आनी शुरू हो गयी। और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण था जिसके कुल सकल घरेलू उत्पाद का 70 प्रतिशत हिस्सा उपभोक्ता खरीदारियों से आता है। इससे स्थिर आय, इक्विटी और डेरिवेटिव बाज़ार में अस्थिरता बढ़ी। इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर नज़र आना शुरू हो गया है। जो लोग शुरू में यह कह रहे थे कि सबप्राइम संकट वित्तीय पूँजी बाज़ार का संकट है इसलिए इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था जल्दी ही उबर जाएगी और इसका वास्तविक अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं होगा, उन्हें काफ़ी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है। आज एकदम साफ़ हो चुका है कि सबप्राइम संकट अतिउत्पादन और पूँजी की प्रचुरता का ऐसा संकट है जिसका प्रभाव अमेरिका की वास्तविक अर्थव्यवस्था पर ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की वास्तविक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने वाला है।

सबप्राइम संकट की एक साम्राज्यवादी वित्तीय संकट के रूप में समझ विकसित करने के लिए हमें डॉट-कॉम बुलबुले के समय से अमेरिकी अर्थव्यवस्था के पूरे ऐतिहासिक विकास पर निगाह दौड़ानी होगी। अगर यह समझ लिया जाय कि कहानी यहाँ तक पहुँची कैसे तो यह भी समझा जा सकता है कि यह जाएगी कहाँ।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था का बूम-बस्ट चक्र (1997–2005)

डॉट-कॉम बुलबुला सट्टेबाज़ी के कारण पैदा हुआ एक स्टॉक मार्केट बूम था। यह मोटे तौर पर 1990 के दशक के मध्य से शुरू हुआ और 2001 तक बना रहा। इसी दौर में ई–कॉमर्स और ई–बिज़ आदि जैसे जुओं की शुरुआत हुई। इस बुलबुले के पैदा होने के पूरे दौर में पश्चिमी विकसित पूँजीवादी देशों के स्टॉक मार्केट में भारी उछाल आया जिसका कारण था इण्टरनेट व सम्बन्धित सेक्टर में आयी वृद्धि। इस पूरे दौर ने नये किस्म की कम्पनियों के आश्चर्यजनक उभार को देखा जिन्हें डॉट-कॉम कम्पनियाँ कहा गया। इन कम्पनियों की वृद्धि के कारण शेयरों की बढ़ती कीमत और सट्टेबाज़ी या स्पेक्यूलेशन के कारण एक ऐसा माहौल पैदा हुआ जिसमें कम्पनियों ने वास्तविक अर्थव्यवस्था में निवेश करना कम कर दिया और स्टॉक मार्केट से तुरत-फ़ुरत मुनाफ़ा कमा लेने की तकनीक का इस्तेमाल करना शुरू किया। लेकिन कोई ठोस आधार न होने के कारण 2001 में डॉट-कॉम बुलबुला फ़ूटा और इसने 2000 के दशक की मन्द मन्दी का श्रीगणेश कर दिया।

डॉट-कॉम कम्पनियों का पूरा फ़ण्डा था इण्टरनेट तकनोलॉजी के आधार पर आइडिया बेचना और नेटवर्क इफ़ेक्ट पैदा करके अपनी बाज़ार हिस्सेदारी को बढ़ाना। इन कम्पनियों का मानना था कि शुरुआत में एक निश्चित अवधि तक हानि में रहकर काम करते हुए डॉट-कॉम तकनोलॉजी द्वारा ब्राण्ड जागरूकता पैदा की जाय और फ़िर अपने उत्पादों और सेवाओं के लिए लाभदायक कीमतें वसूली जाय। इस हानि की अवधि के दौरान ये कम्पनियाँ वेंचर पूँजी पर निर्भर करती थीं, जिसका अर्थ था शुरू करने के लिए आरंभिक पूँजी। यह पूँजी प्राप्त करना 1997–98 के समय आसान हो गया था क्योंकि 1997–98 के पूर्वी एशियाई संकट के उत्तर-प्रभावों से निपटने के लिए फ़ेड ने ब्याज दरें बेहद गिरा दी थीं। इसके अलावा ये कम्पनियाँ निर्भर करती थीं अपने शेयर को अच्छे से अच्छे दाम पर बेचने के लिए जिसके लिए सट्टेबाज़ों को जमकर खिलाया जाता था। ये शेयर एकदम नये किस्म के थे जिनका वास्तकविक संपत्ति से कोई लेना-देना नहीं था। वास्तिवक अर्थव्यवस्था में काम करने वाली कम्पनियों के शेयरों के दाम उनकी वास्तविक संपदा से मेल नहीं खाते। लेकिन डॉट-कॉम कम्पनियों की तो कई बार कोई वास्तविक सम्पदा होती ही नहीं थी और फ़िर भी उनके शेयर आसमान छू रहे थे! कई कम्पनियाँ इस शेयर बाज़ार बुलबुले के कारण कागज़ों पर अरबपति-खरबपति हो गयीं। मार्च 2000 इस डॉट-कॉम बुलबुले के फ़ूलने का चरमोत्कर्ष था जब नास्डाक सूचकांक अपने शीर्ष पर पहुँचा। डॉट-कॉम बुलबुले के फ़ूटने की शुरुआत इसी के ठीक बाद हुई। इसके तात्कालिक कारणों के रूप में लोगों ने अमेरिकी सरकार और माइक्रोसॉफ्ट के बीच हुए मुकदमे और वाई2के समस्या को भी गिनाया था लेकिन असल कारण कुछ और था। भावी मुनाफ़े की उम्मीद में तमाम इंटरनेट सम्बन्धित सेक्टरों में सैकड़ों कम्पनियाँ लगातार हानि में काम कर रही थीं। उनका सहारा था फ़ेड की कम ब्याज दर। लेकिन नेटवर्क प्रभाव के जरिये सभी कम्पनियाँ कभी मुनाफ़ा कमा ही नहीं सकती थीं। हर सेक्टर में ज़्यादा से ज़्यादा एक या दो विजेता ही हो सकते थे जो प्रचार और सट्टेबाजी के जरिये अपने उपभोक्ताओं के आधार को हानि में रहते हुए इस हद तक विस्तारित कर पाते कि बाद में उससे कहीं ज़्यादा मुनाफ़ा कमाया जा सके। 2001 आते-आते जिस भावी मुनाफ़े की उम्मीद में तमाम डॉट-कॉम कम्पनियाँ काम कर रही थीं, वह असलियत नहीं बन पाया और वेंचर पूँजी भी समाप्त हो चुकी थी। नतीजतन, सैकड़ों कम्पनियाँ दीवालिया हुईं, छँटनियाँ हुईं, तालाबन्दियाँ हुईं और स्टॉक मार्केट भारी मन्दी का शिकार होने लगा। तरलता में एक भारी कमी आयी और पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था एक गम्भीर मन्दी की ओर बढ़ने लगी।

हाउसिंग बूम

डॉट-कॉम बुलबुले के फ़ूटने के कारण पैदा हुए संकट से निपटने के लिए फ़ेडरल बैंक ने ब्याज दरों को ऐतिहासिक रूप से निम्न स्तरों तक गिरा दिया। यहीं से शुरू होती है ‘हाउसिंग बूम’ की कहानी। ज़रा येल के अर्थशास्त्री रॉबर्ट शिलर के इस कथन पर निगाह डालें- “जैसे ही शेयरों की कीमत गिरी, रियल एस्टेट उस सट्टेबाज़ी के पागलपन के लिए एक प्राथमिक निकासी द्वार बन गया, जिसे स्टॉक मार्केट ने शुरू किया था। अपने हाल ही में हासिल की गयी प्रतिभा का ये जुआरी इससे बेहतर और कहाँ इस्तेमाल कर सकते थे?…-आजकल घर खरीदने से बड़ा राष्ट्रीय उन्माद सिर्फ़ पोकर है…”।

