Tag Archives: आनन्‍द

सेल्फ़ी संस्कृति- पूँजीवादी युग में अलगाव एवं व्यक्तिवाद की चरम अभिव्यक्ति

जो परिस्थितियाँ सेल्फ़ी जैसी आत्मकेन्द्रित सनक को पैदा कर रही हैं, वही फ़ासीवादी बर्बरता को भी खाद-पानी दे रही हैं। यह महज़ संयोग नहीं है कि हिन्दुस्तान जैसे मुल्क में सेल्फ़ी की सनक का सबसे बड़ा ब्राण्ड अम्बैसडर एक ऐसा व्यक्ति है जो आज के दौर में फ़ासीवाद का प्रतीक पुरुष भी बन चुका है। दूसरों के दुखों व तकलीफों के प्रति संवेदनहीन और खासकर शोषित-उत्पीड़ित जनता के संघर्षशील जीवन से कोई सरोकार न रखने वाले आत्मकेन्द्रित व आत्ममुग्ध निम्नबुर्जुआ प्राणी ही फ़ासीवाद का सामाजिक आधार होते हैं।

युद्ध, शरणार्थी एवं प्रवासन संकट पूँजीवाद की नेमतें हैं

इतने बड़े पैमाने पर विस्थापन की वजह समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि वे कौन से क्षेत्र हैं जहाँ से आज विस्थापन सबसे अधिक हो रहा है। आँकड़े इस बात की ताईद करते हैं कि हाल के वर्षों में जिन देशों में साम्राज्यवादी दख़ल बढ़ी है वो ही वे देश हैं जहाँ सबसे अधिक लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ रहा है, मसलन सीरिया, अफ़गानिस्तान, फ़िलिस्तीन, इराक व लीबिया। पिछले डेढ़ दशक में इन देशों में अमेरिका के नेतृत्व में साम्राज्यवादी दख़ल से पैदा हुई हिंसा और अराजकता ने इन इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। इस हिंसा में भारी संख्या में जानमाल की तबाही हुई है और जो लोग बचे हैं वे भी सुरक्षित जीवन के लिए अपने रिहायशी इलाकों को छोड़ने पर मज़बूर कर दिये गये हैं। अमेरिका ने 2001 में अफ़गानिस्तान पर तथा 2003 में इराक़ पर हमला किया जिसकी वजह से इन दो देशों से लाखों लोग विस्थापित हुए जो आज भी पड़ोसी मुल्कों में शरणार्थी बनकर नारकीय जीवन बिताने को मज़बूर हैं। 2011 में मिस्र में होस्नी मुबारक की सत्ता के पतन के बाद सीरिया में स्वतःस्फूर्त तरीके से एक जनबग़ावत की शुरुआत हुई थी जिसका लाभ उठाकर अमेरिका ने सऊदी अरब की मदद से इस्लामिक स्टेट नामक सुन्नी इस्लामिक कट्टरपन्थी संगठन को वित्तीय एवं सैन्य प्रशिक्षण के ज़रिये मदद पहुँचाकर सीरिया के गृहयुद्ध को और भी ज़्यादा विनाशकारी बनाने में अपनी भूमिका निभायी जिसका नतीजा यह हुआ है कि 2011 के बाद से अकेले सीरिया से ही 1 करोड़ से भी अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं जिनमें से 40 लाख लोग तो वतन तक छोड़ चुके हैं।

‘पाप और विज्ञान’: पूँजीवादी अमेरिका और समाजवादी सोवियत संघ में नैतिक प्रश्नों के हल के प्रयासों का तुलनात्मक ब्यौरा

