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ओअक्साका शिक्षकों का संघर्ष: जुझारूपन और जन एकजुटता की मिसाल

नागरिक और शिक्षकों की मजबूत एकता का लम्बा इतिहास सत्ता के लिये बिना शक  चुनौती है। निजीकरण, नवउदारवाद और खुले बाज़ार की नीतियों को धड़ल्ले  से लागू करने के लिये इस एकता को समाप्त करना सत्ता की  प्राथमिक आवश्यकता थी क्योंेकि यह एकजुटता सत्ता  के शोषण और दमन के विरुद्ध मजबूत दीवार की तरह आज तक खड़ी रही है। सत्ता द्वारा नियोजित चौकसी की ठण्डी हिंसा राज्यों द्वारा प्रायोजित उग्र हिंसा के काल में बर्बरता को बहुत हद तक मान्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। लेकिन शिक्षकों और नागरिकों के बीच दरार पैदा करने की तमाम कोशिशों के बावजूद; मुख्य मीडिया और सोशल मीडिया पर बदनाम करने के धुआँधार अभियान के बावजूद; पूँजीवादी सत्ता द्वारा लोहे के हाथों से लागू नवउदारवाद और निजीकरण की नीतियाँ  शोषित जनता को साथ ले आती है।

ग्वाटेमाला की जनता के संघर्षों के सहयोद्धा और जीवन के चितेरे कवि : ओतो रेने कास्तिय्यो

एक योद्धा कवि अपनी मिट्टी, अपने लोगों के लिए अन्तिम साँस तक लड़ता रहा। एक बेहतर, आरामदेह ज़िन्दगी जीने के तमाम अवसर मौजूद होने के बावजूद उसने जनता का साथ चुना और आख़िरी दम तक उनके साथ ज़िन्दगी को खूबसूरत बनाने के लिए लड़ता हुआ शहीद हो गया।

फासीवादी हमले के विरुद्ध ‘जेएनयू’ में चले आन्दोलन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवाल

कोई भी आन्दोलन जब व्यक्ति केन्द्रित होता है या ‘से‍क्टेरियन’ राजनीति का शिकार होता है तो अपनी तमाम उर्वर सम्भावनाओं के बावजूद वह सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक प्रतिरोध के तौर पर प्रभावी होने की क्षमता खो बैठता है। वह आन्दोलन किसी धूमके‍तु की तरह आकाश में बस चमक कर रह जाता है। कुछ लोगों या संगठनों के नाम अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियाँ बनते हैं और फ़िर वे इन्हें अपने-अपने फायदे के अनुसार भुनाते हैं। व्यापक राजनीति‍ के साथ यह धोखाधड़ी और मौकापरस्ती इतिहास के इस कठिन दौर में जब फासीवाद इस कदर समाज पर छा रहा है और पूरी दुनिया में प्रतिक्रियावाद और कट्टरपन्थ का दौर है, बेहद महँगा साबित होने जा रहा है।

पेरिस पर आतंकी हमला : आदमखोर साम्राज्यवाद की कीमत चुकाती जनता

फ्रांस वह पहला देश है जिसने फ़िलिस्तीन के समर्थन में होने वाले प्रदर्शनों पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। इस प्रतिबन्ध के बावजूद जनता सड़कों पर उतरती है और उन्हें पुलिस के अत्याचारों को झेलना पड़ता है। कुछ दिनों पहले फिलिस्तीन पर चल रहे इज़राइल के हमले, वहाँ की ज़मीन पर अवैध कब्जे और मासूम बच्चों की मौत के ख़िलाफ़ शान्तिपूर्ण विरोध और बी.डी.एस. (बाईकॉट, डाइवेस्टमेंट और सैंक्शन) का समर्थन कर रहे 12 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। इतना ही नहीं फ्रांस के उच्चतम न्यायालय ने बी.डी.एस. का समर्थन कर रहे इन 12 कार्यकताओं के ख़िलाफ आपराधिक सज़ा को सही ठहराया। इन कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ भेदभाव प्रतिरोध क़ानून लगाया गया। इनका दोष इतना था कि ये टी-शर्ट पहन कर जिस पर बी.डी.एस. और ये लोग “लांग लिव पैलेस्टाइन, बायकॉट इज़रायल!” लिखा था, शान्तिपूर्वक तरीके से ‘सुपरमार्केट’ में लोगों के बीच अपना परचा बाँट रहे थे। परचे में लिखा थाः ‘इजराइल के उत्पादों को खरीदने का अर्थ होगा गाज़ा में अपराधों को वैध करार देना!’ इस अपराध के लिए उनपर मुकदमा चला और उन्हें 50,000 डॉलर जुर्माना भरना पड़ा। इस सज़ा ने बी.डी.एस. को अन्तरनिहित रूप से भेदभावपूर्ण बताया। यह घटना फ्रांस का इज़राइल को खुला समर्थन नहीं तो और क्या दर्शाती है? यदि रूस, ईरान या सूडान के प्रति बहिष्कार का कोई आन्दोलन हो तो वह फ्रांस में मान्य है लेकिन इज़रायल के ख़िलाफ कोई भी आवाज़ भेदभावपूर्ण करार दे दी जाती है जिसकी तुलना यहूदी-विरोध से की जाती है।

