Category Archives: छात्र आन्‍दोलन

पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्रों का बहादुराना संघर्ष ज़िन्दाबाद

11 अप्रैल की घटना के बाद संघर्ष को पीठ दिखाकर ‘जॉइंट एक्शन कमेटी’ से बाहर हो जाने वाले संगठनों –सोई, स्टूडैंट काउंसिल, एन.एस.यू.आयी, पुसु, ए.बी.वी.पी, आदि –जो 11 अप्रैल के पथराव वाली घटना का सारा दोष छात्रों पर मढ़ रहे थे और खासकर आरएसएस का छात्र संगठन एबीवीपी तो निजी तौर पर संघर्षशील छात्रों को निशाना बना रहा था ताकि पुलिस उनको गिरफ़्तार कर ले। ये लोग अब बेहद बेशर्मी साथ इस जीत का सेहरा अपने सिर बाँधना चाहते हैं। परन्तु छात्र जानते हैं कि कौन खरा है, कौन पूरे संघर्ष दौरान छात्रों का पक्ष लेता रहा है और कौन प्रशासन और सरकार का टट्टू बन बैठा रहा है! इस जीत ने न सिर्फ़ छात्रों के मन में ऊर्जा का संचार किया है, बल्कि एक क्रान्तिकारी संगठन की ज़रूरत का एहसास भी पक्का किया है। साथ ही, इस संघर्ष ने अपना नाम चमकाने के लिये बैठे संगठनों का चरित्र भी नंगा किया है।

कॉलेज प्रशासन के तानाशाहीपूर्ण रवैये के ख़िलाफ़ ‘पटना आर्ट कॉलेज’ के छात्रों का आन्दोलन

लगभग डेढ़ महीने तक प्रशासन और मौजूदा नितीश सरकार चुप्पी साधे रहे और इनके द्वारा आन्दोलन को तोड़ने की कोशिशें होती रही पर छात्र अपनी माँगों को लेकर डटे रहे| आखिर में लगातार हो रहे प्रदर्शन के दबाव में अन्ततः वि.वि. प्रशासन ने निलम्बित छात्रों की अस्थाई वापसी व प्राचार्य को एक महीने की छुट्टी देने का फैसला किया है परन्तु अभी भी कॉलेज में स्थायी प्राचार्य की बहाली नहीं की गयी है|

फासीवादी हमले के विरुद्ध ‘जेएनयू’ में चले आन्दोलन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवाल

कोई भी आन्दोलन जब व्यक्ति केन्द्रित होता है या ‘से‍क्टेरियन’ राजनीति का शिकार होता है तो अपनी तमाम उर्वर सम्भावनाओं के बावजूद वह सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक प्रतिरोध के तौर पर प्रभावी होने की क्षमता खो बैठता है। वह आन्दोलन किसी धूमके‍तु की तरह आकाश में बस चमक कर रह जाता है। कुछ लोगों या संगठनों के नाम अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियाँ बनते हैं और फ़िर वे इन्हें अपने-अपने फायदे के अनुसार भुनाते हैं। व्यापक राजनीति‍ के साथ यह धोखाधड़ी और मौकापरस्ती इतिहास के इस कठिन दौर में जब फासीवाद इस कदर समाज पर छा रहा है और पूरी दुनिया में प्रतिक्रियावाद और कट्टरपन्थ का दौर है, बेहद महँगा साबित होने जा रहा है।

एफ.टी.आई.आई. के छात्रों का संघर्ष: लड़ाई अभी जारी है!