सोवियत सरकार द्वारा व्यभिचार के अड्डों को ध्वस्त करने की मुहिम छेड़े जाने से घबराये ठेकेदारों और वेश्यागृहों के मालिकों ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाना शुरू कर दिया। वे सोवियत अख़बारों में पत्र भेजकर यह कहने लगे कि सोवियत सरकार वेश्याओं को पनाह देकर और भोले-भाले मालिकों को दण्ड देकर घोर पाप कर रही है। किन्तु सोवियत अधिकारियों ने उनकी चीख-पुकार का उत्तर सेना की ओर से और भी कड़ी कार्रवाई से दिया। ठेकेदारों ने यह दलील देनी शुरू की कि वेश्याओं को अपना पेशा ज़ारी रखने का हक़ है। अधिकारियों ने प्रश्न-पत्र का ज़िक्र करते हुए कहा कि औरतों ने व्यभिचार को मजबूरी की हालत में अपनाया है और समाज का यह कर्तव्य है कि वह उन्हें अच्छे काम देकर व्यभिचार से मुक्त करे।

यमन पर हमला अरब के शेखों और शाहों की मानवद्रोही सत्ताओं की बौखलाहट की निशानी है

ग़ौरतलब है कि 1932 में इब्न सऊद द्वारा सऊदी राजतंत्र स्थापित करने और सऊदी अरब में तेल की खोज के बाद उसके अमेरिका से गँठजोड़ से पहले यमन अरब प्रायद्वीप का सबसे प्रभुत्वशाली देश था। सऊदी राजतंत्र के अस्तित्व में आने के दो वर्ष के भीतर ही सऊदी अरब व यमन में युद्ध छिड़ गया जिसके बाद 1934 में हुए ताईफ़ समझौते के तहत यमन को अपना कुछ हिस्सा सऊदी अरब को लीज़ पर देना पड़ा और यमन के मज़दूरों को सऊदी अरब में काम करने की मंजूरी मिल गई। नाज़रान, असीर, जिज़ान जैसे इलाकों की लीज़ ख़त्म होने के बावजूद सऊदी अरब ने वापस ही नहीं किया जिसको लेकर यमन में अभी तक असंतोष व्याप्त है। ग़ौरतलब है कि ये वही इलाके हैं जहाँ शेखों के निरंकुश शासन के खि़लाफ़ बग़ावत की चिंगारी भी समय-समय पर भड़कती रही हैं। यमन पर सऊदी हमले की वजह से जहाँ एक ओर यमन के भीतर राष्ट्रीय एकता की भावना पैदा हुई है वहीं सऊदी अरब के इलाकों में भी बग़ावत की चिंगारी एक बार फिर भड़कने की सम्भावना बढ़ गई है।

एंगेल्‍स की प्रसिद्ध पुस्तिका ‘समाजवाद: काल्‍पनिक तथा वैज्ञानिक’ का परिचय

समाजवाद की वैज्ञानिक धारा से अपरिचित लोग समाजवाद को एक अव्‍यवहारिक और आदर्शवादी विचार मानते हैं। ऐसे लोग अक्‍सर यह कहते हुए पाये जाते हैं कि समाजवाद जिस तरह की व्‍यवस्‍था की बात करता है वह कल्‍पना जगत में तो बहुत अच्‍छी लगती है, परन्‍तु वास्‍तविक जगत में ऐसी व्‍यवस्‍था संभव नहीं है क्‍योंकि मनुष्‍य अपने स्‍वभाव से ही लालची और स्‍वार्थी होता है। ऐसे लोगों को यह नहीं पता होता कि समाजवाद की उनकी समझ दरअसल काल्‍पनिक समाजवाद (Utopian Socialism) की धारा द्वारा प्रतिपादित विचारों के प्रभाव में आकर बनी है जिसके अनगिनत संस्‍करण दुनिया के विभिन्‍न हिस्‍सों में पाये जाते हैं। ऐसे लोग इस बात से भी अनभिज्ञ होते हैं कि काल्‍पनिक समाजवाद की इस धारा के बरक्‍स मार्क्‍स और एंगेल्‍स द्वारा प्रतिपादित वैज्ञानिक समाजवाद की भी एक धारा है जो दरअसल काल्‍पनिक समाजवाद की धारा के साथ आलोचनात्‍मक संबन्‍ध रखते हुए और उसे कल्‍पना की दुनिया से वास्‍तविक और व्‍यवहारिक दुनिया में लाने की प्रक्रिया में विकसित हुई है। काल्‍पनिक समाजवाद से वैज्ञानिक समाजवाद की इस विकासयात्रा को समझने के लिए शायद सबसे बेहतर रचना एंगेल्‍स की प्रसिद्ध पुस्तिका ‘समाजवाद: काल्‍पनिक तथा वैज्ञानिक’है। ब्रिटेन के प्रसिद्ध मार्क्‍सवादी मॉरिस काॅर्नफ़ोर्थ ने इस पुस्तिका के बारे में लिखा है: ”मार्क्‍स और एंगेल्‍स की सभी कृतियों में से, शुरुआती पाठक के लिए यह शायद सर्वश्रेष्‍ठ है। यह बेहद स्‍पष्‍ट और सरल शैली में लिखी गयी है और वैज्ञानिक समाजवाद के बुनियादी विचारों से पाठक को परि‍चित कराती है।”

