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यहाँ सिर्फ़ ‘पेड न्यूज़’ नहीं, बल्कि मीडिया ही पूरी तरह पेड है

यह तो तय है कि जैसे-जैसे मीडिया पर बड़ी पूँजी का शिंकजा कसता जायेगा, वैसे-वैसे मीडिया का चरित्र ज़्यादा से ज़्यादा जनविरोधी होता जायेगा और आम जनता के जीवन की वास्तविक परिस्थितियों और मीडिया में उनकी प्रस्तुति के बीच की दूरी बढ़ती ही जायेगी। आज के दौर में कारपोरेट लोग मीडिया को विज्ञापन देते हैं जिनसे मीडिया की हर साल लगभग 18 हज़ार करोड़ रुपयों की कमाई होती है। सरकारी विज्ञापनों से, काग़ज़-कोटे में मिलने वाली कमाई तो है ही। ऐसे में मीडिया जगत की पक्षधरता के बारे में भ्रमित होने की ज़रूरत नहीं है। मौजूदा मीडिया कारपोरेट जगत का मीडिया है और उसकी आलोचना नहीं करता है। साफ़ है जो जिसका खायेगा, उसी के गुण गायेगा।

यह योजना महज चुनावी कार्यक्रम नहीं बल्कि व्यापारियों का मुनाफा और बढ़ाने की योजना है

यह बात सही है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी.डी.एस.) में कई कमियाँ हैं। सबसे बड़ी कमी है ग़रीबी रेखा का निर्धारण ही सही तरीके से नहीं किया गया है। मौजूदा ग़रीबी रेखा हास्यास्पद है। उसे भुखमरी रेखा कहना अधिक उचित होगा। पौष्टिक भोजन के अधिकार को जीने के मूलभूत संवैधानिक अधिकार का दर्जा दिया जाना चाहिए तथा इसके लिए प्रभावी क़ानून बनाये जाने चाहिए। इसके लिए ज़रूरी है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली का ही पुनर्गठन किया जाए और अमल की निगरानी के लिए जिला स्तर तक प्रशासनिक अधिकारी के साथ-साथ लोकतान्त्रिक ढंग से चुनी गयी नागरिक समितियाँ हों। पर किसी पूँजीवादी व्यवस्था से ऐसी उम्मीद कम ही है; भारत समेत पूरी दुनिया जिस आर्थिक मंदी से गुज़र रही है ऐसे समय में ऐसी नीतियों का बनना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इस देश के आम लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा को सही मायने में लागू करवाने के लिए छात्र-नौजवानों और नागरिकों का दायित्व है कि ऐसी योजनाओं की असलियत को उजागर करते हुए देश की जनता को शासक वर्ग की इस धूर्ततापूर्ण चाल के बारे में आगाह करें जिससे कि एक कारगर प्रतिरोध खड़ा किया जा सके।

शिक्षा में आरक्षण जनता को बाँटने की साजिश है! एकसमान व निःशुल्क स्कूल व्यवस्था का नारा आज की ज़रूरत है!

सभी परिवर्तकामी नौजवानों को अपने संगठनों के ज़रिये यह माँग उठानी चाहिए कि भारत के सभी बच्चों को, चाहे वे किसी भी वर्ग, क्षेत्र, जाति या धर्म के हों, एकसमान स्कूल प्रणाली मिलनी चाहिए। यही आज के दौर में एक सही इंक़लाबी माँग हो सकती है। अन्य सभी माँगें, मिसाल के तौर पर, निजी स्कूलों में आरक्षण आदि की माँग से फौरी तौर पर भी कोई लाभ नहीं मिलता। उल्टे नुकसान ही होता है। इसलिए शासक वर्ग के इस ख़तरनाक ट्रैप में फँसने की बजाये हमें एकसमान स्कूल व्यवस्था की माँग करनी चाहिए। उच्च शिक्षा को बहुसंख्यक आबादी से दूर करते हुए तमाम सरकारें यही कारण बताती हैं कि वे इससे बचने वाले धन को प्राथमिक शिक्षा में निवेश करेंगी। यदि वाकई ऐसा है तो सरकार से यह माँग की जानी चाहिए कि वह सभी बच्चों को निशुल्क, स्तरीय और एकसमान स्कूल शिक्षा दे और सभी क्षेत्रों के बच्चों को उनकी भाषा में पढ़ने का अधिकार मुहैया कराये।

