Category Archives: शिक्षा स्‍वास्‍थ्य और रोजगार

शासन–प्रशासन तंत्र की आपराधिक संवेदनहीनता ने छीन ली हज़ारों बच्चों की ज़िन्दगी

इंसफ़ेलाइटिस से पीड़ित होने वाले अधिकांश बच्चे गरीबों के ही हैं। इसका कारण भी बहुत साफ़ है। यह बीमारी मच्छरों के काटने से फ़ैलती है जो ठहरे हुए पानी में और गन्दे स्थानों पर पलते हैं। समझा जा सकता है कि गाँवों और शहरों की गन्दी बस्तियों में रहने वाली आबादी जापानी इंसफ़ेलाइटिस के विषाणुओं के वाहक मच्छरों के लिए आसान शिकार हैं। यही असल कारण भी है कि क्यों शासन–प्रशासन तंत्र पिछले 27 सालों से इसके रोकथाम के कारगर उपाय नहीं कर रहा है। पूँजीपतियों और अमीरों की सेवा में दिन-रात जुटी रहने वाली शासन–प्रशासन की मशीनरी के लिए गरीबों की जान की कोई कीमत ही नहीं है।

क्रान्तिकारी छात्र राजनीति से घबराये हुक़्मरान

अगर छात्रसंघ को ख़त्म किया जाता है तो यह एक फ़ासिस्ट और अलोकतांत्रिक कदम होगा। छात्र कहीं भी आवाज़ उठाएँगे तो उन्हें कुचला जाएगा और चुनावबाज पार्टियों के लग्गुओं-भग्गुओं का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, मगर कैम्पसों में एक मुर्दा शान्ति छा जाएगी। छात्रसंघ की गन्दी राजनीति का इलाज छात्रसंघ को ख़त्म करके करना वैसा ही है जैसे कि बीमार की बीमारी का इलाज करने की बजाय बीमार को ही ख़त्म कर दिया जाय। कोशिश यह होनी चाहिए कि कैम्पस में मौजूद क्रान्तिकारी ताकतें आगे बढ़कर छात्रसंघ की कमान अपने हाथ में ले लें।

इस बार भी आदमखोर शिक्षा व्यवस्था की बलि चढ़े मासूम बच्चे

भूमण्डलीकरण और उदारीकरण के दौर में बदली शिक्षा नीति ने इस प्रणाली को और अधिक अमानवीय बना दिया है जिसमें केवल सबसे पहले स्थान पर आने वाले के लिए ही मौका है, जबकि उससे कमतर छात्रों का भविष्य अंधकार में छोड़ दिया जाता है। साथ ही पूँजीवादी मीडिया और संस्कृति भी यही प्रचारित करती है “पढ़ो ताकि बढ़ा आदमी बनो और ख़ूब पैसा कमाओ’’। वह स्वयं भी गुनगुनाता है, “दुनिया जाए भाड़ में ऐश करो तुम”। यह सोच छात्रों को लालची, स्वार्थी और संवेदनशून्य बना रही है। इस शिक्षा व्यवस्था के दूसरे पहलू पर ग़ौर करना भी ज़रूरी है। कोई छात्र इस शिक्षा व्यवस्था में सफ़लता प्राप्त कर ले, तो क्या वह एक बेहतर इंसान की ज़िन्दगी जी पाएगा? इस शिक्षा व्यवस्था के केन्द्र में इंसान नहीं है आम घरों से आने वाले छात्रों को शिक्षा इसलिए दी जाती है ताकि उन्हें इस व्यवस्था के यंत्र का एक नट-बोल्ट बनाया जा सके। यानी उस भीड़ में शामिल किया जा सके जो इस व्यवस्था की सेवा में लगी है।

