Category Archives: फासीवाद

हिन्दुत्ववादी फासीवाद के आगे बढ़ते कदम

भाजपा सत्ता में रहे या न रहे, फासीवाद के विरुद्ध लड़ाई की योजनाबद्ध, सांगोपांग, सर्वांगीण तैयारी क्रान्तिकारी एजेण्डे पर हमेशा प्रमुख बनी रहेगी, क्योंकि फासीवाद राजनीतिक परिदृश्य  पर अपनी प्रभावी उपस्थिति तबतक बनाये रखेगा, जबतक राज, समाज और उत्पादन का पूँजीवादी ढाँचा बना रहेगा। इसलिए फासीवाद विरोधी संघर्ष को हमें पूँजीवाद-साम्राज्यवाद विरोधी क्रान्तिकारी संघर्ष के एक अंग के रूप में ही देखना होगा। इसे अन्य किसी भी रूप में देखना भ्रामक होगा और आत्मघाती भी।

बिपिन चन्द्र की पुस्तक पर भगवा हमला : भगतसिंह बनाम क्रान्तिकारी आतंकवाद

एक तरफ़ जहाँ संघ तृणमूल स्तर पर अपने प्रचार तथा कार्रवाइयों के ज़रिये जनता को अपने पक्ष में करने में लगा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ़ शिक्षा के भगवाकरण के ज़रिये वह पूरे देश में चेतना को कुन्द करके समाज की मेधा को अपने नियंत्रण में करने की कोशिश कर रहा है। यही नहीं वह मिथ्या और झूठ को सामान्य ज्ञान के रूप में स्थापित कर अपने नापाक इरादों की पूर्ति को सुगम बना रहा है। संघ के इन नापाक इरादों को विफल करने के लिए, आज देश की तमाम प्रगतिशील और क्रान्तिकारी ताक़तों का यह दायित्व बनता है कि वे शिक्षा के भगवाकरण की मुहिम का पुरज़ोर विरोध करें और अपनी समझ को लेकर जनता के बीच जाएँ और संघी फ़ासिस्टों के नापाक मंसूबों के ख़िलाफ़ जनान्दोलनों को तेज़ करें।

फासीवादी हमले के विरुद्ध ‘जेएनयू’ में चले आन्दोलन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवाल

कोई भी आन्दोलन जब व्यक्ति केन्द्रित होता है या ‘से‍क्टेरियन’ राजनीति का शिकार होता है तो अपनी तमाम उर्वर सम्भावनाओं के बावजूद वह सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक प्रतिरोध के तौर पर प्रभावी होने की क्षमता खो बैठता है। वह आन्दोलन किसी धूमके‍तु की तरह आकाश में बस चमक कर रह जाता है। कुछ लोगों या संगठनों के नाम अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियाँ बनते हैं और फ़िर वे इन्हें अपने-अपने फायदे के अनुसार भुनाते हैं। व्यापक राजनीति‍ के साथ यह धोखाधड़ी और मौकापरस्ती इतिहास के इस कठिन दौर में जब फासीवाद इस कदर समाज पर छा रहा है और पूरी दुनिया में प्रतिक्रियावाद और कट्टरपन्थ का दौर है, बेहद महँगा साबित होने जा रहा है।

मोदी सरकार के दो साल: जनता बेहाल, पूँजीपति मालामाल

मोदी सरकार के दो वर्षों में उपरोक्त आर्थिक नीतियों के कारण आम मेहनतकश जनता को अभूतपूर्व महँगाई का सामना करना पड़ रहा है। इन दो वर्षों में ही रोज़गार सृजन में भारी कमी आयी है और साथ ही बेरोज़गारों की संख्या में भी खासा इज़ाफ़ा हुआ है। मज़दूरों के शोषण में भी तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई है क्योंकि मन्दी के दौर में मज़दूरों को ज़्यादा निचोड़ने के लिए जिस प्रकार के खुले हाथ और विनियमन की पूँजीपति वर्ग को ज़रूरत है, वह मोदी सरकार ने उन्हें देनी शुरू कर दी है। कृषि क्षेत्र भी भयंकर संकट का शिकार है। यह संकट एक पूँजीवादी संकट है। साथ ही, सरकारी नीतियों के कारण ही देश कई दशकों के बाद इतने विकराल सूखे से गुज़र रहा है। इन सभी कारकों ने मिलकर व्यापक मज़दूर आबादी और आम मेहनतकश जनसमुदायों के जीवन को नर्क बना दिया है। यही कारण है कि मोदी सरकार ने हाफपैण्टिया ब्रिगेड को दो चीज़ों की पूरी छूट दे दी है: पहला, सभी शैक्षणिक, शोध व सांस्कृतिक संस्थानों को खाकी चड्ढीधारियों के नियंत्रण में पहुँचा दिया है ताकि देशभर में आम राय के निर्माण के प्रमुख संस्थान संघ परिवार के हाथ में आ जायें और दूसरा, देश भर में आम मेहनतकश अवाम के भीतर इस भयंकर जनविरोधी सरकार के प्रति विद्रोह की भावना न पनपे इसके लिए उन्हें दंगों, साम्प्रदायिक तनाव, गौरक्षा, घर-वापसी जैसे बेमतलब के मुद्दों में उलझाकर रखने के प्रयास जारी हैं।

