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कुछ अहम सवाल जिनका जवाब जाति उन्मूलन की ऐतिहासिक परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए अनिवार्य है

अभी हमारी चर्चा का मूल विषय है एक निहायत ज़हीन, संजीदा, इंसाफ़पसन्द नौजवान की असमय मौत और उसके नतीजे के तौर पर हमारे सामने उपस्थित कुछ यक्षप्रश्न जिनका उत्तर दिये बग़ैर हम जाति के उन्मूलन की ऐतिहासिक परियोजना में ज़रा भी आगे बढ़ने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। कार्ल सागान जैसा वैज्ञानिक बनने की आकांक्षा रखने वाले रोहित ने आत्महत्या क्यों की? तारों की दुनिया, अन्तरिक्ष और प्रकृति से बेपनाह मुहब्बत करने वाले इस नौजवान ने जीवन की बजाय मृत्यु का आलिंगन क्यों किया? वह युवा जो इंसानों से प्यार करता था, वह इस कदर अवसाद में क्यों चला गया? वह युवा जो न्याय और समानता की लड़ाई में अगुवा कतारों में रहा करता था और जिसकी क्षमताओं की ताईद उसके विरोधी भी किया करते थे, वह अचानक इस लड़ाई और लड़ाई के अपने हमसफ़रों को इस तरह छोड़कर क्यों चला गया? इन सवालों की पहले ही तमाम क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और छात्र-युवा साथियों ने अपनी तरह से जवाब देने का प्रयास किया है। हम कोई बात दुहराना नहीं चाहते हैं और इसलिए हम इस मसले पर जो कुछ सोचते हैं, उसके कुछ अलग पहलुओं को सामने रखना चाहेंगे।

हम हार नहीं मानेंगे! हम लड़ना नहीं छोड़ेंगे!

शासक हमेशा ही यह मानने की ग़लती करते रहे हैं कि संघर्षरत स्त्रियों, मज़दूरों और छात्रों-युवाओं को बर्बरता का शिकार बनाकर वे विरोध की आवाज़ों को चुप करा देंगे। वे बार-बार ऐसी ग़लती करते हैं। यहां भी उन्होंने वही ग़लती दोहरायी है। 25 मार्च की पुलिस बर्बरता केजरीवाल सरकार द्वारा दिल्ली के मेहनतकश ग़रीबों को एक सन्देश देने की कोशिश थी और सन्देश यही था कि अगर दिल्ली के ग़रीबों के साथ केजरीवाल सरकार के विश्वासघात के विरुद्ध तुमने आवाज़ उठायी तो तुमसे ऐसे ही क्रूरता के साथ निपटा जायेगा। हमारे घाव अभी ताजा हैं, हममें से कई की टांगें सूजी हैं, उंगलियां टूटी हैं, सिर फटे हुए हैं और शरीर की हर हरकत में हमें दर्द महसूस होता है। लेकिन, इस अन्याय के विरुद्ध लड़ने और अरविंद केजरीवाल और उसकी ‘आप’ पार्टी की घृणित धोखाधड़ी का पर्दाफाश करने का हमारा संकल्प और भी मज़बूत हो गया है।

अस्मितावादी और व्यवहारवादी दलित राजनीति का राजनीतिक निर्वाण

रामविलास पासवान का रिकॉर्ड तो वैसे भी अपनी राजनीतिक निरन्तरता को कायम रखने में बेहद ख़राब रहा है और राजनीतिक फायदे और पद की चाहत में द्रविड़ प्राणायाम करने में वह पहले ही माहिर हो चुके हैं। लेकिन रामदास आठवले की ‘रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया’ और उदित राज की ‘जस्टिस पार्टी’ ने जिस कुशलता और चपलता के साथ अचानक पलटी मारी है, उससे अस्मितावादी दलित राजनीति के पैरोकार काफ़ी क्षुब्ध हैं और उसे अम्बेडकरवाद से विचलन और ग़द्दारी बता रहे हैं। लेकिन हमें ऐसा लगता है कि रामदास आठवले भी पहले इस बात का चयन करने में किसी आलोचनात्मक निर्णय क्षमता का परिचय नहीं देते रहे हैं कि किसकी गोद में बैठकर ज़्यादा राजनीतिक हित साधे जा सकते हैं। सत्ता और शासक वर्ग की दलाली में रामविलास पासवान और रामदास आठवले ने पहले भी ऐसे झण्डे गाड़े हैं और ऐसे किले फतह किये हैं कि उनकी मिसालों को दुहरा पाना किसी के लिए भी एक चुनौतीपूर्ण काम साबित होगा। सबसे ज़्यादा लोग उदित राज के पलटी मारने पर स्यापा कर रहे हैं।