12 जून 2015 को शुरू हुआ पुणे के फिल्म एण्ड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इण्डिया (भारत फिल्म और टेलीविजन संस्थान) के छात्रों का संघर्ष 139 दिन लम्बी चली हड़ताल के ख़त्म होने के बावजूद आज भी जारी है। 139 दिनों तक चली इस हड़ताल के दौरान देश भर के छात्रों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों, फिल्मकारों, मज़दूर कार्यकर्ताओं और आम जनता ने खुलकर एफ.टी.आई.आई. के छात्रों की हड़ताल का समर्थन किया। 24 फिल्मकारों ने अपने राष्ट्रीय पुरस्कार वापिस किये जिनमें एफ.टी.आई.आई. के पूर्व अध्यक्ष सईद अख़्तर मिर्ज़ा, ‘जाने भी दो यारो’ फिल्म बनाने वाले कुंदन शाह, संजय काक आदि जैसे फिल्मकार शामिल थे। बार-बार सरकार के सामने अपनी माँगों को रखने और उनसे उन्हें संज्ञान में लेते हुए उनकी सुनवाई करने की अपीलों के बावजूद भी मोदी की फ़ासीवादी सरकार ने अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचलते हुए इस पूरे मामले पर चुप्पी साधे रखी। नरेन्द्र दाभोलकर, गोविन्द पानसरे और कलबुर्गी जैसे बुद्धिजीवियों की हत्या, दादरी में अख़लाक की हत्या, देश में बढ़ रहे फासीवादी आक्रमण और संघी गुण्डों की मनमर्ज़ी की पृष्ठभूमि में एफ.टी.आई.आई.के छात्रों के संघर्ष को संघ के भगवाकरण और हिन्दुत्व के मुद्दे से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। एफ.टी.आई.आई. की स्वायत्तता पर हमला देश के शिक्षण संस्थानों और कला के केन्द्रों के भगवाकरण के फ़ासीवादी एजेण्डे का ही हिस्सा है। गजेन्द्र चौहान, अनघा घैसास, राहुल सोलपुरकर, नरेन्द्र पाठक, शैलेश गुप्ता जैसे लोगों की एफ.टी.आई.आई. सोसाइटी में नियुक्ति की खबर के बाद 12 जून को शुरू हुई हड़ताल ने देश के सभी छात्रों को भगवाकरण की इस मुहिम के ख़िलाफ़ एकजुट कर दिया।

ऑक्यूपाई यूजीसी आन्दोलनः शिक्षा का यह संघर्ष, संघर्ष की सोच को बचाने का संघर्ष है

वर्तमान सरकार उच्च शिक्षा को विश्व व्यापार संगठन में शामिल करने के लिए प्रतिबद्ध है। दिसम्बर 2015 के दोहा बैठक में उच्च शिक्षा को गैट (जनरल एग्रीमेण्ट ऑन ट्रेड) के तहत लाने का प्रस्ताव था। भारत सरकार ने इस मुद्दे पर दोहा सम्मलेन में कोई विरोध दर्ज नहीं किया और न ही इसको चर्चा के लिए खोला। इससे यह स्पष्ट है कि भारत सरकार उच्च शिक्षा में डब्ल्यूटीओ के समझौते को लाने वाली है। एक बार अगर उच्च शिक्षा को इस समझौते के तहत लाया जाता है तो न तो सरकार किसी भी सरकारी विश्वविद्यालय को कोई अनुदान देगी और न ही शिक्षा से सम्बन्धित अधिकार संविधान के दायरे में होंगे। क्योंकि किसी भी देश के लिए जो डब्ल्यूटीओ और गैट्स पर हस्ताक्षर करता है उसके लिए इसके प्रावधान बाध्यताकारी होते हैं। इससे देश में रहा-सहा उच्च शिक्षा का ढाँचा भी तबाह हो जायेगा और यह इतना महँगा हो जायेगा कि देश की ग़रीब जनता की बात तो दूर मध्यवर्ग के एक ठीक-ठाक हिस्से के लिए भी यह दूर की कौड़ी होगा। एमिटी यूनिवर्सिटी, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी और शारदा यूनिवर्सिटी तथा अन्य निजी शिक्षा संस्थानों की फीस आज भी सामान्य पाठ्क्रमों के लिए 50,000 से 1,00,000 रुपये प्रति सेमेस्टर है। अगर यह समझौता उच्च शिक्षा में लागू होता है तो जहाँ एक और देशी-विदेशी पूँजीपतियों के लिए शिक्षा से मुनाफा वसूलने की बेलगाम छूट मिल जायेगी वहीं जनता से भी शिक्षा का मौलिक अधिकार छिन जायेगा। जिस तरह से आज सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा के बाद निजी अस्पतालों का मुनाफा लोगों की ज़िन्दगी की कीमतों पर फल रहा है उसी तरह शिक्षा के रहे-सहे ढाँचे में जो थोड़ी बहुत ग़रीब आबादी आम घरों से पहुँच रही है वह भी बन्द हो जायेगी। इस प्रकार यह पूरी नीति हमारे बच्चों से न सिर्फ़ उनके पढ़ने का अधिकार छीन लेगी वरन उनसे सोचने, सपने देखने का हक भी छीनेगी।

