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पूँजीवादी विज्ञापन जगत का सन्देश: ‘ख़रीदो और खुश रहो!’

एक सांस्कृतिक उत्पाद के तौर पर भी विज्ञापनों का असर लम्बे समय तक रहता है। क्योंकि लगातार दुहराव के ज़रिये ये लोगों के मस्तिष्क पर लगातार प्रभाव छोड़ते रहते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि हम कब विज्ञापनों में इस्तेमाल किये जाने वाले जिंगल गुनगुनाने लगते हैं या फिर उनके स्लोगन और टैगलाइन ख़ुद दोहराने लगते हैं। पूँजीवाद विज्ञापनों द्वारा माल अन्धभक्ति (कमोडिटी फ़ेटिशिज़्म) को एक नये मुक़ाम पर पहुँचा देता है। बार-बार लगातार विज्ञापनों के ज़रिये हमें यह बताने का प्रयास किया जाता है कि यदि हमारे पास फलाना सामान नहीं है तो हम ज़िन्दगी में कितना कुछ ‘मिस’ कर रहे हैं। हमें बार-बार लगातार यह बताया जाता है कि सुखी-सन्तुष्ट जीवन का एकमात्र रास्ता बाज़ार के ज़रिये वस्तुओं का उपभोग है। केवल माल और सामान ही हमें खुशी और सामाजिक रुतबा प्रदान कर सकते हैं। बिना किसी अपवाद के हर विज्ञापन का यही स्पष्ट सन्देश होता है – चाहे वह विज्ञापन किसी कार कम्पनी का हो या किसी बीमा कम्पनी का, किसी सौन्दर्य प्रसाधन के ब्राण्ड का हो या फिर किसी शराब या मोबाइल फ़ोन की कम्पनी का – यही सन्देश बार-बार रेखांकित किया जाता है। सामानों, वस्तुओं, मालों को प्रसन्नता, स्वतन्त्रता और रुतबे का समतुल्य बना दिया जाता है।

जर्मनी में फ़ासीवाद का उभार और भारत के लिए कुछ ज़रूरी सबक़

जर्मनी में जो कुछ हुआ वह आज भारत में हरेक प्रगतिशील व्यक्ति के लिए बेहद प्रासंगिक है। भारत में भी आर्थिक संकट अपने पूरे ज़ोर के साथ इस दशक ही आने वाला है। अभी भी स्थिति कोई बेहतर नहीं है और मन्दी जारी है, लेकिन कुछ वर्षों में ही यह मन्दी एक गम्भीर संकट में तब्दील होने वाली है। फासीवादी ताक़तें उस समय के मुताबिक अपनी तैयारियाँ कर रही हैं। क्रान्तिकारी ताक़तों को भी मज़दूर वर्ग को आधार बनाते हुए इस फासीवादी उभार का मुकाबला करने की तैयारियाँ आज से ही शुरू कर देनी चाहिए। वहीं दूसरी ओर क्रान्तिकारी शक्तियों को लगातार निम्न और मँझोले मध्यवर्ग में भी क्रान्तिकारी राजनीतिक प्रचार करना चाहिए और उन्हें इस बात का अहसास कराना चाहिए कि मौजूदा संकट, अनिश्चितता और असुरक्षा के लिए समूची पूँजीवादी व्यवस्था ज़िम्मेदार है; क्रान्तिकारी हिरावल को संगठित करना और पूँजीवाद का एक वैज्ञानिक-व्यावहारिक विकल्प पेश करनाः यही आज का सबसे अहम कार्यभार है। इस कार्यभार को पूरा करने में युवाओं और छात्रों की विशेष और पहलकारी भूमिका की ज़रूरत है। क्या हम इतिहास के इस आह्वान का जवाब नहीं देंगे?

भ्रष्टाचार-मुक्त सन्त पूँजीवाद के भ्रम को फैलाने का बेहद बचकाना और मज़ाकिया प्रयास

ऐसी तमाम प्रयास पूँजीवादी व्यवस्था और समाज में बीच-बीच में होते ही रहते हैं। जब-जब पूँजीवादी व्यवस्था अपनी नंगई और बेशरमी की हदों का अतिक्रमण करती हैं, तो उसे केजरीवाल और अण्णा हज़ारे जैसे लोगों की ज़रूरत होती है, तो ज़ोर-ज़ोर से खूब गरम दिखने वाली बातें करते हैं, और इस प्रक्रिया में उस मूल चीज़ को सवालों के दायरे से बाहर कर देते हैं, जिस पर वास्तव में सवाल उठाया जाना चाहिए। यानी कि पूरी पूँजीवादी व्यवस्था। आम आदमी पार्टी का घोषणापत्र भी यही काम करता है। यह मार्क्स की उसी उक्ति को सत्यापित करता है जो उन्होंने ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ में कही थी। मार्क्स ने लिखा था कि पूँजीपति वर्ग का एक हिस्सा हमेशा समाज में सुधार और धर्मार्थ कार्य करता है, ताकि पूँजीवादी व्यवस्था बरक़रार रहे।

