Category Archives: शिक्षा स्‍वास्‍थ्य और रोजगार

दिल्ली में ‘स्कूल बचाओ अभियान’ की शुरुआत

स्कूली शिक्षा बच्चों के जीवन की बुनियाद होती है जहाँ वह सामाजिक होना, इतिहास, कला आदि से परिचित होता है। अमीरी और ग़रीबी में बँटे हमारे समाज का यह फ़र्क देश के स्कूलों में भी नज़र आता है। जहाँ एक तरफ़ पैसों के दम पर चलने वाले प्राईवेट स्कूलों में अमीरों के बच्चों के लिए ‘फाइव-स्टार होटल’-मार्का सुख-सुविधाएँ उपलब्ध हैं, वही दूसरी ओर सरकार द्वारा चलाये जा रहे ज़्यादातर स्कूलों की स्थिति ख़स्ताहाल है। केन्द्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय और सैनिक स्कूल जैसे कुलीन सरकारी स्कूलों को छोड़ दिया जाये, तो सरकारी स्कूल सरकार द्वारा ही तय विद्यालय मानकों का पालन नहीं करते। ज़्यादातर सरकारी स्कूलों में साफ़ पीने के पानी की व्यवस्था तक नहीं है, सभी बच्चों के बैठने के लिए डेस्क नहीं हैं, कक्षाओं में पंखों तक की व्यवस्था नहीं है; वहीं अमीरज़ादों के स्कूलों में पीने के पानी के लिए बड़े-बड़े ‘आर.ओ. सिस्टम’, खेलने के लिए बड़े मैदान, कम्प्यूटर रूम, लाइब्रेरी और यहाँ तक कि कई स्कूलों में स्विमिंग पूल व घुड़सवारी की भी व्यवस्था है!

दवा कम्पनियों के मुनाफे के लिए इंसानी जि़न्दगी से घिनौने खिलवाड़ का मसौदा

किसी भी देश के नागरिकों तक जीवन-रक्षक व अत्यावश्यक दवाओं की सहज व सस्ती उपलब्धता को सुनिश्चित करना हरेक राज्य के सबसे महत्वपूर्ण दायित्वों में से एक है। एक स्वस्थ इंसानी, जिन्दगी के लिए अनिवार्य होने के कारण यह देश की जनता का एक प्रमुख जनवादी अधिकार व मानवाधिकार भी है। लेकिन जो राज्य लोगों की सबसे बुनियादी जरूरतों – भरपेट भोजन, कपडे़ और सिर के ऊपर छत – को भी पूरा न करता हो उससे बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के सस्ती दरों पर उपलब्ध कराए जाने का भ्रम पालना ही एक नादानी भरी सोच है। ख़ासकर नवउदारवाद और भूमण्डलीकरण के इस दौर में जबकि देश की बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी की पूँजी के आधुनिक गुलामों और मुनाफ़ा निचोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले यंत्रों से अधिक कोई कीमत न हो तो केवल पूँजीवादी राज्य से केवल यहीं उम्मीद की जा सकती है कि वह एक एक करके स्वास्थ्य सुविधाओं, दवा-इलाज आदि को मुनाफ़े की हवस में अंधे पूँजीपतियों और उनके जंगल (बाजार) को सौंपता जाए।

‘पंसारी की दुकान’ से ‘शॉपिंग मॉल’ बनने की ओर अग्रसर यह विश्वविद्यालय

वैसे यह फ़ीस वृद्धि कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है। पिछले दो दशकों से जारी और भविष्य के लिए प्रस्तावित शिक्षा नीति का मूलमन्‍त्र ही है कि सरकार को उच्च शिक्षा की जि़म्मेदारी से पूरी तरह मुक्त करते हुए उसे स्ववित्तपोषित बनाया जाये। ताज़ा आँकड़ों के अनुसार आज केन्द्रीय सरकार सकल घरेलू अत्पाद (जीडीपी) का 1 फ़ीसदी से कम उच्च शिक्षा पर ख़र्च करता है और यह भविष्य में बढ़ेगा, इसकी उम्मीद कम ही है। मानव संसाधन मन्‍त्रालय के हालिया बयानों में यह बात प्रमुखता से आयी है, हर तीन साल बाद विश्वविद्यालय की फ़ीसों में बढ़ोत्तरी की जाये ताकि राज्य इस जि़म्मेदारी से मुक्त हो सकते। बिरला-अम्बानी-रिपोई से लेकर राष्ट्रीय ज्ञान आयोग और यशपाल समिति की सिफ़ारिशें भी इसी आशय की हैं।