आज जिस परिघटना को हम ‘हाउसिंग बूम’ के नाम से जानते हैं वह अमेरिकी आवास बाज़ार में मोटे तौर पर 2001 से 2005 तक अस्तित्वमान रही और 2005 में उसमें उतार शुरू हुआ। आवास बाज़ार में तेज़ी पूरे अमेरिका में समान रूप से नहीं आयी। विशेष रूप से इसका केन्द्र थे कैलीफ़ोर्निया, फ्लोरिडा, न्यूयॉर्क, शिकागो, डेट्रॉइट, और बॉसवॉश मेगालोपॉलिस। इसके अतिरिक्त भी कई अन्य इलाकों में इस तेज़ी का प्रभाव देखा गया। आवास बाज़ार में आने वाली तेज़ी कोई नयी परिघटना नहीं थी। यह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से चक्रीय रूप से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आती-जाती रही है। लेकिन इस बार यह सबसे बड़े पैमाने पर आयी थी और इसमें कुछ अस्वस्थ और अस्वाभाविक था। इस बुलबुले के पैदा होने के कई कारण थे। इनमें ऐतिहासिक रूप से निम्न ब्याज दरें, ऋणदाताओं द्वारा बेहद कम ब्याज दरों पर और बिना जाँच-पड़ताल के बड़े पैमाने पर दिया जाने वाला खराब ऋण, और प्रचार और सट्टेबाज़ी द्वारा घर खरीदने के लिए पैदा किया गया उन्माद प्रमुख थे। लेकिन यह सारा गोरखधन्धा क्यों किया गया था, यह जानना दिलचस्प होगा। डॉट-कॉम बुलबुले के फ़टने के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था जिस मन्दी की ओर बढ़ रही थी उसके बारे में हम बता चुके हैं। इस मन्दी के आसन्न होने के कारण उपभोक्ता सामग्रियों की ख़रीद में कमी आने लगी थी। इसी कमी को रोकने के लिए लोगों के बीच एक ऐसा माहौल पैदा करना ज़रूरी था जिससे कि उपभोक्ता ख़र्च को गिरने से रोका जा सके। ऐसा किया जा सकता था ‘वेल्थ इफ़ेक्ट’ पैदा करके और सहज प्राप्य पूँजी मुहैया कराके।

पहली बात तो यह है कि अमेरिकियों में मकान के मालिकाने के प्रति एक आसक्ति वहाँ की व्यवस्था ने लम्बे समय के दौरान पैदा की है। ज्ञात हो कि अमेरिकी बड़े पूँजीपति वर्ग में रियल एस्टेट वालों की हमेशा से ही एक शक्तिशाली लॉबी रही है। नतीजतन, एक आम मध्यवर्गीय अमेरिकी नागरिक घर का मालिक होना बहुत बड़ी नेमत समझता है। लेकिन इस बुलबुले को बनाने के लिए पहले यह इच्छा एक उन्माद में तब्दील की गयी और फ़िर पागलपन में। यहाँ तक कि तमाम सटोरियों की पत्रिकाओं तक ने 2005 के आरम्भ होते-होते रियल एस्टेट बाज़ार को “झागदार” (फ्रॉथी) बताना शुरू कर दिया। 2007 में फ़ोर्ब्स पत्रिका ने एक लेख में लिखा, “यह समझने के लिए कि अमेरिका में घर खरीदने का उन्माद सभी संजीदा सच्चाइयों से कोसों दूर है, आपको बस मौजूदा सबप्राइम ऋण संकट पर एक निगाह डालने की आवश्यकता है…जैसे-जैसे ब्याज दरें और उसके साथ मॉर्टगेज भुगतान चढ़ने शुरू हुए हैं, वैसे-वैसे कई नये मालिकों को अपनी ज़रूरतों को पूरा करने में दिक्कतें पेश आ रही हैं…ये ऋण लेने वाले उससे भी बुरी स्थिति में पहुँच गये हैं जिसमें वे ऋण लेने से पहले थे।”

दूसरी बात यह है कि अमेरिका में आवास में निवेश करने को ज़्यादा भरोसेमन्द माना जाता है। इस रूप में नहीं कि यह आपको रहने की जगह देगा, बल्कि इस रूप में कि यह एक लाभदायक और भरोसेमन्द एसेट (सम्पदा) है जिसकी कीमत समय के साथ बढ़ेगी। साथ ही यह तुलनात्मक रूप से जोखिम से मुक्त निवेश है। यह कहा जाता है कि शेयर की तरह मकानों की कीमत अस्थिर और गैर-भरोसेमन्द नहीं होती है। इसके अतिरिक्त, महामन्दी के बाद के दौर से हाउसिंग बूम के समाप्त होने तक अमेरिका में मकानों की दरों में कभी गिरावट नहीं आयी थी। इसलिए भी लोग मकान में पैसा लगाना शेयर मार्केट में पैसा लगाने से बेहतर समझने लगे क्योंकि डॉट-कॉम बुलबुले के फ़ूटने और 1997–98 के पूर्वी एशियाई मौद्रिक संकट के बाद निवेशकों ने यह समझ लिया था कि शेयर बाज़ार अधिक से अधिक अस्थिर और आवारा होता जा रहा है। आवास में निवेश ठोस और भरोसेमन्द प्रतीत होता था। लेकिन आवास बाज़ार में तेज़ी की समाप्ति के बाद से यह विश्वास डगमगा चुका है। बहरहाल, इसने हाउसिंग बुलबुले को पैदा करने में काफ़ी योगदान दिया।

कुछ अर्थशास्त्रि‍यों ने इस यक़ीन पर भी सवाल उठाया है कि पूरी बीसवीं शताब्दी में (महामन्दी के दौर को छोड़कर) आवासीय कीमतों में लगातार भारी बढ़ोत्तरी होती रही है। रॉबर्ट शिलर ने दिखलाया है कि 1890 से 2004 के बीच मुद्रास्फ़ीति को समायोजित करने के बाद आवास की कीमतों में मात्र 0.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 1940 से 2004 के बीच वृद्धि 0.7 प्रतिशत रही है।

हाउसिंग बूम के पीछे तीसरा कारण था सट्टेबाज़ी। जैसे ही 2000–2001 में आवासीय कीमतों में बढ़ोत्तरी शुरू हुई, जिसका कारण फ़ेड द्वारा ब्याज दरों में नाटकीय कटौती था, वैसे ही सट्टेबाज़ों द्वारा घरों की खरीद में भी भारी वृद्धि हुई। कई अर्थशास्त्रि‍यों ने उस समय ही आने वाले समय में भारी क्रैश की चेतावनी दे दी थी। उनका कहना था कि घरों की आसमान छूती कीमत का कारण उनके वास्तविक मूल्य में वृद्धि नहीं बल्कि सट्टेबाज़ी या स्पेक्यूलेशन है। मार्च 2006 में कंट्रीवाइड फ़ाइनेंशियल के सीईओ एंजेलो मोत्सिलो ने कहा कि साल भर के भीतर घरों की कीमतों में 30 प्रतिशत तक की गिरावट आने की पूरी संभावना है क्योंकि घर अपनी वास्तविक कीमत पर नहीं है और सट्टेबाज़ी के बुलबुले की हवा निकलते ही पूरा का पूरा आवासीय उद्योग अमेरिका के ही नहीं बल्कि विश्व के पैमाने पर एक लम्बी मन्दी का शिकार हो जाएगा। सट्टेबाज़ी को बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार एक कारकं फ़ेड द्वारा लम्बे समय तक लक्ष्य ब्याज दर को 1 प्रतिशत पर रखना भी था जिसने सटोरियों का मनोबल बढ़ाने का ही काम किया। इसके लिए तत्कालीन फ़ेड अध्यक्ष व अर्थशास्त्री एलन ग्रीनस्पैन को दोषी ठहराया जाता है। लेकिन पूँजीवाद के पूँजीवादी समालोचक यह नहीं समझ पाते हैं कि इसमें श्रीमान ग्रीनस्पैन की कोई ग़लती नहीं थी। दरअसल, अगर पूरी अर्थव्यवस्था को डॉट-कॉम के गुब्बारे के फ़टने के बाद डूबने से बचाना था तो बाज़ार में बड़ी मात्र में पूँजी इंजेक्ट करके निवेश को बढ़ावा देना फ़ेड की मजबूरी थी। यह सच है कि इससे संकट सिर्फ़ निलम्बित ही हो सकता था। लेकिन पूँजीवाद और कुछ कर भी तो नहीं सकता!

