Tag Archives: स्‍त्री विरोधी अपराध

लुधियाना बलात्कार व क़त्ल काण्ड की पीड़िता और बहादुरी से बलात्कारियों-कातिलों के ख़िलाफ़ जूझने वाली शहनाज़़ को इंसाफ़ दिलाने के लिए विशाल लामबन्दी और जुझारू संघर्ष

इस संघर्ष के दौरान विभिन्न चुनावी पार्टियों के दलाल नेताओं सहित संघर्ष में तोड़फ़ोड़ करने की कोशिश करने वाली कई रंगों की ताक़तों की जनविरोधी साजिशों को नाकाम करने में कामयाबी मिली है। एकजुट संघर्ष की यह प्राप्तियाँ बताती हैं कि जनता जब एकजुट होकर इमानदार, जुझारू और समझदार नेतृत्व में योजनाबद्ध ढंग से लड़ती है तो बड़े से बड़े जन-शत्रुओं को धूल चटा सकते हैं। लोगों को शहनाज़़ के बलात्कार व क़त्ल के दोषियों को सजा करवाने के लिए तो जुझारू एकता कायम रखनी ही होगी बल्कि स्त्रियों सहित तमाम जनता पर कायम गुण्डा राज से रक्षा और मुक्ति की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए एकता को और विशाल व मज़बूत बनाना होगा।

हरियाणा के रोहतक में हुई एक और ‘निर्भया’ के साथ दरिन्दगी

स्त्री विरोधी मानसिकता का ही नतीजा है कि हरियाणा में कन्या भ्रूण हत्या होती है और लड़के-लड़कियों की लैंगिक असमानता बहुत ज़्यादा है। हिन्दू धर्म के तमाम ठेकेदार आये दिन अपनी दिमागी गन्दगी और स्त्रियों को दोयम दर्जे का नागरिक मानने की अपनी मंशा का प्रदर्शन; कपड़ों, रहन-सहन और बाहर निकलने को लेकर बेहूदा बयानबाजियाँ कर देते रहते हैं लेकिन तमाम स्त्री विरोधी अपराधों के ख़िलाफ़ बेशर्म चुप्पी साध लेते हैं। यह हमारे समाज का दोगलापन ही है कि पीड़ा भोगने वालों को ही दोषी करार दे दिया जाता है और नृशंसता के कर्ता-धर्ता अपराधी आमतौर पर बेख़ौफ़ होकर घूमते हैं। अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए जब हरियाणा के मौजूदा मुख्यमन्त्री मनोहर लाल खट्टर फरमा रहे थे कि लड़कियों और महिलाओं को कपड़े पहनने की आज़ादी लेनी है तो सड़कों पर निर्वस्त्र क्यों नहीं घूमती!

हज़ारों इंसाफ़पसन्द लोगों ने दी बहादुर शहनाज़़ को भावभीनी श्रद्धांजलि

ढण्डारी (लुधियाना) बलात्कार व क़त्ल काण्ड विरोधी संघर्ष कमेटी के आह्वान पर 28 दिसम्बर को कड़ाके की सर्दी व सरकार द्वारा पूरे ढण्डारी इलाक़े को पुलिस छावनी में बदलकर दहशत का माहौल खड़ा करने के बावजूद हज़ारों लोगों के विशाल जनसमूह ने अपहरण, बलात्कार, मिट्टी का तेल डालकर जलाए जाने के दिल दहला देने वाले जुल्मों का शिकार व गुण्डा गिरोह के ख़िलाफ़ जूझती हुई मर-मिटने वाली बहादुर शहनाज़़ को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

रोहतक में निर्भया काण्ड के ख़िलाफ़ जन-अभियान व प्रदर्शन

पुलिस-प्रशासन की भूमिका आज अग्नि शमन विभाग से ज़्यादा नहीं रह गयी है। छेड़छाड़ और बलात्कार की दर्दनाक घटनाएँ हो जाने के बाद ही पुलिस-प्रशासन सकते में आता है। यदि इस देश की सरकारें स्त्रियों की सुरक्षा नहीं दे सकती, रोज़गार और शिक्षा नहीं दे सकती तो उनका काम क्या है? दूसरी बात आज समाज को पीछे ले जाने वाली ताक़तें भी समाज में सक्रिय हैं जो लड़कियों को घर की चार-दीवारी में ही कैद रखना चाहती हैं। इनके ख़िलाफ़ भी हमें एकजुट होना पड़ेगा, इनसे लोहा लेना पड़ेगा।

बढ़ते स्त्री-विरोधी अपराधों का मूल और उनके समाधान का प्रश्न

पिछले कुछ वर्षों में बर्बरतम स्त्री-विरोधी अपराधों की बाढ़ सी आ गयी है। ये अपराध दिन ब दिन हिंस्र से हिंस्र होते जा रहे हैं। समाज में ऐसा घटाटोप छाया हुआ है जहाँ स्त्रियों का खुलकर सांस ले पाना मुश्किल हो गया है। बर्बर बलात्कार, स्त्रियों पर तेज़ाब फेंके जाने, बलात्कार के बाद ख़ौफनाक हत्याओं जैसी घटनाएँ आम हो गयी हैं। पिछले दिनों लखनऊ, बदायूं, भगाणा, आदि जगहों पर हुई घटनायें इसका उदाहरण हैं। आखि‍र क्या कारण है कि ऐसी अमानवीय घटनाएँ दिन प्रतिदिन बढती जा रही हैं? इस सवाल को समझना बेहद जरुरी है क्योंकि समस्या को पूरी तरह समझे बगैर उसका हल निकाल पाना संभव नहीं है। अक्सर स्त्री-विरोधी अपराधों के कारणों की जड़ तक न जाने का रवैया हमें तमाम लोगों में देखने को मिलता है। इन अपराधों के मूल को ना पकड़ पाने के कारण वे ऐसी घटनाओं को रोकने के हल के तौर पर कोई भी कारगर उपाय दे पाने में असमर्थ रहते हैं। वे इसी पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर ही कुछ कड़े क़ानून बनाने, दोषियों को बर्बर तरीके से मृत्युदण्ड देने आदि जैसे उपायों को ही इस समस्या के समाधान के रूप में देखते हैं। इस पूरी समस्या को समझने के लिए हमें इसके आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आदि सभी कारणों की पड़ताल करनी होगी, तभी हम इस समस्या का सही हल निकालने में समर्थ हो पाएंगे।

