Category Archives: महान व्‍यक्तित्‍व

शहीद सुखदेव के जन्मदिवस के अवसर पर

शहीद सुखदेव और उनके साथियों के सपनों का समतामूलक समाज बनना अभी बाकी है। इसके लिए मेहनतकश जनता व खासकर नौजवानों को आगे आना होगा। उनके जन्मदिवस पर यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

प्रीति‍लता वादेदार :चटगाँव विद्रोह की अमर सेनानी

देश के लि‍ए मर मि‍टने का जज़्बा ही वो ताकत है जो वि‍भि‍न्न पृष्ठभूमि‍ के क्रान्ति‍कारि‍यों को एक दूसरे के प्रति, साथ ही जनता के प्रति अगाध वि‍श्वास और प्रेम से भरता है। आज की युवा पीढ़ी को भी अपने पूर्वजों और उनके क्रान्तिकारी जज़्बे के विषय में कुछ जानकारी तो होनी ही चाहिए।

अमर शहीद राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ को याद करते हुए

बिस्मिल-अशफ़ाक की दोस्ती आज भी हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे और साझे संघर्ष का प्रतीक है। ज्ञात हो एच.आर.ए. की धारा ही आगे चलकर एच.एस.आर.ए. में विकसित हुई जिससे भगतसिंह, बटुकेश्वर दत्त, सुखदेव, भगवती चरण वोहरा, दुर्गावती और राजगुरू आदि जैसे क्रान्तिकारी जुड़े व चन्द्रशेखर ‘आज़ाद’ इसके कमाण्डर-इन-चीफ़ थे। हमारे इन शहीदों ने एक समता मूलक समाज का सपना देखा था। भरी जवानी में फाँसी का फ़न्दा चूमने वाले इन शहीदों को देश की खातिर कुर्बान हुए लम्बा समय बीत चुका है। अग्रेजी राज भी अब नहीं है लेकिन बेरोजगारी, भुखमरी, ग़रीबी और अमीर-ग़रीब की बढ़ती खाई से हम आज भी आज़िज हैं।

ग्वाटेमाला की जनता के संघर्षों के सहयोद्धा और जीवन के चितेरे कवि : ओतो रेने कास्तिय्यो

एक योद्धा कवि अपनी मिट्टी, अपने लोगों के लिए अन्तिम साँस तक लड़ता रहा। एक बेहतर, आरामदेह ज़िन्दगी जीने के तमाम अवसर मौजूद होने के बावजूद उसने जनता का साथ चुना और आख़िरी दम तक उनके साथ ज़िन्दगी को खूबसूरत बनाने के लिए लड़ता हुआ शहीद हो गया।

अमर शहीद करतार सिंह सराभा के 100वें शहादत दिवस (16 नवम्बर) के अवसर पर

16 नवम्बर 1915 को मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में शहादत पाने वाले करतार सिंह सराभा का जन्म लुधियाना जिले के सराभा गाँव में सन् 1896 में हुआ था। माता–पिता का साया बचपन में ही इनके सिर से उठ जाने पर दादा जी ने इनका पालन–पोषण किया। लुधियाना से मैट्रिक पास करने के बाद ये इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए सान फ्रांसिस्को, अमेरिका चले गये। 1907 के बाद से काफी भारतीय विशेषकर पंजाबी लोग अमेरिका और कनाडा में मज़दूरी के लिए जा कर बस चुके थे। इन सभी को वहाँ आये दिन ज़ि‍ल्लत और अपमान का सामना करना पड़ता था। अमेरिकी गोरे इन्हें काले और गन्दे लोग कहकर सम्बोधित करते थे। इनसे अपमानजनक सवाल–जवाब किए जाते और खिल्ली उड़ाई जाती थी कि 33 करोड़ भारतीय लोगों को 4-5 लाख गोरों ने गुलाम बना रखा है! जब इन भारतीयों से पूछा जाता कि तुम्हारा झण्डा कौन–सा है तो वे यूनियन जैक की तरफ इशारा करते, इस पर अमेरिकी गोरे ठहाका मारते हुए कहते कि ये तो अंग्रेज़ों का झण्डा है तुम्हारा कैसे हो गया। प्रवासी भारतीयों को अब खोयी हुई आज़ादी की क़ीमत समझ में आयी। देश को आज़ाद कराने की कसमसाहट पैदा हुई और मीटिंगों के दौर चले।