चौथा कारण था मीडिया द्वारा रियल एस्टेट से घूस खाकर लोगों में घर खरीदने के प्रति एक उन्माद और पागलपन पैदा करना। 2005 से 2006 के बीच ऐसे टेलीविज़न कार्यक्रमों में भारी वृद्धि हुई जो घर को खरीदने के लिए लोगों को उकसाते थे। अमेरिका में ऐसी किताबों की भरमार हो गयी जो मकान को सर्वश्रेष्ठ सम्पदा घोषित करने लगीं। इसमें रियल एस्टेट लॉबी द्वारा फ़ेंकी गयी हडि्डयों को चबा-चबाकर गुज़ारा करने वाले अर्थशास्त्री डेविड लेरियाह की किताब व्हाई दि रियल एस्टेट बूम विल नॉट एण्ड प्रमुख थी। हालाँकि फ़ेड के अध्यक्ष बेन बर्नाके द्वारा 2006 में हाउसिंग बूम की समाप्ति की घोषणा के बाद यही लेरियाह यह मानने को मजबूर हुए कि एक बुलबुला पैदा किया गया था जिसे हमेशा के लिए नहीं चलाया जा सकता था और बाज़ार करेक्शन तो होना ही था। लेरियाह नेशनल एसोसियेशन ऑफ़ रियाल्टर्स के पैसों पर पलने वाला एक कुख्यात अर्थशास्त्री है जिसका काम ही रियल एस्टेट के मगरमच्छों का हित साधने वाली सट्टेबाज़ियों को अपने सिद्धान्तों से बढ़ावा देना है। हाउसिंग बूम की समाप्ति के बाद इन्हें अमेरिकी अर्थशास्त्र का जोकर कहा जाने लगा है!

लेकिन ये चारों कारण सहायक कारण थे। हाउसिंग बूम के असल कारण तो मुख्य रूप से दो थे।

पहला, 2001 में डॉट-कॉम क्रैश के झटके को सोखने के लिए कदम उठाना। 2000 में नास्डाक सूचकांक में डॉट-कॉम बुलबुले के फ़टने के कारण 70 प्रतिशत की अभूतपूर्व गिरावट आयी। इसके कारण लोगों ने शेयरों में से अपनी पूँजी निकालनी शुरू कर दी और मीडिया और सट्टेबाज़ों के बहकावे में रियल एस्टेट में लगानी शुरू कर दी जिसे ज़्यादा भरोसेमन्द और कभी हानिकारक न बनने वाला निवेश करार दिया गया। येल के अर्थशास्त्री रॉबर्ट शिलर ने इस पर गौर करने योग्य टिप्पणी करते हुए कहा था कि “अतार्किक प्रचुरता” शेयरों की दुनिया से निकल कर मकानों की दुनिया में आ गयी। शेयर मार्केट के ढहने के बाद सट्टेबाज़ी का निकास द्वार बना आवास उद्योग।

दूसरा प्रमुख वास्तविक कारण था फ़ेडरल रिज़र्व द्वारा डॉट-कॉम बुलबुले के फ़टने के झटके से अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए ब्याज दरों को ऐतिहासिक रूप से निम्न स्तरों तक गिरा देना। फ़ेडरल बैंक ने 2001 में ब्याज दरों को 6.5 प्रतिशत से घटाकर 1 प्रतिशत पर कर दिया!! फ़ेड अध्यक्ष एलन ग्रीनस्पैन ने बाद में स्वीकार किया कि हाउसिंग बुलबुले के पैदा होने का कारण फ़ेड द्वारा ब्याज दरों को गिराना ही था। सभी जानते हैं कि निम्न ब्याज दरों, उच्चतर आवास मूल्यों और बढ़ती वित्तीय तरलता का अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है। फ़ेड की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी भी अन्य संपत्ति के मूल्य की ही तरह, घर की कीमतें भी ब्याज दरों से प्रभावित होती हैं और कई देशों में तो आवास उद्योग ही मौद्रिक नीति में आये बदलाव को अन्य सेक्टरों तक संचारित करते हैं। एलन ग्रीनस्पैन का उस समय तो यशगान गाया गया कि उन्होंने अर्थव्यवस्था को मन्दी में जाने से बचाया। और बाद में उनकी आलोचनाएँ की गयीं कि उन्होंने सबकुछ जानते हुए भी आवास बाज़ार के गुब्बारे में ज़रूरत से ज़्यादा हवा भर दी जिससे कि वह फ़ूट गया। ब्याज दरों को नीचे करने से पूँजी तो बाज़ार में आ गयी। लेकिन ज़्यादा अच्छी क्रेडिट हिस्टरी वालों को ऋण की आवश्यकता नहीं थी और ख़राब क्रेडिट हिस्टरी वालों को ऋण देने के लिए किसी “रचनात्मकृ ऋण उपकरण” की ज़रूरत थी। इसी ज़रूरत को पूरा करने के लिए सबप्राइम लोन, एडजस्टेबल मॉर्टगेज रेट, आदि जैसे उपकरणों का उपयोग शुरू किया गया और बड़े पैमाने पर खराब ऋण दिये गये, जो बाद में ज़हरीला वित्तीय कचरा साबित हुए। डलास फ़ेड के अध्यक्ष रिचर्ड फ़िशर की इस उक्ति पर ग़ौर करें, “फ़ेड की कम ब्याज दरों की नीति ने गैरइरादतन तौर पर आवास बाज़ार में सट्टेबाज़ी को बढ़ावा दिया, और बाद में होने वाले भारी करेक्शन के कारण लाखों मकानमालिकों को भारी हानि उठानी पड़ी।” मॉर्टगेज ब्याज दरों में कटौती से ऋण लेने की कीमत कम हो जाती है और इसके कारण एक ऐसे बाज़ार में कीमतें बढ़ने लगती हैं जहाँ लोग मकान ख़रीदने के लिए ऋण लेते हैं। गणना करने से पता चलता है कि ब्याज दरों में 1 प्रतिशत का बदलाव घरों की कीमत को 10 प्रतिशत तक प्रभावित कर सकता है। यानी, ब्याज दरों और मकान की कीमतों में 1:10 का अनुपात है। रॉबर्ट शिलर ने दिखलाया है कि फ़ेड द्वारा ब्याज दरों में की गयी भारी कटौती के कारण हाउसिंग बूम के दौरान 45 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। इसी नियम के अनुसार जब ब्याज दरें बढ़ती हैं तो घर की कीमतों पर क्या प्रभाव पड़ता होगा इसे समझा जा सकता है। हुआ यही है। फ़ेड ने 2004 से 2006 के बीच 17 बार ब्याज दरें बढ़ाईं-1 प्रतिशत से 5.25 प्रतिशत तक। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अर्थशास्त्रि‍यों का कहना था कि ब्याज दरों को पहले ही बढ़ाया जाना चाहिए था। लेकिन यह भी पूँजीवाद के दायरे के भीतर एक संत सदिच्छा ही है। पूँजीवादी व्यवस्था के नियोजक छोटी दूरी का ही सोच सकते हैं। लम्बा सोचने की इजाज़त उन्हें अराजकतापूर्ण आर्थिक शक्तियाँ देती नहीं हैं।