फ़ासीवाद का मुक़ाबला कैसे करें

फ़ासीवाद और प्रतिक्रियावाद दस में से नौ बार जातीयतावादी, नस्लवादी, साम्प्रदायिकतावादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का चोला पहनकर आता है। वैसे तो हमें शुरू से ही बुर्जुआ राष्ट्रवाद के हर संस्करण का पुरज़ोर विरोध करना चाहिए, लेकिन ख़ास तौर पर फ़ासीवादी प्रजाति का सांस्कृतिक अन्धराष्ट्रवाद मज़दूर वर्ग के सबसे बड़े शत्रुओं में से एक है। हमें हर कदम पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, प्राचीन हिन्दू राष्ट्र के गौरव के हर मिथक और झूठ का विरोध करना होगा और उसे जनता की निगाह में खण्डित करना होगा। इसमें हमें विशेष सहायता इन सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों की जन्मकुण्डली से मिलेगी। निरपवाद रूप से अन्धराष्ट्रवाद का जुनून फैलाने में लगे सभी फ़ासीवादी प्रचारक और उनके संगठनों का काला इतिहास होता है जो ग़द्दारियों, भ्रष्टाचार और पतन की मिसालें पेश करता है। हमें बस इस इतिहास को खोलकर जनता के सामने रख देना है और उनके बीच यह सवाल खड़ा करना है कि यह ”राष्ट्र” कौन है जिसकी बात फ़ासीवादी कर रहे हैं? वे कैसे राष्ट्र को स्थापित करना चाहते हैं? और किसके हित में और किसके हित की कीमत पर? ”राष्ट्रवाद” के नारे और विचारधारा का निर्मम विखण्डन – इसके बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते। राष्ट्र की जगह हमें वर्ग की चेतना को स्थापित करना होगा। बुर्जुआ राष्ट्रवाद की हर प्रजाति के लिए ”राष्ट्र” बुर्जुआ वर्ग और उसके हित होते हैं। मज़दूर वर्ग को हाड़ गलाकर इस ”राष्ट्र” की उन्नति के लिए खपना होता है। इसके अतिरिक्त कुछ भी सोचना राष्ट्र-विरोधी है। राष्ट्रवाद मज़दूरों के बीच छद्म गर्व बोध पैदा कर उनके बीच वर्ग चेतना को कुन्द करने का एक पूँजीवादी उपकरण है और इस रूप में उसे बेनकाब करना बेहद ज़रूरी है। यह न सिर्फ मज़दूरों के बीच किया जाना चाहिए, बल्कि हर उस वर्ग के बीच किया जाना चाहिए जिसे भावी समाजवादी क्रान्ति के मित्र के रूप में गोलबन्द किया जाना है।

आनन्द तेलतुम्बडे को जवाबः स्व-उद्घोषित शिक्षकों और उपदेशकों के नाम

तेलतुम्बडे यहाँ असत्य वचन का सहारा ले रहे हैं कि उन्होंने मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद के मिश्रण या समन्वय की कभी बात नहीं की या उसे अवांछित माना है। 1997 में उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में एक पेपर प्रस्तुत किया, ‘अम्बेडकर इन एण्ड फॉर दि पोस्ट-अम्बेडकर दलित मूवमेण्ट’। इसमें दलित पैंथर्स की चर्चा करते हुए वह लिखते हैं, “जातिवाद का असर जो कि दलित अनुभव के साथ समेकित है वह अनिवार्य रूप से अम्बेडकर को लाता है, क्योंकि उनका फ्रेमवर्क एकमात्र फ्रेमवर्क था जो कि इसका संज्ञान लेता था। लेकिन, वंचना की अन्य समकालीन समस्याओं के लिए मार्क्सवाद क्रान्तिकारी परिवर्तन का एक वैज्ञानिक फ्रेमवर्क देता था। हालाँकि, दलितों और ग़ैर-दलितों के बीच के वंचित लोग एक बुनियादी बदलाव की आकांक्षा रखते थे, लेकिन इनमें से पहले वालों ने सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन के उस पद्धति को अपनाया जो उन्हें अम्बेडकरीय दिखती थी, जबकि बाद वालों ने मार्क्सीय कहलाने वाली पद्धति को अपनाया जो कि हर सामाजिक प्रक्रिया को महज़ भौतिक यथार्थ का प्रतिबिम्बन मानती थी।………… अब पाठक ही बतायें कि तेलतुम्बडे जो दावा कर रहे हैं, क्या उसे झूठ की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए? क्या यहाँ पर ‘अम्बेडकरीय’ और ‘मार्क्सीय’ दोनों को ‘अम्बेडकरवाद’ और ‘मार्क्सवाद’ के अर्थों में यानी ‘दो विचारधाराओं’ के अर्थों में प्रयोग नहीं किया गया है? फिर तेलतुम्बडे यह आधारहीन और झूठा दावा क्यों करते हैं कि उन्होंने कभी ‘अम्बेडकरवाद’ शब्द का प्रयोग नहीं किया क्योंकि वह नहीं मानते कि ऐसी कोई अलग विचारधारा है? क्या यहाँ पर उन्होंने अम्बेडकर की विचारधारा और मार्क्स की विचारधारा और उनके मिश्रण की वांछितता की बात नहीं की? हम सलाह देना चाहेंगे कि तेलतुम्बडे के कद के एक जनपक्षधर बुद्धिजीवी को बौद्धिक नैतिकता का पालन करना चाहिए और इस प्रकार सफ़ेद झूठ नहीं बोलना चाहिए।

