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लक्ष्मीनगर हादसा: मुनाफे की पूँजीवादी मशीनरी की बलि चढ़े ग़रीब मज़दूर

मुनाफा! हर हाल में! हर कीमत पर! मानव जीवन की कीमत पर। नैतिकता की कीमत पर। नियमों और कानूनों की कीमत पर। यही मूल मन्त्र है इस मुनाफाख़ोर आदमख़ोर व्यवस्था के जीवित रहने का। इसलिए अपने आपको जिन्दा बचाये रखने के लिए यह व्यवस्था रोज़़ बेगुनाह लोगों और मासूम बच्चों की बलि चढ़ाती है। इस बार इसने निशाना बनाया पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मीनगर स्थित ललिता पार्क स्थित उस पाँच मंजिला इमारत में रहने वाले ग़रीब मज़दूर परिवारों को जो देश के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली काम की तलाश में आये थे। इमारत के गिरने से लगभग 70 लोगों की मौत हो गयी और 120 से अधिक लोग घायल हो गये, जिनमें कई महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं।

‘‘उभरती अर्थव्यवस्था’’ की उजड़ती जनता

हमारे देश का कारपोरेट मीडिया और सरकार के अन्य भोंपू समय-समय पर हमें याद दिलाते रहते हैं कि हमारा मुल्क ‘‘उभरती अर्थव्यवस्था’’ है; यह 2020 तक महाशक्ति बन जाएगा; हमारे मुल्क के अमीरों की अमीरी पर पश्चिमी देशों के अमीर भी रश्क करते हैं; हमारी (?) कम्पनियाँ विदेशों में अधिग्रहण कर ही हैं; हमारी (?) सेना के पास कितने उन्नत हथियार हैं; हमारे देश के शहर कितने वैश्विक हो गये हैं; ‘इण्डिया इंक.’ कितनी तरक्की कर रहा है, वगैरह-वगैरह, ताकि हम अपनी आँखों से सड़कों पर रोज़ जिस भारत को देखते हैं वह दृष्टिओझल हो जाए। यह ‘‘उभरती अर्थव्यवस्था’’ की उजड़ती जनता की तस्वीर है। भूख से दम तोड़ते बच्चे, चन्द रुपयों के लिए बिकती औरतें, कुपोषण की मार खाए कमज़ोर, पीले पड़ चुके बच्चे! पूँजीपतियों के हितों के अनुरूप आम राय बनाने के लिए काम करने वाला पूँजीवादी मीडिया भारत की चाहे कितनी भी चमकती तस्वीर हमारे सामने पेश कर ले, वस्तुगत सच्चाई कभी पीछा नहीं छोड़ती। और हमारे देश की तमाम कुरूप सच्चाइयों में से शायद कुरूपतम सच्चाई हाल ही में एक रिपोर्ट के जरिये हमारे सामने आयी।

गुजरात : पूँजीवादी इंसाफ का रास्ता बेइन्तहा लम्बा, टेढ़ा–मेढ़ा और थकाऊ है

आज गुजरात में हुआ, कल कहीं और होगा। आज मोदी ने किया, कल कोई और करेगा। क्या आज़ादी के बाद के 63 वर्ष इस बात की गवाही नहीं देते ? अगर इस कुचक्र से मुक्ति पानी है तो पूरी पूँजीवादी व्यवस्था, सभ्यता और समाज के ही विकल्प के बारे में सोचना होगा। हर इंसाफ़पसन्द नौजवान का आज यही फ़र्ज़ बनता है।

नेपाली क्रान्तिः महत्व और भविष्य

इसमें कोई शक़ नहीं है कि नेपाली क्रान्तिकारियों के सामने चुनौतियाँ बहुत कठिन है, लेकिन इतिहास भी इस बात का गवाह है कि प्रतिकूलतम परिस्थितियाँ भले ही जनता के संघर्षों की राह को दुर्गम, लम्बा और जटिल बना दें, पर उनका गला नहीं घोंट सकतीं।

यूनान में जनअसन्तोष के फूटने के निहितार्थ

यदि इन प्रतिरोध-प्रदर्शनों के पीछे के वास्तविक कारणों की पड़ताल की जाय तो पता चलता है कि जनता के बड़े हिस्से में, विशेषकर युवा आबादी के बीच एक ऐसी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के प्रति गहरी पैठी नफ़रत और निराशा है जो केवल अमीरों और धनाढ्य वर्गों का प्रतिनिधित्व करती है और उन्हीं के हितों की पूर्ति और रक्षा करती है। निजीकरण और उदारीकरण की वैश्विक लहर से यूनानी अर्थव्यवस्था भी अछूती नहीं रही है। नवउदारवादी नीतियों के चलते, सार्वजनिक शिक्षा और सामाजिक सेवाओं को लगातार निजी हाथों में सौंपा जा रहा है और उन्हें अमीरों की बपौती बनाया जा रहा है। यदि केवल आँकड़ों की बात की जाय तो पूरे यूरोपीय संघ में यूनान में युवा बेरोज़गारी दर सबसे अधिक है, जो लगभग 28 से 29 प्रतिशत के बीच है। इसके कारण युवावस्था पार करने के बाद तक ज्यादातर नौजवान आर्थिक रूप से अपने माँ-बाप पर ही निर्भर रहते हैं।

पैदा हुई पुलीस तो इबलीस ने कहा…

पुलिस द्वारा स्त्रियों के बढ़ते उत्पीड़न के मामले सिर्फ़ इसी तथ्य को रेखांकित करते हैं कि समाज में शोषित-उत्पीड़ित और दमित स्त्री एक आसान निशाना या शिकार होती है। पुलिस बल ने कई मौकों पर साबित किया है कि वह देश की सबसे संगठित गुण्डा बल ही है जो व्यवस्था का रक्षक है। जनता का नहीं। जनता के कमज़ोर तबकों को दबाना तो पुलिस अपना कर्तव्य और धर्म समझती है।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारण्टी योजना – एक विशालकाय सरकारी धोखे का सच!