कम ब्याज दरों से ही सबप्राइम ऋण देने की गति, दर और आकार में वृद्धि हुई। मार्च 2007 में सबप्राइम ऋण लेने वालों के भारी संख्या में डिफ़ॉल्टर होने और उनकी संपत्ति की ज़ब्ती और नीलामी होने के कारण सबप्राइम ऋणदाता ढह गये और पूरा सबप्राइम ही नहीं बल्कि ऋण बाज़ार ही ढहना शुरू हो गया। इसके बार में हार्पर्स मैगज़ीन लिखती है: “समस्या यह है कि खरीदने वालों के कुल मॉर्टगेज के स्थिर रहने या बढ़ने के बावजूद घर की कीमतें गिर रही हैं…बढ़ता ऋण-सेवा भुगतान आगे भी उपभोक्ता ख़र्च से आय को हटाएगा। साथ में देखने पर, ये कारक “वास्तविक अर्थव्यवस्था” को सिंकोड़ देंगे, पहले से ही गिर रही वास्तविक आय को नीचे ले जाएँगे, और कर्ज़ तले दबी हमारी अर्थव्यवस्था को जापान जैसे ठहराव में धकेल देंगे या उससे भी बुरी स्थिति पैदा कर देंगे।” जिन कारकों ने ब्याज दरों को बढ़ाने का काम किया है वे हैं अमेरिका का राष्ट्रीय ऋण, व्यापार घाटा, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण मुद्रास्फ़ीति में वृद्धि, और अमेरिकी अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेश में आने वाले परिवर्तन। परिवर्तनीय ब्याज दरों के कारण सबप्राइम ऋण फ़ेड द्वारा ब्याज दरें बढ़ाए जाने के कारण काफ़ी घातक सिद्ध हुए। फ़ेड ने जब ब्याज दरें बढ़ाईं तो वे सबप्राइम ऋणदाता अपनी ब्याज दरों को इस हद तक बढ़ाने को मजबूर हो गये कि सबप्राइम ऋण लेने वालों के लिए ऋण की किश्त चुकाना भी मुश्किल हो गया और उनकी संपत्ति की ज़ब्ती और नीलामी शुरू हो गयी। लेकिन अब मकानों की कीमतें इतनी गिर गयी थीं कि उनमें निवेश करने के लिए पर्याप्त निवेशक नहीं बचे। नतीजा यह हुआ कि तमाम सबप्राइम ऋणदाता कंगाल होने शुरू हो गये और साथ ही कोलेटरल डेट ऑब्लिगेशन पैकेज के तहत जिन हेज फ़ण्ड्स और निवेश बैंकों ने निवेश किये थे वे भी दीवालिया होने लगे। यही कारण था कि सबप्राइम संकट सबप्राइम ऋण से बढ़कर ऑल्ट-ए व प्राइम ऋण तक भी पहुँच गया और पूरा का पूरा वित्तीय पूँजी बाज़ार ही भयंकर रूप से संकटग्रस्त हो गया। बाज़ार में तरलता की कमी हो गयी; कई निवेशक क्रेडिट क्रंच और असमाधेयता के शिकार हो गये। फ़ेड ने तीन बार पूँजी बाज़ार में पूँजी इंजेक्ट करके पूँजी बाज़ार को अपने पैरों पर खड़ा करने की कोशिश की; इसके अतिरिक्त, फ़ेड ने ब्याज दरें थोड़ी गिराकर भी सबप्राइम संकट को बढ़ने से रोकने की कोशिश की लेकिन इसका कोई लाभ नहीं हुआ और दिसम्बर मध्य आते-आते सरकारी अधिकारी और प्रमुख निवेश बैंक भी इस बात को स्वीकार करने लगे कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था एक गहरे संकट के भँवर में फ़ँस चुकी है। यह संकट अब सर्वव्यापी बन चुका है। दुनिया के सबसे बड़े बॉण्ड फ़ण्ड पिमको के प्रबंधक ने तो जून 2007 में ही चेतावनी दे दी थी कि सबप्राइम संकट अन्य सेक्टरों से कोई कटी हुई परिघटना नहीं है और कालान्तर में इसकी कीमत पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था चुकाएगी। इसके दुष्प्रभाव व्यापक हैं। सबसे प्रमुख प्रभाव पूरे निर्माण उद्योग पर पड़ा है। नये मकानों के निर्माण में भारी कमी दर्ज की जा रही है। मॉर्टगेज इक्विटी में निवेश करने वालों ने अपनी पूँजी निकालनी शुरू कर दी है जिससे पूरी की पूरी मॉर्टगेज इण्डस्ट्री एक गम्भीर संकट का शिकार हो चुकी है। अर्थशास्त्री नूरियल रूबीनी ने कहा है कि आवास उद्योग गहरी मन्दी का शिकार है जो पूरी अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार रहा है और यह एक महामन्दी भी पैदा कर सकता है। भूमण्डलीकरण के “मानवीय चेहरे” की वकालत करने वाले जोसफ़े स्टिग्लिट्ज़ तक को यह स्वीकार करना पड़ा है मकान की गिरती कीमतें पूरी अमेरिकी अर्थव्यवस्था को एक मन्दी की ओर धकेल सकती हैं। मकान की कीमतें गिरने के साथ ही आवास उद्योग से जुड़ा “समृद्धि प्रभाव” हवा हो चुका है और उपभोक्ता सामग्रियों को खरीदने के लिए लोगों के पास न तो पैसा है और न ही वे पैसा खर्च करना चाहते हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था अपने 13.7 ट्रिलियन डॉलर का 70 प्रतिशत उपभोक्ता सामग्रियों की ख़रीद से प्राप्त करती है। आवास उद्योग की मन्दी के कारण उपभोक्ता सामग्रियों की ख़रीद में भी भारी कमी आई है और इसके कारण “वास्तविक अर्थव्यवस्था” प्रभावित होने लगी है। इसका एक प्रमाण तब मिला जब 9 सितम्बर को डॉलर 15 वर्ष के अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँच गया और 4000 नौकरियों में कटौती की गयी। 2003 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि अमेरिका में नौकरियों में कटौती की गयी है। और यह तो सिर्फ़ शुरुआत भर है। आगे स्थिति इससे भी भयंकर रूप धारण करने वाली है।

अमेरिकी सरकार और फ़ेडरल रिज़र्व के सामने एक बहुत बड़ा सवाल यह है कि पहले की तरह इस बाज़ार को संकट से उबारने के लिए कोई “कीन्सियाई हस्तक्षेप” किया जाय या नहीं? यह सवाल भी कोई सीधा सवाल नहीं है बल्कि काफ़ी टेढ़ा-मेढ़ा है। कारण यह है कि राष्ट्रीय कर्ज़ के बढ़ने, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और व्यापार घाटे के बढ़ने के साथ ही फ़ेड के लिए ब्याज दरों को और गिराना एक तरह से असम्भव हो गया है। दूसरा कारण यह है कि पहले भी बाज़ार में पूँजी इंजेक्ट करके अर्थव्यवस्था को उबारने के दूरगामी परिणामों को अमेरिकी शासक वर्ग देख चुका है। 1997–98 के संकट से उबरने के लिए फ़ेड ने ब्याज दरें गिराई थीं और पूँजी बाज़ार में पूँजी इंजेक्ट की थी। इसके कारण जो डॉट-कॉम बुलबुला पैदा हुआ उसके 2001 में फ़ूटने के बाद फ़ेडरल रिज़र्व ने हाउसिंग बूम पैदा करके अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए फ़िर से ब्याज दरों को गिराया और इस बार अभूतपूर्व स्तरों तक। 2005 में हाउसिंग बुलबुले के फ़ूटने के बाद जो सबप्राइम संकट शुरू हुआ है उससे उबरने के लिए फ़िर से पूँजी बाज़ार को कोरामिन का इंजेक्शन देने से फ़ेड ने इंकार कर दिया है। क्योंकि हर ऐसी मदद के बाद जो नया संकट आया है वह पहले से ज़्यादा भयंकर रहा है क्योंकि हर ऐसे कदम के बाद अर्थव्यवस्था में अस्थिरता बढ़ी है, तरलता के बढ़ने-घटने के चक्र ज़्यादा क्षतिकारी हो गये हैं और सट्टेबाज़ी को इससे काफ़ी बढ़ावा मिला है। कुल मिलाकर, विश्व साम्राज्यवाद के चौधरी और उनके तलवे चाटने वाले अर्थशास्त्री ही अब इस पूरे जटिल पूँजी तंत्र को नहीं समझ पा रहे हैं जो उन्होंने खुद ही पैदा किया है। वे ज़्यादा से ज़्यादा तात्कालिक राहत के लिए होम्योपैथिक डॉक्टर की तरह लक्षणों की पहचान करने की कोशिश कर रहे हैं और वैसे ही सुझाव भी दे रहे हैं। लेकिन इस बीमारी का इलाज पूँजीवादी-साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था के भीतर है ही नहीं। यह इसकी अंतकारी लाइलाज बीमारी है- अति-उत्पादन और पूँजी की प्रचुरता।