‘आप’ के उभार के मायने

‘आप’ पूरी पूँजीवादी व्यवस्था को कभी कठघरे में खड़ा नहीं करती। केजरीवाल ने एक कारपोरेट घराने के ‘काम करने के तरीकों’ पर सवाल उठाना शुरू किया था, लेकिन इस मुद्दे पर जल्द ही वह चुप्पी साध गये। बाकी कारपोरेट घरानों पर केजरीवाल ने कभी मुँह तक नहीं खोला। उल्टे पूँजीपति वर्ग को भी वह ‘विक्टिम’ और पीड़ित के रूप में दिखलाते हैं! अपने घोषणापत्र में केजरीवाल लिखते हैं कि कांग्रेस और भाजपा जैसी भ्रष्ट पार्टियों के कारण मजबूर होकर पूँजीपतियों को भ्रष्टाचार करना पड़ता है! यह दोगलेपन की इन्तहाँ नहीं तो क्या है? आप देख सकते हैं कि भ्रष्टाचार के मुद्दे को किस प्रकार नंगी और बर्बर पूँजीवादी लूट को छिपाने के लिए इस्तेमाल किया गया है। पूँजीपति जो श्रम कानूनों का उल्लंघन करते हैं क्या वह मजबूरी के कारण करते हैं? ठेकाकरण क्या वह भ्रष्टाचार से मजबूर होकर करते हैं? यह तो पूरी तस्वीर को ही सिर के बल खड़ा करना है। वास्तव में, सरकार (चाहे किसी की भी हो!) और पूँजीपति वर्ग मिलकर मज़दूरों के विरुद्ध लूट और हिंसा को अंजाम देते हैं! केजरीवाल की इस महानौटंकी के पहले अध्याय के लिखे जाते समय ही दिल्ली के पड़ोस में मारुति सुजुकी के मज़दूरों का संघर्ष चल रहा था लेकिन केजरीवाल ने इस पर एक शब्द नहीं कहा; दिल्ली में ही मेट्रो के रेल मज़दूरों को न्यूनतम मज़दूरी और ठेका प्रथा ख़त्म करने के लिए संघर्ष चल रहा था, इस पर भी केजरीवाल ने एक बयान तक नहीं दिया! क्या केजरीवाल को यह सारी चीज़ें पता नहीं है? ऐसा नहीं है! यह एक सोची-समझी चुप्पी है! मज़दूरों के लिए कुछ कल्याणकारी कदमों जैसे कि पक्के मकान देना आदि की बात करना एक बात है, और मज़दूरों के सभी श्रम अधिकारों के संघर्षों को समर्थन देना एक दूसरी बात।

एरिक हॉब्सबॉमः एक हिस्टोरियोग्राफिकल श्रद्धांजलि

हॉब्सबॉम एक जटिल व्यक्तित्व थे। बौद्धिक ईमानदारी और विपर्यय के दौर में जीने के चलते पैदा होने वाले निराशावाद के द्वन्द्व के कारण यह जटिलता और भी बढ़ जाती है। लेकिन निश्चित तौर पर वह उन भूतपूर्व मार्क्सवादियों से लाख गुना बेहतर बुद्धिजीवी और इंसान थे, जो पूरी तरह से पूँजीवाद और साम्राज्यवाद की गोद में बैठ गये थे और द्वन्द्वमुक्त हो गये थे; न ही हॉब्सबॉम ने कभी मार्क्सवाद में सोचे-समझे तौर पर कोई विकृति पैदा करने की कोशिश की, हालाँकि उनकी समझ पर बहस हो सकती है; हॉब्सबॉम ने कभी मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, स्तालिन और माओ के प्रति कभी कोई असम्मान या गाली-गलौच जैसी निकृष्ट हरकत नहीं की, जैसा कि आजकल के कई राजनीतिक नौदौलतिये कर रहे हैं, जो कि अपने आपको मार्क्सवादी भी कहते हैं; हॉब्सबॉम जीवनपर्यन्त बोल्शेविक क्रान्ति के एजेण्डे से आत्मिक तौर पर जुड़े रहे और लगातार आशाओं के उद्गमों की तलाश करते रहे। लेकिन अनिरन्तर और असंगतिपूर्ण मार्क्सवादी अप्रोच और पद्धति के कारण वह अक्सर अपनी इस तलाश में नाकाम रहे।