कुल मिलाकर यही है वह रोज़गार गारण्टी योजना जिसे ‘ऐतिहासिक’ बताया जा रहा था और जिसके लिए अभी भी इतना शोर मचाया जा रहा है, साल भर में महज़ 100 दिन का रोज़गार वह भी मात्र 50 रुपए की मज़दूरी पर! लेकिन साल के बाकी 265 दिन वह सौ दिन का (कहना चाहिए) ठेका मज़दूर और उसका परिवार क्या करेगा, क्या ख़ाकर ज़िन्दा रहेगा? ख़ैर, एक तरफ़ जहाँ सरकार इस पहलू पर आश्चर्यचकित ढंग से चुप्पी साधे हुए है, वहीं दूसरी ओर इस योजना के हिमायती यह कहते हुए घूम रहे हैं कि चलो कुछ लोगों को कुछ दिन के लिए ही सही कुछ तो मिल ही रहा है। लेकिन मनमोहन सिंह जी आपका यह “कुछ-कुछ” का सिद्धान्‍त तो वाकई में कुछ भी नहीं कर पा रहा है!

संसदीय वामपंथियों का अमेरिका-प्रेम!

जब इन संसदीय वामपंथी बातबहादुरों से पूछा गया कि ‘महोदय, आपकी कथनी और करनी में यह मायावी विरोधभास कैसे? इसे कैसे समझा जाय?’ तो इनका कहना था कि आपकी पार्टी विचारधारा और व्यक्तिगत जीवन में फ़र्क करती है! बाप रे बाप! हम तो चक्कर ही खा गये! कैसी विचित्र दैवीय अलौकिक तर्कपद्धति है! हमने तो मार्क्सवाद के बारे में जितना पढ़ा तो उससे हमें लगा था कि राजनीतिक व्यक्तिगत होता है और व्यक्तिगत राजनीतिक। इनमें कोई विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती। और यह भी कहीं पढ़ा था शायद कि जैसा जीवन होता है उसका प्रभाव विचारधारा और राजनीति पर दिखने लगता है! कोई हमसे यह भी कह रहा था कि अमेरिका के प्रति आपका यह प्रेम दरअसल इसी बात को दिखलाता है कि व्यक्तिगत जीवन में आप जैसे जीते हैं उसी की छाया आपकी राजनीति और विचारधारा पर भी नज़र आती है।

कैम्पसों में बढ़ती पुलिस मौजूदगी – आख़िर किस बात का डर है उन्हें?

कुल मिलाकर इस सारी कवायद का मक़सद यही है कि छात्रों को और कैम्पसों को मरघट की शान्ति से भर दिया जाय। कहीं कोई आवाज़ न उठाये; कहीं लोग एक-दूसरे से मिलें नहीं और आपसी संवाद और सम्बन्ध न कायम करें; कोई हक़ की बात न करे; सब शान्त रहें! यही चाहत है इस व्यवस्था और प्रशासन की। लेकिन पुलिस का डण्डा छात्रों को डराकर उनकी नौजवानी को कुचल नहीं सकता। छात्रों-युवाओं में एक सहज न्यायबोध होता है। उसे ऐसे किसी भोंडे प्रयास से कुचला नहीं जा सकता। साथ ही, छात्रों के राजनीतिकरण को भी रोकना इस व्यवस्था के बूते की बात नहीं। अंततः कैम्पस के भीतर या कैम्पस के बाहर नौजवानों को अपनी ज़िन्दगी की जद्दोजहद से यह समझ लेना है कि संगठित हुए बग़ैर उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा। कैम्पसों को छावनियों में तब्दील करने की तमाम कोशिशों के बावजूद छात्र अपनी यह फ़ितरत नहीं भूल सकते-अन्याय के विरुद्ध विद्रोह न्यायसंगत है!

ख़र्चीला और परजीवी होता “जनतंत्र”, लुटती और बरबाद होती जनता

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक आज से 50 साल पहले 5 व्यक्तियों का परिवार एक साल में जितना अनाज खाता था, आज उससे 200 किलो कम खाता है। भोजन में विटामिन और प्रोटीन जैसे जरूरी पोषक तत्वों की लगातार कमी होती गई है। आम आदमी के लिए प्रोटीन के मुख्य स्रोत दालों की कीमत में पिछले एक साल के अन्दर 110 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। हरी सब्जियाँ, दालें और दूध तो गरीब आदमी में भोजन से नदारद ही हो चुके हैं। इसी का नतीजा है कि कुपोषण के कारण कम वजन वाले बच्चों की सबसे बड़ी संख्या भारत में है। बेतहाशा बढ़ती महँगाई ने आम मेहनतक़श लोगों को जीवन की बुनियादी जरूरतों में कटौती करने के लिए विवश कर दिया है।