सरकारी सहायता से बाज़ार को उबारने का तो अब बुर्जुआ अर्थशास्त्री तक अपनी भाषा और शब्दावली में विरोध कर रहे हैं। सरकारी मदद का विरोध करने वालों का कहना है कि ऐसी मदद यह एक बुरा उदाहरण स्थापित कर देगी और एक “नैतिक तबाही” लाएगी। इसके अतिरिक्त, यह आवास उद्योग में सट्टेबाज़ी को बढ़ावा देगा। मॉर्टगेज समर्थित सिक्योरिटीज़ (प्रतिभूतियों) के बाज़ार के जनक, सालोमॉन ब्रदर्स का कहना है कि यह तो तूफ़ान की शुरुआत भर है। इसी से अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि तूफ़ान के मध्य में क्या होने वाला है।

लुब्बेलुबाब यह है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को एक गम्भीर संकट के भँवर में जाने से अब कोई नहीं बचा सकता है। और इस संकट को रोकने का प्रयास तो अब सरकार ने छोड़ भी दिया है। अब तो सारे घाघ “डैमेज कण्ट्रोल” के बारे में सोच रहे हैं!

चेन रिएक्शन

जिन प्रेक्षकों ने यह भविष्यवाणी की थी कि अमेरिकी सबप्राइम संकट एक वित्तीय संकट है जिसका “वास्तविक अर्थव्यवस्था” पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और जो अमेरिकी पूँजी बाज़ार तक ही सीमित रहेगा, उन्हें जल्दी ही अपनी बात पर पुनर्विचार करना पड़ा। सितम्बर, 2007 में अमेरिकी सबप्राइम संकट के कारण ब्रिटेन के प्रमुख मॉर्टगेज बैंकों में से एक नॉर्दर्न रॉक ढह गया। पूरे महीने बैंक से अपने पैसे निकालने वालों की भीड़ लगी रही और बैंक से कुछ ही समय में लोगों ने 2 खरब डॉलर निकाल लिए और नॉर्दर्न रॉक दीवालियेपन की कगार पर आ गया। बैंक ऑफ़ इंग्लैण्ड ने सही समय पर हस्तक्षेप करके इस बैंक को बचाया। लेकिन यह पूरे वित्तीय संकट को रोक नहीं सकता। इंग्लैण्ड के केन्द्रीय बैंक ने 28 बिलियन डॉलर ब्रिटिश पूँजी बाज़ार में इंजेक्ट किए लेकिन अभी भी स्थिति डावाँडोल ही बनी हुई है। नॉर्दर्न रॉक बैंक का पूरा व्यवसाय मॉर्टगेज ऋणों पर आधारित था। इसमें करीब 4,000 कर्मचारी काम करते हैं। अमेरिकी सबप्राइम बाज़ार के ढहने के साथ ही इसके पास मॉर्टगेज ऋणों को वित्तपोषित करने के लिए पूँजी की कमी हो गयी। वैश्विक पूँजी बाज़ार के अधिक से अधिक जुड़ते जाने के बाद यह तो होना ही था। और इस कदर भूमण्डलीकृत विश्व वित्तीय बाज़ार में ऐसी घोषणा और भविष्यवाणियाँ करना कि कोई भी संकट स्थानीय बना रहेगा, मूर्खतापूर्ण है। लेकिन पूँजीवादी अर्थशास्त्रि‍यों की फ़ितरत शुतुरमुर्ग जैसी होती है। तूफ़ान आने पर वे अपना सिर बालू के अन्दर डालकर यह सोच लेते हैं कि तूफ़ान चला गया। लेकिन ऐसा होता तो है नहीं, इसलिए इससे कोई फ़ायदा नहीं होता। जैसा कि लिबरल डेमोक्रैट विंस केबल ने कहा है, “मौजूदा बूम दीर्घकालिक निवेश पर या निर्यात या अधिक शिक्षित, कुशल श्रम शक्ति पर आधारित नहीं है। यह ऋणपोषित उपभोक्ता क्रय, बेहूदा किस्म के ऋण और मकानों की कीमत बढ़ने पर आधारित है। इसे तो फ़ूटना ही था।”

चीन की अर्थव्यवस्था पर भी अमेरिकी सबप्राइम संकट का प्रभाव पड़ना शुरू हो गया है। कारण यह है कि चीन की पूरी अर्थव्यवस्था एक निर्यात निर्देशित अर्थव्यवस्था है और उसके निर्यातों का सबसे बड़ा ख़रीदार अमेरिका है। अमेरिका का चीन की ओर व्यापार घाटा चेतावनी स्तर को कब का पार कर चुका है। ऐसे में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में होने वाली कोई भी हलचल चीन की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किए बगैर नहीं रह सकती। और जब संकट इस गंभीरता और इस आकार का हो तो समझा जा सकता है कि चीन की अर्थव्यवस्था पर उसका क्या प्रभाव पड़ सकता है। मिसाल के तौर पर, अगर फ़ेडरल बैंक ने ब्याज दरों को और घटाने का निर्णय लिया होता या अगर वह भविष्य में संकट को और गहराने से रोकने के लिए ऐसा करता है, तो इसका चीन की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि वह अमेरिका के राष्ट्रीय ऋण और व्यापार घाटे को और बढ़ाएगा। व्यापार ने अमेरिकी और चीनी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह नत्थी कर दिया है। अगर अमेरिकी बाज़ार में उपभोक्ता टिकाऊ और गैर-टिकाऊ वस्तुओं पर ख़र्च में कमी आती है तो जिस देश पर इसका सबसे भयंकर प्रभाव पड़ेगा वह निर्विवाद रूप से चीन ही होगा। दूसरे नंबर पर भारत का नाम आता है। और अगर अमेरिकी वित्तीय पूँजी बाज़ार में संकट आता है तो उसका प्रभाव दुनिया के हर देश पर पड़ेगा। कारण यह है कि भारत और चीन जैसी तथाकथित “उभरती अर्थव्यवस्थाओं” में जो विदेशी संस्थागत निवेश हो रहा है जिसके कारण यहाँ के शेयर बाज़ार आसमान छूते हैं, उसका एक विशाल हिस्सा हेज फ़ण्ड्स द्वारा किया जाने वाला निवेश है। हेज फ़ण्ड्स पूँजी बाज़ार में होने वाले किसी भी संकट का आसानी से शिकार हो जाते हैं। मिसाल के तौर पर, सबप्राइम संकट ने भी हेज फ़ण्ड्स को ही सर्वाधिक हानि पहुँचाई है। ऐसे संकट की सूरत में हेज फ़ण्ड्स निवेश को रोकना शुरू कर देते हैं और शेयर बाज़ार से अपनी पूँजी निकालना शुरू कर देते हैं। भारत के सेंसेक्स में हाल में आयी ज़बर्दस्त अस्थिरता का भी प्रमुख कारण यही था।

एक दूसरे रूप में कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्थाएँ भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था से नाभिनालबद्ध हैं। उनपर भी इस संकट का प्रभाव पड़ना लाज़िमी है।

