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उद्धरण, मई-जून 2016

अगर देशप्रेम की परिभाषा सरकार की अन्धआज्ञाकारिता नहीं हो, झण्डों और राष्ट्रगानों की भक्तिभाव से पूजा करना नहीं हो; बल्कि अपने देश से, अपने साथी नागरिकों से (सारी दुनिया के) प्यार करना हो, न्याय और जनवाद के उसूलों के प्रति प्रतिबद्दता हो; तो सच्चे देशप्रेम के लिए ज़रूरी होगा कि जब हमारी सरकार इन उसूलों को तोड़े तो हम उसके हुक्म मानने से इंकार करें!

उद्धरण

हमारे समाज पर जिन लोगों का नियन्त्रण है, यानी राजनीतिज्ञ, कॉरपोरेट अधिकारी, प्रेस और टेलीविज़न कम्पनियों के मालिक, अगर वे हमारे विचारों पर प्रभुत्व हासिल करने में सफल रहेंगे, तो वे सत्ता में सुरक्षित बने रहेंगे। उन्हें ऐसा करने के लिए सड़कों पर गश्त लगाते सैनिकों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। हम स्वयं अपने आपको नियन्त्रित करेंगे।

उद्धरण

अपने समाज के प्रति आलोचनात्मक नज़रिया हमारे भीतर पैदायशी नहीं होता। हमारी जिन्दगी में कुछ ऐसे क्षण रहे होंगे (कोई महीना या कोई साल) जब कुछ प्रश्न हमारे सामने प्रस्तुत हुए होंगे, उन्होंने हमें चौंकाया होगा, जिसके बाद हमने अपनी चेतना में गहरे जड़ें जमा चुकी कुछ आस्थाओं पर सवाल उठाये होंगे – वे आस्थाएँ जो पारिवारिक पूर्वाग्रह, रूढ़िवादी शिक्षा, अख़बारों, रेडियो या टेलीविज़न के रास्ते हमारी चेतना में पैबस्त हुई थीं। इससे एक सीधा-सा निष्कर्ष यह निकलता है कि हम सभी के ऊपर एक महती जिम्मेदारी है कि हम लोगों के सामने ऐसी सूचनाएँ लेकर जायें जो उनके पास नहीं हैं, ऐसी सूचनाएँ जो उन्हें लम्बे समय से चले आ रहे अपने विचारों पर दोबारा सोचने के लिए विवश करने की क्षमता रखती हों।

जनता का इतिहास लेखक : हावर्ड ज़िन

इतिहास का निर्माण जनता करती है लेकिन स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में पढ़ायी जाने वाली इतिहास की किताबों में जनता की भूमिका प्राय: नदारद रहती है। शासक वर्ग हमेशा अपने नज़रिये से इतिहास लिखवाने की कोशिश करते हैं और उसे ही प्रचलित और स्वीकार्य बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं। जनता के पक्ष से लिखी गयी इतिहास की पुस्तकें अक्सर एक छोटे दायरे तक सीमित रह जाती हैं। लेकिन कुछ इतिहासकार इस दायरे को तोड़कर इतिहास की जनपरक व्याख्या को पाठकों के बहुत बड़े समुदाय तक ले जाने में सफल रहे हैं। हावर्ड ज़िन, जिनका इसी वर्ष 27 जनवरी को निधन हो गया, इन्हीं में से एक थे।