शार्ली एब्दो और बोको हरम: साम्राज्यवादी ताक़तों का दुरंगा चरित्र

हर तरह के धार्मिक कट्टरपन्थ का इस्तेमाल उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों, जनान्दोलनों और जन संघर्षों को कमज़ोर करने, बाँटने और विसर्जित करने के लिए करता आया है। साम्राज्यवाद द्वारा धार्मिक कट्टरपन्थ के व्यवस्थित इस्तेमाल की शुरूआत हमें आज से सौ वर्ष पहले ‘साइक्स-पीको’ समझौते और दूसरे विश्व युद्ध के बाद ट्रूमैन डॉक्ट्रिन के काल से देखनी चाहिए जिसके अनुसार यूरोपीय-अमेरिकी शक्तियाँ और प्रतिक्रियावादी खाड़ी के राजशाहियों और अमीरों द्वारा अरब विश्व में इस्लामी दक्षिणपन्थी ताक़तों को हथियार के तौर पर तैयार करने की योजना थी ताकि कम्युनिज़्म के प्रेत और धर्मनिरपेक्ष अरब राष्ट्रवाद के बढ़ते ख़तरे को रोका जा सके। अमेरिकी राष्ट्रपति डीवाइट डी. आइजेनहावर ने व्हाइट हाउस के हॉल में मुस्लिम ब्रदरहुड के नेताओं का स्वागत किया था। अमेरिकी कूटनीतिज्ञ और इण्टेलिजेंस सेवाओं ने दशाब्दियों तक ‘जेहादियों’ से लेकर नरमपन्थी इस्लामी समूहों को बढ़ावा दिया। अमेरिका के नेतृत्व में ही कम्युनिज़्म के ख़िलाफ़ अफ़गान जेहादियों पर भी खाड़ी की राजशाहियों और अमीरों ने ख़ज़ाने लुटाये। विश्व भर से जेहादी अफ़गान पहुँचने लगें। यह अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर का राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रेजेंस्‍की ही था जिसने एक लाख से ज़्यादा जिहादियों के सामने अफ़गानिस्तान के वाम धड़े की सरकार के ख़िलाफ़ और सोवियत संघ को युद्ध में उलझाने के लिए खैबर दर्रे की एक पहाड़ी पर खड़ा हो एक हाथ में बन्दूक और दूसरे हाथ में कुरान लिए ऐलान किया था ‘ये दोनों तुम्हें आज़ाद करेगें!’ राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने अफ़गान मुजाहिद्दीन के नेताओं का स्वागत व्हाइट हाउस में किया था और कहा था कि ‘ये हमारे राष्ट्र के संस्थापकों के नैतिक समतुल्य हैं’। गुलबुद्दीन हिकमतयार जैसे जेहादी भाड़े के टट्टुओं को वाशिंगटन और जेफ़रसन के महान व्यक्तित्व तक ऊँचा उठाया गया!

मिगेल एरनानदेस – एक अपूर्ण क्रान्ति का पूर्ण कवि

मिगेल के जीवन के अन्तिम दिन ज़्यादातर जेल की सलाखों के पीछे बीते। लेकिन सलाखों के बाहर भी ज़िन्दगी क़ैद थी। इन अँधेरे दिनों के गीत मिगेल ने अपनी कविताओं में गाए हैं। ये कविताएँ उन अँधेरे, निराशा, हताशा, विशाद और मायूसी भरे दिनों की कविताएँ हैं जो अँधेरे समय का गीत गाती हैं। ऐसी ही एक कविता है नाना दे सेबोया (प्याज़ की लोरी)। मिगेल की पत्नी ने उसे जेल में चिट्ठी भेजी और उसे बताया कि घर में खाने को कुछ भी नहीं है सिवाय प्याज़ और ब्रेड के। मिगेल का एक छोटा बेटा था, मिगेल ने जेल से अपने बेटे के लिए यह लोरी लिखी थी

दुनिया में एक अरब लोग भुखमरी के शिकार!

