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फ़िलिस्तीनी कवि समीह अल-क़ासिम की स्मृति में

समीह अल क़ासिम आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन फ़िलिस्तीन की मुक्ति के लिए उठने वाली हर आवाज़ में, अन्याय के प्रतिरोध में उठने वाली हर मुट्ठी में वह ज़िन्दा हैं। उनकी कविताएँ आज़ाद फ़िलिस्तीन के हर नारे में गूँज रही हैं।

शोकगीत

लोग मेरे दोस्त के बारे में
बहुत बातें करते हैं
कैसे वह गया और फ़िर नहीं लौटा
कैसे उसने अपनी जवानी खो दी
गोलियों की बौछारों ने
उसके चेहरे और छाती को बींध डाला
बस और मत कहना
मैंने उसका घाव देखा है

बेर्टोल्ट ब्रेष्ट – दुख के कारणों की तलाश का कलाकार

बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की कला की मुख्य प्रवृत्ति पूँजीवादी नज़रिये पर तीखा प्रहार करना है। अपने नाटकों और कविताओं में इन्होंने शिक्षात्मक पहलू के साथ ही कलात्मकता के बेहतरीन मानदण्डों को बरकरार रखा। अपने नाटकों में ब्रेष्ट ने दुखों का केवल बख़ान करके ही नहीं छोड़ दिया, बल्कि उनके कारणों की गहराई तक शिनाख़्त भी की। ब्रेष्ट ने अपने नाटकों में रूप और अन्तर्वस्तु दोनों ही दृष्टियों से एक अलग सौन्दर्यशास्त्र का अनुपालन किया, जिसे इन्होंने ‘एपिक थिएटर’ का नाम दिया।

लेनिन ज़िन्दाबाद

तब जेल के अफ़सरान ने भेजा एक राजमिस्त्री।
घण्टे-भर वह उस पूरी इबारत को
करनी से खुरचता रहा सधे हाथों।
लेकिन काम के पूरा होते ही
कोठरी की दीवार के ऊपरी हिस्से पर
और भी साफ़ नज़र आने लगी
बेदार बेनज़ीर इबारत –
लेनिन ज़िन्दाबाद!
तब उस मुक्तियोद्धा ने कहा,
अब तुम पूरी दीवार ही उड़ा दो!

भूलना नहीं है

भूलना नहीं है कि
अभी भी है भूख और बदहाली,
अभी भी हैं लूट और सौदागरी और महाजनी
और जेल और फाँसी और कोड़े।
भूलना नहीं है कि
ये सारी चीज़ें अगर हमेशा से नहीं रही हैं
तो हमेशा नहीं रहेंगी।

हमारा सच और उनका सच

क्या यह ज़रूरी नहीं है कि सारे विश्वविद्यालयों के मठाधीशों को
खटाया जाय खेतों-खलिहानों और फ़ैक्ट्रियों में
कि उत्पादन का सच समझाया जा सके।
कि सच को समझने के लिए
चीजों को उलट देना ज़रूरी है
कि जैसे नमी को जानने के लिए शुष्कता
उजाले के लिए अन्धेरा और
दिन को जानने के लिए रात
और आज़ादी को जानने के लिए ज़रूरी है;
हमारे दिलों में जज़्ब जज़्बात की तड़प को समझना,

…वे अपना मृत्युलेख लिखते हैं

ऐसे में कोई कविता
कविता नहीं होती
कहानी कहानी नहीं बन पाती
सब कुछ महज़ एक बयान होता है,
हथेलियों में धँसी
क्रोधोन्मत्त, भिची हुई उँगलियों का
कसाव होता है

बेबी की कविताएँ

रोज
कोड़ता हूँ
घोंघे, सितुए
कंकड.पत्थर
चुन.चुनकर फेंकता हूँ
कि
कल
बो दूँगा तुझे
जिन्दगी

पाठक मंच

दोस्तो! ‘तुम्हारी’ पैण्ट बनाने में या कमीज़ बनाने में
सिर्फ हमारी मेहनत ही नहीं
बहुत कुछ गलता-पिसता-घिसता-ख़त्म होता है
हाँ, ये सिर्फ तुम्हारी ही हैं
हमें तो ये सपनों में भी मयस्सर नहीं