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दिल्ली विश्वविद्यालय में दिशा छात्र संगठन का सहायता केन्द्र

दिल्ली विश्वविद्यालय में लगातार जनवादी अधिकारों को कम करने की प्रक्रिया के इस नए कदम ने दिखा दिया कि जब भी नौजवान समाज को बदलने की दिशा में सोचना शुरू करते हैं तो शासक वर्ग अपने तमाम हथियारों पुलिस-प्रशासन, न्याय-व्यवस्था के दम पर उन्हें दबाता है। दिशा छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं ने बाद में कला-संकाय के अन्दर ‘मे आई हेल्प यू’ के बिल्ले लगाकर, खड़े होकर छात्रों को सहायता देना शुरू किया। सहायता व परामर्श के अलावा संगठन के कार्यकर्ताओं ने छात्रों के बीच स्वागत पुस्तिका भी वितरित की जिसमें बताया गया है कि आज भारत के विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए योग्य और सक्षम आबादी का सिर्फ 7 प्रतिशत हिस्सा कैम्पसों तक पहुँचा पाता है। बाकि 93 प्रतिशत नौजवानों बारहवीं के बाद कुछ तकनीकी शिक्षा लेकर कुशल मज़दूर बन जाते हैं, जो वह तकनीकी शिक्षा भी नहीं ले पाते वे अर्द्धकुशल या अकुशल मज़दूरों की जमात में शामिल हो जाते हैं और जो कोई भी काम पाने में असफल रहते हैं वे करोड़ों बेरोज़गारों की रिज़र्व आर्मी का हिस्सा बन जाते हैं। कई आर्थिक अनुसन्धान संस्थानों के मुताबिक इस समय देश मे 25 से 30 करोड़ लोग बेरोज़गार है जिनमें से 5 करोड़ शिक्षित बेरोज़गार है। सरकार उच्च शिक्षा को लगातार निजी हाथों में सौंपकर उसे आम घरों से आने वाले लड़के-लड़कियों की पहुँच से दूर कर रही है।

लिंगदोह समिति का सच सामने है और हमारे कार्यभार भी…

कुल मिलाकर यह पूँजीपति शासक वर्ग की एक साज़िश है कि व्यापक छात्र आबादी का विराजनीतिकरण कर दिया जाय, कैम्पस को क्रान्तिकारी छात्र राजनीति से बचा कर रखा जाय, छात्र राजनीति को कुछ दिखावटी नियमों के पालन के साथ विधायक–सांसद बनने का प्रशिक्षण केन्द्र बने रहने दिया जाय और क्रान्तिकारी शक्तियों को कैम्पस के भीतर पैठने न दिया जाय ।

गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति की छात्र–विरोधी काली करतूतें

गोरखपुर विश्वविद्यालय पिछले कई वर्षों से अराजकताओं और अव्यवस्थाओं तथा भ्रष्टाचार का अड्डा बना हुआ है । शिक्षा का स्तर गर्त में चला गया है । हर छह महीने साल भर पर कुलपति बदलते रहते हैं । इन्हीं अव्यवस्थाओं के बीच इस सत्र में स्थायी कुलपति एन.एस. गजभिए की नियुक्ति हुई जो आई.आई.टी. कानपुर से आये हैं । जिससे छात्रों, कर्मचारियों तथा शिक्षकों को उम्मीद बँधी थी कि विश्वविद्यालय की तस्वीर बदलेगी । और कुलपति ने भी कहा कि हम विश्वविद्यालय को नयी ऊँचाई और पहचान दिलायेंगे । लेकिन सभी की आशाओं पर कुठाराघात करते हुए दो ही महीने के अन्दर कुलपति के एकतरफा और निरंकुश निर्णयों की बाढ़ सी आ गयी । नये सत्र की शुरुआत के पहले ही छात्रावासों को मरम्मत के नाम पर जबरिया खाली करा लिया गया । जिसमें न ही किसी छात्र से और न किसी कर्मचारी या छात्रावास प्रतिनिधियों से राय–मशविरा किये बिना एकतरफा तरीक़े से छात्र आन्दोलन के बावजूद पुलिस और पीएसी के बल पर छात्रावास खाली कराये गये । अब छात्रावास में मेस भी अनिवार्य कर दिया गया है । पूर्वांचल में ग़रीब तथा आम घरों से आने वाले जो छात्र पहले 500–600 रुपये में अपना खर्च चला लेते थे, अब एक हज़ार रुपया मासिक दे कर सड़ा–गला तथा अधपका खाना खायेंगे । यह सब करते वक़्त छात्र हित से ज़्यादा ठेकेदार हित हावी था