मिगेल एरनानदेस – एक अपूर्ण क्रान्ति का पूर्ण कवि

मिगेल के जीवन के अन्तिम दिन ज़्यादातर जेल की सलाखों के पीछे बीते। लेकिन सलाखों के बाहर भी ज़िन्दगी क़ैद थी। इन अँधेरे दिनों के गीत मिगेल ने अपनी कविताओं में गाए हैं। ये कविताएँ उन अँधेरे, निराशा, हताशा, विशाद और मायूसी भरे दिनों की कविताएँ हैं जो अँधेरे समय का गीत गाती हैं। ऐसी ही एक कविता है नाना दे सेबोया (प्याज़ की लोरी)। मिगेल की पत्नी ने उसे जेल में चिट्ठी भेजी और उसे बताया कि घर में खाने को कुछ भी नहीं है सिवाय प्याज़ और ब्रेड के। मिगेल का एक छोटा बेटा था, मिगेल ने जेल से अपने बेटे के लिए यह लोरी लिखी थी

भगतसिंह के लिए एक गद्यात्मक सम्बोध-गीति

भारत की एक स्त्री, एक स्त्री कवि, सचमुच तुम्हे याद करना चाहती है भगतसिंह,
एक मशक्कती ज़िन्दगी की तमाम जद्दोजहद और
उम्मीदों और नाउम्मीदियों के बीच,
अपने अन्दर की गीली मिट्टी से आँसुओं, ख़ून और
पसीने के रसायनों को अलगाती हुई,
जन्मशताब्दी समारोहों के घृणित पाखण्डी अनुष्ठानों के बीच,
सम्बोध-गीति के अतिशय गद्यात्मक हो जाने का जोखिम उठाते हुए

गाब्रियल गार्सिया मार्खेस : यथार्थ का मायावी चितेरा

गाब्रियाल गार्सिया मार्खेस, यथार्थ के कवि, जो इतिहास से जादू करते हुए उपन्यास में जीवन का तानाबाना बुनते हैं, जिसमें लोग संघर्ष करते हैं, प्यार करते हैं, हारते हैं, दबाये जाते हैं और विद्रोह करते हैं। ब्रेष्ट ने कहा था साहित्य को यथार्थ का “हू-ब-हू” चित्रण नहीं बल्कि पक्षधर लेखन करना चाहिए। मार्खेस के उपन्यासों में, विशेष कर “एकान्त के सौ वर्ष”, “ऑटम ऑफ दी पेट्रियार्क” और “लव एण्ड दी अदर डीमन” में उनकी जन पक्षधरता स्पष्ट दिखती है। मार्खेस के जाने के साथ निश्चित तौर पर लातिन अमेरिकी साहित्य का एक गौरवशाली युग समाप्त हो गया। उनकी विरासत का मूल्यांकन अभी लम्बे समय तक चलता रहेगा क्योंकि उनकी रचनाओं में जो वैविध्य और दायरा मौजूद है, उसका आलोचनात्मक विवेचन एक लेख के ज़रिये नहीं किया जा सकता है। लेकिन इस लेख में मार्खेस के जाने के बाद उन्हें याद करते हुए हम उनकी रचना संसार पर एक संक्षिप्त नज़र डालेंगे। आगे हम ‘आह्वान’ में और भी विस्तार से मार्खेस की विरासत का एक आलोचनात्मक विश्लेषण रखेंगे।

बेर्टोल्ट ब्रेष्ट – दुख के कारणों की तलाश का कलाकार

बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की कला की मुख्य प्रवृत्ति पूँजीवादी नज़रिये पर तीखा प्रहार करना है। अपने नाटकों और कविताओं में इन्होंने शिक्षात्मक पहलू के साथ ही कलात्मकता के बेहतरीन मानदण्डों को बरकरार रखा। अपने नाटकों में ब्रेष्ट ने दुखों का केवल बख़ान करके ही नहीं छोड़ दिया, बल्कि उनके कारणों की गहराई तक शिनाख़्त भी की। ब्रेष्ट ने अपने नाटकों में रूप और अन्तर्वस्तु दोनों ही दृष्टियों से एक अलग सौन्दर्यशास्त्र का अनुपालन किया, जिसे इन्होंने ‘एपिक थिएटर’ का नाम दिया।

पीट सीगर (1919-2014) – जनता की आवाज़ का एक बेमिसाल नुमाइन्दा

सीगर 1990 के दशक में भी अपनी काँपती आवाज़ में जनसभाओं और आन्दोलनों में गाते रहे। उनकी आवाज़ में एक ऐसी ईमानदारी, जीवन के प्रति भरोसा और प्यार, इंसानियत के प्रति विश्वास और साथीपन झलकता था कि लगभग हमेशा ही समूची भीड़ उनके साथ गाने लगती थी। 2000 के दशक में भी वयोवृद्ध होने के बाद भी उन्होंने अपनी सांगीतिक सक्रियता को छोड़ा नहीं। यहाँ तक कि उन्होंने ‘ऑक्युपाई’ आन्दोलन में भी गाया।