रघुराम राजन: पूँजीपति वर्ग के दूरगामी हितों का रक्षक!

रघुराम राजन के बयानों को ऊपरी तौर पर पढ़ने से किसी को यह भ्रम हो सकता है कि ये बयान इस देश की जनता के हित को ध्यान में रखकर दिये गये हैं। परन्तु सावधानीपूर्वक इन बयानों की पड़ताल करने और राजन के राजनीतिक अर्थशास्त्र को जानने के बाद हम पाते हैं कि दरअसल इन उग्र तेवरों के पीछे जनता के हित नहीं बल्कि पूँजीपति वर्ग के दूरगामी हितों की हिफ़ाज़त करने की उनकी व्यग्रता छिपी है। इस लेख में पहले हम रघुराम राजन बुर्जुआ अर्थशास्त्र की जिस धारा से आते हैं उसका संक्षेप में ज़िक्र करेंगे और उसके बाद उनके बयानों के पीछे छिपी पूँजीपति वर्ग के दूरगामी हितों के रक्षक की उनकी भूमिका पर बात करेंगे।

मेक्सिको के जुझारू छात्रों-युवाओं को क्रान्तिकारी सलाम!

मेक्सिको के छात्रों और युवाओं ने अपने लड़ाकूपन से वहाँ के सत्ताधरियों की नींद हराम कर दी है। जिस तरीक़े से मेक्सिको के छात्र और युवा इस आन्दोलन को पूरे देश में फैला रहे हैं और जिस तरीक़े से वे मेक्सिको के आम नागरिकों सहित दुनिया-भर के इंसाफ़पसन्द लोगों को परम्परागत और आधुनिक माध्यमों का इस्तेमाल करके इस आन्दोलन से जोड़ रहे हैं, वह वाकई प्रेरणादायी है। साथ ही साथ यह भी कहना होगा कि यह बेहद अफ़सोस की बात है कि इतने जुझारू छात्र-युवा आन्दोलन की मौजूदगी के बावजूद मेक्सिको के सर्वहारा वर्ग की संगठित ताक़तें इतनी कमज़ोर हैं कि वे इस परिस्थिति का लाभ उठाकर इस देशव्यापी आन्दोलन को सर्वहारा क्रान्ति की ओर अग्रसर करने में नितान्त असमर्थ हैं। 1911-1929 की मेक्सिको की क्रान्ति के शानदार इतिहास को देखते हुए यह निश्चय ही चिन्ता का सबब है कि सर्वहारा वर्ग की ताक़तें उस देश में आज इतनी कमज़ोर हैं।

इस्लामिक स्टेट (आईएस): अमेरिकी साम्राज्यवाद का नया भस्मासुर

आईएस जैसे बर्बर इस्लामिक कट्टरपन्थी संगठन की अमेरिकी साम्राज्यवादी नीतियों द्वारा पैदाइश और उनका पालन-पोषण कोई नयी बात नहीं है। दरअसल द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से ही कम्युनिज़्म और धर्मनिरपेक्ष अरब राष्ट्रवाद को मात देने के लिए अमेरिका इस्लामिक दक्षिणपन्थ के साथ गठजोड़ बनाता आया है जिसकी वजह से समय-समय पर वहाँ ऐसे इस्लामिक कट्टरपन्थी संगठन उभरते रहे हैं।

