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लगातार गायब हो रहे बच्चों के कारण मानखुर्द के निवासियों में रोष, किया स्थानीय थाने का घेराव

मानखुर्द, गोवण्डी के इलाके में भी लम्बे समय से बच्चों को गायब करने वाले गिरोह सक्रिय हैं। इलाके से अनेक बच्चों के गायब हो जाने के बावजूद भी पुलिस आज तक किसी गिरोह का पर्दाफाश नहीं कर पायी है। इलाके में नशे का व्यापार करने वाले तमाम गुण्डा गिरोह भी सक्रिय हैं, जिसके कारण लड़कियों के साथ छेड़छाड़ की अनेक घटनाएँ होती रहती हैं।

मुम्बई में 200 से ज़्यादा लोगों की मौत का ज़िम्मेदार कौन

यह भी हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई है कि जब एक मज़दूर को दिन भर हाड़-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है तो साथ ही साथ उसका अमानवीकरण भी होता है और शराब व अन्य व्यसन उसके लिए शौक नहीं बल्कि ज़िन्दगी की भयंकर कठिनाइयों को भुलाने और दुखते शरीर को क्षणिक राहत देने के साधन बन जाते हैं। ऐसे मूर्खों की हमारे समाज में कमी नहीं है जो कहते हैं कि मज़दूरों की समस्याओं का कारण यह है कि वे बचत नहीं करते और सारी कमाई को व्यसनों में उड़ा देते हैं। असल में बात इसके बिल्कुल उलट होती है और वे व्यसन इसलिए करते हैं कि उनकी ज़िन्दगी में पहले ही असंख्य समस्याएँ है। जो लोग कहते हैं कि बचत न करना ग़रीबों-मजदूरों की सभी परेशानियों का कारण होता है उनसे पूछा जाना चाहिए कि जो आदमी 5000-8000 रुपये ही कमा पाता हो वह अव्वलन तो बचत करे कैसे और अगर सारी ज़िन्दगी भी वह चवन्नी-अठन्नी बचायेगा तो कितनी बचत कर लेगा? क्या जो 1000-1500 रुपये एक महीने या कई महीनों में वे व्यसन में उड़ा देते हैं उसकी बचत करने से वे सम्पन्नता का जीवन बिता सकेंगे? यहाँ व्यसनों की अनिवार्यता या फिर उन्हें प्रोत्साहन देने की बात नहीं की जा रही है बल्कि समाज की इस सच्चाई पर ध्यान दिलाया जा रहा है कि एक मानवद्रोही समाज में किस तरह से ग़रीबों के लिए व्यसन दुखों से क्षणिक राहत पाने का साधन बन जाते हैं। इस व्यवस्था में जहाँ हरेक वस्तु को माल बना दिया जाता है वहाँ जिन्दगी की मार झेल रहे गरीबों के व्यसन की जरूरत को भी माल बना दिया जाता है। ग़रीब मज़दूर बस्तियों में सस्ती शराबों का पूरा कारोबार इस जरूरत से मुनाफा कमाने पर ही टिका है। इस मुनाफे की हवस का शिकार भी हर-हमेशा गरीब मज़दूर ही बनते हैं।

25 मार्च की घटना के विरोध में देश के अलग-अलग हिस्सों में आम आदमी पार्टी के विरोध में प्रदर्शन

25 मार्च की घटना के विरोध दिल्ली, पटना, मुम्बई और लखनऊ में विरोध प्रदर्शन हुए। 1 अप्रैल को दिल्ली के वज़ीरपुर औद्योगिक क्षेत्र के मज़दूरों ने ‘दिल्ली इस्पात उद्योग मज़दूर यूनियन’ के नेतृत्व में सैंकड़ों की संख्या में मज़दूरों ने रैली निकाली और इलाके के आप विधायक राजेश गुप्ता का घेराव किया। राजेश गुप्ता मज़दूरों की रैली के पहुँचने के पहले ही पलायन कर गये। इसके बाद मज़दूरों ने उनके कार्यालय के बाहर पुतला दहन किया और फिर वज़ीरपुर औद्योगिक क्षेत्र में आम आदमी पार्टी के पूर्ण बहिष्कार का एलान किया।