‘‘स्‍वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव’’ की असलियत

पूँजीवादी जनतन्त्र के खेल में चुनाव आयोग की भूमिका महज़ एक रेफरी की ही होती है। इस खेल में शामिल होने की जो शर्त है, जो नियम और तौर-तरीके हैं उसके चलते ग़रीब मेहनतकश जनता तो इस खेल में खिलाड़ी के रूप में शामिल हो ही नहीं सकती है (और उसे इस खेल में शामिल होने की कोई दरकार भी नहीं है!)। वह इस खेल में महज़ एक मोहरा या अधिक से अधिक मूकदर्शक ही होती है। एक अच्छे रेफरी के बतौर चुनाव आयोग की भूमिका बस इतनी होती है कि खिलाड़ी ‘फाउल’ न खेले जिससे खेल में दिलचस्पी बनी रहे और मोहरे बिदक न जायें। पिछले कई चुनावों से इस खेल में शामिल खिलाडि़यों के बीच ‘फाउल’ खेलकर ही जीतने की होड़ मची हुई है। इसलिए चुनाव आयोग अति सजग और सक्रिय होने की कोशिश करता है। उसकी चिन्ता रहती है कि कहीं सारा खेल ही चौपट न हो जाये। एक बार अगर यह मान भी लिया जाये कि यह चुनाव वाकई स्वतन्त्र और निष्पक्ष हो जाए तो भी सच्चे मायनों में आम जनता के जनप्रतिनिधि का चुनाव नहीं हो सकता। जिन चुनावों में एक आम आदमी चुनाव में खड़ा होने की हैसियत ही न रखता हो; जहाँ चुनाव में कोई नेता एक बार चुने जाने के बाद जनता का विश्वास खोने पर भी पाँच साल के लिए जनता की छाती पर मूंग दलने के लिए आज़ाद हो; जहाँ विशालकाय निर्वाचक मण्डलों में होने वाले चुनाव अपने आपमें करोड़ों रुपये के निवेश वाला व्यवसाय बन जाते हों, जो कि सिर्फ पूँजी के दम पर लड़े जा सकते हों; जहाँ जनतन्त्र धनतन्त्र पर टिका हो; जहाँ समाज की अस्सी फीसदी आबादी भयंकर ग़रीबी में जीती हो; वहाँ चुनाव प्रणाली को स्वतंत्र; और निष्पक्ष कहा ही नहीं जा सकता है।

मर्डोक मीडिया प्रकरण के आईने में भारतीय मीडिया

168 वर्ष पुराना ब्रिटिश अखबार ‘न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड’ पिछले कुछ महीनों या सालों से नहीं बल्कि एक-डेढ दशक से फिल्मी सितारों, खिलाड़ियों, राजनेताओं और प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन में ताक-झाँक के लिए फोन हैंकिग और ईमेल पढ़ने सहित निजी जासूसों के इस्तेमाल से लेकर पुलिस अफसरों को घूस देने जैसे तमाम गैरकानूनी हथकंडे इस्तेमाल कर रहा था। पत्रकारिता की आड़ में फोन हैकिंग लगभग कारोबार के स्तर पर पहुँच गया है जहाँ उसकी चपेट में ब्रिटिश राजपरिवार से लेकर इराक युद्ध में मारे सैनिकों के परिवारजन, व लंदन बम विस्फोट के पीड़ित तक नहीं बच सके।

और अब ‘एम्स’ की बारी…

मुनाफे के लिए संवेदनहीन होती इस व्यवस्था में स्वास्थ्य संस्थान भी कमाई का एक ज़रिया बन जाये तो इसमें आश्चर्य कैसा? पूँजीवादी व्यवस्था की तो नियति ही यही है। अगर हमें स्वास्थ्य या अन्य बुनियादी ज़रूरतों को आमजन के लिए सुलभ बनाना है, तो हमें इस बीमार व्यवस्था का इलाज ढूँढ़ना ही होगा।

दवा उद्योग का घिनौना सच!

