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रुपये के मूल्य में गिरावट के निहितार्थ

रुपये में गिरावट सीधे चालू खाते के घाटे से जुड़ी है क्योंकि यह घाटा रुपये की तुलना में विदेशी करेंसी की कम आपूर्ति को दिखाता है। कुछ बुर्जुआ अर्थशास्त्री रुपये के मूल्य में गिरावट की वजह लोगों के पास ज़्यादा मुद्रा होना बताते हैं यानी कि अर्थव्यवस्था में माँग का बढ़ना बताते हैं। वे यह दावा करते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने मनरेगा जैसी नीतियों के तहत रुपया पानी की तरह बहाया है जिसकी वजह से अर्थव्यवस्था में माँग बढ़ी है और आयात भी बढ़ा है जिसकी वजह से चालू खाते का घाटा बढ़ गया है। इसी हास्यास्पद तर्क की आड़ लेकर ये टुकड़ख़ोर खाद्य सुरक्षा अधिनियम का भी विरोध कर रहे हैं क्योंकि उनके अनुसार इससे माँग और बढ़ेगी, आयात बढ़ेगा और चालू खाते का घाटा और बढ़ेगा जिससे अर्थव्यवस्था का संकट बढ़ जायेगा। इनसे यह पूछा जाना चाहिए कि मनरेगा और खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत मिलने वाली थोड़ी-बहुत सुविधाओं का लाभ जिस ग़रीब आबादी को मिलता है वह गाड़ी-मोटर तो चलाती नहीं, वह सोने और कीमती हीरे-जवाहरात भी नहीं ख़रीदती तो फिर उनके भरपेट खाने भर से भला आयात कैसे बढ़ जायेगा! इनके लचर तर्क से यह स्पष्ट है कि ग़रीबों का पेट भर खाना और उनके लिए रोज़गार के मामूली अवसर भी इन लग्गुओं-भग्गुओं को फूटी आँख नहीं सुहाता। शासक वर्ग के टुकड़ों पर पलने वाले ये टुकड़खोर अर्थशास्त्री हर साल कॉरपोरेटों को दी जाने वाली अरबों की सब्सिडी के बारे में मौन रहते हैं।

उत्तराखण्ड त्रासदीः यह पूँजीवादी विकास की तार्किक परिणति है!

पिछले कुछ वर्षों से आश्‍चर्यजनक रूप से नियमित अन्तराल पर दुनिया के किसी न किसी कोने में ऐसी विभीषिकाएँ घटित हो रही हैं जो इस बात के स्पष्ट संकेत देती हैं कि पूँजीवादी व्यवस्था का अस्तित्व न सिर्फ मानवता के लिए घातक है बल्कि यह पृथ्वी और उस पर रहने वाले तमाम जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों या यूँ कहें कि उसके समूचे पारिस्थितिक तन्त्र के लिए विनाश का सबब है। गत जून के दूसरे पखवाड़े में उत्तराखण्ड में बादल फटने, भूस्खलन, हिमस्खलन और बाढ़ से आयी तबाही का जो ख़ौफ़नाक मंज़र देखने में आया वह ऐसी ही विनाशकारी घटनाओं का एक प्रातिनिधिक उदाहरण है। इस त्रासदी से निपटने में पूरी तरह विफल साबित होने के बाद अपनी छीछालेदर से बचने के लिए उत्तराखण्ड सरकार ने अभी भी इस त्रासदी में मारे गये लोगों की ठीक-ठीक संख्या नहीं बतायी है, परन्तु विभिन्न गैर सरकारी संस्थाओं और स्वतन्त्र एजेंसियों का दावा है कि यह संख्या 10 से 15 हज़ार हो सकती है। यही नहीं उत्तराखण्ड के सैकड़ों गाँव तबाह हो गये हैं और लाखों लोगों के लिए जीविका का संकट उत्पन्न हो गया है।

बाल ठाकरे: भारतीय फासीवाद का प्रतीक पुरुष

बाल ठाकरे और शिव सेना शुरू से ही अपने आपको ‘मराठी मानुस’ का रहनुमा कहते आये हैं। परन्तु ग़ौर करने वाली बात यह है कि उनके ‘मराठी मानुस’ से उनका तात्पर्य उच्च जाति वाले मराठी पुरुषों से होता है। महाराष्ट्र की दलित आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग पाँचवाँ भाग है जो इस दायरे से बिल्कुल बाहर है। 1974 में बनी दलितों की जुझारू पार्टी दलित पैंथर्स पर शिवसेना के गुण्डों ने कई हमले किये क्योंकि उसके सदस्य खुले रूप में हिन्दू धर्म के प्रतिक्रियावादी और दकियानूसी विचारों का विरोध करते थे। दलित पैंथर के एक नेता भगवत जाधव की हत्या शिव सेना के गुण्डों ने ही की थी।

