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आरक्षण की लड़ाई: एक अनार सौ बीमार

सरकारों के द्वारा जब शिक्षा को महँगा किया जाता है व इसे आम जनता की पहुँच से लगातार दूर किया जाता है और जब सार्वजनिक क्षेत्र (‘पब्लिक सेक्टर’) की नौकरियों में कटौती करके हर चीज़ का ठेकाकरण किया जाता है तब जातीय ठेकेदार चूं तक नहीं करते! ‘रोज़गार ही नहीं होंगे तो आरक्षण मिल भी जायेगा तो होगा क्या?’ यह छोटी सी और सीधी-सच्ची बात भूल से भी यदि इनके मुँह से निकल गयी तो इन सभी की प्रासंगिकता ही ख़त्म हो जायेगी इस बात को ये घाघ भलीभाँति जानते हैं।

विवेकहीनता का मौजूदा दौर और इसके विरोध के मायने

आज जनवादी-नागरिक अधिकारों पर फासीवादी हमला जब लोगों के शयनकक्ष तक में प्रवेश कर गया है, तब तमाम उदारवादी बुद्धिजीवियों ने आजिज आकर आवाज़ उठायी है, और इसकी हिमायत की जानी चाहिए। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि फासीवादी उभार के इस कदर आक्रामक बन पाने में कुछ योगदान उदारवादी बुद्धिजीवी वर्ग का भी है, जो कि, जब फासीवादी नाग अपना फन उठाने की शक्ति संचित कर रहा था तो विचारधारात्मक-राजनीतिक निष्पक्षता के ‘हाई मॉरल ग्राउण्ड’ पर विराजमान थे! आज फासीवादी ताक़तों के ख़िलाफ़ लड़ाई को सड़कों तक ले जाने के लिए व्यापक मेहनतकश जनसमुदायों को इस पूँजीवादी व्यवस्था की सच्चाई से रूबरू कराना होगा और उसे क्रान्तिकारी विचारों व राजनीति पर जीतना होगा। यदि जनमत हमारे पक्ष में नहीं होगा तो वह किसी न किसी रूप में चाहे-अनचाहे फासीवाद के पक्ष में होगा क्योंकि यदि वह तटस्थ भी होगा तो भी वह साम्प्रदायिक शक्तियों का मददगार ही होगा।

हरियाणा के रोहतक में हुई एक और ‘निर्भया’ के साथ दरिन्दगी

स्त्री विरोधी मानसिकता का ही नतीजा है कि हरियाणा में कन्या भ्रूण हत्या होती है और लड़के-लड़कियों की लैंगिक असमानता बहुत ज़्यादा है। हिन्दू धर्म के तमाम ठेकेदार आये दिन अपनी दिमागी गन्दगी और स्त्रियों को दोयम दर्जे का नागरिक मानने की अपनी मंशा का प्रदर्शन; कपड़ों, रहन-सहन और बाहर निकलने को लेकर बेहूदा बयानबाजियाँ कर देते रहते हैं लेकिन तमाम स्त्री विरोधी अपराधों के ख़िलाफ़ बेशर्म चुप्पी साध लेते हैं। यह हमारे समाज का दोगलापन ही है कि पीड़ा भोगने वालों को ही दोषी करार दे दिया जाता है और नृशंसता के कर्ता-धर्ता अपराधी आमतौर पर बेख़ौफ़ होकर घूमते हैं। अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए जब हरियाणा के मौजूदा मुख्यमन्त्री मनोहर लाल खट्टर फरमा रहे थे कि लड़कियों और महिलाओं को कपड़े पहनने की आज़ादी लेनी है तो सड़कों पर निर्वस्त्र क्यों नहीं घूमती!

भारत का सोलहवाँ लोकसभा चुनाव: किसका, किसके लिए और किसके द्वारा

भारत के “स्‍वर्णिम” चुनावी इतिहास में मौजूदा चुनाव ने पैसा ख़र्च करने के मामले में चार चाँद लगा दिये हैं। भारत का सोलहवाँ लोकसभा चुनाव अमेरिका के बाद दुनिया का सबसे महँगा चुनाव है। यदि ख़र्च होने वाले काले धन को भी जोड़ दिया जाये तो अमेरिका क्या पूरी दुनिया के चुनावों के कुल ख़र्च को भी हमारा भारत देश टक्कर दे सकता है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र जो ठहरा! सिर्फ़ धन ख़र्च करने और काले धन की खपत करने के मामले में ही नहीं बल्कि झूठे नारे देकर, झूठे वायदे करके जनता को कैसे उल्लू बनाया जाये, जाति-धर्म के झगड़े-दंगे कराकर ख़ून की बारिश में वोट की फ़सल कैसे काटी जाये, जनता-जनता जपकर पूँजीपतियों का पट्टा गले में डलवाने में कैसे प्रतिस्पर्धा की जाये, इन सभी मामलों में भी भारतीय नेतागण विदेशी नेताओं को कोचिंग देने की कूव्वत रखते हैं!

