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पूँजीवादी स्वर्ग के तलघर की सच्चाई

ग़रीबी रेखा सम्बन्धी प्राप्त आकड़ों के अनुसार 34 करोड़ की कुल अमेरिकी जनसंख्या में करीब 5 करोड़ लोग ग़रीबी-रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं और अन्य 10 करोड़ इस बस ऊपर ही है, यानी करीब आधी आबादी भयंकर ग़रीबी का शिकार है। खाद्य उपलब्धता सम्बन्धी आँकड़ों के बारे में अमेरिकी सरकार के कृषि विभाग के अनुसार हर चार में एक अमेरिकी नागरिक भोजन सम्बन्धी दैनिक ज़रूरतों के लिए राज्य सरकार एवं विभिन्न दाता एंजेसियों द्वारा चलाये जा रहे खाद्य योजनाओं पर निर्भर है, क्योंकि वह अपनी आय से दो जून की रोटी ख़रीद पाने में अक्षम है। अगर शिक्षा की बात की जाये तो एक उदाहरण के जरिये चीज़ें समझना ज़्यादा आसान होगा। बर्कले विश्वविद्यालय का एक छात्र, आज करीब 11,160 डॉलर प्रति वर्ष शिक्षा शुल्क के तौर पर अदा करता है; आज से दस साल पहले वो 2,716 डॉलर ख़र्च करता था और उम्मीद है कि 2015-16 तक वह 23,000 डॉलर अदा करेगा।

चिली के छात्रों का जुझारू आन्‍दोलन

इस साल अप्रैल माह में शुरू हुए चिली के छात्रों के इस संघर्ष के पीछे मुख्य वजह 20 सालों के दौरान शिक्षा के बढ़ते निजीकरण के कारण पैदा हुई असमान शिक्षा व्यवस्था से छात्रों के व्यापक हिस्से में उपजा असन्तोष है। पिछले दो दशकों से जारी शिक्षा के निजीकरण और बाज़ारीकरण की वजह से बेहतर शिक्षा प्राप्त करना तेज़ी से महँगा होता गया है, ग़रीब परिवारों से आने वाले छात्रों को प्राप्त शिक्षा की गुणवत्ता में तेज़ी से गिरावट आयी है और ग़रीब तबके से आने वाले छात्र ऋण के जुवे तले पिसते जा रहे हैं। इस प्रकार अच्छी शिक्षा बेहद अमीर घरों के बच्चों तक सिमटती जा रही है। शिक्षा में बढ़ती इस असमानता के कारण पिछले कई वर्षों से व्यवस्था के विरुद्ध छात्रों का रोष बढ़ता जा रहा है। इसी असन्तोष की एक अस्पष्ट अभिव्यक्ति के रूप में पाँच साल पहले अर्थात 2006 में भी हाईस्कूली छात्रों ने एक ज़ोरदार संघर्ष किया था। और इसी कड़ी में विश्वविद्यालय के छात्रों का वर्तमान संघर्ष इस सामाजिक असन्तोष की एक अधिक स्पष्ट और केन्द्रीभूत अभिव्यक्ति के रूप में उभरकर सामने आया।

मायावती का निरंकुश, स्वेच्छाचारी शासन

मायावती के रूप में भारतीय पूँजीवादी राजनीति का सबसे निरंकुश, स्वेच्छाचारी और जनविरोधी चरित्र उभर कर सामने आता है। जाहिरा तौर पर इसका सबसे अधिक खामियाजा समाज के सबसे निचले तबकों यानी मज़दूरों और किसानों को उठाना पड़ता है।

‘पंसारी की दुकान’ से ‘शॉपिंग मॉल’ बनने की ओर अग्रसर यह विश्वविद्यालय

वैसे यह फ़ीस वृद्धि कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है। पिछले दो दशकों से जारी और भविष्य के लिए प्रस्तावित शिक्षा नीति का मूलमन्‍त्र ही है कि सरकार को उच्च शिक्षा की जि़म्मेदारी से पूरी तरह मुक्त करते हुए उसे स्ववित्तपोषित बनाया जाये। ताज़ा आँकड़ों के अनुसार आज केन्द्रीय सरकार सकल घरेलू अत्पाद (जीडीपी) का 1 फ़ीसदी से कम उच्च शिक्षा पर ख़र्च करता है और यह भविष्य में बढ़ेगा, इसकी उम्मीद कम ही है। मानव संसाधन मन्‍त्रालय के हालिया बयानों में यह बात प्रमुखता से आयी है, हर तीन साल बाद विश्वविद्यालय की फ़ीसों में बढ़ोत्तरी की जाये ताकि राज्य इस जि़म्मेदारी से मुक्त हो सकते। बिरला-अम्बानी-रिपोई से लेकर राष्ट्रीय ज्ञान आयोग और यशपाल समिति की सिफ़ारिशें भी इसी आशय की हैं।

