Category Archives: भ्रष्‍टाचार

मोदी सरकार के घोटालों की लम्बी होती फ़ेहरिस्त

घोटालों की मार को ख़त्म करने का नारा देते हुए आयी भाजपा सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद भी घोटाले और वित्तीय अनियमितताएँ जारी हैं। आज़ादी के बाद से बननी शुरू हुई घोटालों की फ़ेहरिस्त में इस बार भी कई बड़े घोटाले शामिल हुए हैं। जहाँ एक तरफ देश की कमान सम्भाल रहे नरेन्द्र मोदी ‘मेक इन इण्डिया’, ‘स्किल इण्डिया’ जैसे नारे देकर सबके विकास का राग अलाप रहे हैं, वहीं इसी राग के साथ देश के नेता-नौकरशाह जनता की गाढ़ी कमाई से ऐय्याशी के बाद भी अपनी धुन में घोटाले किये जा रहे हैं।

पनामा पेपर लीक मामला

भारत के नेताओं, मंत्रियों और कॉरपोरेट घरानों ने काले धन में इतने घपले किये हैं कि जनता को यह आम बात लगती है और वह सारे गोरखधन्धे की बारीकी व विभत्सता तथा इससे जुडे़ खूनी खेल को समझ भी नहीं पाती कि यह सारी चोरी और डाकेजनी उसी की जेबों में से हो रही है, उनके बच्चों की दवाएँ महँगी हो रही हैं, उनके पास ही लाश ढँकने तक के लिए कफन नहीं है। दुनिया भर के हुक्मरानों के कुकर्मों के उजागर होने पर तभी उनका बाल बाँका किया जा सकता है जब जनता इस बात को जानती हो कि तमाम घोटाले और घपले दरअसल उनकी गाढ़ी मेहनत के दम पर पैदा की गयी दौलत को लेकर होते हैं।

साम्प्रदायिक फासीवादी सत्ताधारियों के गन्दे चेहरे से उतरता नकाब़

दरअसल, पिछले दस साल से भाजपाई सत्ता को तरस गये थे; पूँजीपति वर्ग से गुहारें लगा रहे थे कि एक बार उनके हितों की सेवा करने वाली ‘मैनेजिंग कमेटी’ का काम कांग्रेस के हाथों से लेकर उसके हाथों में दे दिया जाय; वे अम्बानियों-अदानियों को लगातार याद दिला रहे थे कि गुजरात में, मध्य प्रदेश में और छत्तीसगढ़ में उन्होंने मज़दूरों-मेहनतकशों की आवाज़ को किस कदर दबा कर रखा है, उन्होंने किस तरह से कारपोरेट घरानों को मुफ़्त बिजली, पानी, ज़मीन, कर से छूट आदि देकर मालामाल बना दिया है! ये सारी दुहाइयाँ देकर भाजपाई लगातार देश की सत्ता को लपकने की फि़राक़ में थे! वहीं दूसरी ओर 2007 में शुरू हुई वैश्विक मन्दी के बाद पूँजीपति वर्ग को भी किसी ऐसी सरकार की ज़रूरत थी जो उसे लगातार छँटनी, तालाबन्दी के साथ-साथ और भी सस्ती दरों पर श्रम को लूटने की छूट दे और श्रम कानूनों से छुटकारा दिलाये। बिरले ही लागू होने वाले श्रम कानून भी मन्दी की मार से कराह रहे पूँजीपति वर्ग की आँखों में चुभ रहे हैं क्योंकि जहाँ कहीं कोई मज़बूत मज़दूर आन्दोलन संगठित होता है वहाँ कुछ हद तक वह श्रम कानूनों की कार्यान्वयन के लिए सत्ता को बाध्य भी करता है। इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए देश के पूँजीपति वर्ग को भाजपा जैसी फासीवादी पार्टी को सत्ता में पहुँचाना अनिवार्य हो गया। यही कारण था कि 2014 के संसद चुनावों में मोदी के चुनाव प्रचार पर देश के पूँजीपतियों ने अभूतपूर्व रूप से पैसा ख़र्च किया, इस कदर ख़र्च किया कि कांग्रेस भी रो पड़ी कि मोदी को सारे कारपोरेट घरानों का समर्थन प्राप्त है और मोदी उन्हीं का आदमी है! यह दीगर बात है कि कांग्रेस की इस कराह का कारण यह था कि मन्दी के दौर में फासीवादी भाजपा पूँजीपति वर्ग के लिए उससे ज़्यादा प्रासंगिक हो गयी थी। मोदी ने सत्ता में आने के बाद देश-विदेश के कारपोरेट घरानों के जिस अश्लीलता से तलवे चाटे हैं, वह भी एक रिकॉर्ड है। श्रम कानूनों को बरबाद करने, ट्रेड यूनियन बनाने के अधिकार को एक प्रकार से रद्द करने, करों और शुल्कों से पूँजीपति वर्ग को छूट देने, विदेशों में भारतीय कारपोरेट घरानों के विस्तार के लिए मुफ़ीद स्थितियाँ तैयार करने से लेकर हर प्रकार के जनप्रतिरोध को मज़बूती से कुचलने में मोदी ने नये कीर्तिमान स्थापित किये हैं। लेकिन एक दिक्कत भी है