‘मैं-फिसड्डी-तो-तू-भी-फिसड्डी’

ज़ाहिर है कि मीडिया, जो इसी पूँजीवादी व्यवस्था का अवलम्ब है, से यह अपेक्षा करना बेमानी है कि वह अपने दर्शकों और पाठकों को इस सच्चाई से अवगत कराये कि यह संकट दरअसल व्यवस्थागत है। शासक वर्ग को हमेशा यह ख़ौफ सताता रहता है कि यदि जनता इस सच्चाई से अवगत होगी तो इस व्यवस्था के विकल्प के बारे में भी सोचना शुरू कर देगी। इसलिए एक सोची-समझी चाल के तहत व्यवस्था के संकट को व्यक्तियों की कमज़ोरी की तरह पेश किया जाता है और इस बात का भ्रम पैदा करने की कोशिश की जाती है कि यदि अमुक व्यक्ति की बजाये कोई और व्यक्ति नेतृत्व दे रहा होता तो यह संकट आता ही नहीं या फिर इससे बेहतर तरीके से निपटा जा सकता था।

जस्टिस काटजू का विधवा-विलाप और भारतीय मीडिया की असलियत

मुनाफ़ाखोर मीडिया से यह अपेक्षा करना कि वह जनता का पक्ष लेगा और वैज्ञानिक तथा प्रगतिशील दृष्टिकोण बनाने में सहायक होगा, आकाश-कुसुम की अभिलाषा के समान लगता है। यह तो तय है कि जैसे-जैसे मीडिया पर बड़ी पूँजी का शिकंजा कसता जायेगा, वैसे-वैसे मीडिया का चरित्र ज़्यादा से ज़्यादा जनविरोधी होता जायेगा और आम जनता के जीवन की वास्तविक परिस्थितियों और मीडिया में उनकी प्रस्तुति के बीच की दूरी बढ़ती ही जायेगी। जस्टिस काटजू की यह बात तो सही है कि भारत में पत्र-पत्रिकाओं का एक गौरवशाली अतीत रहा है और विशेषकर स्वतन्त्रता संघर्ष के दौरान उनकी बेहद सकारात्मक और प्रगतिशील भूमिका रही है। लेकिन वह यह बात भूल जाते हैं कि ऐसी सभी पत्र-पत्रिकाएँ जनता के संघर्षों की तपन में उपजी और पनपी थीं और उनका उद्देश्य मुनाफ़ा कमाना हरगिज़ नहीं था। आज के दौर में पूँजीवादी मीडिया से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती की वह जनता का पक्ष ले।

एक ‘‘ईमानदार’’ प्रधानमन्त्री के घडि़याली आँसू

विज्ञान और गणित के क्षेत्र में भारत के पिछड़ेपन पर प्रधानमन्त्री का चकित होना भी उनकी मासूमियत नहीं बल्कि उनके घाघपन का ही परिचायक है। क्या प्रधानमन्त्री महोदय को यह नहीं पता है कि आज़ादी के छह दशक बाद भी इस देश में बच्चों की विशाल आबादी प्राथमिक शिक्षा से ही महरूम है और अपना व अपने परिवार का पेट भरने के लिए ढाबों और गैराजों में अपनी श्रम शक्ति बेचने के लिए मजबूर है या फिर शहरों की सड़कों और चौराहों पर भीख माँगकर गुज़ारा करती है। ग़रीबों के जो बच्चे किसी तरह सरकारी स्कूल में दाखि़ल हो भी जाते हैं उनकी शिक्षा भी बस नाम के लिए ही होती है। नवउदारवाद के इस दौर में सरकारी स्कूलों की स्थिति बद से बदतर हुई है। ऐसे में यह उम्मीद करना कि ये बच्चे विज्ञान और गणित में मौलिक खोजें कर देश का नाम रोशन करेंगे, एक चमत्कार की उम्मीद के समान है।

