उद्धरण

कार्ल मार्क्स के 194वें जन्मदिवस (5 मई) के अवसर पर

march april 12 Karl marx“क्‍या यह समझने के लिए गहरी अन्तर्दृष्टि की ज़रूरत है कि मनुष्य के विचार, मत व उसकी धारणाएँ – संक्षेप में उसकी चेतना – उसके भौतिक अस्तित्व की अवस्थाओं, उसके सामाजिक सम्बन्धों तथा सामाजिक जीवन के प्रत्येक परिवर्तन के साथ बदलती हैं

विचारों का इतिहास इसके सिवा क्या सिद्ध करता है कि जिस अनुपात में भौतिक उत्पादन में परिवर्तन होता है, उसी अनुपात में बौद्धिक उत्पादक का स्वरूप भी परिवर्तित होता है हर युग के प्रभुत्वशील विचार सदा उसके शासक वर्ग के ही विचार रहे हैं।

जब लोग समाज में क्रान्ति ला देने वाले विचारों की बात करते हैं तो वे केवल इस तथ्य को अभिव्यक्त करते हैं कि पुराने समाज के भीतर एक नये समाज के तत्व पैदा हो गये हैं तथा पुराने विचारों का विघटन अस्तित्व की पुरानी अवस्थाओं के विघटन के साथ व़फ़दम मिलाकर चलता है।

प्राचीन दुनिया जिस समय अपनी अन्तिम साँसें गिन रही थी, उस समय प्राचीन धर्मों को ईसाई धर्म ने पराभूत कर दिया था। 18वीं शताब्दी में जब ईसाई मत तर्कबुद्धिवादी विचारों के सामने धराशायी हुआ, उस समय सामन्ती समाज ने तत्कालीन क्रान्तिकारी बुज़ुर्आ वर्ग से अपनी मौत की लड़ाई लड़ी थी। धर्म और अन्तःकरण की स्वतन्त्रता की बातें ज्ञानजगत में मुक्त होड़ के प्रभुत्व को ही व्यक्त करती थी।”

– कार्ल मार्क्स (‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ से)

हॉवर्ड जिन

हॉवर्ड जिन (अमेरिकी इतिहासकार)

“हमारे समाज पर जिन लोगों का नियन्त्रण है, यानी राजनीतिज्ञ, कॉरपोरेट अधिकारी, प्रेस और टेलीविज़न कम्पनियों के मालिक, अगर वे हमारे विचारों पर प्रभुत्व हासिल करने में सफल रहेंगे, तो वे सत्ता में सुरक्षित बने रहेंगे। उन्हें ऐसा करने के लिए सड़कों पर गश्त लगाते सैनिकों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। हम स्वयं अपने आपको नियन्त्रित करेंगे।”

भगतसिंह ने कहा…

bhagat_singh“लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की ज़रूरत है। ग़रीब मेहनतकश व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं, इसलिए तुम्हें इनके हथकण्डों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़कर कुछ नहीं करना चाहिए। संसार के सभी ग़रीबों के चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताव़फ़त अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों में तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी ज़ंज़ीरें कट जायेंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्रता मिलेगी।”

(‘साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज’)

“धार्मिक अन्धविश्वास और कट्टरपन हमारी प्रगति में बहुत बड़े बाधक हैं। वे हमारे रास्ते के रोड़े साबित हुए हैं और हमें उनसे हर हालत में छुटकारा पा लेना चाहिए। जो चीज़ आज़ाद विचारों को बर्दाश्त नहीं कर सकती, उसे समाप्त हो जाना चाहिए। इसी प्रकार की और भी बहुत-सी कमज़ोरियाँ हैं, जिन पर हमें विजय पानी है। …इस काम के लिए सभी समुदायों के क्रान्तिकारी उत्साह वाले नौजवानों की आवश्यकता है।”

(नौजवान भारत सभा, लाहौर का घोषणापत्र)

 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, मई-जून 2012

 

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