एक युवा नाटककार की नज़र से ललितगेट घोटाला

इस पूरे वाकये में भाजपा सरकार के अन्तरविरोध भी उभर आए हैं। लम्बे समय से कांग्रेस के शासन के कारण भाजपा के नेता सत्ता में आते ही जैसे बौखला गए हैं। देश का ‘प्रधानसेवक’ देश से ज़्यादा विदेश में घूमता है। वे किसी भी राजनेता द्वारा किए गए विदेशी दौरों की प्रतिस्पर्धा में अव्वल हैं। व्यापम घोटाला अब तक करीब 45 जानें ले चुका है और राज्यसत्ता के चरित्र को ये खुल कर नंगा कर रहे है। अब इनके पास अब सिर्फ हिन्दुत्व की परत है जो यह लगातार चढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, अटाली में दंगे कराकर, मुज़फ्फ़रनगर-शामली में लगातार साम्प्रदायिकता की लहर फैलाकर। परन्तु जिस कदर संसद में बैठे ये भ्रष्टाचारी नंगे हो रहे हैं मीडिया द्वारा बनाई मोदी लहर के लिए संकट हो सकता है और हो सकता है आने वाले समय में ये जनता का ध्यान बाँटने के लिए कोई जुमला उछाले, किसी देश के साथ किए लूट के सौदों को ऐतिहासिक बताएँ या फिर दंगे भड़काकर जनता का ध्यान बाँटें। मोदी द्वारा जन सुरक्षा बिल को अभी ज़्यादा कवरेज नहीं मिली है और इस रक्षाबंधन पर शायद वे फिर इस गुब्बारे में हवा भरें। पर जिस दर से मोदी सरकार के मंत्री लूट, खून, खराबे और अय्याशी में पकड़े जा रहे हैं उसे ये सुरक्षा बिल के खोखले ड्राफ्ट नहीं सम्भाल सकते हैं। इनकी हवस का अंदाजा वसुन्धरा राजे के हलफनामे और सुषमा स्वराज के मंत्रालय में किसी को सूचित किये बिना जारी समर्थन पत्र से लग सकता है।

‘आप’ के उभार के मायने

‘आप’ पूरी पूँजीवादी व्यवस्था को कभी कठघरे में खड़ा नहीं करती। केजरीवाल ने एक कारपोरेट घराने के ‘काम करने के तरीकों’ पर सवाल उठाना शुरू किया था, लेकिन इस मुद्दे पर जल्द ही वह चुप्पी साध गये। बाकी कारपोरेट घरानों पर केजरीवाल ने कभी मुँह तक नहीं खोला। उल्टे पूँजीपति वर्ग को भी वह ‘विक्टिम’ और पीड़ित के रूप में दिखलाते हैं! अपने घोषणापत्र में केजरीवाल लिखते हैं कि कांग्रेस और भाजपा जैसी भ्रष्ट पार्टियों के कारण मजबूर होकर पूँजीपतियों को भ्रष्टाचार करना पड़ता है! यह दोगलेपन की इन्तहाँ नहीं तो क्या है? आप देख सकते हैं कि भ्रष्टाचार के मुद्दे को किस प्रकार नंगी और बर्बर पूँजीवादी लूट को छिपाने के लिए इस्तेमाल किया गया है। पूँजीपति जो श्रम कानूनों का उल्लंघन करते हैं क्या वह मजबूरी के कारण करते हैं? ठेकाकरण क्या वह भ्रष्टाचार से मजबूर होकर करते हैं? यह तो पूरी तस्वीर को ही सिर के बल खड़ा करना है। वास्तव में, सरकार (चाहे किसी की भी हो!) और पूँजीपति वर्ग मिलकर मज़दूरों के विरुद्ध लूट और हिंसा को अंजाम देते हैं! केजरीवाल की इस महानौटंकी के पहले अध्याय के लिखे जाते समय ही दिल्ली के पड़ोस में मारुति सुजुकी के मज़दूरों का संघर्ष चल रहा था लेकिन केजरीवाल ने इस पर एक शब्द नहीं कहा; दिल्ली में ही मेट्रो के रेल मज़दूरों को न्यूनतम मज़दूरी और ठेका प्रथा ख़त्म करने के लिए संघर्ष चल रहा था, इस पर भी केजरीवाल ने एक बयान तक नहीं दिया! क्या केजरीवाल को यह सारी चीज़ें पता नहीं है? ऐसा नहीं है! यह एक सोची-समझी चुप्पी है! मज़दूरों के लिए कुछ कल्याणकारी कदमों जैसे कि पक्के मकान देना आदि की बात करना एक बात है, और मज़दूरों के सभी श्रम अधिकारों के संघर्षों को समर्थन देना एक दूसरी बात।