छात्रों के जनवादी अधिकारों पर एक ख़तरनाक हमला

कहने के लिए लिंगदोह कमेटी के सुझावों का मक़सद छात्र राजनीति की सफाई करना है और उसे राजनीतिक कुरीतियों से बचाना है। लेकिन दरअसल यह छात्र राजनीति को साफ करने के नाम पर साधारण छात्रों की व्यापक आबादी को राजनीति से दूर करने की साजि“श है। यह छात्रों के जनवादी अधिकारों पर हमला है। जिस तरह लोकसभा और विधानसभा चुनावों में आचार संहिता का तमाम चुनावी पार्टियों और अपराधी उम्मीदवारों के लिए कोई मतलब नहीं है और आचार संहिता के प्रावधानों से बच निकलने के चोर रास्ते तलाश लिये जाते हैं, उसी तरह छात्र संघ चुनावों में भी ये सुझाव छात्र राजनीति को तो साफ नहीं कर पायेंगे, हाँ, छात्रों के वास्तविक प्रतिनिधियों के लिए छात्र संघ के मंच का इस्तेमाल कर पाना जरूर थोड़ा और मुश्किल बना देंगे। और यही इन सिफारिशों का असली मक़सद भी है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में पुलिस दमन के विरोध में छात्रों का जोरदार आन्दोलन

लेकिन इस आंशिक विजय के बावजूद अच्छी बात यह रही कि सारे चुनावबाज इस क्रम में पूरी तरह बेनकाब हो गये और आम छात्रों के बीच उनकी काफी लानत–मलामत हुई। इस आन्दोलन की विजय इस बात में निहित नहीं है कि सारी माँगें पूरी हुईं या नहीं हुईं। इसके विजय की असली कसौटी यह थी कि- (1) कोई भी पुलिस अधिकारी अब ऐसी हरकत करने से पहले सौ बार सोचेगा; (2) छात्रों की निगाह में दलाल चुनावबाज छात्र संगठनों का चरित्र बिल्कुल साफ हो गया। दिशा छात्र संगठन को मानसरोवर के छात्रों का पूरा समर्थन मिला।

कैम्पसों में सिमटते जनवादी अधिकार

कहीं भी कोई व्याख्यान, नाटक, म्यूजिक कंसर्ट, गोष्ठी आदि का आयोजन करने के लिए इतने चक्कर लगवाये जाते हैं कि आप वहाँ ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन का विचार ही त्याग दें। इनकी जगह अण्डरवियर की कम्पनियों की वैन, फैशन शो, जैम सेशन और इस तरह की गतिविधियों को आयोजित करवाने का काम स्वयं छात्र संघ में बैठे चुनावबाज करते हैं। इस तरह से कैम्पस का विराजनीतिकरण (डीपॉलिटिसाइजेशन) करने की एक साजिश की जा रही है। इसकी वजह यह है कि ऊपर बैठे हुक्मरान डरते हैं। उन्हें डर है कि अगर कैम्पस में इतना जनवादी स्पेस होगा तो उसका इस्तेमाल क्रान्तिकारी ताक’तें छात्रों को एकजुट, गोलबन्द और संगठित करने में कर सकती हैं। तो जनवादी अभिव्यक्ति की जगहों को ख़त्म किया जा रहा है और पुलिस का आतंक छात्रों के दिल में बैठाया जा रहा है। जनतंत्र के नाम पर छात्र संघ तो है ही! वहाँ किस तरह की राजनीति होती है यह किसी से छिपा तथ्य नहीं है। वैसी राजनीति की तो सत्ता पर काबिज लोगों को जरूरत है। वे छात्र राजनीति को अपने जैसी ही भ्रष्ट, दोगली और अनाचारी राजनीति की नर्सरी के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। इस काम में बाधक क्रान्तिकारी राजनीतिक शक्तियों का गला घोंटने के लिए ही तरह–तरह के नियम–क़ायदे–क़ानूनों की आड़ में जनवादी स्पेस को सिकोड़ा और जनवादी अधिकारों का धीरे–धीरे हनन किया जा रहा है। जिम्मेदार क्रान्तिकारी छात्र शक्तियों को इस साजिश को समझना होगा और इसे नाक़ाम करना होगा।