क्या डाक्टरों की यह संस्था इस तथ्य से इंकार कर सकती है कि ऐसे डाक्टरों की कमी नहीं जो चिकित्सा बाज़ार में बैठकर मुनाफा पीटने की हवस में कसाइयों की तरह ग़रीबों-बेबसों को हलाल करते हैं? झोलाछाप डाक्टरों पर लगाम लगाने के लिए समय-समय पर सरकार से ज़ोरदार माँग करने वाले आईएमए को कभी यह ख़्याल क्यों नहीं आता कि वह सरकारी अस्पतालों के ढाँचे को बेहतर बनाने और जनस्वास्थ्य के समूचे तन्त्र को मज़बूत बनाने के लिए सरकार से माँग करे और ज़रूरत पड़े तो सड़कों पर भी उतरे। असलियत तो यह है कि ज़्यादातर सरकारी अस्पतालों में और निजी प्रैक्टिस कर रहे एमबीबीएस, एमडी डाक्टर ही नकली या ग़ैरज़रूरी महँगी दवाओं से मरीज़ों की पर्ची भर देते हैं।

सूचना का अधिकार : एक कागजी हथियार

वैसे भी सूचना अधिकार कानून बनाने की मंशा सरकार की इसलिए नहीं थी कि व्यवस्था को भ्रष्टाचार–मुक्त और पारदर्शी बनाया जाए। बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था के पैरोकार समय–समय पर ऐसे कुछ कदम उठाते रहते है जो भ्रष्टाचार पर रोक लगाने और राजनीतिक–प्रशासनिक ‘‘सुधार’’ का काम करते हैं, ताकि जनता का विश्वास इस व्यवस्था में बना रहे। वास्तव में सूचना के अधिकार का कानून एक ऐसा अधिकार है जो देश की जनता को दशकों पहले मिल जाना चाहिए था। भारत में मौजूद पूँजीवादी व्यवस्था लोगों को सीमित जनवादी अधिकार देती है। अभी भी अगर हम पश्चिमी पूँजीवादी देशों की व्यवस्थाओं से तुलना करें तो कई ऐसे जनवादी अधिकार हैं जो जनता को बहुत पहले ही मिल जाने चाहिए थे। इसलिए सूचना के अधिकार को देकर पूँजीवादी व्यवस्था ने कोई उपकार नहीं किया है। उल्टे इस बात के लिए इसकी आलोचना होनी चाहिए कि यह आज़ादी के लगभग छह दशक बाद क्यों मिला ?

यह आम जनता के प्रतिनिधियों का चुनाव है या कॉरपोरेट जगत की मैनेजिंग कमेटी का!?

सिर्फ़ हिन्दुस्तान में ही नहीं बल्कि लगभग सभी पूँजीवादी देशों में चुनावबाज पार्टियों की पूरी फ़ण्डिंग कॉरपोरेट घरानों के दम पर ही होती है। यानी, जन-प्रतिनिधियों के चुनाव के लिए सारा खर्च ये घराने उठाते हैं। ये इसे अपनी जिम्मेदारी क्यों समझते हैं, यह सहज ही समझा जा सकता है। दूसरी बात जो और भी महत्त्वपूर्ण है कि सभी घरानों ने मिलकर देश की बड़ी पार्टिंयों कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही 50–50 करोड़ रुपए दिए हैं, यानी, इन घरानों की पार्टिंयों को लेकर कोई विशेष पसंद नहीं है। इन्हें दोनों ही सामान्य रूप से स्वीकार्य है। ऐसा होना लाज़िमी भी है क्योंकि इन दोनों पार्टियों में आर्थिक नीतियों को लेकर कोई मतभेद नहीं है। दोनों ही जनता को लूटने वाली भूमण्डलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों पर एक हैं।

कहीं भी नहीं है लहू का सुराग़…

कहीं नहीं है, कहीं भी नहीं लहू का सुराग
नः दस्त-ओ–नाख़ून–ए–कातिल न आस्तीं पेः निशाँ
नः सुर्खी-ए–लब-ए–ख़ंजर , नः रंग-ए–नोक-ए–सनाँ
नः ख़ाक पर कोई धब्बा नः बाम पर कोई दाग़
कहीं नहीं है, कहीं भी नहीं लहू का सुराग़