भ्रष्टाचार-मुक्त सन्त पूँजीवाद के भ्रम को फैलाने का बेहद बचकाना और मज़ाकिया प्रयास

ऐसी तमाम प्रयास पूँजीवादी व्यवस्था और समाज में बीच-बीच में होते ही रहते हैं। जब-जब पूँजीवादी व्यवस्था अपनी नंगई और बेशरमी की हदों का अतिक्रमण करती हैं, तो उसे केजरीवाल और अण्णा हज़ारे जैसे लोगों की ज़रूरत होती है, तो ज़ोर-ज़ोर से खूब गरम दिखने वाली बातें करते हैं, और इस प्रक्रिया में उस मूल चीज़ को सवालों के दायरे से बाहर कर देते हैं, जिस पर वास्तव में सवाल उठाया जाना चाहिए। यानी कि पूरी पूँजीवादी व्यवस्था। आम आदमी पार्टी का घोषणापत्र भी यही काम करता है। यह मार्क्स की उसी उक्ति को सत्यापित करता है जो उन्होंने ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ में कही थी। मार्क्स ने लिखा था कि पूँजीपति वर्ग का एक हिस्सा हमेशा समाज में सुधार और धर्मार्थ कार्य करता है, ताकि पूँजीवादी व्यवस्था बरक़रार रहे।

सारदा चिटफण्ड घोटालाः सेंधमार, लुटेरे पूँजीवाद का प्रातिनिधिक उदाहरण

निम्न पूँजीपति वर्ग के लोगों ने लाखों की तादाद में इन मज़ाकिया स्कीमों पर भरोसा क्यों किया इसे समझने के लिए इस वर्ग के चरित्र को समझने की भी ज़रूरत है। यह वर्ग न पूरी तरह आबाद होता है और न ही पूरी तरह बरबाद होता है। नतीजतन, इसकी राजनीतिक वर्ग चेतना भी अधर में लटकी होती है। अपनी राजनीतिक माँगों के लिए संगठित होने और सरकार की नीतियों के ख़ि‍लाफ जनता के अन्य मेहनतकश हिस्सों के साथ संगठित होकर आवाज़ उठाने की बजाय अधिकांश मामलों में वह पूँजीवादी व्यवस्था के पैरोकारों द्वारा पेश किये जा रहे दावों और वायदों पर भरोसा कर बैठता है। और जब उसे इसका ख़ामियाज़ा भुगताना पड़ता है तो वह काफ़ी छाती पीटता है और शोर मचाता है। सारदा ग्रुप जैसी फ्रॉड कम्पनियों की स्कीमों के निशाने पर ये ही वर्ग होते हैं, जो परिवर्तन और बदलाव की मुहिम के ढुलमुलयकीन मित्र होते हैं। जब परिवर्तन की ताक़तें उफान पर होती हैं, तो ये उनके पीछे चलते हैं और जब माहौल यथास्थितिवादी ताक़तों के पक्ष में होता है, तो ये अपने निजी, व्यक्तिगत हित साधने में व्यस्त रहते हैं और व्यवस्था को एक प्रकार से मौन समर्थन देते हैं।

केजरीवाल एण्ड पार्टी के “आन्दोलन” से किसको क्या मिलेगा?