आरक्षण की फसल

थोड़ा तथ्यों व आँकड़ों पर ध्यान देकर विवेक का प्रयोग करने की ज़रूरत है। बात बिलकुल साफ हो जायेगी कि आरक्षण महज़ एक नौटंकी किसलिए है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि कैसे पब्लिक सेक्टर को ख़त्म करके हर चीज़ का बाज़ारीकरण किया जा रहा है। निजी मालिकाने में भी लगभग 90 फीसदी काम दिहाड़ी, ठेका, पीसरेट आदि पर कराया जाता है, 7 से 9 फीसदी विकास दर वाले देश में लगभग 28 करोड़ लोग बेरोज़गार हैं, तो आखि़र आरक्षण के मायने क्या है? दूसरा जिन जातियों के लिए आरक्षण की माँग हो रही है, (चाहे वे जाट, गुर्जर, यादव, मीणा कोई भी हों) उनमें भी ध्रुवीयकरण जारी है, पूँजी की नैसर्गिक गति भारी आबादी को उजाड़कर सर्वहारा, अर्धसर्वहारा की कतार में खड़ा कर रही है। तो इसमें भी बड़े किसान, कुलक ही पूँजीवादी भूस्वामी बनकर चाँदी काट रहे हैं, और दूसरे लोगों के लिए आरक्षण का झुनझुना थमाने पर आमादा हैं।

नौजवान भारत सभा द्वारा सफ़ाई एवं स्वास्थ्‍य के मुद्दे पर संघर्ष की शुरुआत

आह्वान के पिछले अंक में हमने जो रिपोर्ट दी थी। वह यह थी कि लखनऊ के खदरा क्षेत्र में डेंगू, मलेरिया, मियादी लोगों द्वारा चिन्‍ह‍ित समस्याएँ थीं कि नालियों की सफ़ाई नहीं होती, जिसमें पानी इकट्ठा होता है और मच्छर पनपते हैं और भी तमाम परेशानियाँ होती हैं। पीने का पानी जो सप्लाई द्वारा आता है, वह कई बार बदबूदार व झागदार होता है, हैण्डपाइप कई महीनों-सालों से ख़राब हैं, शिकायत-पत्र देने पर भी ठीक नहीं किये जाते और तरह-तरह के बहाने बनाकर टाल दिया जाता है। बाक़ी तीन मुद्दे नौजवान भारत सभा द्वारा भी सुझाये गये कि इस इलाक़े में एक सरकारी डिस्पेंसरी होनी चाहिए। क्षेत्र में पर्याप्त मात्र में कूडे़दान रखे जायें और हर माह क्लोरीन की गोली भी बाँटी जाये, ताकि लोग साफ पानी पी सकें। सभा में लगभग 100 लोगों ने भागीदारी की, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएँ भी थीं। सभी ने किसी भी वक़्त साथ खड़े होने की बात की।

छात्रों द्वारा शिक्षकों के नाम एक खुला पत्र

ऐसे में हम अपने विश्वविद्यालय के शिक्षकों और गुरुजनों से कुछ मुद्दों पर दिशा-सन्धान और मार्गदर्शन चाहेंगे। सर्वप्रथम, क्या विश्वविद्यालय के भीतर एक अकादमिक और उच्च गुणवत्ता वाला बौद्धिक वातावरण तैयार करने के लिए स्वयं प्रशासन को विचार-विमर्श, डिबेट-डिस्कशन, गोष्ठी-परिचर्चा इत्यादि गतिविधियाँ जिसमें छात्रों की व्यापक भागीदारी हो, आयोजित करने की पहल नहीं करनी चाहिए? क्या ऐसी गतिविधियों के अभाव में न सिर्फ छात्र बल्कि शिक्षक भी शोध-अनुसन्धान जैसे क्रिया-कलापों में पिछड़ नहीं जायेंगे और क्या यह विश्वविद्यालय की हत्या करना जैसा नहीं होगा? दूसरे अगर प्रशासन स्वयं ऐसी पहल नहीं कर रहा है, और कुछ छात्र, जिन्होंने अभी-अभी विश्वविद्यालय में दाखि़ला लिया है, अपने स्तर पर इसके लिए प्रयास करते हैं, तो क्या प्रशासन सहित पूरे विश्वविद्यालय समुदाय की यह ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित करें?