ऐसी त्रासदियों के लिए मूल रूप में मुनाफाकेन्द्रित व्यवस्था जिम्मेदार है

जब हम समस्या की तह तक जाते हैं तो पाते हैं कि पूँजीवादी विकास के साथ समाज में मुनाप़फ़ाखोरी की जो मानवद्रोही संस्कृति विकसित हुई है वह ऐसी त्रासदियों को टालने और उनसे निपटने की राह में आड़े आती है। सुरक्षा के समचित उपाय और आपदाओं से निपटने की तैयारी के लिए आवश्यक पूँजी एक पूँजीपतियों को ग़ैर-ज़रूरी ख़र्च लगता है। भारत जैसे पिछड़े पूँजीवादी देशों में जनता के अपने अधिकारों के प्रति उदासीन रवैये और सरकार और नौकरशाही के जनविरोधी औपनिवेशिक ढाँचे का लाभ उठाकर सुरक्षा के उपायों को ताक पर रखने की वजह से जब ऐसी भीषण घटनायें घट जाती हैं तो फौरी तौर पर भले ही कुछ पूँजीपतियों और प्रबंधकों के साथ कुछ नौकरशाह गिरफ्रतार किये जाते हैं लेकिन अब यह किसी से छिपी बात नहीं है कि भारत में न्याय बिकता है और अपनी पूँजी के दम पर कोई शक्तिशाली व्यक्ति न्याय की प्रक्रिया को आसानी से अपने पक्ष में कर लेता है। इस प्रकार आम जनता की जान ख़तरे में डालकर धंधे करना भारत में ‘लो रिस्क हाई रिटर्न’ उपक्रम है जिसमें उद्योगपति अकूत मुनाफा कमाता है और उसके एक हिस्से की नेताओं, नौकरशाही और न्यायधीशों के बीच बन्दरबाँट होती है और इस प्रकार मौत का यह घिनौना खेल निहायत ठण्डे तरीके से जारी रहता है। चाहे वह भोपाल, उपहार या कोंबाकुणम जैसी भीषण त्रासदियाँ हों या फिर सुरक्षा उपायों की खामियों की वजह से आये दिन होने वाली छोटी-छोटी घटनायें हों, इन सबके पीछे मूल रूप से पूँजी की यही मानवद्रोही संस्कृति जिम्मेदार होती है।

यू आई डी योजना – जनता के नाम पर पूँजी और उसकी राज्यसत्ता का आधार मजबूत करने की चाल

यह एक चिंताजनक सवाल है कि नागरिकों की निजी गुप्तता पर हमला करने वाली जिन योजनाओं को अमेरिका और ब्रिटेन जैसे उन्नत देशों में अव्यवहारिक और जनविरोधी मानकर रद्द कर दिया गया वैसी ही योजना को भारत का शासक वर्ग बड़ी ही आसानी से लागू कर रहा है और इसका कोई कारगर विरोध भी अभी तक नहीं उभरा है। हालाँकि नागरिक आजादी और जनवादी अधिकार आंदोलन से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने इस मुद्दे पर अखबारों में और इण्टरनेट पर लिखा है लेकिन देश की व्यापक आम आबादी और यहाँ कि पढ़े लिखे मध्य वर्ग को भी इस योजना के भयावह निहितार्थ के बारे में कोई जानकारी नहीं है। ऐसे में नागरिक आजादी और जनवादी अधिकार आंदोलन से जुड़े लोगों और प्रबुद्ध नागरिकों का दायित्व है कि इस मुद्दे पर एकजुट होकर एक देशव्यापी मुहिम चलाकर देश की जनता को शासक वर्ग की इस धूर्ततापूर्ण चाल के बारे में आगाह करें जिससे कि एक कारगर प्रतिरोध खड़ा किया जा सके।

नाभिकीय ऊर्जा की शरण: देशहित में या पूँजी के हित में?

सवाल यह है ही नहीं कि नाभिकीय ऊर्जा का उपयोग किया जाना चाहिए या नहीं। किसी भी ऊर्जा स्रोत का उपयोग किया जा सकता है, बशर्ते कि उस पूरे उपक्रम के केन्द्र में मुनाफा नहीं बल्कि मनुष्य हो। नाभिकीय ऊर्जा के जिन स्वरूपों के सुरक्षित उपयोग की तकनोलॉजी आज मौजूद है, उनकी भी उपेक्षा की जाती है और उचित रूप से उनका उपयोग नहीं किया जा सकता है। दूसरी बात, नाभिकीय रियेक्टर बनाने का काम किसी भी रूप में निजी हाथों में नहीं होना चाहिए क्योंकि इन कम्पनियों का सरोकार सुरक्षा नहीं बल्कि कम से कम लागत में अधिक से अधिक मुनाफा होगा। तीसरी बात, नाभिकीय ऊर्जा के जिन रूपों का उपयोग सुरक्षित नहीं है, उन पर कारगर शोध और उसके बाद उसे व्यवहार में उतारने के कार्य किसी ऐसी व्यवस्था के तहत ही हो सकता है, जिसके लिए निवेश कोई समस्या न हो। यानी, कोई ऐसी व्यवस्था जिसके केन्द्र में पूँजी न होकर, मानव हित हों।