चेतन भगत: बड़बोलेपन और कूपमण्डूकता का एक साम्प्रदायिक संस्करण

चेतन भगत जैसे भाड़े के कलमघसीट जिन्हें समाज, विज्ञान, इतिहास के बारे में ज़रा भी ज्ञान नहीं होता केवल अपने मूर्खतापूर्ण बड़बोलेपन के बूते ही अपनी बौद्धिक दुकानदारी खड़ी कर लेते हैं। महानगरों में मध्यम वर्ग के युवा आपको मेट्रो आदि में चेतन भगत की “रचनाएँ” पढ़ते आसानी से दिख जायेंगे। भारत जैसे देश में जो औपनिवेशिक दौर से ही बौद्धिक कुपोषण का शिकार है, चेतन भगत जैसों की दाल आसानी से गल जाती है। किन्तु इस प्रकार के बगुला भगतों की ख़बर लेना बेहद ज़रूरी है। इनके बौद्धिक ग़रूर को ध्वस्त करना मुश्किल नहीं है, किन्तु ज़रूरी अवश्य है।

पूरे देश को फासीवाद की प्रयोगशाला में तब्दील करने की पूँजीपतियों की तैयारी

हत्यारों को नायकों जैसा सम्मान दिलाने में इस मीडिया का भी बड़ा हाथ है। औपनिवेशिक गुलामी के दौर से लेकर आज तक यह बात सही साबित होती रही है कि वैज्ञानिक और तार्किक विचारों की बजाय सड़ी पुरातन मान्यताओं और पुनरुत्थानवादियों से मानसिक खुराक लेने वाला समाज फासीवादी वृक्ष की बढ़ोत्तरी के लिए अच्छी ज़मीन मुहैया कराता है। 2002 में मौत का तांडव रचने वाले मोदी को विकास पुरुष के तौर पर प्रचारित करना मीडिया के बिकाऊ होने का ही एक सबूत है। जबकि गुजरात के कच्छ की खाड़ी में नमक की दलदलों में काम करने वाले मज़दूरों का किसी को पता भी नहीं है जिनको मौत के बाद नमक में ही दफन कर दिया जाता है क्योंकि उनके शरीर में इतना नमक भर जाता है कि वह जल ही नहीं सकता। अलंग के जहाज़ तोड़ने वाले मज़दूरों से लेकर तमाम मेहनतकश अवाम लोहे के बूटों तले जीवन जी रहे हैं, यह किसी को नहीं बताया जाता। इन्हीं सब चीजों से ‘जनतन्त्र के चौथे स्तम्भ’ की असलियत बयान होती है।

एक जुझारू जनवादी पत्रकार – गणेशशंकर विद्यार्थी

भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौर में जिन्होंने त्याग बलिदान और जुझारूपन के नये प्रतिमान स्थापित किये, उनमें गणेशशंकर विद्यार्थी भी शामिल हैं। अपनी जनपक्षधर निर्भय पत्रकारिता के दम पर विद्यार्थी जी ने विदेशी हुकूमत तथा उनके देशी टुकड़खोरों को बार-बार जनता के सामने नंगा किया था। वे आजीवन राष्ट्रीय जागरण के प्रति संकल्पबद्ध रहे। विद्यार्थी जी ने तथाकथित वस्तुपरकता का नाम लेते हुए कभी भी वैचारिक तटस्थता की दुहाई नहीं दी। हिन्दी प्रदेश में भारतीय राष्ट्रीय जागरण का वैचारिक आधार तैयार करने में तथा उसे और व्यापक बनाने में उन्होंने अहम भूमिका अदा की थी। उस दौर में विद्यार्थी जी के द्वारा सम्पादित पत्र ‘प्रताप’ ने साम्राज्यवाद-विरोधी राष्ट्रीय पत्रकारिता की भूमिका तो निभायी ही साथ-साथ जुझारू पत्रकारों तथा क्रान्तिकारियों की एक पूरी पीढ़ी को शिक्षित-प्रशिक्षित करने का काम भी किया था।