अलीगढ़ के बाद छात्र-संघर्ष का नया केन्द्र बना लखनऊ विश्वविद्यालय

लखनऊ विश्वविद्यालय के भीतर जो माहौल व्याप्त है, वह किसी भी रूप में एक विश्वविद्यालय के स्तर का नहीं है। अधिकतम इसे एक ‘बीमारू प्रदेश’ का ‘बीमारू विश्वविद्यालय’ ही कहा जा सकता है। अकादमिक और बौद्धिक तौर पर इसकी हालत दीवालिया है। हो भी क्यों न! लखनऊ विश्वविद्यालय में कुल 35,000 छात्र हैं, लेकिन विश्वविद्यालय के पास इन छात्रों को बिठा पाने के लिए भी जगह नहीं है। अगर किसी एक दिन विश्वविद्यालय के सारे छात्र उपस्थित हो जायें तो पेड़ों के नीचे भी पढ़ाने की जगह नहीं बचेगी। जहाँ तक शिक्षकों की संख्या का सवाल है, यह आश्चर्यजनक रूप से अपर्याप्त है।

और अब ‘एम्स’ की बारी…

मुनाफे के लिए संवेदनहीन होती इस व्यवस्था में स्वास्थ्य संस्थान भी कमाई का एक ज़रिया बन जाये तो इसमें आश्चर्य कैसा? पूँजीवादी व्यवस्था की तो नियति ही यही है। अगर हमें स्वास्थ्य या अन्य बुनियादी ज़रूरतों को आमजन के लिए सुलभ बनाना है, तो हमें इस बीमार व्यवस्था का इलाज ढूँढ़ना ही होगा।

दवा उद्योग का घिनौना सच!

क्या डाक्टरों की यह संस्था इस तथ्य से इंकार कर सकती है कि ऐसे डाक्टरों की कमी नहीं जो चिकित्सा बाज़ार में बैठकर मुनाफा पीटने की हवस में कसाइयों की तरह ग़रीबों-बेबसों को हलाल करते हैं? झोलाछाप डाक्टरों पर लगाम लगाने के लिए समय-समय पर सरकार से ज़ोरदार माँग करने वाले आईएमए को कभी यह ख़्याल क्यों नहीं आता कि वह सरकारी अस्पतालों के ढाँचे को बेहतर बनाने और जनस्वास्थ्य के समूचे तन्त्र को मज़बूत बनाने के लिए सरकार से माँग करे और ज़रूरत पड़े तो सड़कों पर भी उतरे। असलियत तो यह है कि ज़्यादातर सरकारी अस्पतालों में और निजी प्रैक्टिस कर रहे एमबीबीएस, एमडी डाक्टर ही नकली या ग़ैरज़रूरी महँगी दवाओं से मरीज़ों की पर्ची भर देते हैं।

उत्तर प्रदेश में शिक्षामित्रों का जुझारू आन्दोलन

‘शिक्षामित्र’ प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर कार्यरत उन शिक्षकों की श्रेणी को कहा जाता है जिन्हें नियमित शिक्षकों के स्थान पर सालभर के ठेके पर नियुक्त किया जाता है। इनको नियुक्त करने की जिम्मेदारी किसी सरकारी महकमे की नहीं, बल्कि ग्राम पंचायतों और नगर-निगमों की होती है, और इन्हें नियमित शिक्षकों के बरक्स बेहद कम वेतनमान पर रखा किया जाता है। साथ ही ठेके पर होने के कारण इन्हें महँगाई भत्ता, पी.एफ. इत्यादि की भी कोई सुविधा नहीं दी जाती है। सालभर बाद इनकी कार्यकुशलता और काम के मूल्यांकन के अनुसार दोबारा ठेके पर रखा जा सकता है। ये लोग महज़़ उ.प्र. में नहीं बल्कि देश के ज़्यादातर राज्यों में अलग-अलग नामों के अन्तर्गत कार्यरत हैं।