‘आह्वान’ को नियमित कीजिये

मित्रे, इस वर्ष आपने हमें ‘आह्वान’ के लिए बहुत इन्तज़ार कराया। इसे हर हाल में नियमित कीजिये। यह बहुत ज़रूरी काम कर रहा है। बेझिझक यह अभी इस ढंग की अकेली पत्रिका है। हमसे जो सहयोग बन पड़ेगा, करेंगे। आदेश कीजिये।

– चन्दन कुमार, सासाराम

व्यवहार

कुछ विचार, कई दफ़ा

घने ऊँचे पेड़ों के बीच से

मतवाली चाल में, चलते से,

और फिर उड़ते, बादलों के ऊपर,

पंख फैलाये

रौशनी खींचती है उन्हें

और चुँधिया जाते हैं वे।

कुछ विचार, कई दफ़ा,

कुण्डलाकार बढ़ते से, एकजुट से,

एक दूसरे से बात करते रुक जाते हैं,

और छूट जाते हैं रास्ते में ही वे।

वास्तव में, इन विचारों को,

हर दफ़ा, देखना होगा

लगन से, सिद्ध करना होगा,

करके प्राप्त, प्रत्याशित परिणाम,

और होना होगा सवार,

“व्‍यवहार” की गाड़ी में!!

                                – नितिन

‘आह्वान’ प्रेरित करता है, समझ साफ़ करता है

मैं पिछले 3 अंकों से ‘आह्वान’ पढ़ रहा हूँ और अपने मित्रों को भी पढ़वा रहा हूँ। हमें यह बहुत प्रेरित करता है। इसके लेखों से हमें देश की समस्याओं के बारे में स्पष्ट समझ बनाने में बहुत मदद मिलती है। हम लोग केजरीवाल की पार्टी  के समर्थक थे और उसका प्रचार भी करने लगे थे, लेकिन इसके घोषणापत्र की समीक्षा वाला लेख पढ़कर तो जैसे हमारी आँखें खुल गयीं। हमने भ्रष्टाचार और इसके समाधान पर आपके लेखों की आह्वान पुस्तिका भी पढ़ी। इसका व्यापक प्रचार करना चाहिए ताकि लोगों को पूँजीवाद के वास्तविक विकल्प के लिए लड़ने को तैयार किया जाये न कि वे भूलभुलैया में भटकते रहें।

– राजेश, मनीष, बैरहना, इलाहाबाद

 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, सितम्‍बर-दिसम्‍बर 2013