मैं-फिसड्डी-तो-तू-भी-फिसड्डी’

आनन्द, नोएडा

मनमोहन और ओबामा के बीच फिसड्डीपन की होड़ के पीछे की दास्तान की वजह से पूँजीवादी मीडिया पारम्परिक रूप से उनका गुणगान करता आया है। लेकिन मौजूदा दौर में जब भारतीय अर्थव्यवस्था के संकट की आहटें सुनायी दे रही हैं तो बुर्जुआ बुद्धिजीवी मीडिया में मनमोहन सिंह की आलोचना करने लगे हैं कि जिन नवउदारवादी नीतियों के वो प्रणेता रहे हैं उन्हीं को लागू करने में सुस्ती दिखा रहे हैं। टी-वी- चैनलों पर अक्सर यह जुमला सुनने में आता है कि मौजूदा सरकार ‘नीतिगत पक्षाघात’ से ग्रस्त है। जिन नीतियों की वजह से अर्थव्यस्था संकट के दौर से गुज़र रही है और जिनकी वजह से आम मेहनकश जनता का जीना दूभर हो गया है, बड़ी ही बेशर्मी से उन्हीं नीतियों को न सिर्फ़ ज़ारी रखने की सलाह दी जा रही है बल्कि उनमें और भी तेज़ी लाने के तमाम नुस्खे़ भी सुझाये जा रहे हैं। इसमें आश्चर्य की बात नहीं कि अब साम्राज्यवादी मीडिया भी इस सुर में सुर मिला रहा है। अमेरिका की मशहूर ‘टाइम’ पत्रिका ने अपने हालिया अंक के मुख्य पृष्ठ पर मनमोहन सिंह की तस्वीर छापी और उनको ‘अंडरअचीवर’ या यूँ कहें कि फिसड्डी क़रार दिया। हालाँकि इस अंक में मनमोहन सिंह की उन्हीं मुद्दों पर आलोचना की गयी है जिन पर भारतीय मीडिया में भी पिछले कुछ अरसे से उनकी आलोचना होती रही है, लेकिन भारत को महाशक्ति बनाने का सपना संजोने वाले और भारतीय बुर्जुआ वर्ग के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले मीडिया को यह आलोचना नाग़वार गुज़री और उसके जवाब में भारत की ‘आउटलुक’ पत्रिका ने ‘मैं-नंगा-तो-तू-भी-नंगा’ वाली शैली में अपने हालिया अंक में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक़ ओबामा की तस्वीर छापकर उनको भी फिसड्डी करार दिया।

ग़ौरतलब है कि अभी कुछ सालों पहले ही जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति और मनमोहन सिंह दूसरी बार भारत के प्रधानमन्त्री बने थे तो मीडिया में दोनों की तारीफों के पुल बाँधे जाते थे। एक ओर जहाँ ओबामा को ‘इतिहास प्रवर्तक’ बताकर उनकी शान में कसीदे पढ़े जाते थे वहीं दूसरी ओर मनमोहन सिंह को ‘सिंह इज़ किंग’ कहकर उनकी चाटुकारिता की जाती थी। जहाँ तक अमेरिका और भारत की आम मेहनतकश जनता के हितों का सवाल है, इन बुर्जुआ शासकों का फिसड्डीपन तो उस समय भी ज़ाहिर था जब मीडिया में इनको सिर-आँखों पर बिठाया जाता था लेकिन यह जानना दिलचस्प होगा कि मीडिया के रुख़ में अचानक आये इस बदलाव की वजह क्या है।

जब अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर ओबामा की ताज़पोशी की गयी थी तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था और विश्व पूँजीवादी व्यवस्था में 1930 के दशक की महामन्दी के बाद की सबसे बड़ी महामन्दी की शुरुआत ही हुई थी। ऐसे में ओबामा के आगमन को पूरी दुनिया की पूँजीवादी मीडिया ने एक नायक जैसी सलामी दी और जनता में यह भ्रम फैलाने के कोशिश की कि ओबामा के करिश्माई जादू से संकट छूमन्तर हो जायेगा। ओबामा ने खुद भी राष्ट्रपति पद के चुनाव प्रचार के दौरान ‘बदलाव’, ‘उम्मीद’ और ‘हाँ, हम कर सकते हैं’ जैसे जुमलों का प्रयोग करके मीडिया को नायक गढ़ने का मौका दिया था जिसको मीडिया ने हाथों हाथ लपका था। हद तो तब हो गयी जब ओबामा को विश्व शान्ति का दूत बनाने के लिए हास्यास्पद रूप से ओबामा को नोबल शान्ति पुरस्कार से भी नवाज़ा गया।

