कर्णन

अविनाश

उत्तरआधुनिकतावाद के दौर में जेण्डर, रेस, जातियाँ और तमाम अस्मिता या पहचान की राजनीति ने दर्शन, फ़िल्म, कला, संस्कृति व अन्य जगहों पर तेज गति से अपने पैर पसारे हैं। आज उत्तरआधुनिकतावाद के दौर में महाख्यानों (meta narratives) की बात काफ़ी पीछे छूट चुकी है। जिसकी जगह खण्डित व्यक्तिवादी दृष्टिकोण का बोलबाला है। जिसके चलते चीज़ों को आलोचनात्मक व गति में देखने की कमी दिखती है, वहीं दूसरी ओर अनालोचनात्मक नज़रिये से हर चीज़ का जश्न मनाने की मानसिकता है। भारत में उत्तरआधुनिकतावाद के प्रभाव में लगातार अस्मिता/पहचान की राजनीति पर कई फ़िल्में बन रही है। जिनमें रचना-पद्धति में बदलाव (genre switching) और कुछ नये प्रयोग भी देखने को मिल रहे है और इन फ़िल्मों को ओवर दि टॉप (ओ.टी.टी.) प्लेटफॉर्म्स के ज़रिये फैलने का भी काफ़ी मौका मिल रहा है।
सामाजिक-राजनीतिक संरचना में जाति प्रश्न निश्चित तौर पर भारतीय व्यवस्था का अहम व अभिन्न अंग है, और हिन्दी, तमिल, तेलगु, कन्नड़, मराठी व अन्य भाषाओं की कला-साहित्य-फ़िल्म-राजनीति जगत में भी इसकी छाप देखने को मिलती रहती है। अगर फ़िल्म जगत की बात करे तो सत्यजीत रे की सद्गति (प्रेमचन्द की कहानी पर आधारित), श्याम बेनेगल की अंकुर सबसे अग्रिम पंक्ति में आती है। वहीं हाल ही के कुछ सालों में आयी मसान, आर्टिकल 15, अजीब दास्तान, गीली पुच्ची और अन्य फ़िल्में भी मौजूद हैं। जहाँ जाति प्रश्न पर बनी आर्टिकल 15 की मुख्य बहस ‘सवर्ण सविअर’ वर्सेज ‘दलित सविअर’ (अस्मितावादी राजनीति के दायरे) में ही थी। वही ‘अजीब दास्तान’ फ़िल्म (कहानी संकलन में) गीली पुच्ची ‘सवर्ण महिला’ व ‘दलित महिला’ के बीच मौजूद अन्तरविरोधों को पेश करती है, जो प्रतिच्छेदन सिद्धान्त (intersectionality theory) पर आधारित है। ऐसे में जाति प्रश्न पर सीधे तौर पर या फिर उसको स्पर्श करती अलग-अलग फ़िल्में कई भाषाओं में बनी है। उदहारण के लिए मराठी में फण्ड्री, सैराट, तेलगू में रंगस्थालम, c/o कन्चारापलेम, मलयालम में कुम्ब्लान्ग्नी नाइट्स, ई मा यौ जैसी फ़िल्में बनी है। मगर तमिल सिनेमा इन सबमें सबसे आगे है। जहाँ लगातार जाति प्रश्न पर मुख्यधारा में फ़िल्में बन रही है। जिसका एक कारण दलित पृष्ठभूमि के फ़िल्म निर्माताओं के उद्भव से सम्बन्ध रखता है। जिनमें पा रंजीत (अट्टाकथी, मद्रास, कबाली और काला), गोपी नैनार (अराम), और मारी सेल्वराज (परीयरम पेरुमल) व अन्य मुख्य तौर पर शामिल है। इसके पीछे भी तमिलनाडु का इतिहास काफ़ी मायने रखता है। जहाँ ब्राह्मण विरोधी, द्रविड़ आन्दोलन व सामाजिक राजनीतिक कारणों ने अहम भूमिका निभायी है। 