Category Archives: संशोधनवाद

चीन का आगामी ऋण संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक तीखा मोड़

सभी अर्थशास्त्री यह अनुमान लगा रहे हैं कि यह ऋण संकट आने वाले समय में दो रुख ले सकता है –या तो अमेरिकी तर्ज़ पर बैंकों के बड़े स्तर पर दिवालिया होने की ओर बढ़ सकता है और या फिर जापानी तर्ज़ पर चीन लम्बे समय के लिये बेहद कम आर्थिक वृद्धि दर का शिकार हो सकता है। और यह दोनों ही सूरतेहाल चीनी अर्थव्यवस्था के लिये और पूरे वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिये भयानक है। हड़बड़ाहट में बुर्जुआ अर्थशास्त्री चीन पर अब इलज़ाम लगा रहे हैं कि उसने अपने ऋण को कंट्रोल में क्यों नहीं रखा, क्यों इस की मात्रा इतनी बढ़ने दी। दरअसल यह संकट के समय आपस में तीखे हो रहे पूँजीवादी अन्तर्विरोधों का ही इज़हार हो रहा है।

सिरिज़ा की विजय पर क्रान्तिकारी ताक़तों को ख़ुश क्यों नहीं होना चाहिए

सिरिज़ा ने सरकार बनते वक़्त ही देश के पूँजीपतियों और कारपोरेट घरानों के डर को दूर करते हुए कहा था कि उन्हें सिरिज़ा सरकार से डरने की ज़रूरत नहीं है। सिरिज़ा की राजनीति स्पष्ट तौर पर क्रान्तिकारी परिवर्तन का निषेध करती है। सिप्रास ने एक बार कहा था कि उनकी पार्टी बोल्शेविक विचारधारा को नहीं मानती है और ‘शीत प्रासाद पर धावे’ का युग बीत चुका है। स्पष्ट तौर पर नयी समाजवादी क्रान्तियों में शीत प्रासाद पर धावे जैसी कोई चीज़़़ होगी, इसकी अपेक्षा करना बेकार है। लेकिन सिप्रास का ‘शीत प्रासाद पर धावे’ वाक्यांश का प्रयोग वास्तव में क्रान्तिकारी रास्ते से व्यवस्था-परिवर्तन के लिए एक रूपक था और उनके अनुसार वास्तव में बल प्रयोग से एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग से सत्ता छीनने के प्रयास ही व्यर्थ हैं। चुनाव जीतकर सरकार बनाने के बाद सिरिज़ा सरकार वही कर रही है जो कि उसकी राजनीतिक विचारधारा है– एक नये किस्म की सामाजिक जनवादी विचारधारा, एक किस्म का नवसंशोधनवाद! सामाजिक जनवाद के इस नये अवतरण में बुर्जुआ नारीवाद, अस्मितावाद, एनजीओ-ब्राण्ड ‘सामाजिक आन्दोलन’, तृणमूल जनवाद, भागीदारी जनवाद आदि जैसी विश्व बैंक पोषित अवधारणाओं का छौंका लगाया गया है। इस नये छौंके से इस सामाजिक जनवादी चरित्र प्रतीतिगत तौर पर कुछ धुँधला हो जाता है और इसके जुमले गर्म हो जाते हैं। लेकिन वास्तव में इस नये सामाजिक जनवाद का कार्य वही है जो पुराने सामाजिक जनवाद का था– पूँजीवादी व्यवस्था की आख़िरी सुरक्षा पंक्ति की भूमिका निभाना!

मज़दूर वर्ग से ग़द्दारी और मार्क्सवाद को विकृत करने का गन्दा, नंगा और बेशर्म संशोधनवादी दस्तावेज़

दस्तावेज़ के अन्त में माकपा ने फिर से कुछ ‘विचारधारात्मक तोपें’ छोड़ी हैं, जैसे कि मार्क्सवाद प्रासंगिक है, उत्तरआधुनिकतावाद ग़लत है, सामाजिक जनवाद ग़लत है (!?) वगैरह! लेकिन आप भी अब तक इस पूरे दस्तावेज़ का असली इरादा समझ गये होंगे। इसका मकसद था मार्क्सवाद और समाजवाद का नाम लेते हुए मार्क्सवाद और समाजवाद के सिद्धान्त को विकृत कर डालना, उसकी क्रान्तिकारी अन्तर्वस्तु को नष्ट कर डालना, और नंगे और बेशर्म किस्म के संशोधनवाद को मार्क्सवाद का नाम देना! लेकिन इन सभी प्रयासों के बावजूद अगर माकपा के इस दस्तावेज़ को कोई आम व्यक्ति भी पंक्तियों के बीच ध्यान देते हुए पढ़े तो माकपा की मज़दूर वर्ग से ग़द्दारी, उसका पूँजीपति वर्ग के हाथों बिकना, उसका बेहूदे किस्म का संशोधनवाद और ‘भारतीय किस्म के समाजवाद’ के नाम पर भारतीय किस्म के पूँजीवाद के लक्ष्य को प्राप्त करने का उसका शर्मनाक इरादा निपट नंगा हो जाता है! इस दस्तावेज़ में माकपा के घाघ संशोधनवादी सड़क पर निपट नंगे भाग चले हैं। मज़दूर वर्ग के इन ग़द्दारों की असलियत को हमें हर जगह बेनक़ाब करना होगा! ये हमारे सबसे ख़तरनाक दुश्मन हैं। इन्हें नेस्तनाबूद किये बग़ैर देश में मज़दूर वर्ग का क्रान्तिकारी राजनीतिक आन्दोलन आगे नहीं बढ़ पायेगा!