जो भी ताक़त महज़ भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाती है, मुनाफे पर टिकी पूरी पूँजीवादी व्यवस्था को नहीं, वह जनता को धोखा दे रही है। भ्रष्टाचार-मुक्त पूँजीवाद एक मध्यवर्गीय भ्रम है। पूँजीवाद वैसा ही हो सकता है जैसा कि वह है। केजरीवाल और अण्णा हज़ारे जैसे लोगों का काम जाने-अनजाने इसी पूँजीवादी व्यवस्था की उम्र को लम्बा करना है। इसके लिए वह भ्रष्टाचार को एकमात्र समस्या के रूप में और भ्रष्टाचार के किसी कानून के जरिये या “ईमानदार” पार्टी के सत्ता में आने के जरिये ख़ात्मे को सभी दिक्कतों के समाधान के रूप में पेश करते हैं। भ्रष्टाचार का अपने आपमें कोई अर्थ नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे मानवाधिकारों, तानाशाही, आतंकवाद आदि जैसी श्रेणियों का अपने आपमें कोई अर्थ नहीं हैं। ये खोखले शब्द हैं और अपने आपमें ये कुछ भी नहीं बताते जब तक कि इनके साथ कोई विशेषण नहीं लगता। भ्रष्टाचार को एकमात्र समस्या के तौर पर पेश करना हमारे समाज में मौजूद असली आर्थिक लूट और सामाजिक अन्याय को छिपाता है और ‘सुशासन’ को एकमात्र मसला बना देता है।

काले धन पर श्वेत पत्र की सरकारी नौटंकी

काले धन की समस्या में अगर किसी का व्यक्तिगत और सामूहिक उत्तरदायित्व बनता है तो वह इस देश का लोभी, लालची, अनैतिक, पतन के गर्त में पहुँच चुका, विलासी, भ्रष्टाचारी और लम्पट पूँजीपति वर्ग और उसकी नुमाइन्दगी करने वाली पूँजीवादी सरकार है, चाहे वह किसी भी पार्टी के नेतृत्व में बनी हो। यह सारा काला धन जनता को ही तो लूट कर इकट्ठा किया गया है!

अण्णा हज़ारे की महिमा बनाम संसद की गरिमा: तुमको क्या माँगता है?

देश के आम मेहनकतश लोग समझ रहे हैं कि अण्णा बनाम सरकार के पूरे शो में वास्तविक सवाल छिपा दिये गये हैं। यह शो वास्तव में पूँजीवाद की वास्तविक नंगई पर पर्दा डालने की कोशिश करता है। यह एक ग़लत/काल्पनिक दुश्मन पैदा करता है। यह असली दुश्मन को नज़र से ओझल करता है। अण्णा बनाम सरकार एक छद्म विकल्पों का युग्म है। सभी जानते हैं कि अगर कानूनों और अधिनियमों से सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक समस्याएँ दूर होतीं, तो इस देश के मज़दूरों की स्थिति बहुत बेहतर होती क्योंकि उनके लिए तो 206 श्रम कानून बने हुए हैं; वैसे तो भ्रष्टाचार-निरोधक कानून भी बना हुआ है; क्या कन्या भ्रूण हत्या के खि़लाफ़ कानून पास होने से यह समस्या ख़त्म हो गयी? यह तो और बढ़ी है! क्या शिक्षा के अधिकार के लिए कानून पास होने से देश में अशिक्षा ख़त्म हुई है? क्या न्यूनतम मज़दूरी और खाद्य सुरक्षा के लिए कानून बनने से ये समस्याएँ दूर हो जायेंगी? जब 64 साल के इतिहास में एक भी कानून ने कोई समस्या हल नहीं की तो ऐसा मानने वाला अव्वल दर्जे़ का मूर्ख या छँटा हुआ राजनीतिक छलिया और चार सौ बीस ही होगा कि जनलोकपाल (या कोई भी लोकपाल) बनने से भ्रष्टाचार की समस्या दूर होगी! ज़्यादा उम्मीद तो यही है कि भ्रष्ट होने के लिए एक नया अधिकारी पैदा हो जायेगा! इसलिए मूल सवाल है मौजूदा सामाजिक-आर्थिक ढाँचे में आमूल-चूल बदलाव। और अण्णा और सरकार दोनों ही इस मूल प्रश्न पर जनता का ध्यान नहीं जाने देना चाहते हैं।