वियतनाम युद्ध और ओबामा के झूठ

वियतनाम युद्ध अमेरिकी साम्राज्यवादियों की सबसे बुरी यादों में से एक है। यह पूरे अमेरिकी जनमानस के लिए एक सदमा था जिसमें पहली बार साम्राज्यवादी अमेरिका को स्पष्ट तौर पर समर्पण सन्धि पर हस्ताक्षर करना पड़ा और दुम दबाकर भागना पड़ा। इसलिए, अगर अमेरिकी साम्राज्यवादी हमेशा से वियतनाम युद्ध की कड़वी सच्चाइयों को अपने झूठों से ढँकने और उस राष्ट्रीय अमेरिकी शर्म पर पर्दा डालने की कोशिश करते रहे हैं तो इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं है। इन प्रयासों को अंजाम देने वाले राष्ट्रपतियों में मई महीने में अमेरिका “प्रगतिशील” अश्वेत राष्ट्रपति ओबामा का नाम भी शुमार हो गया।

श्री श्री रविशंकर और बाबागीरी का राजनीतिक अर्थशास्त्र

‘भारत एक बाबा-प्रधान देश है!’ यहाँ किसिम-किसिम के बाबा पाये जाते हैं। और हर बाबा के पीछे उनके ‘चेलों’ या ‘भक्तों’ की एक वफ़ादार फौज भी चलती है। चूँकि यहाँ हम एक पूँजीवादी समाज की बात कर रहे हैं, जहाँ हर वस्तु/सेवा एक माल होती है और बाज़ार के लिए पैदा की जाती है। ऐसे में, इस समाज में बाबाओं द्वारा बाँटा गया ‘ज्ञान’ या फिर अपने चेलों-भक्तों के दुखों के निवारण के लिए प्रदान की गई ‘सेवा’ भी एक माल है और इन सभी बाबाओं का भी एक बाज़ार होता है। लेकिन जैसे कि पूँजीवाद में उत्पादित हर माल सबके लिए नहीं होता (जिसकी कूव्वत (यानी कि आर्थिक क्षमता) होती है, वही उसको ख़रीद सकता है, उसका उपभोग कर सकता है), उसी प्रकार बाबाओं द्वारा दी गई ‘सेवा’ भी हर किसी के लिए नहीं होती। सीधे-सपाट शब्दों में कहें तो, बाबाओं का बाज़ार भी वर्ग-विभाजित होता है।

संस्कृति-रक्षकों और धर्म ध्वजाधारियों का असली चेहरा

साम्प्रदायिक फ़ासीवादी ताक़तें या यूँ कहें कि सभी तरह की फ़ासीवादी ताक़तें मिथकों को यथार्थ और ‘कॉमन सेंस’ बनाकर और प्रतिक्रिया की ज़मीन पर खड़े होकर कल्पित अतीत से अपनी राजनीतिक ताक़त और ऊर्जा ग्रहण करते हैं। जर्मनी में नात्सियों ने यही किया और भारत में संघ परिवार और उसके तमाम आनुषंगिक संगठन यही कर रहे हैं। स्त्रियों, दलितों, धार्मिक अल्पसंख्यकों, आदिवासियों और आम ग़रीब आबादी के प्रति इनका फासीवादी रवैया बार-बार हमारे सामने आता है। ये ताक़तें इसे धर्म-सम्मत और संस्कृति-सम्मत बताकर सही ठहराती हैं और अनुशासित और निरन्तरतापूर्ण तरीके से मस्तिष्कों में विष घोलने का काम करती रहती हैं। ये ताक़तें जनता के बीच सतत् मौजूद हैं और इसलिए जनता के तमाम संघर्षों की एकजुटता के लिए नुकसानदेह हैं। इसलिए आज इन संस्कृति-रक्षकों और धर्मध्वजाधारियों के दोगले और पाखण्डी चेहरे को पूरे देश की जनता के सामने बेनक़ाब करने की ज़रूरत है। साथ ही, इन साम्प्रदायिक फ़ासीवादी ताक़तों के खि़लाफ़ समझौताविहीन संघर्ष चलाने की भी उतनी ही ज़रूरत है।

असली इंसाफ़ होना अभी बाकी है!