फ़्री एवं ओेपेन सोर्स सॉफ़्टवेयर आन्दोलन: कितना ‘फ़्री’ और कितना ‘ओपेन’

बावजूद इसके कि फ़्री एवं ओपेन सोर्स सॉफ़्टवेयर के विचार को अब कारपोरेट्स का समर्थन मिल रहा है, एक विचार के तौर पर यह अपने आप में एक प्रगतिशील अवधारणा है, क्योंकि यह ज्ञान के एकाधिकार की पूँजीवादी सोच पर कुठाराघात करती है। सॉफ़्टवेयर उत्पादन का यह सहकारितापूर्ण और सामूहिकतापूर्ण तरीक़ा निश्चित ही इस समाजवादी सोच को पुष्ट करता है कि मनुष्य सिर्फ़ भौतिक प्रोत्साहनों और निजी फ़ायदे के लालच में आकर ही श्रम प्रक्रिया में भाग नहीं लेता बल्कि श्रम उसकी नैसर्गिक आभिलाक्षणिकता है। परन्तु फ़्री एवं ओपेन सोर्स सॉफ़्टवेयर आन्दोलन के कुछ अति-उत्साही समर्थक इस तर्क को खींचकर यहाँ तक कहने लगते हैं कि यह एक कम्युनिस्ट प्रोजेक्ट है और यह इतना ‘सबवर्सिव’ है कि साइबर स्पेस में पूँजीवादी उत्पादन-सम्बन्धों को छिन्न-भिन्न कर देगा।

रुपये के मूल्य में गिरावट के निहितार्थ

रुपये में गिरावट सीधे चालू खाते के घाटे से जुड़ी है क्योंकि यह घाटा रुपये की तुलना में विदेशी करेंसी की कम आपूर्ति को दिखाता है। कुछ बुर्जुआ अर्थशास्त्री रुपये के मूल्य में गिरावट की वजह लोगों के पास ज़्यादा मुद्रा होना बताते हैं यानी कि अर्थव्यवस्था में माँग का बढ़ना बताते हैं। वे यह दावा करते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने मनरेगा जैसी नीतियों के तहत रुपया पानी की तरह बहाया है जिसकी वजह से अर्थव्यवस्था में माँग बढ़ी है और आयात भी बढ़ा है जिसकी वजह से चालू खाते का घाटा बढ़ गया है। इसी हास्यास्पद तर्क की आड़ लेकर ये टुकड़ख़ोर खाद्य सुरक्षा अधिनियम का भी विरोध कर रहे हैं क्योंकि उनके अनुसार इससे माँग और बढ़ेगी, आयात बढ़ेगा और चालू खाते का घाटा और बढ़ेगा जिससे अर्थव्यवस्था का संकट बढ़ जायेगा। इनसे यह पूछा जाना चाहिए कि मनरेगा और खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत मिलने वाली थोड़ी-बहुत सुविधाओं का लाभ जिस ग़रीब आबादी को मिलता है वह गाड़ी-मोटर तो चलाती नहीं, वह सोने और कीमती हीरे-जवाहरात भी नहीं ख़रीदती तो फिर उनके भरपेट खाने भर से भला आयात कैसे बढ़ जायेगा! इनके लचर तर्क से यह स्पष्ट है कि ग़रीबों का पेट भर खाना और उनके लिए रोज़गार के मामूली अवसर भी इन लग्गुओं-भग्गुओं को फूटी आँख नहीं सुहाता। शासक वर्ग के टुकड़ों पर पलने वाले ये टुकड़खोर अर्थशास्त्री हर साल कॉरपोरेटों को दी जाने वाली अरबों की सब्सिडी के बारे में मौन रहते हैं।