मारुति सुजुकी के मज़दूरों का संघर्ष और भारत के ‘‘नव-दार्शनिकों” के “अति-वामपन्थी” भ्रम और फन्तासियाँ

मारुति सुजुकी के मज़दूरों के संघर्ष के इन सकारात्मक नतीजों के बावजूद, इसे एक रैडिकल और आलोचनात्मक दृष्टिकोण से समझना ज़रूरी है। मारुति सुजुकी मज़दूरों के संघर्ष का एक आलोचनात्मक मूल्यांकन आज इसलिए भी और ज़रूरी, बल्कि निहायत ज़रूरी और अत्यावश्यक कार्य हो जाता है, क्योंकि इस समय मज़दूर वर्ग की स्वतःस्फूर्तता का अनालोचनात्मक उत्सव मनाने की प्रवृत्तियाँ देखी जा रही है, और यह प्रवृत्ति क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट आन्दोलन के कुछ हिस्सों के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के राजनीतिक नौदौलतियों के बीच भी खास तौर पर प्रचलित है। जाहिर है कि कोई भी क्रान्तिकारी समूह या बुद्धिजीवी मज़दूर वर्ग के स्वतःस्फूत उभारों का स्वागत करेगा। यद्यपि, ऐसे किसी भी समूह या व्यक्ति की असली जिम्मेदारी ठीक इसी बिन्दु से शुरू होती है, और वह जिम्मेदारी है इस उभार या आन्दोलन के साथ एक आलोचनात्मक अन्तर्क्रिया का सम्बन्ध स्थापित करना, न कि मज़दूर वर्ग की स्वतःस्फूर्तता को ही उत्सव मनाने या अन्धभक्ति करने की विषयवस्तु बना देना।

मज़दूर वर्ग से ग़द्दारी और मार्क्सवाद को विकृत करने का गन्दा, नंगा और बेशर्म संशोधनवादी दस्तावेज़

दस्तावेज़ के अन्त में माकपा ने फिर से कुछ ‘विचारधारात्मक तोपें’ छोड़ी हैं, जैसे कि मार्क्सवाद प्रासंगिक है, उत्तरआधुनिकतावाद ग़लत है, सामाजिक जनवाद ग़लत है (!?) वगैरह! लेकिन आप भी अब तक इस पूरे दस्तावेज़ का असली इरादा समझ गये होंगे। इसका मकसद था मार्क्सवाद और समाजवाद का नाम लेते हुए मार्क्सवाद और समाजवाद के सिद्धान्त को विकृत कर डालना, उसकी क्रान्तिकारी अन्तर्वस्तु को नष्ट कर डालना, और नंगे और बेशर्म किस्म के संशोधनवाद को मार्क्सवाद का नाम देना! लेकिन इन सभी प्रयासों के बावजूद अगर माकपा के इस दस्तावेज़ को कोई आम व्यक्ति भी पंक्तियों के बीच ध्यान देते हुए पढ़े तो माकपा की मज़दूर वर्ग से ग़द्दारी, उसका पूँजीपति वर्ग के हाथों बिकना, उसका बेहूदे किस्म का संशोधनवाद और ‘भारतीय किस्म के समाजवाद’ के नाम पर भारतीय किस्म के पूँजीवाद के लक्ष्य को प्राप्त करने का उसका शर्मनाक इरादा निपट नंगा हो जाता है! इस दस्तावेज़ में माकपा के घाघ संशोधनवादी सड़क पर निपट नंगे भाग चले हैं। मज़दूर वर्ग के इन ग़द्दारों की असलियत को हमें हर जगह बेनक़ाब करना होगा! ये हमारे सबसे ख़तरनाक दुश्मन हैं। इन्हें नेस्तनाबूद किये बग़ैर देश में मज़दूर वर्ग का क्रान्तिकारी राजनीतिक आन्दोलन आगे नहीं बढ़ पायेगा!