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पटना में पिंजड़ा तोड़ अभियान की शुरुआत

करीब एक महीने तक चले इस अभियान के तहत अन्त में यूनिवर्सिटी कैंपस में 6 मार्च को एक रैली का आयोजन भी किया गया जिसकी शुरुआत एन आयी टी मोड़ से हुई। ऐन उसी वक़्त जब कुछ लड़कियाँ रैली में शामिल होने आ रही थी कि पटना साइंस कॉलेज परिसर में ही कुछ लड़कों ने उनके साथ बादतमीजी की। इस घटना के जवाब में सारी लड़कियाँ पटना साइंस कॉलेज गेट के सामने इकट्ठी हो गयी व नारेबाज़ी करने लगे। हल्ला सुनकर कुछ ही देर बाद आये कॉलेज प्रिंसिपल ने एक लिखित कम्प्लेंट फाइल देने को कहा। उन्होंने यह तक कहा कि बिना लिखित में दिये वह कोई कार्यवाही नहीं करेंगे! मामले पर अगले ही दिन एक लिखित कम्प्लेंट दायर की गयी। इस घटना पर आक्रोशित लड़कियाँ काफी देर तक साइंस कॉलेज गेट पर जुटी रहीं व नारेबाज़ी करती रहीं। अन्त में रैली पटना कॉलेज गेट पर पहुँची। दोबारा वहाँ सभा की गयी व कुछ गानों और ज़ोरदार नारों के साथ रैली ख़त्म हुई।

“स्त्री क्या चाहती है?” – सबसे पहले तो आज़ादी!

स्त्री क्या चाहती है? यह प्रश्न कई अवस्थितियों से, कई धरातलों पर पूछा जा सकता है और इसके उत्तर भी इतनी ही भिन्न‍ताएँ लिये हुए होंगे। स्त्री की चाहत समय और समाज की चौहद्दी का अतिक्रमण नहीं कर सकती। आज से सौ या पचास साल पहले की स्त्री की चाहत वही नहीं थी जो आज की स्त्री की है। सामाजिक विकास और सामाजिक चेतना के स्तरोन्नयन के साथ स्त्री चेतना भी उन्नत हुई है और उसकी इच्छाओं-कामनाओं-स्वप्नों के क्षितिज का विस्तार हुआ है।

यह आर्तनाद नहीं, एक धधकती हुई पुकार है!

जागो मृतात्माओ!
बर्बर कभी भी तुम्हारे दरवाज़े पर दस्तक दे सकते हैं।
कायरो! सावधान!!
भागकर अपने घर पहुँचो और देखो
तुम्हारी बेटी कॉलेज से लौट तो आयी है सलामत,
बीवी घर में महफूज़ तो है।
बहन के घर फ़ोन लगाकर उसकी भी खोज-ख़बर ले लो!
कहीं कोई औरत कम तो नहीं हो गयी है
तुम्हारे घर और कुनबे की?

स्त्री मुक्ति का रास्ता पूँजीवादी संसद में आरक्षण से नहीं समूचे सामाजिक-आर्थिक ढाँचे के आमूल परिवर्तन से होकर जाता है!

संसद में महिलाओं को आरक्षण? एक ऐसे निकाय में आरक्षण को लेकर बहस और झगड़े का क्या अर्थ है जो किसी भी रूप में जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करता; जो जनता को गुमराह करने के लिए की जाने वाली बहसबाज़ी का अड्डा हो; जो पूँजीपतियों के मामलों का प्रबन्धन करने वाला एक निकाय हो। जो संसद वास्तव में देश की जनता का प्रतिनिधित्व करती ही नहीं है, उसमें स्त्रियों को आरक्षण दे दिया जाय या न दिया जाय, इससे क्या फर्क पड़ने वाला है? संसद में महिला आरक्षण को लेकर आम जनता की ताक़तों का बँट जाना नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के मुद्दे पर बँट जाने से भी अधिक विडम्बनापूर्ण है।

महिला आरक्षण बिल : श्रम की वर्गीय एकजुटता को कुन्द करने की साजिश

जिस तरह रोज़गार एवं अवसरों को उपलब्ध कराने में असफल रही पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा दलित व पिछड़े वर्ग के लिए लागू किये गए आरक्षण से व्यापक दलित व पिछड़े वर्ग को कोई लाभ नहीं हुआ, बल्कि इन वर्गों से कुछ पूँजी के चाकर पैदा हुए और व्यापक मज़दूर वर्ग के आन्दोलन में अस्मितावादी राजनीति ज़ोर मारने लगी, उसी तरह इस कानून से भी आम औरतों को कोई लाभ नहीं होने वाला है। इसके द्वारा स्त्रीवादी आन्दोलन को व्यापक मेहतनकश जनता के आन्दोलन से न जुड़ने देने की साज़िश सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा रची गयी है। न तो स्त्रियों के प्रति पितृसत्तात्मक मानसिकता से जकड़े तमाम सत्ताधारी पुरुषों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आया है और न ही औरतों को चूल्हा–चौका, बच्चा पैदा करने और पति की सेवा करने तक सीमित कर देने के हिमायती और फासीवाद के प्रबल समर्थक संघ परिवार के राजनीतिक मुखौटे भाजपा की विश्वदृष्टि में कोई बदलाव आया है। ऐसे में समझा जा सकता है कि महिला आरक्षण बिल का वास्तविक लक्ष्य क्या है और इसे लेकर सभी चुनावी दल इतनी नौटंकी क्यों कर रहे हैं।

देश में स्त्रियों की स्थिति और स्त्री मुक्ति का प्रश्न

इसी व्यवस्था के भीतर रह कर स्त्री मुक्ति की बात करना बेमानी है। जब तक वर्ग विभाजित समाज और व्यवस्था कायम रहेगी तब तक स्त्री-पुरुष का विभेद भी नहीं मिट सकता। स्त्री और पुरुष के विभेद का आधार भी श्रम विभाजन था और वर्ग विभाजन का आधार भी श्रम विभाजन था। जब तक यह असमान श्रम विभाजन ख़त्म नहीं होता तब तक स्त्री-पुरुष असमानता भी ख़त्म नहीं हो सकती। स्त्री मुक्ति का प्रोजेक्ट मेहनतकशों की मुक्ति के प्रोजेक्ट के एक अंग के तौर पर ही किसी मुकाम पर पहुँच सकता है। मेहनतकशों का भी आधा हिस्सा स्त्रियों का है। यही वे स्त्रियाँ हैं जो स्त्री मुक्ति की लड़ाई को लड़ेंगी और नेतृत्व देंगी, न कि उच्चमध्यवर्गीय घरों की खाई–मुटाई–अघाई स्त्रियाँ जो अपने सोने के पिंजड़े में सुखी हैं।