Category Archives: शिक्षा स्‍वास्‍थ्य और रोजगार

पूँजीवादी व्यवस्था में स्कूली पाठ्यक्रम: शासक वर्गों का बौद्धिक वर्चस्व स्थापित करने का एक उपकरण

यदि कोई व्यक्ति समाज के लिए कुछ करना चाहता है लेकिन समाज-विज्ञान पर उसकी पकड़ नहीं है तो अनजाने में ही उसकी कला उसके मन्तव्य के विपरीत खड़ी हो सकती है। लोगों को मूर्ख बनाने की होड़ में टेलीविज़न पर चलने वाले सीरियलों का तो ज़िक्र ही क्या, ख़बरिया चैनलों पर होने वाली लम्बी-लम्बी बहसों में बड़ी लगन से शिरकत करने वाले बुद्धिजीवी भी मुद्दों को ग़ैर-मुद्दा और गै़र-मुद्दों को मुद्दा बनाने की होड़ में ही लगे रहते हैं। एक तो भारतीय जनमानस अध्ययनशीलता से वैसे ही ख़फ़ा रहता है, बाक़ी रही-सही कसर जनता तक पहुँचने वाला दो कौड़ी का साहित्य पूरी कर देता है। ख़ैर, इन तथाकथित बुद्धिजीवियों के ठाठ तो इसी व्यवस्था की सलामती में हैं। आज के दौर में कूपमण्डूक मध्यमवर्गीय व्यक्ति भी पूँजीवाद के सांस्कृतिक कीचड़ में डुबकी लगाकर फूलकर कुप्पा हो जाता है और मन-ही-मन ख़ुद को बड़ा ही जागरूक और सयाना समझने लगता है।

मुनाफ़े के मकड़जाल में फँसा विज्ञान

मेडिकल विज्ञान में हुए विकास के कारण मानवता इस पड़ाव पर पहुँच चुकी है कि प्लेग जैसी बीमारी जो किसी समय यूरोप की एक-तिहाई आबादी को ख़त्म कर देती थी, जिसका डर इतना भयंकर था कि भारत में आम लोग इस बीमारी का नाम भी अपने मुँह पर नहीं आने देते थे, अब पूरी तरह मनुष्य के क़ाबू में है। अनेकों डॉक्टरों तथा वैज्ञानिकों की अथक मेहनत ने मानवता को इस मंज़िल तक पहुँचाया है। परन्तु अब एक बार फिर से आदमी के सामने उसी समय में वापिस पहुँचने का ख़तरा खड़ा हो रहा है, जिसका कारण दवाओं का बिना-ज़रूरत तथा ग़ैर-वैज्ञानिक इस्तेमाल है।

शिक्षा में सेमेस्टर प्रणाली – सुशिक्षित गुलाम तैयार करने का नुस्खा

वार्षिक प्रणाली के अधीन विद्यार्थियों के पास आपसी बहस, विचार-चर्चाएँ, सेमीनारों और सांस्कृतिक सरगर्मियों के लिए कुछ-कुछ वक़्त होता था, परन्तु सेमेस्टर प्रणाली ने विद्यार्थियों को अपने ख़ुद के लिए समय से पूरी तरह वंचित कर दिया है। सांस्कृतिक सरगर्मियाँ और सेमीनारों के नाम पर प्रशाशन से “मंजूरशुदा” कुछ दिखावे होते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। विद्यार्थियों की तरफ़ से ख़ुद पहलक़दमी करके बहस, सेमीनार आदि करवाने को शिक्षण संस्थानों का प्रशासन सख़्ती के साथ रोकता है, जिसके लिए विद्यार्थियों को डराने-धमकाने तक के हथकण्डे इस्तेमाल किये जाते हैं। कॉलेजों, यूनिवर्सिटियों के कैम्पसों को समाज से अलग-थलग करने में भी सेमेस्टर प्रणाली काफ़ी प्रभावी है। विद्यार्थी ग्रेड-नम्बरों के चक्कर में उलझ कर सामाजिक घटनाओं और समस्त मानवता से टूटकर रह जाते हैं और भयंकर हद तक व्यक्तिवादी चेतना का शिकार हो रहे हैं।