इस तथ्य को साबित करने के लिए किसी अन्य प्रमाण की ज़रूरत भी नहीं है कि गुजरात नरसंहार के करीब 10 साल बाद भी गुजरात के नीरो नरेन्द्र मोदी-समेत तमाम धर्म-ध्वजाधारियों और फासीवादियों पर कोई आँच तक नहीं आयी है। इस देश की न्यायिक व्यवस्था आज भी शेक्सपीयर के पात्र हैमलेट की भाँति ‘मोदी को चार्जशीट किया जा सकता है या नहीं’ की ऊहापोह में फँसी हुई है। ये तथ्य स्वयं ही पूँजीवादी न्याय व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़ा करने के लिए पर्याप्त हैं। यह दीगर बात है कि अगर मोदी के खि़लाफ़ आरोप-पत्र दायर हो भी जाता है तो ये पूरी न्यायिक प्रक्रिया इतनी लम्बी, टेढ़ी-मेढ़ी और थकाऊ होगी कि इस पूरे मामले में ही ज़्यादा कुछ नहीं हो पायेगा। जब तक पूँजीवाद रहेगा, समाज में साम्प्रदायिकता और राजनीति में उसके उपयोग की ज़मीन भी बनी रहेगी। गुजरात जैसे नरसंहार होते रहेंगे, लोगों की जानें इसकी भेंट चढ़ती रहेंगी और मोदी जैसे लोग बेख़ौफ़ कानून को अँगूठा दिखाते हुए खुलेआम आज़ाद घूमते रहेंगे। इसलिए ऐसी व्यवस्था से सच्चे न्याय की उम्मीद करना ही बेमानी है।

फिर से मुनाफ़े की हवस की भेंट चढ़े सैंकड़ों मज़दूर

शराबखोरी पूँजीवादी समाज का एक यथार्थ है। लेकिन हर सामाजिक बुराई की तरह यह निर्वात में अस्तित्वमान नहीं है। शराबखोरी पूँजीवाद-जनित सामाजिक बुराई है। गरीब, मजदूर जो महँगी अंग्रेजी शराब खरीदने की कूव्वत नहीं रखते, वे अवैध तरीके से बनाई जाने वाली देसी शराब पीते हैं और इसलिए प्रायः ऐसे हादसों का शिकार वही होते हैं। अमीरी और गरीबी की खाई जो पूँजीवाद पैदा करता है वह इसके बाज़ारों में भी प्रतिबिम्बित होता है। इसलिए उपभोक्ता वस्तुओं से लेकर संगीत, फिल्मों आदि तक के क्षेत्र में हर हमेशा दो बाज़ार मौजूद होते है। जाहिरा तौर पर एक ऐसी व्यवस्था जिसमें आम बहुसंख्यक आबादी का श्रम और जीवन कौड़ियों के मोल बिकता हो, उनके लिए बाज़ार में मिलने वाली वस्तुएँ भी मिलावटभरी, सस्ती, घटिया और नकली होंगी। महँगी, अच्छी ब्राण्डों की शराब पीने से कोई नहीं मरता! इसलिए शराबखोरी में ऐसे हादसों का कारण तलाशना सच्चाई से मुँह चुराना है। जब तक इतिहास की सबसे बड़ी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय बुराई, यानी पूँजीवाद का अन्त नहीं होता तब तक इससे उपजी तमाम बुराइयों का भी ख़ात्मा सम्भव नहीं हैं।

नार्वे के नरसंहार की अन्तःकथा

इस घटना ने एक बार फिर इस इतिहाससिद्ध तथ्य को फ़िर पुख़्ता किया है कि मज़हबी, नस्ली और सांस्कृतिक कट्टरपंथी आर्थिक कट्टरपंथ की ही जारज औलादें है। इतिहास और वर्तमान दौर में भी फ़ासीवादी ताक़तों के उभार ने यही साबित किया है।

एस-बैण्ड घोटाला: सारे घोटालों का नया सरदार!

एक ऐसे समाज में जहाँ हर काम को करने की प्रेरक शक्ति निजी मुनाफ़ा और लालच हो, वहाँ विज्ञान और वैज्ञानिक अनुसन्धान भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं रह सकते। एस-बैण्ड स्पेक्ट्रम घोटाले ने इसी बात को एक बार फिर रेखांकित किया है। जहाँ विज्ञान और तकनोलॉजी का मकसद ही मानव जीवन की बेहतरी न होकर निजी कम्पनियों का मुनाफ़ा हो वहाँ पर इसरो जैसा स्वच्छ छवि वाला संस्थान भी भ्रष्टाचार के कलंक से अछूता नहीं रह सकता।