यूनीवर्सिटी कम्युनिटी फ़ॉर डेमोक्रेसी एण्ड इक्वैलिटी के नेतृत्व में प्रो. हातेकर के अन्यायपूर्ण निलम्बन के ख़िलाफ़ सफल छात्र आन्दोलन

यूसीडीई (यूनीवर्सिटी कम्युनिटी फ़ॉर डेमोक्रेसी एण्ड इक्वैलिटी) ने प्रो. हातेकर के निलम्बन के विरोध में 6 जनवरी को कलीना कैम्पस, मुम्बई विश्वविद्यालय का गेट जाम करके प्रदर्शन किया, जिसमें बड़ी संख्या में छात्रों ने भाग लिया। इसके बाद 8 जनवरी को एक बड़ा विरोध जुलूस निकाला गया जिसमें सैकड़ों छात्रों ने भागीदारी की। इस जुलूस का आह्वान भी यूसीडीई ने किया था। इसके बाद यूसीडीई ने विश्वविद्यालय के कन्वोकेशन समारोह के दिन 12 जनवरी को मुँह पर काली पट्टियाँ बाँधकर विरोध प्रदर्शन भी किया। इस दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन पर आन्दोलन का दबाव लगातार बढ़ता रहा। इसके बाद आगे का रास्ता तय करने के लिए यूसीडीई ने 15 जनवरी को यूसीडीई की जनरल बॉडी की बैठक बुलायी। इस बैठक में भूख हड़ताल शुरू करने का निर्णय लिया गया। तारीख़ 20 जनवरी तय की गयी। लेकिन इस भूख हड़ताल के शुरू होने के एक दिन पहले ही विश्वविद्यालय ने बढ़ते आन्दोलन को देखकर प्रो. हातेकर का निलम्बन वापस ले लिया। इसके बाद 20 जनवरी को यूसीडीई के नेतृत्व में एक विजय मार्च का आयोजन किया गया।

‘पोलेमिक’ द्वारा मुम्बई में और ‘चिन्तन विचार मंच’ द्वारा पटना में ‘बीसवीं सदी के समाजवादी प्रयोग, पूँजीवादी पुनर्स्थापना और समाजवाद की समस्याएँ’ विषय पर व्याख्यान आयोजित

कोई भी क्रान्तिकारी परिस्थिति स्वयं अपने आप क्रान्ति में परिणत नहीं हो जाती। उसे सही क्रान्तिकारी विचारधारा और कार्यक्रम से लैस एक अनुशासित क्रान्तिकारी पार्टी के रूप में एक क्रान्तिकारी अभिकर्ता या उत्प्रेरक की आवश्यकता होती है। और आज दुनिया भर में कम्युनिस्ट आन्दोलन के समक्ष यही संकट है। इस संकट के समाधान के लिए एक ओर हमें विगत समाजवादी प्रयोगों का एक सही मार्क्सवादी आलोचनात्मक विश्लेषण करना होगा और वहीं दूसरी ओर हमें नवजनवादी क्रान्ति के पुराने पड़ चुके खाँचे से बाहर आकर अपने देश की ठोस परिस्थितियों का ठोस विश्लेषण करना होगा। हमारा देश बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के चीन के समान अर्द्धसामन्ती-अर्द्धऔपनिवेशिक नहीं है, बल्कि एक पिछड़ा हुआ, विशिष्ट प्रकार का उत्तर-औपनिवेशिक पूँजीवादी देश है। यहाँ एक नयी समाजवादी क्रान्ति के कार्यक्रम को अपनाना होगा, जो पूँजीवाद-विरोधी साम्राज्यवाद-विरोधी समाजवादी क्रान्ति होगी। पुराने जड़सूत्रें को छोड़कर और जूते के नाप से पाँव काटने की आदत को छोड़कर ही आज कम्युनिस्ट आन्दोलन अपने संकट से मुक्ति पा सकता है।