नोनाडांगा के विस्थापितों का आन्दोलन और ममता की ”ममता”

पिछले चन्द महीनों की घटनाओं ने पश्चिम बंगाल की जनता और बुद्धिजीवियों को एहसास करा दिया है कि ममता के ‘माँ-माटी-मानुष’ और माकपा के ‘बाज़ार समाजवाद’ में कोई फर्क नहीं है। चुनाव के बाद सिर्फ इतना बदलाव हुआ है कि शासन-प्रशासन में माकपा समर्थकों, गाँव-शहर के गली-मुहल्लों-बस्तियों में माकपा के गुण्डा गिरोह ‘हरमद वाहिनी’ का स्थान प्रशासनिक तंत्र में तृणमूल समथर्कों और गाँव-शहर के गली-मुहल्लों-बस्तियों में तृणमूल के गुण्डा-गिरोह ‘भैरव वाहिनी’ ने ले ली है। गुण्डों की नामपट्टिका बदल गई है, लेकिन गुण्डई कायम है। यही तृणमूल कांग्रेस की राजनीति है और यही उसका असली चरित्र है। नन्दीग्राम और सिंगूर के आन्दोलन में ममता की भूमिका से बंगाल की आम जनता ही नहीं, बहुत से बुद्धिजीवी और क्रान्तिकारी वाम धारा से जुड़े कुछ ग्रुप भी ख़ासे प्रभावित थे। यही लोग अब ममता के मुख्यमंत्री बनते ही उनके व्यवहार में नाटकीय बदलाव से हैरान हैं और इसे तृणमूल कांग्रेस द्वारा जनता से विश्वासघात बता रहे हैं। इसे उनका भोलापन न कहें तो क्या जाये? क्या ये लोग ममता बनर्जी का इतिहास नहीं जानते थे? क्या ये भूल गये थे कि सामाजिक बदलाव का सपना देखने वाले हज़ारों नौजवानों का ख़ून बहाकर नक्सलवादी आन्दोलन का बर्बर दमने करने वाले सिद्धार्थ शंकर रे के मुख्यमंत्रित्व के दौरान ममता बनर्जी उनकी ख़ास चेली थी। यह वही ममता हैं जिन्होंने पश्चिम बंगाल में जयप्रकाश नारायण के काफिले में अपनी गुण्डा वाहिनी को लेकर हुड़दंग मचाया था, जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर चढ़ कर नारेबाज़ी की थी और उनकी कार के शीशे तोड़ दिये थे। जयप्रकाश नारायण के ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ की पोल तो समय ने खोल दी, लेकिन उनके नेतृत्व में जो आपातकाल-विरोधी आन्दोलन चल रहा था, पश्चिम बंगाल में उस पर ममता बनर्जी की अगुवाई में असामाजिक तत्वों ने जमकर हमला किया।

इतने शर्मिंदा क्यों हैं प्रो. एजाज़ अहमद?

किसी भी क्रान्तिकारी मार्क्‍सवादी की पहचान जिन बातों से होती है उनमें से एक यह है कि वह अपने विचारों को छिपाता नहीं है; और दूसरी अहम बात यह होती है कि वह अपने विचारों को लेकर शर्मिन्दा भी नहीं होता। इन कसौटियों को ध्यान में रखें तो आप प्रो. एजाज़ अहमद से यह सवाल पूछ सकते हैं कि आप अपने विचारों को लेकर इतने शर्मिंदा क्यों हैं? आप यह भी पूछ सकते हैं कि आप इतने हताश क्यों हैं?

खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेशः समर्थन, विरोध और सही क्रान्तिकारी अवस्थिति

पूँजीवादी विकास की नैसर्गिक गति छोटी पूँजी को तबाह करेगी ही करेगी और छोटे उत्पादकों, उद्यमियों और व्यापारियों के एक बड़े हिस्से को बरबाद कर सर्वहारा की कतार में ला खड़ा करेगी। ऐसे में, एक वैज्ञानिक क्रान्तिकारी का काम इस छोटी पूँजी को ज्यों-का-त्यों बचाये रखने की गुहार लगाना नहीं, बल्कि इस टटपुंजिया वर्ग में और ख़ास तौर इसके सबसे निचले हिस्सों में (जिसमें कि वास्तव में अर्द्धसर्वहाराओं की बहुसंख्या है) यह क्रान्तिकारी प्रचार करना है कि पूँजीवादी व्यवस्था में छोटी पूँजी की यही नियति है और पूँजीवादी व्यवस्था और समाज के दायरे में रहते हुए इस तबाही और बरबादी से छोटा निम्न पूँजीपति वर्ग नहीं बच सकता है। अगर उसे इस नियति से बचना है तो उसे इस व्यवस्था की चौहद्दी के पार सोचना होगा; एक ऐसी व्यवस्था के बारे में सोचना होगा जो हरेक नागरिक को रोज़गार, शिक्षा, चिकित्सा, आवास और हर प्रकार की बुनियादी सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा मुहैया करा सके। ऐसी व्यवस्था एक समाजवादी व्यवस्था ही हो सकती है। पूँजीवाद का यही एकमात्र सही, व्यावहारिक और वैज्ञानिक विकल्प है।

