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अक्टूबर क्रान्ति शतवार्षिकी समिति द्वारा सोवियत समाजवाद और स्त्रियाँ – एक समकालीन पुनरावलोकन विषय पर पटना में व्याख्यान का आयोजन

बेहद कठिन परिस्थिति में सम्पन्न अक्टूबर क्रान्ति के पहले प्रयोग ने मात्र चार दशकों में स्त्री मुक्ति की यात्रा में जो ऊँचाइयाँ तय की वह आगे भी एक आलोकित शिखर के समान चमकता रहेगा और आने वाली क्रान्तियों को भी दिशा दिखाता रहेगा. अक्टूबर क्रान्ति की शिक्षा हमें बताती है कि पूँजीवादी आर्थिक संरचना को नष्ट किये बिना और समाजवादी समाज की स्थापना के बिना स्त्रियों की वास्तविक मुक्ति हासिल नहीं की जा सकती. इसके लिये स्त्री मुक्ति आन्दोलन को सामाजिक मुक्ति से जोड़ना होगा और सामाजिक आन्दोलन के एजेंडे पर स्त्री प्रश्न को प्रमुखता से स्थान देना होगा. 

पटना में पिंजड़ा तोड़ अभियान की शुरुआत

करीब एक महीने तक चले इस अभियान के तहत अन्त में यूनिवर्सिटी कैंपस में 6 मार्च को एक रैली का आयोजन भी किया गया जिसकी शुरुआत एन आयी टी मोड़ से हुई। ऐन उसी वक़्त जब कुछ लड़कियाँ रैली में शामिल होने आ रही थी कि पटना साइंस कॉलेज परिसर में ही कुछ लड़कों ने उनके साथ बादतमीजी की। इस घटना के जवाब में सारी लड़कियाँ पटना साइंस कॉलेज गेट के सामने इकट्ठी हो गयी व नारेबाज़ी करने लगे। हल्ला सुनकर कुछ ही देर बाद आये कॉलेज प्रिंसिपल ने एक लिखित कम्प्लेंट फाइल देने को कहा। उन्होंने यह तक कहा कि बिना लिखित में दिये वह कोई कार्यवाही नहीं करेंगे! मामले पर अगले ही दिन एक लिखित कम्प्लेंट दायर की गयी। इस घटना पर आक्रोशित लड़कियाँ काफी देर तक साइंस कॉलेज गेट पर जुटी रहीं व नारेबाज़ी करती रहीं। अन्त में रैली पटना कॉलेज गेट पर पहुँची। दोबारा वहाँ सभा की गयी व कुछ गानों और ज़ोरदार नारों के साथ रैली ख़त्म हुई।

कॉलेज प्रशासन के तानाशाहीपूर्ण रवैये के ख़िलाफ़ ‘पटना आर्ट कॉलेज’ के छात्रों का आन्दोलन

लगभग डेढ़ महीने तक प्रशासन और मौजूदा नितीश सरकार चुप्पी साधे रहे और इनके द्वारा आन्दोलन को तोड़ने की कोशिशें होती रही पर छात्र अपनी माँगों को लेकर डटे रहे| आखिर में लगातार हो रहे प्रदर्शन के दबाव में अन्ततः वि.वि. प्रशासन ने निलम्बित छात्रों की अस्थाई वापसी व प्राचार्य को एक महीने की छुट्टी देने का फैसला किया है परन्तु अभी भी कॉलेज में स्थायी प्राचार्य की बहाली नहीं की गयी है|

पटना में स्त्री मुक्ति लीग के द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय स्त्री दिवस के मौके पर कार्यक्रम का आयोजन

106वें अन्तर्राष्ट्रीय स्त्री दिवस के अवसर पर पटना के गाँधी मैदान में 8 मार्च को दिशा छात्र संगठन द्वारा सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में पटना के कई बुद्धिजीवी, नाट्यकर्मी, संवेदनशील, जनवादी और प्रगतिशील नागरिक भी मौजूद रहे।

25 मार्च की घटना के विरोध में देश के अलग-अलग हिस्सों में आम आदमी पार्टी के विरोध में प्रदर्शन