विश्व अर्थव्यवस्था: गहराता साम्राज्यवादी संकट और आने वाले समय के दिशा संकेतक

मार्च 2007 में जब सबप्राइम संकट पूरी तरह खुलकर सामने आ गया तो विशेषज्ञ और आम लोग, दोनों ही इसकी व्यापकता और गहराई को पूरी तरह नहीं समझ पाए थे। वित्तीय जगत में जब नुकसान पर नुकसान हुए जा रहा था तब भी शेयर बाज़ार कुलाँचें भर रहे थे। इसी दौर में भारत में संवेदी सूचकांक ने अपना शीर्ष प्राप्त किया और लगातार तेज़ी का एक दौर बना रहा। हालाँकि अब शेयर बाज़ार तेज़ी से लुढ़क रहा है। लेकिन तब एक अजीबो-ग़रीब किस्म की स्थिति पैदा हो गयी थी। एक तरफ़ सबप्राइम संकट बढ़ रहा था और दूसरी तरफ़ शेयर बाज़ार में तेजड़ियों का दबदबा कायम हो रहा था। डो जोंस अक्टूबर 1, 2007 को रिकॉर्ड-तोड़ 14,087.55 अंक पर बन्द हुआ। भारत में भी सेंसेक्स 20,000 अंक के आँकड़े को छू गया। लोग हैरान थे कि वित्तीय संकट ने ही एक वित्तीय तेज़ी को जन्म कैसे दे दिया। हालाँकि, यह हैरानी अब दूर हो चुकी है क्योंकि लोग समझ गये हैं कि ऐसी वित्तीय तेज़ी सिर्फ़ पूँजी बाज़ार के बढ़ते आवारा-शराबी चरित्र की ओर ही इशारा करती है। अमेरिका में फ़ेड के हस्तक्षेप के कारण कुछ समय के लिए ऐसा लगा कि सबप्राइम संकट एक सेक्टोरल संकट मात्र है और इसके व्यापक परिणाम पूरी अर्थव्यवस्था को नहीं भुगतने पड़ेंगे। हाल में स्टॉक मार्केट में आई तेज़ी का मुख्य वजह हर जगह सरकार द्वारा हस्तक्षेप करके व्यवस्था में तरलता को ‘पम्प इन’ करना ही था, जिससे लगा था कि सबप्राइम संकट एक सर्वांगीण आर्थिक मन्दी का रूप नहीं लेगा। जो लोग इन्हीं आधारों पर यह दावा करने लगे थे कि पूँजीवाद अब पहले के मुकाबले संकटों का शिकार कम होता है, उन्हें अपनी पूरी विचार-पद्धति पर ही गौर करने की ज़रूरत है। उनके ऐसा मानने के पीछे जो तर्क काम करता है वह यह है कि वृद्धि में आने वाले ठहराव के दौरान भी ऋण को सहज रूप से प्राप्य बनाकर मन्दी को रोका जा सकता है, क्योंकि पूँजी की प्रचुरता इस बात की इजाज़त देती है कि ऋण से उपभोक्ता सामग्रियों की ख़रीद को बढ़ावा दिया जा सके। ऋणदाता अपने आपको अधिक सुरक्षित महसूस करने लगे हैं क्योंकि सिक्योरिटीज़ (प्रतिभूतियों) के जरिये वे जोखिम का बँटवारा कर सकते हैं। ऐसा बँटवारा किसी एक निवेशक के तबाह होने की स्थिति से बचाने के लिए किया गया था। लेकिन जिस पूँजी तंत्र का निर्माण साम्राज्यवादी विश्व प्रभुओं ने किया है उसे अब वे ही नहीं समझते और वह उनके हाथों से निकल गया है। मकसद था कि किसी एक की तबाही न आए और सभी झटके के अपने हिस्से को सोख लें और कोई तबाह न हो। लेकिन हुआ यह कि पहले तो कोई एक जल्दी तबाह होता, अब देर से सब तबाह होंगे। ऋण द्वारा खरीदारी को वित्तपोषित करने के पीछे का केन्द्रीय तर्क यह था कि आय और खर्च के बीच के अनम्य सम्बन्ध को तोड़ दिया जाय। यानी उपभोक्तओं और निवेशकों के ख़र्च का मूल्यांकन इस बात पर नहीं किया जा सकता है कि उनकी मासिक या वार्षिक आय क्या है। ऋण उन्हें उन सभी संभावनाओं में निवेश करने की क्षमता देता है जिसकी इजाज़त उनकी आय उन्हें नहीं देती। ऐसा लगता है मानो आय का ख़र्च से रिश्ता ख़त्म हो गया। लेकिन विश्लेषण को थोड़ा गहराई में ले जाते ही यह समझा जा सकता है कि ऐसा होता नहीं है। अंततः आय ही भुगतान की किश्तें भरती है। कभी-कभी यह सिलसिला बहुत घूम-फ़िर कर आय तक पहुँचता है, लेकिन इस सिलसिले के अंतिम छोर पर आय ही होती है। ऋण के इस पूरे खेल को ही ‘वित्तीय अनियमन’ (फ़ाइनेंशियल डिरेग्यूलेशन) और ‘वित्तीय नवोन्मेष’ (फ़ाइनेंशियल इनोवेशन) का नाम दिया जाता है, जिसे सुनकर अब निवेशकों की रीढ़ की हड्डी तक में सिहरन दौड़ जानी चाहिए!!

दरअसल, वित्तीय तरलता में बढ़ोत्तरी के कारण और वित्तीय लेन–देन की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी के कारण वित्तीय अस्थिरता में ज़बर्दस्त वृद्धि हुई है। यानी, तेज़ी और मन्दी का चक्रीय क्रम छोटा हो गया है। कहना चाहिए कि अच्छी तरह से तेज़ी जैसी कोई चीज़ तो आती ही नहीं है बस एक मन्द मन्दी की स्थिति बनी रहती है। वित्तीय बाज़ार में पैदा हुई अस्थिरता वास्तविक अर्थव्यवस्था में भी संकट पैदा कर देती है। कहा जा सकता है कि वित्तीय पूँजी की प्रचुरता ने वित्तीय सट्टेबाज़ी को बहुत बढ़ा दिया है जो मूलतः अनुत्पादक पूँजी है। लेकिन यह वास्तविक अर्थव्यवस्था से नाभिनालबद्ध हो गयी है। सट्टेबाज़ी वित्तीय पूँजी बाज़ार में जो उथल-पुथल लाती है उसका ‘आफ्टर.इफ़ेक्ट’ वास्तविक अर्थव्यवस्था में साफ़ तौर पर महसूस किया जा सकता है।

जिन तरीकों से वित्तीय पूँजी अर्थव्यवस्था में वृद्धि का भ्रम पैदा करती हैं वह है ‘समृद्धि प्रभाव’ पैदा करके उपभोग को बढ़ावा देना, जिसके बारे में हम पहले ही बात कर चुके हैं। अमेरिका में जो उपभोग मेला पूरे 1990 के दशक में चला उसका आधार यही ‘वेल्थ इफ़ेक्ट’ था, वास्तविक आय नहीं। 1990 के दशक की तेज़ी के दो कारण थे। पहला, भूमण्डलीकरण के कारण वित्तीय पूँजी का निर्बाध प्रवाह और पूँजी बाज़ारों का आपस में जुड़ जाना। दूसरा कारण था अमेरिका में उपभोक्ता टिकाऊ व गैर-टिकाऊ सामग्रियों की खरीद में भारी वृद्धि से होने वाली वृद्धि; हम बता चुके हैं कि खरीदारी में यह वृद्धि ऋण-पोषित थी, जो वित्तीय पूँजी के विस्तार के कारण सम्भव हुआ था। मीडिया और सट्टेबाज़ी के जरिये अमेरिकी मध्यम वर्ग में एक ‘कंज़म्प्शन फ़ेस्ट’ की मानसिकता पैदा की गयी। इसके लिए उन्हें यह अहसास कराना ज़रूरी था कि वे समृद्ध हैं। इसके लिए, एक हाउसिंग बूम पैदा किया गया जिसके कारण सभी मकानमालिकों ने अधिक समृद्ध महसूस करना शुरू किया। अधिक समृद्ध महसूस करने वाला मकान मालिक ही, जिसको यह भरोसा दिला दिया जाय कि भविष्य में मकानों की कीमत और बढ़ेगी और वह और अमीर होगा, अपने उपभोग को वित्तपोषित करने के लिए मॉर्टगेज ऋण जैसे उपकरणों का उपयोग कर सकते हैं।

