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स्त्री मुक्ति का रास्ता पूँजीवादी संसद में आरक्षण से नहीं समूचे सामाजिक-आर्थिक ढाँचे के आमूल परिवर्तन से होकर जाता है!

संसद में महिलाओं को आरक्षण? एक ऐसे निकाय में आरक्षण को लेकर बहस और झगड़े का क्या अर्थ है जो किसी भी रूप में जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करता; जो जनता को गुमराह करने के लिए की जाने वाली बहसबाज़ी का अड्डा हो; जो पूँजीपतियों के मामलों का प्रबन्धन करने वाला एक निकाय हो। जो संसद वास्तव में देश की जनता का प्रतिनिधित्व करती ही नहीं है, उसमें स्त्रियों को आरक्षण दे दिया जाय या न दिया जाय, इससे क्या फर्क पड़ने वाला है? संसद में महिला आरक्षण को लेकर आम जनता की ताक़तों का बँट जाना नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के मुद्दे पर बँट जाने से भी अधिक विडम्बनापूर्ण है।