मोदी सरकार के घोटालों की लम्बी होती फ़ेहरिस्त

घोटालों की मार को ख़त्म करने का नारा देते हुए आयी भाजपा सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद भी घोटाले और वित्तीय अनियमितताएँ जारी हैं। आज़ादी के बाद से बननी शुरू हुई घोटालों की फ़ेहरिस्त में इस बार भी कई बड़े घोटाले शामिल हुए हैं। जहाँ एक तरफ देश की कमान सम्भाल रहे नरेन्द्र मोदी ‘मेक इन इण्डिया’, ‘स्किल इण्डिया’ जैसे नारे देकर सबके विकास का राग अलाप रहे हैं, वहीं इसी राग के साथ देश के नेता-नौकरशाह जनता की गाढ़ी कमाई से ऐय्याशी के बाद भी अपनी धुन में घोटाले किये जा रहे हैं।

कविता : गुजरात-2002 / कात्यायनी

क्या हम कर रहे हैं आने वाले युद्ध समय की दृढ़निश्चयी तैयारी
क्या हम निर्णायक बन रहे हैं? क्या हम जा रहे हैं अपने लोगों के बीच
या हम वधस्थल के छज्जों पर बसन्तमालती की बेलें चढ़ा रहे हैं
या अपने अध्ययन कक्ष में बैठे हुए अकेले, भविष्य में आस्था का
उद्घोष कर रहे हैं और सुन्दर स्वप्न या कोई जादू रच रहे हैं

“सदाचारी” संघी फ़ासीवादी सत्ताधारियों के ‘चाल-चरित्र-चेहरे’ की सच्चाई

भगवा फ़ासीवादी सत्ताधारियों के असली मंसूबों का पर्दाफाश करना आज हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। क्रांतिकारी ताकतों को जनता के बीच अपनी खन्दकें खोदनी होंगी, और इन हिन्दुत्ववादी धर्मध्वजधारियों की ‘संस्कृति’, ‘सभ्यता’, ‘नैतिकता’, ‘शुचिता’, ‘सदाचार’ आदि की असलियत को बेनकाब करना होगा। इनके न सिर्फ मुसलमान विरोधी चेहरे को बल्कि दलित विरोधी चेहरे को भी जनता के सामने उजागर करना होगा। देशभक्ति पर इनके हर झूठे दावे को ध्वस्त करना होगा। गद्दारियों, माफीनामों, मुखबिरियों से भरे इनके काले शर्मनाक इतिहास को उजागर करना होगा।

छपते-छपतेः जवाहर लाल नेहरू केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रगतिशील छात्रों पर मोदी सरकार का हमला

पत्रिका के प्रेस में जाते-जाते यह ख़बर मिली है कि जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। जेएनयू में हाल ही में कुछ लोगों ने ‘ए कण्ट्री विद आउट ए पोस्ट ऑफिस’ नामक कार्यक्रम किया था। इसमें कुछ अराजकतावादी व रैडिकल इस्लामिस्ट तत्वों ने भारत-विरोधी नारेबाज़ी की। कन्हैया कुमार मौके पर पहुँचकर इस प्रकार की नारेबाज़ी और मारपीट की सम्भावना को रोकने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन एबीवीपी की आँखों की किरकिरी होने के नाते, उन पर फ़र्ज़ी आरोप लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया गया है, जबकि इस कार्यक्रम के प्रमुख आयोजकों को अभी तक पुलिस नहीं पकड़ सकी है। इसी से पता चलता है कि यहाँ अराजकतावादी तत्वों की बेहूदा कार्रवाइयों के बहाने जेएनयू के तमाम प्रगतिशील संगठनों को निशाना बनाया जा रहा है। यही कारण है कि मुख्य अभियुक्तों को पुलिस पकड़ नहीं सकी है। अगले अंक में हम इस पूरे घटनाक्रम पर विस्तार से लिखेंगे।

विवेकहीनता का मौजूदा दौर और इसके विरोध के मायने

आज जनवादी-नागरिक अधिकारों पर फासीवादी हमला जब लोगों के शयनकक्ष तक में प्रवेश कर गया है, तब तमाम उदारवादी बुद्धिजीवियों ने आजिज आकर आवाज़ उठायी है, और इसकी हिमायत की जानी चाहिए। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि फासीवादी उभार के इस कदर आक्रामक बन पाने में कुछ योगदान उदारवादी बुद्धिजीवी वर्ग का भी है, जो कि, जब फासीवादी नाग अपना फन उठाने की शक्ति संचित कर रहा था तो विचारधारात्मक-राजनीतिक निष्पक्षता के ‘हाई मॉरल ग्राउण्ड’ पर विराजमान थे! आज फासीवादी ताक़तों के ख़िलाफ़ लड़ाई को सड़कों तक ले जाने के लिए व्यापक मेहनतकश जनसमुदायों को इस पूँजीवादी व्यवस्था की सच्चाई से रूबरू कराना होगा और उसे क्रान्तिकारी विचारों व राजनीति पर जीतना होगा। यदि जनमत हमारे पक्ष में नहीं होगा तो वह किसी न किसी रूप में चाहे-अनचाहे फासीवाद के पक्ष में होगा क्योंकि यदि वह तटस्थ भी होगा तो भी वह साम्प्रदायिक शक्तियों का मददगार ही होगा।