इबोला महामारी: प्राकृतिक? या साम्राज्यवाद-पूँजीवाद की देन

इबोला के कारण आकस्मिक नहीं हैं बल्कि अफ़्रीका के सामाजिक-आर्थिक इतिहास में उसके कारण निहित हैं। उपनिवेशवाद द्वारा ढाँचागत तौर पर अफ़्रीका को पिछड़ा बनाया जाना और उसके बाद भी साम्राज्यवादी-पूँजीवादी लूट और प्रकृति के दोहन ने ही वे स्थितियाँ पैदा की हैं, जिनका प्रकोप अफ़्रीका को आये दिन नयी-नयी महामारियों के रूप में झेलना पड़ता है। इबोला इन महामारियों की श्रृंखला में सबसे भयंकर साबित हो रही है। लेकिन निश्चित तौर पर, साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था के रहते यह आख़िरी महामारी नहीं साबित होगी। अफ़्रीका की जनता को समय रहते इस आदमखोर व्यवस्था की असलियत को समझना होगा और उसे उखाड़ फेंकना होगा।

बाज़ार के हवाले चिकित्सा व्यवस्था में दम तोड़ते आम मेहनतकश

विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2011 की रिपोर्ट के अनुसार 70 फीसदी भारतीय अपनी आय का 70 फीसदी हिस्सा दवाओं पर ख़र्च करते है। भारत विश्व का दवा घर है। वर्ष 2008 में यहाँ का घरेलू दवा बाज़ार 55,000 करोड़ रुपये से अधिक का था। स्वास्थ्य तन्त्र में फैला भ्रष्टाचार आज सत्ता और कम्पनियों की गठजोड़ से ऊपर से नीचे तक फैला हुआ है। कुछ वर्ष पूर्व केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री ने सार्वजनिक क्षेत्र की टीका उत्पादक कम्पनियों को उत्पादन बन्द करने का आदेश दिया ताकि निजी क्षेत्र की कम्पनियाँ लोगों को लूट सकें। मेडिकल काउंसिल का सदस्य डॉ. केतन देसाई मेडिकल संस्थानों को स्वीकृति देने हेतु रिश्वत लेते हुए गिरफ़्तार किया गया। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिशन (एन.एच.आर.एम.) राजनेताओं, डाक्टरों एवं प्रशासकों के लिए आज सोने की खान साबित हुआ है। मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश में घोटालों के कितने ही मामले सामने आये है।

स्कूल बचाओ अभियान का ये पैगामः सबको शिक्षा एक समान!

अमीर और ग़रीब में बँटे हमारे समाज में स्कूल भी दोहरे स्तरों में बँटे हुए हैं। एक तरफ हैं दिल्ली पब्लिक स्कूल, केन्द्रीय विद्यालय सरीखे स्कूल तो दूसरी ओर नगर निगम और सर्वोदय विद्यालय सरीखे; एक स्कूल घुड़सवारी, स्वीमिंग पुल, हवाई जहाज प्रशिक्षण, विदेशी शिक्षक जैसी सुविधाएँ देता है तो दूसरे में पीने का पानी नहीं है, शौचालय नहीं है, शिक्षक नहीं हैं; एक स्कूल में व्यापारियों, पूँजीपतियों, बडे़ अफ़सरान के बच्चे पढ़ते हैं तो दूसरे में मज़दूरों, रिक्शा चालकों, पान की दुकान वालों के बच्चे पढ़ते हैं। यह खुद सभी नागरिकों को समान मानने वाले भारत के संविधान का उल्लंघन है, वैसे इस संविधान के बारे में जितना कम कहा जाये बेहतर है। भारतीय संविधान के दुनिया में सबसे भारी-भरकम संविधान होने का कारण यही है कि इसमें हरेक अधिकार साथ उस अधिकार को हज़म कर जाने का प्रावधान भी जोड़ा गया है!

किसे चाहिए अमेरिकी शैली की स्वास्थ्य सेवा?