क्या यह चौंका देने वाला आँकड़ा नहीं है कि दुनिया भर में भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या 96.3 करोड़, या कहें कि लगभग 1 अरब है। यह संख्या पूरी विश्व की आबादी का 14 प्रतिशत है। यह सिर्फ़ आँकड़े नहीं हैं; हर गिनती के पीछे एक हाड़-मांस का इंसान खड़ा है जो इंसान होते हुए भी इंसानियत की ज़िन्दगी नहीं जी रहा है। खून-पसीना बहाकर भी, हडि्डयों को गलाकर भी उसे और उसके बच्चों को दो जून की रोटी तक नहीं नसीब होती। मिलती है तो भुखमरी और मौत।

बाढ़ : मानव–जनित आपदा नहीं, व्यवस्था–जनित आपदा

1954 में गठित गंगा आयोग की ऐसी कई बहुउद्देशीय योजनाओं की सिफ़ारिश की थी जिससे कोसी के नकारात्मक पहलुओं को सकारात्मक कारकों में बदला जा सकता था । ऐसी ही एक योजना थी ‘जलकुण्डी योजना’ जिसके तहत नेपाल में बांध बना कर इस नदी के द्वारा लाए जा रहे सिल्ट (गाद) को वहीं रोक दिया जाना था और इस बांधों पर विद्युत परियोजनाएं लगाने की योजना थी । इसका लाभ दोनों ही देश, नेपाल और भारत उठाते । लेकिन इन योजनाओं को कभी अमल में नहीं लाया गाया । तब इस योजना की लागत 33 करोड़ थी और आज यह इसकी लागत 150 करोड़ से है तब भी बाढ़ नियंत्रण पर पानी की तरह बहाए जाने वाले करोड़ों रुपयों से कम है । कुछ पर्यावरणविद नदियों पर बनाए जा रहे बांधों के विरोधी हैं, तकनोलॉजी को अभिशाप मानते हैं और ‘बैक टू नेचर’ का नारा देते हैं । लेकिन तकनोलॉजी अपने आप में अभिशाप नहीं होती । यह इसपर निर्भर करता है कि इसका इस्तेमाल किस लिये किया जा रहा है । एक मुनाफ़ा–केन्द्रित व्यवस्था में बड़े बांध अभिशाप हो सकते हैं । लेकिन एक मानव–केन्द्रित व्यवस्था में यह वरदान भी साबित हो सकते हैं ।

रिलायंस द्वारा आन्ध्र प्रदेश में पर्यावरण की घातक तबाही

पर्यावरण एक ऐसी व्यवस्था में ही बचाया जा सकता है जहाँ मनुष्य न तो पर्यावरण का स्वामी या व्यापारी होता है और न ही उसका गुलाम। पर्यावरण एक ऐसी व्यवस्था में ही बचाया जा सकता है जहाँ मुनाफ़ा केन्द्र न हो और मानव समाज पर्यावरण के साथ सामंजस्य और साहचर्य में रहता हो।

इस व्यवस्था को जितनी जल्दी हो सके दफन कर देना होगा

100 जिन्दगियों ने जहरीली गैस और उफनते पानी में घुट–घुटकर दम तोड़ दिया। कोई सेना या पुलिस उनकी मदद के लिए नहीं पहुँची। मीडिया को इसमें कोई सनसनी, कोई मसाला नहीं मिला। इसीलिए इसकी ख़बर अख़बारों के कोनों भर में दबकर रह गई। 1 अगस्त को पुरुलिया जिला के गंगटिकुली नामक जगह में एक बन्द कोयला खदान में 100 से ज़्यादा मजदूर, 180 फुट नीचे पानी और जहरीली गैस में फँस गये और समय रहते उनके पास मदद न पहुँचने के कारण उन सबकी मौत हो गयी। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि इस व्यवस्था में मजदूरों और आम मेहनतकश आबादी के जीवन का कोई मोल नहीं। उसका मोल केवल तब तक है जब तक वह पूँजीपतियों के लिए मुनाफा बटोरने के लिए अपना हाड़–मांस गलाती रहे और ऐसा करते–करते वह मर भी जाये तो क्या फर्क पड़ता है ? मजदूर तो मरते ही रहते हैं और उनके जीवन का मतलब ही क्या है अगर वह धन्नासेठों की तिजोरियाँ भरने के लिए नहीं है! यह है इस व्यवस्था में मजदूरों और मेहनतकशों के जीवन का मोल।