नहीं बुझेगी संकल्पों, संघषों और नव-जागरण की वह मशाल!

महेन्द्र नेह

सुप्रसिद्ध रंगकर्मी, साहित्यकार और मार्क्सवादी विचारक शिवराम गत 1 अक्टूबर को हृदयगति रुक जाने से अचानक ही हमारे बीच से चले गये। जीवन के अन्तिम क्षण तक वे जितनी अधिक सक्रियता से काम कर रहे थे, उसे देखकर किसी तौर पर भी यह कल्पना नहीं की जा सकती थी कि वे इस तरह चुपचाप हमारे बीच से चले जायेंगे। देशभर में फैले उनके मित्रों, सांस्कृतिक सामाजिक व राजनीतिक आन्दोलनों में जुटे उनके सहकर्मियों एवं उनके साहित्य के पाठकों के लिए शिवराम के निधन की सूचना अकल्पनीय एवं अविश्वसनीय थी। जिसने भी सुना स्तब्ध रह गया। उनके निधन के बाद समूचे देश में, विशेष तौर से जन प्रतिबद्ध और सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन के उद्देश्यों में शामिल संस्थाओं द्वारा शोक-सभाओं एवं श्रंद्धाजलि-कार्यक्रमों का सिलसिला जारी है।

23 दिसम्बर, 1949 को राजस्थान के करौली नगर के निकट गढ़ी बाँदुवा गाँव में जन्मे शिवराम ने अपने 61 वर्षीय जीवन में साहित्य, संस्कृति, वामपन्थी राजनीति, सर्वहारा-वर्ग एवं बौद्धिक समुदाय के बीच जिस सक्रियता, विवेकशीलता और तर्कसंगत आवेग के साथ काम किया, उसका मूल्यांकन तो आने वाले समय में ही हो सकेगा। लेकिन जिन्होंने उनके साथ किसी भी क्षेत्र में कुछ समय के लिए भी काम किया है या उनके लेखन और सामाजिक साक्रियता के साक्षी रहे हैं, वे अच्छी तरह जानते-समझते हैं कि शिवराम ऊपर से बेहद सहज और सामान्य दिखते हुए भी एक असाधारण इन्सान और युग के पृष्ठ पर गहरे निशान छोड़ जाने वाले सृजनधर्मी थे। शिवराम का हमारे बीच से अकस्मात चले जाना, मात्र एक प्राकृतिक दुर्घटना नहीं है। यह उस आवेगमयी ऊर्जा-केन्द्र का यकायक थम जाना है, जो दिन-रात, अविराम इस समाज की जड़ता को तोड़ने, नव जागरण के स्वप्न बाँटने और एक प्रगतिशील जनपक्षधर व्यवस्था निर्मित करने के अथक प्रयासों और जन-संघर्षों में लगा रहता था।

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1969-70 में अजमेर से यान्त्रिक इंजीनियरिंग में प्रथम श्रेणी से डिप्लोमा करते समय वे आचार्य नरेन्द्र, विवेकानन्द आदि के विचारों से प्रभावित हुए और अपना प्रारम्भिक नाटक विवेकानन्द के जीवन पर लिखा। उसके बाद दूर-संचार विभाग में नौकरी और चेन्नई में ट्रेनिंग के दौरान कथाकार स्वयं प्रकाश से उनका गहरा सानिध्य हुआ। स्वयं प्रकाश से उन्हें मार्क्सवाद के वैज्ञानिक-समाजवादी सिद्धान्त की प्रारम्भिक जानकारी मिली जो उत्तरोत्तर उनके जीवन, चिन्तन, लेखन और कर्म की धुरी बनती चली गयी। कोटा जिले के रामगंजमण्डी में उनकी पहली नियुक्ति हुई, वहाँ पत्थर-ख़ानों में काम कर रहे श्रमिकों के क्रूर शोषण और दुर्दशा को देखकर उनके मन में गहरा सन्ताप हुआ और तभी उन्होंने अपना पहला नाटक ‘‘आगे बढ़ो’‘ लिखा। इस नाटक में एक-दो मध्यवर्गीय मित्रों के अलावा अधिकांश पात्र ही नहीं अभिनेता भी श्रमिक-समुदाय के थे। नाटक के दौरान ही अभिनेता साथियों के साथ उनके गहरे सरोकार जुड़ गये। नाटक का मंचन भी सैकड़ों की संख्या में उपस्थित श्रमिकों के बीच हुआ। नाटकों का यह सिलसिला चलता गया और आगे बढ़ता गया। शहीद भगतसिंह के जीवन पर नाटक खेला गया और शनैः-शनैः इस अभियान ने नाट्य-आन्दोलन, जन आन्दोलन की शक्ल अख्तियार कर ली?