यह आर्तनाद नहीं, एक धधकती हुई पुकार है!

जागो मृतात्माओ!
बर्बर कभी भी तुम्हारे दरवाज़े पर दस्तक दे सकते हैं।
कायरो! सावधान!!
भागकर अपने घर पहुँचो और देखो
तुम्हारी बेटी कॉलेज से लौट तो आयी है सलामत,
बीवी घर में महफूज़ तो है।
बहन के घर फ़ोन लगाकर उसकी भी खोज-ख़बर ले लो!
कहीं कोई औरत कम तो नहीं हो गयी है
तुम्हारे घर और कुनबे की?

कौन जिम्मेदार है इस पाशविकता का? कौन दुश्मन है? किससे लड़ें?

स्त्री-विरोधी अपराध कोई नयी बात नहीं है। जबसे पितृसत्तात्मक समाज अस्तित्व में आया है, तबसे ये अपराध लगातार होते रहे हैं। पहले इनका रूप अलग था और आज इनका रूप अलग है। सामन्ती समाज में तो स्त्रियों के उत्पीड़न को एक प्रकार की वैधता प्राप्त थी; जिस समाज में कोई सीमित पूँजीवादी अधिकार भी नहीं थे, वहाँ परदे के पीछे और परदे के बाहर स्त्रियों के खिलाफ अपराध होते थे और वे आम तौर पर मुद्दा भी नहीं बनते थे। पूँजीवादी समाज में इन स्त्री-विरोधी अपराधों ने एक अलग रूप अख्तियार कर लिया है। अब कानूनी तौर पर, इन अपराधों को वैधता हासिल नहीं है। लेकिन इस पूँजीवादी समाज में एक ऐसा वर्ग है जिसके जेब में कानून, सरकार और पुलिस सबकुछ है। यह वर्ग ही मुख्य रूप से वह वर्ग है जो ऐसे अपराधों को अंजाम देता है।

अरुणिमा को ग़लत साबित करने का कुचक्र रचती सिद्धान्तहीन राजनीति

उत्तर प्रदेश के शहर बरेली के निकट चनेहटी स्टेशन के पास ट्रेन में आधा दर्जन लुटेरों से भिड़ने वाली अरुणिमा को लुटेरों ने ट्रेन से फेंक दिया था। सोनू का एक पैर ट्रेन से कट गया, दूसरा टूट गया। पलक झपकते घटी इस घटना ने उसके भविष्य के सपने चकनाचूर कर दिये। मीडिया की नज़रें इनायत हुईं तो केन्द्रीय खेलमन्‍त्री ने 25 हज़ार रुपये की मदद की घोषणा कर दी। खेलमन्‍त्री का यह एक खिलाड़ी के साथ भद्दा मज़ाक था। एक खिलाड़ी अपना पूरा जीवन देश की सेवा में लगा देता है। पदक जीतकर पूरी दुनिया में नाम रोशन करता है। उसी पर मुसीबत पड़ने पर मदद के नाम पर 25 हज़ार रुपल्ली दिखाना कहाँ तक जायज़ है?

पूँजीपतियों के लिए सुशासन जनता के लिए भ्रष्ट प्रशासन

तमाम चुनावी मदारी जनता को बरगलाने के लिए नये-नये नुस्ख़े ईजाद करते रहते हैं। बिहार में भाजपा व जद (यू) के गठबन्धन वाली सरकार के मुख्यमन्त्री नितीश कुमार इस खेल के काफी मँझे हुए खिलाड़ी हैं। अपने इस कार्यकाल की शुरुआत में उन्होंने ‘‘जनता को रिपोर्ट कार्ड’‘ देने की परम्परा शुरू की थी, जिसे अब केन्द्र सरकार भी निभा रही है। रिपोर्ट कार्ड नामक मायावी जाल इसलिए बुना जाता है, ताकि इसके लच्छेदार शब्दों व भ्रामक आँकड़ों को सुनने के बाद जनता अपनी वास्तविक समस्याओं को भूलकर विकास के झूठे नारे पर अन्धी होकर नाचती रहे।

पैदा हुई पुलीस तो इबलीस ने कहा…

पुलिस द्वारा स्त्रियों के बढ़ते उत्पीड़न के मामले सिर्फ़ इसी तथ्य को रेखांकित करते हैं कि समाज में शोषित-उत्पीड़ित और दमित स्त्री एक आसान निशाना या शिकार होती है। पुलिस बल ने कई मौकों पर साबित किया है कि वह देश की सबसे संगठित गुण्डा बल ही है जो व्यवस्था का रक्षक है। जनता का नहीं। जनता के कमज़ोर तबकों को दबाना तो पुलिस अपना कर्तव्य और धर्म समझती है।