लेकिन ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद विश्व पूँजीवादी व्यवस्था का संकट कम होने की बजाये बढ़ा ही है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था वर्ष 2008 की महामन्दी से अभी उबर भी नहीं पायी थी कि ‘यूरो ज़ोन’ के संप्रभु ऋण संकट ने कंगाली में आटा गीला करने का काम किया और अब तो अतिआशावादी बुर्जुआ बुद्धिजीवियों को भी इस सच्चाई का एहसास होने लगा है कि यह संकट निकट भविष्य में ख़त्म होने वाला नहीं है। ऐसे में जहाँ एक ओर दुनिया भर के स्टॉक सूचकांकों में ज़बर्दस्त गिरावट देखने में आ रही है वहीं दूसरी ओर ओबामा की लोकप्रियता का ग्राफ औंधे मुँह गिरा है। जिस पूँजीवादी मीडिया ने ओबामा के नायकत्व को गढ़ा था वही अब उसको खण्डित करने में जुटा है। नायकों के निर्माण और खंडन की इस कवायद में ग़ौरतलब़ बात यह है कि मीडिया बड़ी ही सफाई से व्यवस्थागत संकट की ओर से जनता का ध्यान का हटाने का काम करता है और संकट का सारा ठीकरा कुछ व्यक्तियों पर फोड़ता है।

बुर्जुआ बुद्धिजीवियों की मायूसी का एक कारण यह भी है कि संकट के काले बादल अब चीन और भारत जैसी उभरती हुई अर्थव्यस्थाओं पर भी दिखने लगे हैं जिन पर उनकी उम्मीदें टिकी थीं। जहाँ तक भारतीय अर्थव्यवस्था का सवाल है तो हलांकि वह वर्ष 2008 की मंदी से अपेक्षाकृत रूप से कम प्रभावित थी, लेकिन हालिया संकट का असर उस पर साफ दिखायी पड़ रहा है। सकल घरेलू उत्पाद की दर जिसको दो अंकों में ले जाने के ख़्वाब संजोये जा रहे थे वह अब सात प्रतिशत से भी नीचे आ गयी है, निर्यात में कमी आ रही है, राजकोषीय घाटे में वृद्धि हो रही है, रुपये की कीमत लगातार गिरती चली जा रही है और महँगाई कम होने का नाम नहीं ले रही है।

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इस परिदृश्य में यह भारतीय पूँजीपति वर्ग और साम्राज्यवाद दोनों के हित में है कि भारत में पूँजीवादी विकास की रफ्तार और तेज़ कर दी जाये जिससे कि एक ओर अपनी अंतिम साँसें गिन रही विश्व पूँजीवादी व्यवस्था को पूँजी निवेश के नये अवसर के रूप में जीवनदायी ऑक्सीजन मिल सके वहीं दूसरी ओर भारतीय पूँजीपति वर्ग के मुनाफे की हवस को बरक़रार रखा जा सके। वैसे तो पिछली सदी के अन्तिम दशक से ही भारतीय अर्थव्यस्था को देशी और विदेशी पूँजी का खुला चारागाह बनाने की प्रकिया ने ज़ोर पकड़ लिया था लेकिन अभी भी खुदरा, बीमा, प्रेस, सुरक्षा, टेलीकॉम जैसे ऐसे कई क्षेत्र हैं जिनमें विदेशी पूँजी की निर्बाध आवाजाही पर कुछ सरकारी बन्दिशें लगी हुई हैं। पूँजी के प्रवाह पर किसी भी किस्म की बन्दिश पूँजीपति वर्ग के मुनाफा कमाने की सम्भावना को कम करती है इसीलिए पूँजीपति वर्ग हमेशा इस फिराक में रहता है कि सरकार पर दबाव डालकर इन बन्दिशों को ख़त्म किया जाये। इसके अलावा कर प्रणाली में सुधार लाकर पूँजीपतियों पर लगने वाले करों को कम करने, श्रम कानूनों को और लचीला बनाने जैसे मुद्दों को भी उठाया जा रहा है।