रामगंजमण्डी से बाराँ स्थानान्तरण के पश्चात वे प्राण-प्रण से श्रमिकों-किसानों-युवकों-साहित्यकारों व संस्कृतिकर्मियों को एकजुट करने एवं व्यवस्था के विरुद्ध एक व्यापक मुहिम में जुट गये। शिवराम के बाराँ-प्रवास के दौरान ही उनका प्रसिद्ध नाटक ‘‘जनता पागल हो गयी है’’ लिखा गया। श्रमिकों-किसानों और छात्रों के बीच से आये अभिनेताओं को साथ लेकर वे आसपास के गाँवों और कस्बों में निकल पड़े। अधभूखे, अधप्यासे रहकर पैदल चलकर नाटकों व जन-गीतों का मंचन और साथ-साथ वर्गीय व जन-संगठनों का गठन, उन्हें आम हिन्दी बुद्धिजीवियों व लेखकों से भिन्न एक सचेत एवं विचारवान सृजनकर्मी का दर्जा दिलाता है। हिन्दी नाटक को प्रेक्षाग्रह की कैद और सम्भ्रान्त दर्शकों के बीच से निकालकर आम मेहनतकश अवाम के बीच ले जाने और हिन्दी के प्रथम नुक्कड़ नाटक के लेखक निर्देशक व अभिनेता होने का श्रेय उन्हें प्राप्त है। हिन्दी नाटक और साहित्य जिस दौर में मोहभंग की स्थिति से उबरने की कशमकश में लगा था, उस दौरान शिवराम वर्ग-संघर्ष और जन-विद्रोह को शक्ल दे रहे थे। यही कारण है कि उनके नाटकों पर कई बार प्रशासनिक पाबन्दियाँ लगायी गयीं। ‘‘जनता पागल हो गयी है’’ का लखनऊ में मंचन कर रहे पात्रों को पुलिस-थाने ले जाया गया। परिणामतः देश की सभी भाषाओं के रंगकर्मियों ने इसे मंचित करने का संकल्प लिया। यह नाटक हिन्दी सहित अनेक भाषाओं में खेला जाने वाला लोकप्रिय नाटक बन गया। उनके नाटक-संग्रहों ‘‘जनता पागल हो गयी है’’, ‘’घुसपैठिये’‘, ‘’राधेया की कहानी’‘, ‘’दुलारी की माँ’‘, ‘‘एक गाँव की कहानी’‘, ‘’गटक चूरमा’‘ के अलावा कई नाट्य-संकलनों व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित नाटकों में शायद ही कोई नाटक ऐसा हो, जिसका मंचन न हुआ हो। प्रेमचन्द व अन्य कहानीकारों की कथाओं का उन्होंने नाट्य-रूपान्तर किया, जो ‘पुनर्नव’ नाम से तथा सेज़ के विरुद्ध उनकी पुस्तिका ‘’सूली ऊपर सेज’‘ प्रकाशित हुई है। हाल ही में उनके तीन कविता-संग्रह ‘’कुछ तो हाथ गहो’‘, ‘’खुद साधो पतवार’‘ एवं ‘’माटी मुलकेगि एक दिन’‘ प्रकाशित हुए हैं।

शिवराम उन लेखकों में से नहीं थे, जो मानते हैं कि साहित्यकारों को राजनीति से दूर रहना चाहिए और केवल कविता लिख देने या नाटक खेलने से ही उनके कर्त्तव्य की पूर्ति हो जाती है। ‘‘कविता बच जायेगी तो धरती बच जायेगी, मनुष्यता बची रहेगी’‘ जैसे जुमलों से उनका स्पष्ट और गहरा मतभेद था। उनका मानना था कि जिस समाज में हम रह रहे हैं, वह एक वर्गीय समाज है, जिसमें प्रभु-वर्ग न केवल पूँजी की ताकत पर बल्कि सभी तरह के पिछड़े और सभी प्रतिक्रियावादी विचारों व आधुनिक नग्नतावादी, फूहड़ अपसंस्कृति के ज़रिये मेहनतकश जनता का निरन्तर आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक शोषण-दमन कर रहा है। शासक वर्ग के वर्गीय गँठजोड़ को समाप्त करने के लिए देश में ‘‘जनता की लोकशाही’‘ तथा समाजवादी शोषणविहीन समाज की स्थापना अनिवार्य है। उनका यह भी मानना था कि अकेले राजनीतिक उपकरणों से न तो सत्ता-परिवर्तन आसान है और न ही उसे टिकाऊ रखा जा सकता है। अतः वे जितना ज़ोर क्रान्ति के लिए जनता की जत्थेबन्दी और वर्ग-संघर्ष तेज़ करने पर देते थे, उतना ही सामाजिक-सांस्कृतिक-वैचारिक लड़ाई को भी व्यापक और घनीभूत करना आवश्यक मानते थे। उनका दृढ़विश्वास था कि प्रगतिशील-जनवादी रचनाकर्मियों को हर सम्भव मीडिया और विधाओं के ज़रिये स्तरीय व लोकप्रिय साहित्य-कला सृजन द्वारा देश-भर में एक व्यापक सांस्कृतिक अभियान चलाना चाहिए।

इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति हेतु उन्होंने बिहार के यादवचन्द्र व अन्य प्रदेशों के साथियों के साथ मिलकर अखिल भारतीय जनवादी सांस्कृतिक-सामाजिक मोर्चा ‘‘विकल्प’‘ का गठन किया। वे मोर्चा के गठन से ही अखिल भारतीय महामन्त्री थे और अपनी अन्तिम साँस तक अपनी जिम्मेदारी को निभाने के लिए काम कर रहे थे। ‘विकल्प’ की अन्य लेखक संगठनों के मुकाबले इस मायने में भिन्न पहचान है क्योंकि अन्य संगठन लेखकों की साहित्यिक भूमिका को ही प्राथमिक मानते हैं, जबकि ‘विकल्प’ रचनाकारों की सामाजिक भूमिका को अनिवार्य मानता है। यह रेखांकित किये जाने योग्य बात है कि ‘विकल्प’ की बिहार-इकाई में मध्यवर्गीय लेखकों के मुकाबले खेत मज़दूरों, किसानों, शिक्षकों आदि की संख्या अधिक है जो गाँवों व कस्बों में गीतों, कविताओं, नाटकों आदि द्वारा सामाजिक-सांस्कृतिक जागरण की मुहिम चला रहे हैं। साहित्यिक पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ के ज़रिये भी उन्होंने जनता के मुक्तिकामी साहित्य के प्रसार को वरीयता दी तथा पूँजीवादी-सामन्ती कला-सिद्धान्तों के विरुद्ध जनपक्षधर रचनाओं की श्रेष्ठता सिद्ध करने का काम किया।

अपने विचारों और अमल में शिवराम कहीं भी व्यक्तिवादी व अराजकतावादी नहीं थे। उनका मानना था कि मुक्ति के रास्ते न तो अकेले में मिलते हैं और न ही परम्परा के तिरस्कार द्वारा। वे कहते थे कि हमें इतिहास और परम्परा का गहरा अध्ययन करना चाहिए तथा अपने नायकों की खोज करनी चाहिए। परम्परा के श्रेष्ठ तत्वों का जनान्दोलनों और जन-हित में भरपूर उपयोग करना चाहिए। लोक-सांस्कृतिक और लोक-ज्ञान का उन्होंने अपनी रचनाओं में सर्वाधिक कुशलता के साथ उपयोग किया है। ‘विकल्प’ द्वारा राहुल, भारतेन्दु, प्रेमचन्द, निराला, फैज़, पाश व सफदर हाशमी आदि की जयन्तियों को एक गतिशील परम्परा और नव जागरण की मुहिम के रूप में चलाना, शिवराम का परम्परा को भविष्य के द्वार खोलने के आवश्यक अवयव के रूप में उल्लेख किया जाना चाहिए। निःसन्देह वे अपनी कलम, ऊर्जा और अपनी सम्पूर्ण चेतना का उपयोग ठीक उसी तरह कर रहे थे, जिस तरह समाज में आमूलचूल परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध उनके पूर्ववर्ती क्रान्तिकारियों व युग-दृष्टाओं ने किया।

शिवराम आज भले ही भौतिक रूप में हमसे बिछड़े गये हों, लेकिन उनके द्वारा साहित्य, समाज व संस्कृति के क्षेत्र में किये गये काम हमारी स्मृतियों में एक भौतिक-शक्ति के रूप में मौजूद रहेंगे और हमारा व आनेवाली पीढ़ियों का मार्ग-दर्शन करेंगे। वे हमारे सपनों, इरादों और संघर्षों में एक तेजोदीप्त मशाल की तरह जीवित रहेंगे। अन्त में साथी शिवराम की एक कविता के साथ उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ –

‘’चन्द्रमा की अनुस्थिति के बावजूद

और बावजूद आसमान साफ नहीं होने के

रात इतनी भी नहीं है सियाह

कि राह ही न सूझे

यहाँ-वहाँ आकाश में अभी भी टिमटिमाते हैं तारे

और ध्रुव कभी डूबता नहीं है

पुकार-पुकार कर कहता है बार-बार

उत्तर इधर है

राहगीर उत्तर इधर है’’

 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,नवम्‍बर-दिसम्‍बर 2010

 

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