पश्चिम बंगाल : भारतीय वामपन्थ का संकट या संशोधनवादी सामाजिक फ़ासीवाद से खुले प्रतिक्रियावादी पूँजीवाद की ओर संक्रमण?

पश्चिम बंगाल में बीते विधानसभा में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी)-नीत वाम मोर्चे की करारी हार के बाद जो दृश्य उपस्थित हुआ वह संशोधनवादी वामपन्थ ‘‘यानी, नाम में मार्क्‍सवादी, काम में पूँजीवादी’’ के पतन पर हमेशा ही उपस्थित होता है। पूरा मीडिया इसे वामपन्थ/मार्क्‍सवाद/कम्युनिज़्म के पतन की संज्ञा दे रहा था; खुले तौर पर पूँजीवादी (लोकतान्त्रिक!) अन्य पार्टियाँ भी यही गाना गा रही थीं। कुल मिलाकर, देश के पूँजीपति वर्ग की अगुवाई करने वालों ने हमेशा की तरह इस अवसर का पूरा लाभ उठाने की कोशिश की। 1989 में बर्लिन की दीवार गिरने, 1990 में सोवियत संघ के पतन और 1976 के बाद चीन में ‘‘बाज़ार समाजवाद” का जुमला उछलने के बाद विश्व-भर के पूँजीवादी मीडिया ने भी यही उन्मादी शोर मचाया था कि यह मार्क्‍सवाद की पराजय है। यह बेहद नैसर्गिक है कि पूँजीवादी मीडिया ऐसा करे।

साम्राज्यवाद की सेवा का मेवा

पिछले कुछ समय में जिन लोगों को शान्ति का नोबेल पुरस्कार दिया गया है, उसने तो नोबेल की विश्वसनीयता पर ही प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया है। अब बराक ओबामा, अल-गोर, हेनरी किसिंगर जैसे साम्राज्यवादी हत्यारों को क्या सोचकर नोबेल का शान्ति पुरस्कार दिया गया है, इस पर अलग से अनुसन्धान की आवश्यकता पड़ेगी! कुल मिलाकर, इस बार लियू ज़ियाओबो को जो नोबेल शान्ति पुरस्कार मिला है और अतीत में जिन शान्तिदूतों को यह पुरस्कार दिया जाता रहा है, वह नोबेल पुरस्कार के पीछे काम करने वाली पूरी राजनीति का चेहरा साफ कर देता है।

चीन के सामाजिक फासीवादी शासकों का चरित्र एक बार फिर बेनकाब

1976 में माओ की मृत्यु के बाद से चीन ने समाजवाद के मार्ग से विपथगमन किया और देघपन्थी ‘‘बाज़ार समाजवाद’‘ का चोला अपना लिया। इसके बाद से मेहनतकश आबादी की जीवन स्थितियाँ लगातार रसातल में जा रही हैं। हर साल कोयला खदानों में ही हज़ारों मज़दूर अपनी जान गवाँ देते हैं तो दूसरी तरफ समाजवादी व्यवस्था की ताकत की नींव पर खड़े होकर संशोधनवादी शासक आज साम्राज्यवादी ताकत के रूप में उभर रहे हैं। यही कारण है कि चीन में अरबपतियों और करोड़पति पूँजीपतियों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। 2006 की ‘फॉर्चून’ पत्रिका के अनुसार दुनिया के अरबपतियों की सूची में सात चीनी उद्योगपति थे। ये तस्वीरें चीन में अमीर-ग़रीब की बढ़ती खाई को दिखाती हैं।

स्त्री मुक्ति का रास्ता पूँजीवादी संसद में आरक्षण से नहीं समूचे सामाजिक-आर्थिक ढाँचे के आमूल परिवर्तन से होकर जाता है!

संसद में महिलाओं को आरक्षण? एक ऐसे निकाय में आरक्षण को लेकर बहस और झगड़े का क्या अर्थ है जो किसी भी रूप में जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करता; जो जनता को गुमराह करने के लिए की जाने वाली बहसबाज़ी का अड्डा हो; जो पूँजीपतियों के मामलों का प्रबन्धन करने वाला एक निकाय हो। जो संसद वास्तव में देश की जनता का प्रतिनिधित्व करती ही नहीं है, उसमें स्त्रियों को आरक्षण दे दिया जाय या न दिया जाय, इससे क्या फर्क पड़ने वाला है? संसद में महिला आरक्षण को लेकर आम जनता की ताक़तों का बँट जाना नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के मुद्दे पर बँट जाने से भी अधिक विडम्बनापूर्ण है।