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बाबाडम और माताडम: दिव्यता के नये कामुक और बाज़ारू अवतार

बाबाडम और माताडम के बाज़ार का भी एक राजनीतिक अर्थशास्त्र है। वहाँ भी किसी भी अन्य पूँजीवादी बाज़ार के समान प्रतिस्पर्द्धा है। ऐसे में एक नये उपभोक्ता आधार को पैदा करने नयी माँग को समझने को अनिवार्य बना देता है। राधे माँ और इसी प्रकार के नये बाज़ारू बाबाओं और माताओं का उदय इसी माँग की आपूर्ति है। लेकिन इस बाज़ार में भी, ठीक पूँजीवादी समाज के ही समान स्त्रियों की स्थिति अधीनस्थ है और राधे माँ की परिघटना इस बात को ही सिद्ध करती है। स्त्रियों की दिव्य शक्ति का स्रोत हर-हमेशा उसके कुमारी (वर्जिन) होने में निहित होता है मिसाल के तौर पर दुर्गा या काली। किसी पुरुष देवता की पत्नियाँ हर-हमेशा शान्त और निर्मल भाव-मुद्रा में चुपचाप खड़ी या बैठी रहती हैं! एक दौर में सन्तोषी माँ का कल्ट भी पैदा हुआ था और इस पर आयी हिन्दी फिल्म ने इसे काफ़ी बढ़ावा दिया था। लेकिन सन्तोषी माँ का काम घर के झगड़े और कलह निपटाने तक ही सीमित था। उदारीकरण से पहले के दौर में इस प्रकार की देवियों के कल्ट ही निर्मित किये जा सकते थे और जो माताएँ पैदा होती थीं, उनकी धार्मिक वैधता भी इन्हीं कल्टों से निकलती थी। लेकिन उदारीकरण के बाद के दौर में औरतों का मालकरण व वस्तुकरण भी बड़े पैमाने पर हुआ है और इसके अंग के तौर पर ही उनका एक पूँजीवादी समाजीकरण भी हुआ है। इस दौर में शक्ति पंथ की कुमारी देवियों की प्रासंगिकता माताडम के धन्धे में बढ़ना स्वाभाविक है। यह सच है कि राधे माँ स्वयं शादीशुदा है, लेकिन प्रतीकात्मक और लक्षणात्मक स्तर पर उसके तमाम प्रोजेक्टेड रूप उसी इमेजरी को उभारते हैं जो कि एक कुमारी देवी की यौनिक-कामुक व शारीरिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन हूबहू उसी रूप में नहीं जिस रूप में प्राचीन हिन्दू धर्म में होता है। इसका एक नया आधुनिक नवउदारवादी अवतार हमें राधे माँ के तौर पर दिखता है। इण्टरनेट पर लाल मिनी ड्रेस और लाल कैप में राधे माँ की जो तस्वीरें फैल गयीं थीं, उनमें राधे माँ का जो रूप है वह एक डॉमिनेट्रिक्स जैसा है। ज़ाहिर है यह रूप और साथ ही एक आधुनिक ड्रेस में बॉलीवुड के गानों पर नृत्य करते हुए एक बाग़ में उछल-कूद मचाना नवउदारवादी युग के उच्च मध्यवर्ग की पतित फैंसीज़ द्वारा प्रस्तुत माँगों की आपूर्ति करता है।

क्यों ज़रूरी है रूढ़िवादी कर्मकाण्डों और अन्धविश्वासी मान्यताओं के विरुद्ध समझौताहीन संघर्ष?

ग़ौर करने वाली बात यह है कि पूरी दुनिया के हर धर्म में जो रूढ़िवादी परम्पराएँ प्रचिलित हैं उनमें से ज़्यादातर असमानता को सही ठहराती हैं। यही कारण है कि शासक वर्ग शोषित उत्पीड़ित जनता को गुमराह करने के लिए इन कर्मकाण्डों और रूढ़ियों का प्रचार करते हैं। टीवी में, अखबारों में और पत्रिकाओं में इन मूर्खताओं के लिए चलाए जा रहे कई कूपमण्डूक विज्ञापन देखे जा सकते हैं, और साथ ही धर्म गुरुओं के आश्रम भी इन्हीं रूढ़ियों के प्रचार के अड्डे बने हुए हैं जो लोगों को गुमराह करके करोड़ों का धन्धा चला रहे हैं। इन परिस्थितियों में धार्मिक कर्मकाण्डों को मानना और पण्डे-पुजारियों (या मुल्ला-मौलवियों) तथा पितृसत्तात्मक मूल्यों को बढ़ावा देना समाज-विरोधी, प्रगति-विरोधी काम है, जिसे हर व्यक्ति को सचेतन रूप से समझना चाहिए और इनके विरुद्ध वैचारिक रूप से तथा व्यवहारिक रूप में प्रचार करना चाहिए।

अमृतानन्दमयी के कुत्तों, आधुनिक धर्मगुरुओं और विघटित-विरूपित मानवीय चेतना वाले उनके भक्तों के बारे में चलते-चलाते कुछ बातें…

पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली अपनी स्वतःस्फूर्त आन्तरिक गति से धार्मिक विश्वास के पुराने रूपों का पोषण करती है और नये-नये आधुनिक रूपों को जन्म देती रहती है। माल उत्पादन और अधिशेष-विनियोजन की मूल गतिकी जनता की नज़रों से ओझल रहती है और अपने जीवन की तमाम आपदाओं का कारक उसके लिए अदृश्य बना रहता है। इसी अदृश्यता का विरूपित परावर्तन सामाजिक मानस में अलौकिक शक्तियों की अदृश्यता के रूप में होता है। इसी से धार्मिक चेतना नित्य प्रति पैदा होती रहती है और आम लोग अलौकिक शक्तियों और उनके एजेण्टों (धर्मगुरुओं) के शरणागत होते रहते हैं। ये अलग-अलग धर्मगुरु अलग-अलग बीमा कम्पनियों के एजेण्ट के समान होते हैं जो तरह-तरह के प्रॉडक्ट ज़्यादा से ज़्यादा आकर्षक बनाकर उपभोक्ताओं को बेचते रहते हैं।

श्री श्री रविशंकर और बाबागीरी का राजनीतिक अर्थशास्त्र

‘भारत एक बाबा-प्रधान देश है!’ यहाँ किसिम-किसिम के बाबा पाये जाते हैं। और हर बाबा के पीछे उनके ‘चेलों’ या ‘भक्तों’ की एक वफ़ादार फौज भी चलती है। चूँकि यहाँ हम एक पूँजीवादी समाज की बात कर रहे हैं, जहाँ हर वस्तु/सेवा एक माल होती है और बाज़ार के लिए पैदा की जाती है। ऐसे में, इस समाज में बाबाओं द्वारा बाँटा गया ‘ज्ञान’ या फिर अपने चेलों-भक्तों के दुखों के निवारण के लिए प्रदान की गई ‘सेवा’ भी एक माल है और इन सभी बाबाओं का भी एक बाज़ार होता है। लेकिन जैसे कि पूँजीवाद में उत्पादित हर माल सबके लिए नहीं होता (जिसकी कूव्वत (यानी कि आर्थिक क्षमता) होती है, वही उसको ख़रीद सकता है, उसका उपभोग कर सकता है), उसी प्रकार बाबाओं द्वारा दी गई ‘सेवा’ भी हर किसी के लिए नहीं होती। सीधे-सपाट शब्दों में कहें तो, बाबाओं का बाज़ार भी वर्ग-विभाजित होता है।

एक साजि़श जिससे जनता की चेतना पथरा जाए

‘‘पूँजीवाद न सिर्फ विज्ञान और उसकी खोजों का मुनाफ़े के लिए आदमखोर तरीके से इस्तेमाल कर रहा है बल्कि आध्यात्म और धर्म का भी वह ऐसा ही इस्तेमाल कर रहा है। इसमें आध्यत्मिकता और धर्म का इस्तेमाल ज़्यादा घातक है क्योंकि इसका इस्तेमाल जनता के नियन्त्रण और उसकी चेतना को कुन्द और दास बनाने के लिए किया जाता है। पूँजीवाद विज्ञान की सभी नेमतों का उपयोग तो करना चाहता है परन्तु विज्ञान और तर्क की रोशनी को जनता के व्यापक तबकों तक पहुँचने से रोकने के लिए या उसे विकृत रूप में आम जनसमुदायों में पहुँचाने के लिए हर सम्भव प्रयास करता है।”

धार्मिकता बनाम तार्किकता

यह पहली घटना नहीं थी जब धार्मिक अन्धविश्वास व इन तथाकथित आध्यात्मिक प्रचारकों के पाखण्ड के चलते लोग मौत का शिकार हुए हों। जनवरी 2005 में हिमाचल में नैना देवी मन्दिर में भगदड़ से ही 340 लोग मारे गए। 2008 में राजस्थान के चामुण्डा देवी मन्दिर में भगदड़ से 216 मौतें हुई। जनवरी 2010 में कृपालु महाराज के आश्रम में 63 मौतें हुई। जनवरी 2011 को केरल के सबरीवाला में 104 लोग मारे गए। इन सबके अलावा मुहर्रम व अन्य धार्मिक उत्सवों पर भी मचने वाली भगदड़ों में लोग मौत का शिकार होते हैं। रोजाना पीरों, फकीरों व झाड़फूँक के चक्कर में होने वाली मौतों का तो हिसाब ही नहीं है जो सामने नहीं आ पाती। इस प्रकार की तमाम घटनाएँ यह दर्शाती है कि अन्धविश्वासों से होने वाली मौतें किसी भी तरह से धार्मिक कट्टरता से होने वाली मौतों से कम नहीं हैं। मानव जीवन का इस तरह से समाप्त होना कई प्रश्नों को खड़ा कर देता है।