Tag Archives: नमिता

इतिहास से भयाक्रान्त फासीवादी

भगवे फासीवादी इतिहास से इस कदर डरते हैं कि वे इतिहास को तोड़ -मरोड़ कर पाठ्यक्रमों में बदलाव करके दलितों और औरतों के संघर्षों के इतिहास को भी दबा देना चाहते हैं क्योंकि वह नहीं चाहते कि कोई भी अपने हकों-अधिकारों के प्रति जागरूक हो। यदि ऐसा हो गया तो इन फासीवादियों को कौन बचाएगा ?

‘‘आनर किलिंग’’- सम्मान के नाम पर हत्या या सम्मान के साथ ना जीने देने का जुनून

दरअसल ‘‘सम्मान’’ के नाम पर हत्याओं की यह अमानवीय परिघटना उन्हीं देशों में अधिक है जहाँ बिना किसी जनवादी क्रान्ति के, धीमे सुधारों की क्रमिक प्रक्रिया के जरिये पूँजीवादी विकास हुआ है। इन देशों में पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्ध तो कायम हुए हैं, लेकिन यह पूँजीवाद यूरोपीय देशों की तरह यहां जनवादी मूल्य लेकर नहीं आया। सामाजिक-सांस्कृतिक धरातल पर आज भी यहाँ सामन्ती मूल्यों की जकड़ बेहद मजबूत है। इन देशों (भारत भी इनमें से एक है) के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने में गैरजनवादी मूल्य गहरे रचे-बसे हैं। इसी कारण यहां व्यक्तिगत आज़ादी और निजता जैसी अवधारणाओं के लिए कोई जगह नहीं है। व्यक्ति के जीवन के हर फैसले में समाज दखल देता है चाहे वह प्रेम का सवाल हो, शादी का, रोजगार का या कोई अन्य।

एक सच्चा सर्वहारा लेखक -मक्सिम गोर्की

गोर्की ने अपने जीवन और लेखन से सिद्ध कर दिया कि दर्शन और साहित्य विश्‍वविद्यालयों, कॉलेजों में पढ़े-लिखे विद्वानों की बपौती नहीं है बल्कि सच्चा साहित्य आम जनता के जीवन और लड़ाई में शामिल होकर ही लिखा जा सकता है। उन्होंने अपने अनुभव से यह जाना कि अपढ़, अज्ञानी कहे जाने वाले लोग ही पूरी दुनिया के वैभव के असली हक़दार हैं। आज एक बार फिर साहित्य आम जन से दूर होकर महफ़िलों, गोष्ठियों यहाँ तक कि सिर्फ़ लिखने वालों तक सीमित होकर रह गया है। आज लेखक एक बार फिर समाज से विमुख होकर साहित्य को आम लोगों की ज़िन्दगी की चौहद्दी से बाहर कर रहा है।

जनता के भगवान डॉक्टर, डॉक्टर का भगवान पैसा

क्या कहा? स्वस्थ करने की गारण्टी? भई गारण्टी तो पैसा लौटाने की होती है, स्वस्थ करने की नहीं। मरीज का कर्त्तव्य है पैसा देना और डाक्टर का कर्त्तव्य है इलाज करना। फ़िर बीच में स्वस्थ करना कहाँ से आ गया? यही है हमारे भूमण्डलीकरण के ज़माने की उदारीकरण की बयार, जहाँ हर चीज़ का निजीकरण हो चुका है। चिकित्सा का भी निजीकरण हो चुका है। डॉक्टर लोग काफ़ी उदार हो गए हैं, इतने उदार कि लोगों की जान लेने में उदारता की सीमा पार कर जाते हैं।