25 मार्च की घटना के विरोध दिल्ली, पटना, मुम्बई और लखनऊ में विरोध प्रदर्शन हुए। 1 अप्रैल को दिल्ली के वज़ीरपुर औद्योगिक क्षेत्र के मज़दूरों ने ‘दिल्ली इस्पात उद्योग मज़दूर यूनियन’ के नेतृत्व में सैंकड़ों की संख्या में मज़दूरों ने रैली निकाली और इलाके के आप विधायक राजेश गुप्ता का घेराव किया। राजेश गुप्ता मज़दूरों की रैली के पहुँचने के पहले ही पलायन कर गये। इसके बाद मज़दूरों ने उनके कार्यालय के बाहर पुतला दहन किया और फिर वज़ीरपुर औद्योगिक क्षेत्र में आम आदमी पार्टी के पूर्ण बहिष्कार का एलान किया।

पटना में दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा द्वारा ‘जन तक कविता-कविता तक जन’ का आयोजन

आम तौर पर यह समझा जाता है कि कविता-कहानी बुद्धिजीवियों के लिए होता है और आम लोग उसे नहीं समझ पाते और ये चीज़ें उनकी ज़द से बाहर हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि कविता समेत सभी स्वस्थ साहित्यिक-सांस्कृतिक माध्यम उत्पादन की कार्रवाइयों से पैदा होते हैं। इन्हें जन्म देने वाली असली शक्ति स्वयं मेहनतकश जनता और आम लोग होते हैं जो रोज़मर्रा की जिन्दगी में रोज़ी-रोटी की जद्दोजहद से दो-चार होते हैं।

‘पोलेमिक’ द्वारा मुम्बई में और ‘चिन्तन विचार मंच’ द्वारा पटना में ‘बीसवीं सदी के समाजवादी प्रयोग, पूँजीवादी पुनर्स्थापना और समाजवाद की समस्याएँ’ विषय पर व्याख्यान आयोजित

कोई भी क्रान्तिकारी परिस्थिति स्वयं अपने आप क्रान्ति में परिणत नहीं हो जाती। उसे सही क्रान्तिकारी विचारधारा और कार्यक्रम से लैस एक अनुशासित क्रान्तिकारी पार्टी के रूप में एक क्रान्तिकारी अभिकर्ता या उत्प्रेरक की आवश्यकता होती है। और आज दुनिया भर में कम्युनिस्ट आन्दोलन के समक्ष यही संकट है। इस संकट के समाधान के लिए एक ओर हमें विगत समाजवादी प्रयोगों का एक सही मार्क्सवादी आलोचनात्मक विश्लेषण करना होगा और वहीं दूसरी ओर हमें नवजनवादी क्रान्ति के पुराने पड़ चुके खाँचे से बाहर आकर अपने देश की ठोस परिस्थितियों का ठोस विश्लेषण करना होगा। हमारा देश बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के चीन के समान अर्द्धसामन्ती-अर्द्धऔपनिवेशिक नहीं है, बल्कि एक पिछड़ा हुआ, विशिष्ट प्रकार का उत्तर-औपनिवेशिक पूँजीवादी देश है। यहाँ एक नयी समाजवादी क्रान्ति के कार्यक्रम को अपनाना होगा, जो पूँजीवाद-विरोधी साम्राज्यवाद-विरोधी समाजवादी क्रान्ति होगी। पुराने जड़सूत्रें को छोड़कर और जूते के नाप से पाँव काटने की आदत को छोड़कर ही आज कम्युनिस्ट आन्दोलन अपने संकट से मुक्ति पा सकता है।

पटना में दो दिवसीय क्रान्तिकारी नवजागरण अभियान

देश के विभिन्न इलाकों में क्रान्तिकारी राजनीति का प्रचार-प्रसार करने और लोगों को संगठित करने की मुहिम में एक और डग भरते हुए, ‘दिशा छात्र संगठन’ और ‘नौजवान भारत सभा’ के कार्यकर्ताओं ने बिहार के पटना जिले में 15 और 16 मार्च को शहीदेआज़म भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के 80वें शहादत दिवस के मौके पर दो दिवसीय क्रान्तिकारी नवजागरण अभियान चलाया।