इसके अतिरिक्त, जब कोई भी तेज़ी ऋण द्वारा वित्तपोषित होती है तो वह एक और बुराई को साथ लाती है-अबचत (डिस्सेविंग)। क्रेडिट या ऋण का अर्थ ही होता है शुद्ध अबचत। बैंक जो ऋण देते हैं वह बचत का ही हिस्सा होता है। अगर ऋण का बड़ा हिस्सा उपभोग पर ही ख़र्च हो जाता है तो निश्चित रूप से वह टिकाऊ आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा नहीं दे सकता। पहले इसे उपभोक्ता सामग्रियों की ख़रीद में आई तेज़ी को शेयर मार्केट में 1997 से 2001 तक की तेज़ी के जरिये वित्त-पोषित किया गया था। यही डॉट-कॉम बुलबुले के बनने और फ़ूटने का दौर था। शेयर मार्केट में आई तेज़ी से परजीवी अमेरिकी मध्य वर्ग ने जमकर कमाई की और उसे उपभोग में जमकर उड़ाया। कारण यह है कि अमेरिका में शेयर व्यापार करने की प्रवृत्ति बहुत अधिक है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 1998 में 35 से 44 वर्ष के अमेरिकी लोगों में से 62.4 प्रतिशत लोग शेयर–होल्डर थे। यही कारण था कि 1997 से 2001 के शेयर बाज़ार बूम ने उपभोग में ख़र्च को जमकर बढ़ाया। 2001 में डॉट-कॉम क्रैश के बाद किस तरह से हाउसिंग बूम पैदा किया गया और उससे उपभोक्ता सामग्रियों पर ख़र्च को कैसे बरकरार रखा गया, यह हम पहले ही दिखला चुके हैं। एक अनुमान के अनुसार 2001 से 2005 के बीच अमेरिका में 40 प्रतिशत रोज़गार वृद्धि आवास उद्योग में वृद्धि के कारण हुई। आवासीय सम्पत्ति के मूल्यों में ज़बर्दस्त वृद्धि के कारण भी उसी किस्म का ‘वेल्थ इफ़ेक्ट’ पैदा हुआ जैसा शेयरों का दाम बढ़ने के कारण हुआ था। इसने भी उपभोग को बढ़ावा दिया। अब हम देख चुके हैं कि यह ‘ईज़ी मनी’ किस तरह से तरलता को बेहद बढ़ाकर वित्तीय बाज़ार की अस्थिरता को बढ़ावा देती है और किस तरह से निम्न ब्याज दरों और अन्धाधुन्ध बुरे ऋण देने से सबप्राइम संकट पैदा हुआ जो अब पूरी विश्व अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। इस संकट ने क्रेडिट क्रंच, असमाधेयता और तरलता में अत्यधिक कमी की समस्या खड़ी कर दी है जिसने पूरी दुनिया की वास्तविक अर्थव्यवस्था को हिलाना शुरू कर दिया है। अमेरिका में शुरू हुई यह मन्दी इस दशक की तीसरी मन्दी है और सम्भवतः यह इन तीनों में सबसे बड़ी साबित होने जा रही है। इस संकट का तात्कालिक कारण सट्टेबाज़ पूँजी में देखा जा सकता है लेकिन दरअसल यह अति-उत्पादन और पूँजी की प्रचुरता का संकट है, जिसके निवेश के लिए लाभदायक निवेश स्थान ही नहीं बचे हैं। लिहाज़ा, यह पूँजी अनुत्पादक हो चुकी है और शेयर बाज़ार और सट्टेबाज़ी में लगकर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था (वास्तविक वाली!!) को डावाँडोल कर रही है।

गौर करने लायक बात यह है कि 1970 के दशक के संकट के बाद से, या कहा जाय कि ‘स्वर्ण युग़‘ की समाप्ति के बाद से विश्व पूँजीवाद में तेज़ी के दौर अधिक विरल होते गये हैं और मन्दी सर्वव्यापी और निरन्तर बनती गयी है। कहना चाहिए कि विश्व पूँजीवादी तंत्र सतत एक मन्दी का शिकार है, जिसमें कभी-कभी थोड़ी कमी आती है। मन्दी में कभी-कभार आने वाली कमी को ही अब तेज़ी या बूम कह दिया जाता है। इसका साफ़ सबूत यह है कि 1970 बल्कि 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध से ही पूरे विश्व का सकल घरेलू उत्पाद लगातार कम होता जा रहा है। उसकी वृद्धि दर में लगातार कमी आती जा रही है।

कीन्सियाई नुस्खों के कारगर होने में विश्व पूँजीवाद के चौधरियों का यक़ीन अमेरिका में केनेडी के दौर या ‘स्वर्णिम युग’ की समाप्ति के साथ ही ख़त्म हो गया था। केनेडी के युग में आई आर्थिक तेज़ी के लिए कई कारक ज़िम्मेदार थे। इसमें एक तो द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया भर में पुनर्निर्माण के ठेकों से अमेरिका को हुआ अतिलाभ था, तो दूसरी तरफ़ तथाकथित ‘ऑटोमोबाइल क्रान्ति’ थी। उस समय भी अमेरिका में एक किस्म का वेल्थ इफ़ेक्ट पैदा हुआ था जिसके कारण उपभोग में भारी वृद्धि हुई थी। वह अमेरिकी पूँजीवाद का स्वर्णिम दौर था, जिसे केनेडी युग के नाम से भी जाना जाता है। आज भी, ख़ास तौर पर, मन्दी के दौरों में अमेरिकी मध्य वर्ग के बड़े-बुजुर्ग बड़ा नॉस्टैल्जिक होकर उस युग को याद करते हैं। लेकिन 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में यह तेज़ी का दौर ख़त्म हो गया और लोगों का धीरे-धीरे इस बात से यकीन भी उठने लगा कि राज्य के सही समय पर उचित हस्तक्षेप से पूँजीवाद को चक्रीय संकट से बचाया जा सकता है और इस तरह पूँजीवाद को अजर-अमर बनाया जा सकता है, जैसा कि हकीम कीन्स के नुस्खे के फ़टे-चिथड़े कागज पर धुली हुई लिखाई में लिखा था। जल्दी ही दुनिया भर में पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाओं ने पूँजी की प्रचुरता के संकट को हल करने के लिए ‘कल्याणकारी राज्य’ का मुखौटा नोचकर फ़ेंकना शुरू कर दिया जो उनका दम घोंट रहा था। पूँजी को उत्पादक निवेश और सट्टेबाज़ी के लिए बाज़ार और विस्तार चाहिए था। और यह कीन्सियाई नुस्खे के अमल में रहते नहीं हो सकता था। लेकिन यह अपरिहार्य था, और यही किया भी गया।

लेकिन कीन्सियाई नुस्खों के खारिज किए जाने के बाद से पूरे विश्व पूँजीवाद ने एक गिरावट की प्रवृत्ति देखी है। पूँजीवाद के विजयी और अमर होने की सभी उत्तर–आधुनिक घोषणाओं की पोल बस अर्थव्यवस्था पर ही एक निगाह डाल लेने से खुल जाती है, जो एक संकट से लदी, बेरोज़गारी और ठहराव का शिकार अर्थव्यवस्था है। वर्ल्ड बैंक के वैश्विक आर्थिक संभावनाएं नामक वार्षिक विश्लेषण के अनुसार 1960 के दशक और 1973 के बीच में विश्व आर्थिक वृद्धि की दर थी 5.2 प्रतिशत। यानी, पहले तेल संकट से पहले तक। इसेक बाद 1974 से 1990 के बीच यह दर घटकर 3 प्रतिशत रह गयी और 1991 से 1997 के बीच यह और अधिक घटकर 2.3 प्रतिशत रह गयी।