1930 और 1950 के बीच बनी फ़िल्मों में गाँधीवादी दृष्टिकोण से त्याग भूमि और हरिजन पेन लक्ष्मी जैसी फ़िल्में बनायी गयी थी, जिनमें सामाजिक सरोकार था और हमेशा दलितों का प्रतिनिधित्व मौजूद रहता था। वहीं आगे भी जाति विषय पर कई फ़िल्में बनी थी। मगर पा रंजीत के इण्टरव्यू से हमें जाति प्रश्न पर आज जो फ़िल्में बन रही है उसे समझने में मदद मिलती है, उनके अनुसार अभी फ़िल्मों में ‘दलित मुखर चरित्र’ (Dalit assertive characters) पेश करती है, जबकि पहले दलितों को पीड़ितों (victim) के तौर पर ही पेश किया जाता था। आगे वह कहते है कि हमें ज़मीन पर आन्दोलनों की ज़रूरत है – कुछ ऐसा जो द्रविड़ आन्दोलन ने इतनी शानदार ढंग से किया था। वही निर्देशक गोपी नैनार दलित पृष्ठभूमि से फ़िल्म निर्माताओं के उभरने पर कहते है “कार्ल मार्क्स पहले ही इस मुद्दे की व्याख्या कर चुके हैं: अगर पूँजीवाद के ख़तरों के बारे में बोलने वाली कोई किताब है, तो पूँजीपति ख़ुद इसे बेच देंगे। अगर दलित सिनेमा जीत रहा है, तो इसका मतलब है कि उसके लिए एक बाज़ार है। लेकिन, यह भी इसकी दिक्कत है।” तमिल सिनेमा में दलित पृष्ठभूमि से आने वाले निर्देशकों के समूह में मार्क्स-अम्बेडकर-पेरियार की अन्तरविरोधी विचारधारा के मिश्रित दर्शन मौजूद है। जो उनकी फ़िल्मों में झलक कर आती है। मगर इन फ़िल्मों में मुख्य तौर पर ‘दलित चित्रण’ के तहत दलित अस्मिता की निर्मिति व नवनिर्मिति का काम किया जा रहा है। यह भी उत्तरआधुनिकतावाद के दौर में अस्मिता की बाइनरी ही खड़ी करता है, जो ‘सवर्ण सविअर(savior)’ और ‘दलित मुखर चरित्र’ (Dalit assertive characters) के तौर पर उभर कर आती है। इसी कारण तमाम जातीय अस्मिताओं को उभारने और श्रेष्ठ साबित करने की तरफ़़ जाता है। गुज्जर, राजपूत, चमार और ऐसी अन्य जातीय अस्मिताओं को अस्मिता के आधार पर एकजुट होने की तरफ़़ लेकर जाती है।
मारी सेल्वराज की 2018 में बनी पहली फ़िल्म ‘परीयरम पेरुमल’ के बाद, यह उनकी दूसरी फ़िल्म ‘कर्णंन’ है। मारी सेल्वराज की पहली फ़िल्म में उनकी अम्बेडकरवादी विचारधारा कलात्मक और कथात्मक तौर पर उभर कर सामने आयी थी। जिसमें नायक अपनी बेबसी और लाचारी के बावजूद, वह समझता है कि व्यवस्था की इन्हीं चौहदियों में उसे रास्ता तलाशना होगा और कोई विकल्प नहीं है। वही कर्णन फ़िल्म की कहानी तमिलनाडु की दक्षिण भाग के एक गाँव की कहानी है। फ़िल्म में यह छोटी सी जगह पुलियांकुलम के नाम से जानी जाती है। कहानी की शुरुआत में दिखाया गया है कि एक बच्ची सड़क के बीचों बीच तड़प कर मर रही है और आस-पास के बस बिना रुके दोनों तरफ़़ से गुजर रहे हैं। लड़की मरने के बाद, वह उस गाँव की देवी कट्टु पेची के तौर पर उनके बीच मौजूद रहती है। इसमें दखाया गया है कि गाँव के मिथकों के अनुसार हर लड़की जो 18 साल की उम्र से पहले मर जाती है, वह देवी बन कर मौजूद रहती है। जिसका बिम्ब फ़िल्म के शुरुआत से अन्त तक मौजूद रहता है। फ़िल्म इसी तरह कई तरह के मिथकों को गूँथ-बुन कर पेश करती है। सेल्वराज ने जाति चेतना से जुड़े प्रतीकों के साथ मिस-एन-सीन (mise en scene) को जोड़ दिया है।
