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प्रधानमंत्री का प्राथमिक शिक्षा पर स्यापा

इसी से जुड़ा प्रश्न है कि बच्चे स्कूल क्यों छोड़ देते हैं ? असल में सामाजिक–आर्थिक व्यवस्था उन्हें स्कूल से बाहर छोड़ आती है । ऐसा नहीं है कि स्कूल छोड़ने वाले बच्चे अपने जीवन में शिक्षा के महत्व को समझते ही नहीं या उनके मां–बाप को शिक्षा से कोई जन्मजात बैर हो । ऐसे ख्याल कई बार खाते–पीते मध्यवर्गीय को खासा मनोरंजन और संतुष्टि देते हैं कि ये लोग तो पढ़ना और आगे बढ़ना ही नहीं चाहते । यह बात भुला दी जाती है कि इन बच्चों और उनके परिवारों के लिए ये व्यवस्था दो जून खाने और रोज कमाने के बीच ज्यादा फासला नहीं छोड़ती । अध्ययनों में भी सामने आया है कि वंचित तबकों के ज्यादातर बच्चे ग्यारह साल की उम्र तक स्कूल से बाहर चले जाते है यह उम्र का वह मोड़ होता है, जहां से एक रास्ता स्कूल की तरफ आगे जाता है और दूसरा परिवार का पेट भरने में हाथ बंटाने की तरफ । और ऐसे में ये बच्चे अगर अपना नाम लिखना भी सीख लेते है तो सरकारी आंकड़ों के हिसाब से ये साक्षर मान लिये जाते हैं ।

शिक्षा व्यवस्था की बलि चढ़ा एक और मासूम

बेहद कम उम्र से ही परीक्षा में अच्छे नम्बर लाने की एक उन्मादी होड़ बच्चों के अन्दर उनके माँ–बाप, शिक्षकों और पूरे समाज के माहौल से पैदा कर दी जाती है। दूसरी–तीसरी कक्षा से ही बच्चे ट्यूशन सेण्टरों का चक्कर काटते नजर आते हैं। इस होड़ में कुछ की नैया तो पार लग जाती है, लेकिन एक भारी आबादी “नाकाबिल” करार दी जाती है। जो पीछे रह जाते हैं उनकी बड़ी आबादी कुण्ठा का शिकार होना शुरू हो जाती है। इनमें से कुछ ऐसे होते हैं जो अवसादग्रस्त होकर आत्महत्या करने जैसा कदम उठा लेते हैं। आख़िर इन मासूम बच्चों की इस स्थिति का जिम्मेदार कौन है ? यह सोचने की बात है। स्कूल में दाखिले के पहले दिन से ही उनके नन्हें कन्धों पर सपनों, आशाओं और आकांक्षाओं का बोझ लाद दिया जाता है। उनके दिमाग में यह बात बैठा दी जाती है कि अगर अव्वल न आए तो कितनी बेइज़्जती होगी, तो पढ़ना बेकार है, बल्कि जीना ही बेकार है। नतीजा यह होता है कि अच्छे नम्बर न ला पाने की सूरत में वे कुण्ठा व अवसाद का शिकार हो जाते हैं और कुछ आत्महत्या तक कर लेते हैं।