अगर दशकीय वृद्धि दरों की तुलना की जाय तो विश्व अर्थव्यवस्था के संकट की और साफ़ तस्वीर सामने आ जाती है।

वृद्धि दरों मे यह कमी विश्व के सबसे उन्नत पूँजीवादी देशों की अर्थव्यवस्था की रफ्तार में कमी आने के कारण हुई है। इसके कई कारण हैं। अति-उत्पादन और पूँजी की प्रचुरता के संकट के कारण वित्तीय विस्तार की नीति को अपनाना पूँजीवाद के समक्ष उपलब्ध एकमात्र विकल्प था। वित्तीय विस्तार और वित्तीय पूँजी बाज़ारों के पैदा होने और उनके आपस में जुड़ते जाने, और उत्पादक निवेश की सम्भावनाएँ पूँजीवाद के दायरे के भीतर नगण्य होते जाने के साथ ही, पूँजी का चरित्र अधिक से अधिक अनुत्पादक और जुआरी होते जाने के कारण सरकारों के पास जनकल्याण और अवसंरचनागत क्षेत्र में निवेश के लिए ताकत नहीं रह गयी है। ऐसा पूरी अर्थव्यवस्था के ढह जाने की कीमत पर ही किया जा सकता है। अगर किसी भी देश में सरकार रोज़गार को बढ़ाने के लिए और उत्पादन को बढ़ाने के लिए अपने ख़र्चों को बढ़ाने का विकल्प चुनती है तो यह मुद्रास्फ़ीति को बढ़ावा देगा और इसके कारण व्यापार घाटे में वृद्धि होगी और साथ ही वित्तीय संपत्ति का अवमूल्यन होगा। इसके कारण उस देश की अर्थव्यवस्था में निवेश करने वाले निवेशक, देशी भी और विदेशी भी, अपनी पूँजी का विनिवेश करेंगे और यह पूरी मुद्रा के औंधे मुँह गिर जाने के रूप में परिणामित होगा। इसलिए  आज, यानी साम्राज्यवाद के भूमण्डलीकरण के दौर में, जब दुनिया भर में कुल पूँजी निवेश का लगभग 90 फ़ीसदी हिस्सा अनुत्पादक हो चुका है, जब पूँजी अधिकाधिक अनुत्पादक हो चुकी है, जब दुनिया भर के वित्तीय बाज़ार इस हद तक एक-दूसरे से जुड़ चुके हों, किसी भी देश की पूँजीवादी सरकार के लिए यह सम्भव नहीं रह गया है कि वह रोज़गार को बढ़ावा देने के लिए वास्तविक अर्थव्यवस्था में निवेश करे। यह किसी भी पूँजीवादी देश की इच्छा से स्वतंत्र हो चुका है। अगर कोई सरकार चाहे भी तो ऐसा नहीं कर सकती है। यह पूरी अर्थव्यवस्था को ढहा देगा। इसलिए पूँजीवाद एक असमाधेय समस्या का शिकार हो चुका है। वास्तविक अर्थव्यवस्था में निवेश न होने के कारण, रोज़गार अवसरों के पैदा न होने के कारण जनअसन्तोष तीसरी दुनिया के पूँजीवादी देशों में ही नहीं बल्कि उन उन्नत पूँजीवादी देशों में भी बढ़ रहा है जहाँ की सरकारें दुनिया भर में अपनी साम्राज्यवादी लूट की बदौलत अपने देश के मज़दूर वर्ग को रिश्वत देकर उसका मुँह बन्द रखने का काम करती हैं।

इसीलिए अभी दुनिया भर में पूँजीवादी सरकारें द्रविड़ प्राणायाम करके अपने ख़र्चों को कम करने की कोशिश में लगी रहती हैं ताकि अपने बजट घाटे को कम कर सकें जो कीमतों के लगातार लाभ स्तर से नीचे गिरने का कारण बनती है, जिसे हम डिफ्लेशन नाम से भी जानते हैं। कीमतों का इस तरह से गिरना धीमे आर्थिक विकास का कारण बनता है। यानी की सरकारी या सार्वजनिक ख़र्चों को घटाना आज विश्व पूँजीवाद के पदसोपान क्रम में किसी भी स्थान पर खड़े देश की सरकार के लिए एक मजबूरी है। सार्वजनिक खर्च जो आर्थिक वृद्धि दे सकता है वह आर्थिक वृद्धि वह दे चुका और अब पूँजीवाद इस सार्वजनिक खर्च को अफ़ोर्ड नहीं कर सकता। इसलिए वृद्धि एक ही स्रोत रह जाता है- निजी खर्चे। निजी खर्च का अर्थ है उपभोक्ता सामग्रियों पर होने वाला ख़र्च। इसी से जो वृद्धि पैदा होती है वह अर्थव्यवस्था के लिए ऑक्सीजन सिलेण्डर का काम करती है। लेकिन इस सिलेण्डर में भी अब ऑक्सीजन ख़त्म होने की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रही है और मरीज़ को हिचकियाँ आ रही हैं। कारण हम सबप्राइम संकट के विश्लेषण में देख चुके हैं। वित्तीय पूँजी के अनुत्पादक और सट्टेबाज़ होते जाने के कारण पूँजीवाद बूम-बस्ट के अपने चक्रीय संकट से उबर नहीं पा रहा है, बल्कि इस संकट की बारंबारता बढ़ती जा रही है। यह वास्तविक आय के घटने का कारण बन रहा है जिसके कारण ख़रीद में कमी आ रही है, जो भूमण्डलीकरण के दौर में आर्थिक वृद्धि का एकमात्र स्रोत रह गया है। इसलिए अब ऋण वित्तपोषण से उपभोग को बढ़ावा देने की कोशिशें की गयीं हैं। लेकिन उसके विनाशकारी परिणाम भी हमारे सामने हैं जब विश्व पूँजीवाद का चौधरी अपने पैदा किए गए सबप्राइम संकट की मार से धराशायी होता नज़र आ रहा है। तरलता को बढ़ाकर उपभोग का वित्तपोषण करने की युक्ति मुसीबत बनकर पूरे विश्व वित्तीय पूँजी बाज़ार पर टूट पड़ी है।

हम अपने उपरोक्त विश्लेषण के जरिये समझ सकते हैं कि ऋण द्वारा वित्तपोषित कोई भी उपभोग, निवेश या किसी भी अन्य तरह की आर्थिक तेज़ी न सिर्फ़ वृद्धि की दर को कम करती जाती है बल्कि पूरे पूँजीवादी अर्थतंत्र को संकटों के सामने और अरक्षित बना देती है। एक ओर पूँजीवाद में अस्थिरता बढ़ती जाती है और दूसरी ओर वृद्धि भी ख़त्म होती जाती है। यानी एक मन्द मन्दी लगातार बरकरार रहती है जो समय-समय पर किसी बड़ी मन्दी में तब्दील होती रहती है। सबप्राइम संकट में यही बात साबित हो रही है। जिस-जिस बात की आशंका अर्थशास्त्रि‍यों ने अभिव्यक्त की थी, बिल्कुल वही हो रहा है। सबप्राइम संकट के कारण डॉलर का हृास हो रहा है जो पूरी विश्व अर्थव्यवस्था को एक लम्बी मन्दी की ओर धकेल रहा है। इससे बचने का कोई तात्कालिक रास्ता तो समझ में नहीं आ रहा है।

(दायित्वबोध से साभार)

 

 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जनवरी-मार्च 2008

 

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