अब इंजीनियरिंग-मेडिकल भी रोज़गार की गारण्टी नहीं

भारत में यह सोच काफ़ी हावी रही है कि बेटा अगर इंजीनियर या डाक्टर बन गया तो समझ लो कि रोज़गार पक्का। लेकिन भूमण्डलीकरण की कड़वी सच्चाई अब इस भ्रम को तोड़ रही है। आज भारत में 20 प्रतिशत इंजीनियर बेरोज़गार घूम रहे हैं। एक समय में ये क्षेत्र रोज़गार की गारण्टी माने जाते थे। नतीजतन, कोई इंजीनियर–डाक्टर से नीचे कुछ बनना ही नहीं चाहता था। भारत में 1993 में 5,97,680 इंजीनियर थे। 2003 में यह संख्या दोगुनी होकर 11,83,186 हो गई। नतीजतन, सरकारी और निजी संस्थानों में इंजीनियरिंग कोर्सों की मोटी फ़ीस देकर आज जब छात्र इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर निकलता है तो कह नहीं सकता कि उसे नौकरी मिलेगी या नहीं। जाहिर है, कि हमेशा ऊपर देखने की आदत रखने वाले मध्य वर्ग को इस बदलाव से थोड़ा होश आएगा और उसके नौजवान अपने कैरियरवाद को तिलांजलि देकर समाज के बारे में सोचने को मजबूर होंगे।

जनता के भगवान डॉक्टर, डॉक्टर का भगवान पैसा

क्या कहा? स्वस्थ करने की गारण्टी? भई गारण्टी तो पैसा लौटाने की होती है, स्वस्थ करने की नहीं। मरीज का कर्त्तव्य है पैसा देना और डाक्टर का कर्त्तव्य है इलाज करना। फ़िर बीच में स्वस्थ करना कहाँ से आ गया? यही है हमारे भूमण्डलीकरण के ज़माने की उदारीकरण की बयार, जहाँ हर चीज़ का निजीकरण हो चुका है। चिकित्सा का भी निजीकरण हो चुका है। डॉक्टर लोग काफ़ी उदार हो गए हैं, इतने उदार कि लोगों की जान लेने में उदारता की सीमा पार कर जाते हैं।

किस चीज़ का इन्तज़ार है? और कब तक? दुनिया को तुम्हारी ज़रूरत है!

ज़रूरत है ऐसे बहादुर, विचारसम्पन्न नौजवानों की, जो इस काम को अंजाम देने के लिए आगे आयें। यह तो सभी महसूस करते हैं कि उनके माँ-बाप को उनकी ज़रूरत है। जो लोग यह महसूस करते हैं कि समाज को उनकी ज़रूरत है, वे ही इतिहास बदलने के औज़ार गढ़ते हैं और परिवर्तनकामी जनता के हिरावल बनते हैं। आज एक बार फ़िर सब कुछ नये सिरे से शुरू करना है और इसके लिए कोई मसीहा धरती पर नहीं आयेगा। बदलाव की तैयारी आम जनता के कुछ बहादुर युवा सपूत ही शुरू करेंगे। ऐसे ही लोग सच्चे युवा हैं। उनकी संख्या ही बहुसंख्या है। पर अभी वे निराशा या ‘क्या करें क्या न करें’ की दुविधाग्रस्त मानसिकता से ग्रस्त हैं। सही है, कि हार के समय थोड़ी निराशा आ जाती है। लेकिन कब तक मेरे भाई? अब तो उबरने का समय आ चुका है? इसके संकेतों को पहचानने की कोशिश तो करो! क्या हज़ार ऐसे कारण नहीं है कि हम विद्रोह करें और क्या इनमें से चन्द एक ही काफ़ी नहीं हैं कि हम अपनी तैयारी अभी से शुरू कर दें? क्या एकमात्र रास्ता यही नहीं बचा है कि हम अन्याय के विरुद्ध लड़ें और छिटपुट न लड़ें बल्कि अपनी लड़ाई को सामाजिक क्रान्ति की सीढ़ियाँ बना दें।