बिनायक सेन: पूँजीवादी न्याय की स्वाभाविक अभिव्यक्ति

वैसे तो इस देश की अभागी जनता को पूँजीवादी लोकतन्त्र के मानकों पर खरा उतरने वाला लोकतन्त्र भी कभी नहीं मिला, लेकिन पहले के मुकाबले आज की स्थितियों में फ़र्क़ ज़रूर है। उदारीकरण और निजीकरण के पिछले दो दशकों के इतिहास ने राज्य की भूमिका को दो स्तरों पर परिवर्तित किया है। निजी पूँजी की लूट को रोक पाना या एक हद तक नियमित कर पाना भी उसके लिए असम्भव है। वस्तुगत तौर पर उसकी भूमिका सहायक की ही हो सकती है, क्योंकि यह पूँजीवाद की ज़रूरत है। ऐसे में निजी पूँजी के विस्तार के ख़िलाफ अगर तात्कालिक दृष्टि से भी कोई व्यक्ति या संगठन कार्य करता है, उसे अवरुद्ध करता है तो राज्य उसका निर्मम दमन करेगा। दूसरे इन नीतियों के प्रभाव में जहाँ एक तरफ छोटे से मध्यवर्ग के लिए अकूत धन-सम्पदा और ख़ुशहाली पैदा हुई है, वहीं देश की व्यापक जनता के लिए ग़रीबी, बेरोज़गारी, भुखमरी और महँगाई के रूप में भारी विपन्नता पैदा हुई है। देश के शासक वर्ग भी जानते हैं कि वे ज्वालामुखी के दहाने पर बैठकर रंगरेलियाँ मना रहे हैं और यह ज्वालामुखी भविष्य में जनविद्रोह के रूप में फूटेगा ही, जिसके आसार अभी से नज़र आने लगे हैं। इस विस्फोट को यथासम्भव विलम्बित करने के लिए राज्य अपने दमनतन्त्र को तीखा करते हुए दबे पाँव एक अघोषित आपातकाल पैदा करने की ओर अग्रसर है।

छात्रों द्वारा शिक्षकों के नाम एक खुला पत्र

ऐसे में हम अपने विश्वविद्यालय के शिक्षकों और गुरुजनों से कुछ मुद्दों पर दिशा-सन्धान और मार्गदर्शन चाहेंगे। सर्वप्रथम, क्या विश्वविद्यालय के भीतर एक अकादमिक और उच्च गुणवत्ता वाला बौद्धिक वातावरण तैयार करने के लिए स्वयं प्रशासन को विचार-विमर्श, डिबेट-डिस्कशन, गोष्ठी-परिचर्चा इत्यादि गतिविधियाँ जिसमें छात्रों की व्यापक भागीदारी हो, आयोजित करने की पहल नहीं करनी चाहिए? क्या ऐसी गतिविधियों के अभाव में न सिर्फ छात्र बल्कि शिक्षक भी शोध-अनुसन्धान जैसे क्रिया-कलापों में पिछड़ नहीं जायेंगे और क्या यह विश्वविद्यालय की हत्या करना जैसा नहीं होगा? दूसरे अगर प्रशासन स्वयं ऐसी पहल नहीं कर रहा है, और कुछ छात्र, जिन्होंने अभी-अभी विश्वविद्यालय में दाखि़ला लिया है, अपने स्तर पर इसके लिए प्रयास करते हैं, तो क्या प्रशासन सहित पूरे विश्वविद्यालय समुदाय की यह ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित करें?

चोरों, डकैतों, भ्रष्टाचारियों और अपराधियों के बीच हमारे ‘राहुल बाबा’!