कुछ अहम सवाल जिनका जवाब जाति उन्मूलन की ऐतिहासिक परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए अनिवार्य है

अभी हमारी चर्चा का मूल विषय है एक निहायत ज़हीन, संजीदा, इंसाफ़पसन्द नौजवान की असमय मौत और उसके नतीजे के तौर पर हमारे सामने उपस्थित कुछ यक्षप्रश्न जिनका उत्तर दिये बग़ैर हम जाति के उन्मूलन की ऐतिहासिक परियोजना में ज़रा भी आगे बढ़ने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। कार्ल सागान जैसा वैज्ञानिक बनने की आकांक्षा रखने वाले रोहित ने आत्महत्या क्यों की? तारों की दुनिया, अन्तरिक्ष और प्रकृति से बेपनाह मुहब्बत करने वाले इस नौजवान ने जीवन की बजाय मृत्यु का आलिंगन क्यों किया? वह युवा जो इंसानों से प्यार करता था, वह इस कदर अवसाद में क्यों चला गया? वह युवा जो न्याय और समानता की लड़ाई में अगुवा कतारों में रहा करता था और जिसकी क्षमताओं की ताईद उसके विरोधी भी किया करते थे, वह अचानक इस लड़ाई और लड़ाई के अपने हमसफ़रों को इस तरह छोड़कर क्यों चला गया? इन सवालों की पहले ही तमाम क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और छात्र-युवा साथियों ने अपनी तरह से जवाब देने का प्रयास किया है। हम कोई बात दुहराना नहीं चाहते हैं और इसलिए हम इस मसले पर जो कुछ सोचते हैं, उसके कुछ अलग पहलुओं को सामने रखना चाहेंगे।

क्यों संघर्षरत हैं हम एफ़.टी.आई.आई. के लिए?

एफटीआईआई के छात्र विकास उर्स ने कहा कि इस हड़ताल ने उनके विश्व दृष्टिकोण को विस्तारित किया है, यह हड़ताल एफटीआईआई के छात्रों के लिए एक सीखने का तर्जुबा रहा है जिसके ज़रिये उन्हें अपनी कक्षाओं से भी कही ज्यादा ज्ञान मिला। विकास ने आगे कहा कि एफटीआईआई एक अकेला ऐसा कला और शिक्षा का संस्थान नहीं है जहाँ सरकार अपने राजनीतिक हित को साधने के लिए भगवाकरण की नीति लागू कर रही है। अम्बेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल से लेकर, सी.बी.एफ.सी, सी.एफ.एस.आई आदि भी इस सरकार के निशाने पर रह चुके हैं। विकास ने बताया कि किस तरह उनके संघर्ष को कुचलने के लिए उनके ख़िलाफ़ फर्जी एफआईआर दर्ज़ करवाई जा रही है और छात्रों पर दबाव बनाया जा रहा है कि वह अपनी हड़ताल खत्म कर दें। एफटीआईआई की साक्षी गुलाटी ने कहा कि हमारा संघर्ष इस देश के बाकी शिक्षा संस्थानों और कला के केन्द्रों पर हो रहे भगवाकरण के हमलों से कटा हुआ नहीं है बल्कि यह संघर्ष भी उसी बड़ी लड़ाई का हिस्सा है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में एक शोध छात्रा के साथ हुए यौन शोषण के खिलाफ़ विरोध-प्रदर्शन

ग़ौरतलब है कि सेण्ट स्टीफेंस कॉलेज के प्रिंसिपल थम्पू तमाम तरीकों से आरोपी को बचा रहे हैं। कॉलेज के तमाम तथाकथित प्रगतिशील लोग भी मसले पर चुप्पी साधे बैठे हैं। कुछ ने तो पीड़ित छात्र के ही चरित्र को प्रश्नों के दायरे में लाने का प्रयास किया है। ऐसे स्त्री-विरोधी कदमों को छात्रों को एकजुट होकर विरोध करना चाहिए। दिशा छात्र संगठन के प्रतिनिधियों ने पूछा कि “स्त्री सुरक्षा” के नाम पर कॉलेज प्रशासन व कुछ शिक्षक गण हॉस्टलों में छात्राओं पर तरह-तरह की पाबन्दियाँ लगाते हैं। रात में आने का वक़्त आठ बजे कर दिया जाता है, नाइट आउट व लेट नाइट की आज्ञा देने पर रोक लगा दी जाती है। लेकिन वास्तव में तो प्रशासन और कॉलेज के भीतर ही छात्रओं का यौन-उत्पीड़न हो रहा है। यह दिखाता है कि स्त्री सुरक्षा के नाम पर छात्राओं पर तरह-तरह की रोक लगायी जाती है, जबकि उनका उत्पीड़न कॉलेजों, विभागों आदि की भीतर ही किया जाता है। छात्रों-छात्राओं को मिलकर विश्वविद्यालय में इस माहौल के ख़िलाफ़ एक लम्बा संघर्ष छेड़ना होगा।

