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शिवराज उवाच – ”मध्यप्रदेश में फ़ायदेमन्द निवेश के लिए आपका स्वागत है“

मध्यप्रदेश में अब तक 80530 करोड़ के निवेश का नतीजा सामने यह आया है कि जहाँ एक तरफ पूँजीपति संसाधनों का दोहन व मज़दूरों के शोषण से अकूत मुनाफा कमा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आम आबादी के ये हालात हैं कि कुपोषण से ग्रसित कुल बच्चों का प्रतिशत 1998-99 में 53.3 से बढ़कर 2008-09 में 60.3 पहुँच गया है तथा ख़ुद सरकारी आँकड़ों से ही म.प्र. में 12,2416 बच्चे भूख व कुपोषण से दम तोड़ चुके हैं जो कुल बाल आबादी का 60 फीसदी है। यह स्वयं म.प्र. के स्वास्थ्य मन्त्री अनूप मिश्रा का कहना है।

पूँजीवादी न्याय का असली चरित्र

कानून की किताब में कुछ भी लिखा हो, अमीरों के लिए कानून का एक रुख़ होता है और ग़रीबों के लिए दूसरा। कानून के समक्ष समानता की सारी बातें किताबों में दबी रहती हैं। पूँजीवादी न्याय पूँजी के वर्चस्व का ही अंग होता है। इस प्रक्रिया ही ऐसी होती है कि कोई ग़रीब आदमी उस तक पहुँच ही नहीं पाता है। और अमीरों को तो न्याय व्यवस्था उनके दरवाज़े पर आकर न्याय देती है। और सबकुछ बेचने-खरीदने वाली व्यवस्था में न्याय का भी हश्र कमोबेश वैसा ही हो जाता है, जैसे कि किसी भी माल का।

‘‘उभरती अर्थव्यवस्था’’ की उजड़ती जनता

हमारे देश का कारपोरेट मीडिया और सरकार के अन्य भोंपू समय-समय पर हमें याद दिलाते रहते हैं कि हमारा मुल्क ‘‘उभरती अर्थव्यवस्था’’ है; यह 2020 तक महाशक्ति बन जाएगा; हमारे मुल्क के अमीरों की अमीरी पर पश्चिमी देशों के अमीर भी रश्क करते हैं; हमारी (?) कम्पनियाँ विदेशों में अधिग्रहण कर ही हैं; हमारी (?) सेना के पास कितने उन्नत हथियार हैं; हमारे देश के शहर कितने वैश्विक हो गये हैं; ‘इण्डिया इंक.’ कितनी तरक्की कर रहा है, वगैरह-वगैरह, ताकि हम अपनी आँखों से सड़कों पर रोज़ जिस भारत को देखते हैं वह दृष्टिओझल हो जाए। यह ‘‘उभरती अर्थव्यवस्था’’ की उजड़ती जनता की तस्वीर है। भूख से दम तोड़ते बच्चे, चन्द रुपयों के लिए बिकती औरतें, कुपोषण की मार खाए कमज़ोर, पीले पड़ चुके बच्चे! पूँजीपतियों के हितों के अनुरूप आम राय बनाने के लिए काम करने वाला पूँजीवादी मीडिया भारत की चाहे कितनी भी चमकती तस्वीर हमारे सामने पेश कर ले, वस्तुगत सच्चाई कभी पीछा नहीं छोड़ती। और हमारे देश की तमाम कुरूप सच्चाइयों में से शायद कुरूपतम सच्चाई हाल ही में एक रिपोर्ट के जरिये हमारे सामने आयी।

विकास के रथ के नीचे भूख से दम तोड़ते बच्चे

मध्यप्रदेश के मुखमन्त्री शिवराज सिंह चौहान सवेरे नहा–धोकर माथे पर तिलक लगाकर, चमकता सूट डालकर जब साइकिल पर सवार होकर विधानसभा की ओर कूच करते है तो मीडिया की आँखे फटी की फटी रह जाती है कि ये क्या हो गया है ? दुनिया के सबसे बड़े ‘लोकतन्त्र’ के एक प्रदेश का मुख्यमन्त्री साइकिल पर ? गजब की बात भाई! मोटरसाइकिल से, कार से चलने वाले मध्यवर्ग का एक हिस्सा हर्षातिरेक से मुख्यमन्त्री जी के जीवन की सादगी पर लोट–पोट हो जा रहा है। पत्र–पत्रिकाओं के कवर पेज पर और अखबारों आदि में मध्यप्रदेश की सरकार द्वारा छपवाये जा रहे विज्ञापनों से पता चलता है कि मुख्यमन्त्री शिवराज चौहान के नेतृत्व में स्व. प. दीनदयाल अत्ंयोदय उपचार योजना, दीनदयाल रोज़गार योजना, दीनदयाल चलित उपचार योजना, दीनदयाल अंत्योदय मिशन जैसी परियोजनाएँ चल रही है, जिनके केन्द्र में ‘सबसे कमज़ोर’ आदमी है। इन विज्ञापनों में विशेष रूप से यह बात दर्ज़ रहती है कि मध्यप्रदेश की सरकार प. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवतावाद के सिद्धान्त पर चल रही है। इस तरह विज्ञापनों द्वारा बजाये जा रहे ढोल–नगाड़ों के साथ सरकार के मजूबत हाथ ‘कमज़ोर आदमी’ तक पहुँच चुके हैं। लेकिन ज्योंही कुछ सरकारी आँकड़ों की ही थाप पड़ी इस ढोल की पोल खुलने में देर नहीं लगी। तो आइये आँकड़ो और तथ्यों की रोशनी में हम इस ‘एकात्म मानवतावाद’ के फोकस बिन्दु की और उसके नाभिक की सच्चाई को पहचानें।