धार्मिकता बनाम तार्किकता

यह पहली घटना नहीं थी जब धार्मिक अन्धविश्वास व इन तथाकथित आध्यात्मिक प्रचारकों के पाखण्ड के चलते लोग मौत का शिकार हुए हों। जनवरी 2005 में हिमाचल में नैना देवी मन्दिर में भगदड़ से ही 340 लोग मारे गए। 2008 में राजस्थान के चामुण्डा देवी मन्दिर में भगदड़ से 216 मौतें हुई। जनवरी 2010 में कृपालु महाराज के आश्रम में 63 मौतें हुई। जनवरी 2011 को केरल के सबरीवाला में 104 लोग मारे गए। इन सबके अलावा मुहर्रम व अन्य धार्मिक उत्सवों पर भी मचने वाली भगदड़ों में लोग मौत का शिकार होते हैं। रोजाना पीरों, फकीरों व झाड़फूँक के चक्कर में होने वाली मौतों का तो हिसाब ही नहीं है जो सामने नहीं आ पाती। इस प्रकार की तमाम घटनाएँ यह दर्शाती है कि अन्धविश्वासों से होने वाली मौतें किसी भी तरह से धार्मिक कट्टरता से होने वाली मौतों से कम नहीं हैं। मानव जीवन का इस तरह से समाप्त होना कई प्रश्नों को खड़ा कर देता है।

आज भी उतना ही प्रासंगिक है ‘जंगल’ उपन्यास

‘जंगल’ उपन्यास वह रचना थी जिसने गहरा सामाजिक प्रभाव छोड़ा था। पत्रिका में धारावाहिक छपने के बाद जब पुस्तक के रूप में इसे प्रकाशित करने की बारी आयी तो छह प्रकाशक सीधे तौर पर हाथ खड़े कर गये। जब सिंक्लेयर ने स्वयं इसके प्रकाशन का निर्णय लिया तो डबलसे इसे प्रकाशित करने के लिए तैयार हो गये। 1906 में पुस्तक के रूप में आते ही इस उपन्यास की 1,50,000 प्रतियाँ बिक गयीं तथा अगले कुछ ही वर्ष के भीतर 17 भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका था इतना ही नहीं अमेरिका के तत्कालिक राष्ट्रपति थियोडोर रूज़वेल्ट ने स्वयं ‘जंगल’ उपन्यास पढ़ने के बाद अप्टन सिंक्लेयर से मुलाकात की और तत्काल ही एक जाँच कमेटी नियुक्त की जिसकी रिपोर्ट के आधार पर उसी वर्ष ‘प्योर फूड एण्ड ड्रग्स ऐक्ट’ और ‘मीट इंस्पेक्शन ऐक्ट’ नामक दो कानून पारित हुए तथा मांस पैकिंग उद्योग के मज़दूरों की जीवन-स्थितियों में सुधार के लिए भी कुछ कदम उठाये गये।

आजादी के 64 साल

यह किस बात की आजादी है? क्या आजादी के मायने यही होते हैं कि समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा तो अपना खून पसीना जलाकर सभी चीजें पैदा करे, लेकिन उस उत्पादन को पूंजी में बदल कर हड़प जाएं मुट्ठी भर धनकुबेर कतई नहीं? आजादी का मतलब होता है, उत्पादन करने वाले वर्गों के हाथों में वितरण के अधिकार का भी होना। यदि हर प्रकार का भौतिक उत्पादन करने के बाद भी मेहनतकश आवाम मोहताज है, तो यह आजादी नहीं है सही मायने में आजादी तभी आ सकती है, जब व्यापक मेहनतकश जनता संगठित होकर अपने संघर्षो के द्वारा निजी स्वामित्व पर आधारित व्यवस्था को ध्वस्त करके सामाजिक-आर्थिक समानतापूर्ण व्यवस्था का निर्माण करें जाहिरा तौर पर इसमें छात्र-नौजवानों की भी अहम भूमिका होगी जिन्हें भगतसिंह के शब्दों में क्रान्ति का सन्देश कल कारखानों तथा खेतो-खलिहानों तक लेकर जाना होगा। ताकि सचेतन तौर पर मेहनतकश वर्ग सही मायने में लोकसत्ता कायम कर सके।