अगर इस फ़िल्म की पृष्ठभूमि पर बात करें तो 1990 के दशक में, तमिलनाडु को जातिगत हिंसा से चिह्नित किया गया था। प्रसिद्ध नेताओं के नाम पर जिलों और बस निगमों के नामकरण की सरकारों की नीति के कारण (जिनमें से कुछ को जाति के प्रतीक के रूप में देखा जाता था) हिंसा भड़की थी। फ़िल्म में वर्णित ‘बस राजनीति’ (दक्षिणी जिलों में बस स्टॉप के आसपास हुए आन्दोलन) का वास्तविक जीवन में भी आधार है। इस पूरे दशक में पुलिस की ज़्यादती भी देखी गयी थी। इसके साथ ही कहते हैं कि इसी समय राज्य ने स्थानिक अस्मिता का सिनेमा में उदय देखा, जिसने खुले तौर पर जाति की पहचान और चरित्रों का जश्न मनाया, और उनका सम्मान किया। इसी समय मदुरई फॉर्मूला या 3Ms: (Murder, Mayhem and Madurai) हत्या, तबाही और मदुरई का फ़िल्म फार्मूला का भी इस अवधि में उभार हुआ था। कर्णन में चित्रित घटनाओं को 1995 में दक्षिणी तमिल जिले थूथुकुडी के कोडियांकुलम गाँव में हुई कुख्यात हिंसा से प्रेरित बताया जा रहा है। फ़िल्म में, गाँव को पोडियांकुलम नाम दिया गया है। देवेन्द्र कुला वेल्लालर (पूर्व अछूत और पल्लर के रूप में सन्दर्भित) और थेवारों के बीच दुश्मनी का वर्णन करता है, जो कि सत्ताधारी वर्ग के रूप में निकटवर्ती पिछड़ी जाति है।
फ़िल्म कई तरह की बिम्बों का इस्तेमाल करती है। फ़िल्म की कहानी में जानवरों के बिम्बों से (मुर्गियाँ और उनके चूज़े, चील, आवारा कुत्ते, सूअर, कीड़े, गधे के बँधे हुए पैर, हाथी, घोड़ा व अन्य) लगातार जाति के दंश को भी दर्शाती है और साथ-साथ दलित मुखरता को भी चिन्हित करती है। हाथी शक्ति, समृद्धि और शान का प्रतीक है, वहीं गधे का इस्तेमाल किया गया है, जिसके पैर ज़ंजीर से बंधे हुए हैं, यह बन्धन बेबसी और लाचारी का प्रतीक है। फ़िल्म एक भौतिक मुद्दे को ज़रूर उठाती है। जिसमें बस स्टॉप के न होने की वजह से कर्णन के गाँव को हाशिये पर होना दर्शाया गया है। ग्रामीण सार्वजनिक परिवहन वाहन पर चढ़ना चाहते हैं। मगर बस कभी नहीं रूकती है, यह दृश्य दशकों की संस्थागत उपेक्षा के साथ जोड़ा गया है। इसके बाद लम्बे समय से जमा हो रहा गुस्सा एक विस्फोट के तौर पर उभर कर आता है, जो बस तोड़ने के तौर पर दर्शाया गया है। ‘दलित’ साहित्य में भी कई बार सामाजिक-आर्थिक और व्यवस्थागत कारणों की वजह से लम्बे समय से पल रहे गुस्से को बिना किसी दिशा में ढाले, स्वतःस्फूर्त विस्फोट के तौर पर पेश किया जाता रहा है। यह पूरी घटना (Passive Reactionary Radicalism) निष्क्रिय प्रतिक्रियावादी परिवर्तनवाद के तौर पर उभर कर आती है। दलित आबादी को ‘दलित’ होने की वजह से अपमान का सामना करना पड़ता है, जिसमें दलित मज़दूर अपने सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियों के चलते दोहरा दंश झेलता है। मगर फ़िल्म में यह ‘दलित’ अस्मिता के तौर पर एकजुट होने की तरफ़़ भी जाता है। आगे यह पूरी घटना महज़ जाति के प्रति संवेदनशील बनाने की तरफ़़ ही नहीं जाती है, बल्कि उस सामाजिक-आर्थिक और व्यवस्था के ख़िलाफ़ फूटे स्वतःस्फूर्त गुस्से का औचित्य साधने की तरफ़़ भी जाती है। निश्चित तौर पर दलित आबादी के ऊपर हो रहे जातिगत अपमान व हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिए और ज़मीनी जुझारू जनसंघर्ष चलाया जाना चाहिए। मगर यह अस्मितावादी राजनीति के तहत नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे जाति और मजबूत होगी। फ़िल्म में ‘बस स्टॉप’ का जो भौतिक मुद्दा उठाया गया है। वह फ़िल्म के आधे रास्ते में ही ख़त्म हो जाता है। बस मालिक ने केस करने से मना कर दिया था और उनके गाँव में बस के रुकने की बात भी करता है। मगर आगे की फ़िल्म अस्मिता श्रेष्ठता के चलते होने वाली हिंसा पर आधारित है।
मारी सेल्वराज जाति के नेता या ग्राम प्रधान के विरोधी के बजाय, पुलिस और राज्य को जाति प्रभुत्व के लिए एक सम्बन्धित रूपक के रूप में उपयोग करते हैं। पूँजीवादी व्यवस्था में जाति का स्वरुप भी बदला है व जाति और पूँजीवाद के बीच सामंजस्य (correspondence) की स्थिति में है। फ़िल्म में विरोधी, कन्निबिरन, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जिसे निकटवर्ती पिछड़ी जाति से सम्बन्धित माना जाता है, गाँव के सरदार या तलाइप्पकई हेडस्कार्फ़ नहीं हटाने के लिए गाँव के बुजुर्गों की पिटाई करता है। कन्निबिरन फिर ग्रामीणों से कहता है: “निमिर्ंधु पाथाधुक्कु आदिचंगा। निमिर्ंधु पढ़ाचु, इनमे कुनिया मुदियाधु।” जिसका अर्थ है उन्होंने हमें सिर्फ़ ख़ुद को मुखर करने के लिए पीटा। जवाब में, नायक कर्णन ने गाँव के बुजुर्गों को बचाने के लिए पुलिस स्टेशन में तोड़फोड़ की।
कर्णन का महाभारत के पौराणिक सन्दर्भ भी है। फ़िल्म सूक्ष्मता में अपने अर्थ धारण करती है। फ़िल्म में, कर्णन, दुर्योधन, द्रौपदी व अन्य का ज़िक्र है। वहीं कर्णन का द्रौपदी के साथ प्रेम सम्बन्ध भी दिखाया गया है, जो कि राजिशा विजयन द्वारा निभाया गया एक चरित्र है। यह महाकाव्य की कहानी के पुनर्लेखन के प्रयास का एक और उदाहरण है, जहाँ कर्णन, एक सूत-पुत्र, कुलीन घर में जन्मी द्रौपदी से शादी करने के योग्य नहीं था। इस प्रकार, फ़िल्म पौराणिक आधारों के साथ आधुनिक कथाओं को भी जोड़ती है और एक वैकल्पिक वास्तविकता का पता लगाने की कोशिश करती है जो ऐतिहासिक रूप से दलितों के प्रतीकात्मक उत्थान ही दर्शाता है। यह भी दलित आन्दोलन में मौजूद वैकल्पिक कहानी (counter narrative) पेश करता है। कर्णन जो अन्ततः प्रतिपक्षी को मारने के बावजूद, अपने कृत्य के प्रति व्यर्थता और त्रासदी की कैथार्सिस (catharsis) को ही प्रदर्शित करता है। इन बिम्बों और कथा के माध्यम से फ़िल्म जाति अस्मिता की निर्मिति व नव निर्मिति का काम करती है जो अन्ततः अस्मितावादी राजनीति को मजबूत ही करेगी, और जाति अन्त का सवाल और मुश्किल बनेगा।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जुलाई-अगस्त 2021

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