अगर आप थोड़ा बारीकी से नज़र डालेंगे तो जितनी स्वतःस्फूर्तता के साथ राहुल जी उभरे हैं, उतनी ही स्वतःस्फूर्तता के साथ आप यह समझ जायेंगे कि राहुल गाँधी अपने-आप लोकप्रिय नहीं बन गये, बल्कि बहुत ही प्रायोजित ढंग से इस देश के प्रिण्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा उन्हें लोकप्रिय बनाया जा रहा है। आप फिर तपाक से पूछेंगे कि अब इसकी क्या ज़रूरत पड़ गयी? क्या इस देश में लोकप्रिय नेताओं की कमी है और उससे भी बड़ा सवाल कि जब आज मीडिया के पास राखी साँवत से लेकर सचिन तेन्दुलकर तक हज़ारों ‘सेलेबल प्रोडेक्ट्स’ हैं तो फिर राहुल गाँधी को यह मौका क्यों दिया जा रहा है? दोनों ही सवाल जायज़ हैं!

अलीगढ़ मुस्लिम वि.वि. में छात्र संघ बहाली के लिए, छात्रों का जुझारू संघर्ष

पिछले करीब डेढ़ महीने से अलीगढ़ मुस्लिम वि.वि. में हज़ारों की संख्या में छात्र, छात्र संघ की बहाली के लिए संघर्षरत हैं। इसकी शुरुआत 4 अक्टूबर को वी.सी. लॉज के सामने छात्रों के धरने के साथ हुई। यह धरना मुख्यतः दो माँगों को लेकर आयोजित किया गया था – पहला छात्र संघ बहाल करने की माँग और दूसरा डीन, वित्त अधिकारी और प्रवोस्ट की बर्खास्‍तगी की माँग। धरने के तीन दिन बाद ही कुलपति से छात्रों के प्रतिनिधिमण्डल की वार्ता हुई। यह वार्ता कुलपति के तानाशाही रवैये के कारण बेनतीजा साबित हुई। इसके बाद छात्रों ने आम सहमति से संघर्ष को और तेज़ करने के लिए 12 अक्टूबर से अनियतकालीन भूख हड़ताल की शुरुआत कर दी।

निजी पूँजी का ताण्डव नृत्य जारी, लुटती जनता और प्राकृतिक संसाधन!

पिछले दो दशकों के दौरान भारतीय पूँजीवाद का सबसे मानवद्रोही चेहरा उभरकर हमारे सामने आया है। उत्पादन के हर क्षेत्र में लागू की जा रही उदारीकरण-निजीकरण की नीतियाँ, एक तरफ मुनाफे और लूट की मार्जिन में अप्रत्याशित वृद्धि दरें हासिल करा रही हैं, वहीं दूसरी ओर आम जनजीवन से लेकर पर्यावरण के ऊपर सबसे भयंकर कहर बरपा करने का काम भी कर रही हैं। भारतीय खनन उद्योग इन नीतियों की सबसे सघन प्रयोग-भूमि बनकर उभरा है। यही कारण है कि कभी रेड्डी बन्धुओं के कारण, तो कभी सरकार द्वारा चलाये जा रहे ‘ऑपरेशन ग्रीन हण्ट’ के कारण खनन उद्योग लगातार चर्चा में रहा है।

उत्तर प्रदेश में शिक्षामित्रों का जुझारू आन्दोलन

‘शिक्षामित्र’ प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर कार्यरत उन शिक्षकों की श्रेणी को कहा जाता है जिन्हें नियमित शिक्षकों के स्थान पर सालभर के ठेके पर नियुक्त किया जाता है। इनको नियुक्त करने की जिम्मेदारी किसी सरकारी महकमे की नहीं, बल्कि ग्राम पंचायतों और नगर-निगमों की होती है, और इन्हें नियमित शिक्षकों के बरक्स बेहद कम वेतनमान पर रखा किया जाता है। साथ ही ठेके पर होने के कारण इन्हें महँगाई भत्ता, पी.एफ. इत्यादि की भी कोई सुविधा नहीं दी जाती है। सालभर बाद इनकी कार्यकुशलता और काम के मूल्यांकन के अनुसार दोबारा ठेके पर रखा जा सकता है। ये लोग महज़़ उ.प्र. में नहीं बल्कि देश के ज़्यादातर राज्यों में अलग-अलग नामों के अन्तर्गत कार्यरत हैं।