जैसा कि 1991 में देखने में आया था कि जब भी अर्थव्यस्था किसी संकट से गुज़र रही होती है उस समय पूँजीपति वर्ग के लिए सरकार पर दबाव डालकर नीतियों में परिवर्तन करना आसान होता है। पूँजीपति वर्ग अपने भोंपू, यानी मीडिया के ज़रिये जनता में निहायत ही बेशर्मी से यह प्रचार करवाता है कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का एकमात्र रास्ता है कि पूँजी के प्रवाह में आने वाली बन्दिशों को हटाया जाये और पूँजी निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनाया जाये।

मौजूदा संकट में भी ऐसा ही देखने को मिल रहा है। मीडिया की बेशर्मी की हद तो तब पार हो जाती है जब उसमें बहसबाज़ी करने वाले प्रकाण्ड बुर्जुआ अर्थशास्त्री और बुद्धिजीवी दर्शकों को यह बताते हैं कि यह संकट नव-उदारवादी नीतियों को लागू करने की वजह से नहीं आया है बल्कि इसलिए आया है कि इन नीतियों को लागू करने की रफ्तार बहुत सुस्त है। इस प्रकिया में अब मीडिया अपने लाडले मनमोहन सिंह को भी नहीं बख़्श रहा है। जिन मनमोहन सिंह को भारत में तथाकथित आर्थिक सुधारों का प्रणेता बताकर गुणगान किया जाता था उन्हीं मनमोहन सिंह की अब यह कहकर ज़ोर-शोर से आलोचना की जा रही है कि वो इन सुधारों को आगे बढाने में सुस्ती दिखा रहे हैं।

ज़ाहिर है कि मीडिया, जो इसी पूँजीवादी व्यवस्था का अवलम्ब है, से यह अपेक्षा करना बेमानी है कि वह अपने दर्शकों और पाठकों को इस सच्चाई से अवगत कराये कि यह संकट दरअसल व्यवस्थागत है। शासक वर्ग को हमेशा यह ख़ौफ सताता रहता है कि यदि जनता इस सच्चाई से अवगत होगी तो इस व्यवस्था के विकल्प के बारे में भी सोचना शुरू कर देगी। इसलिए एक सोची-समझी चाल के तहत व्यवस्था के संकट को व्यक्तियों की कमज़ोरी की तरह पेश किया जाता है और इस बात का भ्रम पैदा करने की कोशिश की जाती है कि यदि अमुक व्यक्ति की बजाये कोई और व्यक्ति नेतृत्व दे रहा होता तो यह संकट आता ही नहीं या फिर इससे बेहतर तरीके से निपटा जा सकता था। इसीलिए भारत में मनमोहन सिंह और अमेरिका में बराक ओबामा पर से मीडिया की कृपादृष्टि कम हो गयी है और उनके विकल्प के रूप में जहाँ भारत में कोई राहुल गाँधी के नाम पर दाँव लगा रहा है तो कोई नरेंद्र मोदी के नाम पर वहीं अमेरिका में मिट रॉमनी का नाम चर्चा में है। यानी कि मीडिया पुराने नायकों को ध्वस्त कर नये नायकों के निर्माण के काम में जुट गया है। लेकिन सच्चाई तो यह है कि किसी समाज की तरक्की या उसका संकट अन्तिम विश्लेषण में किसी व्यक्ति विशेष की वजह से नहीं बल्कि व्यवस्था के अन्तर्विरोधों की तार्किक परिणति होते हैं। महान से महान व्यक्ति या फिसड्डी से फिसड्डी व्यक्ति भी दरअसल समाज की गति की आम प्रवृत्ति का ही प्रतिनिधित्व करते हैं।

(30 अक्टूबर 2012)

 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जुलाई-दिसम्‍बर 2012

 

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