दिल्ली विश्वविद्यालय में 2014-15 के अकादमिक सत्र से सीबीसीएस लागू होने के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन

इसके अंतर्गत किया यह जा रहा है की सभी कॉलेजों को समान संस्तर पर लाने का जुमला उछाल कर उनका पूरा स्तर गिराया जायेगा ताकि विदेशी प्राइवेट विश्वविद्यालयों का धंधा चल सके। यह फैसला भी प्रशासन ने छात्रों-शिक्षकों से बिना सलाह मशविरा लिए लागू कर दिया। शिक्षा को पूरी तरह एक बिकाऊ माल में तब्दील करने की कोशिश की जा रही है और आम मेहनतकश जनता की पहुँच से शिक्षा को दूर ले जाया जा रहा है। इन्हीं छात्र विरोधी नीतियों के खिलाफ दिशा छात्र संगठन अन्य शिक्षक व छात्र संगठनो के साथ एक संयुक्त मोर्चे के तहत संघर्षरत है। जहाँ लगातार इन छात्र-विरोधी नीतियों के खिलाफ़ आवाज़ उठायी जा रही है जिसमें 4 जून को अभी यूजीसी पर विरोध प्रदर्शन किया गया जहाँ यह माँग की गई कि सीबीसीएस को वापस लिया जाये। 9 जून को जन्तर-मन्तर पर विरोध प्रदर्शन किया गया- उसके साथ ही छात्रों व आम नागरिकों के बीच इसके ख़िलाफ प्रचार अभियान चलाया गया व हस्ताक्षर जुटाया गया। एक अभियान की शक्ल में 5 से 25 जून तक विश्वविद्यालय परिसर में मौजूद नवागंतुक छात्रों के बीच इन छात्र-विरोधी नीतियों का पर्दाफाश किया गया।

एफ़.टी.आई.आई. के छात्रों का संघर्ष ज़िन्दाबाद

एफ़.टी.आई.आई. पर मौजूदा हमला कोई अलग-थलग अकेली घटना नहीं है। यह एक ट्रेण्ड का हिस्सा है। यह एक फ़ासीवादी राजनीतिक एजेण्डा का अहम हिस्सा है, ठीक उसी प्रकार जिस तरह से मज़दूरों और ग़रीब किसानों के हक़ों पर हमला और अम्बानियों-अदानियों के लिए देश को लूट की खुली चरागाह बना देना भी इस फासीवादी एजेण्डा का अहम अंग है। बेर्टोल्ट ब्रेष्ट ने 1937 में लिखा था, हमें तुरन्त या सीधे तौर पर इस बात का अहसास नहीं हुआ कि यूनियनों और कैथेड्रलों या संस्कृति की अन्य इमारतों पर हमला वास्तव में एक ही चीज़ था। लेकिन ठीक यही जगह थी जहाँ संस्कृति पर हमला किया जा रहा था।—अगर चीज़ें ऐसी ही हैं—अगर हिंसा की वही लहर हमसे हमारा मक्खन और हमारे सॉनेट्स दोनों ही छीन सकती है; और अगर, अन्ततः, संस्कृति वाकई एक इतनी भौतिक चीज़ है, तो इसकी हिफ़ाज़त के लिए क्या किया जाना चाहिए?” और अन्त में ब्रेष्ट स्वयं ही इसका जवाब देते हैं, “—वह संस्कृति महज़ केवल किसी स्पिरिट का उद्भव नहीं है बल्कि सबसे पहले यह एक भौतिक चीज़ है। और भौतिक हथियारों के साथ ही इसकी रक्षा हो सकती है।” एफ़.टी.आई.आई. पर यह हमला केवल एक शिक्षा संस्थान पर हमला नहीं है बल्कि यह हमला है कला के उस स्रोत पर जिसका इस्तेमाल ये फ़ासीवादी अपने फायदे के लिए करना चाहते हैं।