सरकार जिस तरह से जनता की स्वास्थ्य सेवा से हाथ पीछे खींच रही है, उससे सरकार का मानवद्रोही चरित्र साफ़ सामने आता है। स्वास्थ्य का अधिकार जनता का बुनियादी अधिकार है। भारत में स्वास्थ्य का स्तर सर्वविदित है। जिस देश में पहले से ही 55 प्रतिशत महिलाएँ रक्त की कमी का शिकार हों, जहाँ 46 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हों, वहाँ स्वास्थ्य सेवा को बाज़ार की ताकतों के हवाले करने के कितने भयावह परिणाम हो सकते हैं, इसे आसानी से समझा जा सकता है। सरकार के इस प्रस्तावित कदम से भी यह साफ़ हो जाता है कि ऐसी व्यवस्था के भीतर जहाँ हर वस्तु माल होती है, वहाँ जनता की स्वास्थ्य सेवा भी बिकाऊ माल ही है। जिस व्यवस्था का केन्द्र बिन्दु मुनाफा हो उससे आप और कोई उम्मीद भी नहीं रख सकते हैं।

स्कूल बचाओ अभियान मुस्तफाबाद में ‘नागरिक निगरानी समिति’ का गठन

स्कूल बचाओ अभियान की संयोजक शिवानी ने बताया कि जनदबाव के चलते ही यह सुनिश्चित हो पाया है कि हमारे बच्चे किस स्कूल में स्थानान्तरित होंगे। यह हमारे संघर्ष की आंशिक जीत थी। हम लोगों द्वारा बनाई गयी ‘नागरिक निगरानी समिति’ को स्कूल की जाँच करने का अधिकार मिलना हमारे संघर्ष की एक बड़ी जीत है। समिति के सदस्य योगेश ने बताया कि ‘स्कूल बचाओ अभियान’ दिल्ली के अन्य इलाकों में भी इस तरह की निगरानी समितियों का गठन करेगा।

स्वास्थ्य तन्त्र में अमानवीयता पूँजीवाद का आम नियम है

मानवद्रोही पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा मुनाफे की ख़ातिर इंसान के गोश्त को भी बेच खाने की प्रवृत्ति उसकी कोई विसंगति या विचलन नहीं है, बल्कि उसकी स्वाभाविक गति है। जो नौजवान अभी भी दूसरों के दुख-दर्द को महसूस करना जानते हैं, और नवजात शिशुओं की मौतों पर जिनका दिल गुस्से और नफरत से भर उठता है, उन्हें यह समझना होगा कि यह कुछ लोगों की नाजायज़ हरक़त या लालच का फल नहीं है। इस त्रासद स्थिति की जड़ में मुनाफा-केन्द्रित पूँजीवादी व्यवस्था है। जब तक इसे तबाह नहीं किया जाता, तब तक यह हमारे जीवन को तबाह करती रहेगी।

शिक्षा में आरक्षण जनता को बाँटने की साजिश है! एकसमान व निःशुल्क स्कूल व्यवस्था का नारा आज की ज़रूरत है!

सभी परिवर्तकामी नौजवानों को अपने संगठनों के ज़रिये यह माँग उठानी चाहिए कि भारत के सभी बच्चों को, चाहे वे किसी भी वर्ग, क्षेत्र, जाति या धर्म के हों, एकसमान स्कूल प्रणाली मिलनी चाहिए। यही आज के दौर में एक सही इंक़लाबी माँग हो सकती है। अन्य सभी माँगें, मिसाल के तौर पर, निजी स्कूलों में आरक्षण आदि की माँग से फौरी तौर पर भी कोई लाभ नहीं मिलता। उल्टे नुकसान ही होता है। इसलिए शासक वर्ग के इस ख़तरनाक ट्रैप में फँसने की बजाये हमें एकसमान स्कूल व्यवस्था की माँग करनी चाहिए। उच्च शिक्षा को बहुसंख्यक आबादी से दूर करते हुए तमाम सरकारें यही कारण बताती हैं कि वे इससे बचने वाले धन को प्राथमिक शिक्षा में निवेश करेंगी। यदि वाकई ऐसा है तो सरकार से यह माँग की जानी चाहिए कि वह सभी बच्चों को निशुल्क, स्तरीय और एकसमान स्कूल शिक्षा दे और सभी क्षेत्रों के बच्चों को उनकी भाषा में पढ़ने का अधिकार मुहैया कराये।