Category Archives: पुस्‍तक परिचय‍ व समीक्षा

आज भी उतना ही प्रासंगिक है ‘जंगल’ उपन्यास

‘जंगल’ उपन्यास वह रचना थी जिसने गहरा सामाजिक प्रभाव छोड़ा था। पत्रिका में धारावाहिक छपने के बाद जब पुस्तक के रूप में इसे प्रकाशित करने की बारी आयी तो छह प्रकाशक सीधे तौर पर हाथ खड़े कर गये। जब सिंक्लेयर ने स्वयं इसके प्रकाशन का निर्णय लिया तो डबलसे इसे प्रकाशित करने के लिए तैयार हो गये। 1906 में पुस्तक के रूप में आते ही इस उपन्यास की 1,50,000 प्रतियाँ बिक गयीं तथा अगले कुछ ही वर्ष के भीतर 17 भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका था इतना ही नहीं अमेरिका के तत्कालिक राष्ट्रपति थियोडोर रूज़वेल्ट ने स्वयं ‘जंगल’ उपन्यास पढ़ने के बाद अप्टन सिंक्लेयर से मुलाकात की और तत्काल ही एक जाँच कमेटी नियुक्त की जिसकी रिपोर्ट के आधार पर उसी वर्ष ‘प्योर फूड एण्ड ड्रग्स ऐक्ट’ और ‘मीट इंस्पेक्शन ऐक्ट’ नामक दो कानून पारित हुए तथा मांस पैकिंग उद्योग के मज़दूरों की जीवन-स्थितियों में सुधार के लिए भी कुछ कदम उठाये गये।

प्रेम की आज़ादी के लिए परम्परा से विद्रोह

कात्यायनी की प्रस्तुत पुस्तक स्‍त्री व पुरुष के प्रेम को असम्भव बनाने वाली समाजार्थिक परिस्थितियों का ऐतिहासिक भौतिकवादी विश्लेषण करते हुए, उसे सम्भव बनाने हेतु समाजवादी क्रान्ति की पक्षधर है। इस विषय को स्पष्ट करने हेतु, कम्युनिज़्म की सैद्धान्तिकी का सहारा वे लेती हैं, जिससे किसी हद तक वह सैद्धान्तिकी भी पुस्तक विवेचित कर देती है। मात्र 64 पृष्ठों में दीर्घ निबन्ध की शक्ल में लिखी, यह स्‍त्री विमर्श से कुछ आगे की किताब है, जो भाषा की दुरूहता के बावजूद, पठनीय है। इस विषय पर इतनी यथार्थपरक वैचारिक कृति हिन्दी में अब तक, कम से कम मेरी दृष्टि में, नहीं आयी थी। “प्रेम” की हत्या करने की परम्परा से सन्दर्भित प्रत्यक्ष सामाजिक संकट से शुरू हुई यह रचना गहन विमर्श में परिणत होती है। यह शोध है, जो हमें बोध देता है, जिससे प्रेम की राह के अवरोध दूर करने की प्रेरणा मिलती है। “प्रेम’’ को बचाना नर-नारी समता को बचाना है, “प्रेम” को लाना जीवन की सरसता व मधुरता को लाना है – इसी सन्दर्भ में पुस्तक का लेखन हुआ लगता है, तो अनुशीलन भी इसी सन्दर्भ में होना चाहिए।

प्रो. लालबहादुर वर्मा का प्रेम-चिन्तन

अगले ही पैरा में लेखक एक और ऐसी बात कहता है जिससे यह संशय होता है कि या तो मार्क्सवाद की अपनी समझ से वे प्रस्थान कर चुके हैं, या फिर मार्क्सवाद में ही वे कोई नया इज़ाफ़ा कर रहे हैं। वे कहते हैं कि उन्नीसवीं सदी में क्रान्ति का सिद्धान्त रचा गया और उसके आधार पर व्यवहार भी विकसित हुआ, लेकिन इसके साथ ही लैंगिक राजनीति का उस अनुपात में विकास नहीं हो सका जिससे कि नारी आश्वस्त और सन्तुष्ट हो सके। अब इस पर क्या कहा जा सकता है? मार्क्सवाद अलग से किसी भी लैंगिक राजनीति का विरोध करता है। मानव मुक्ति के पूरे प्रोजेक्ट के तमाम हिस्सों में से एक हिस्सा जेण्डर प्रश्न का समाधान है, ठीक उसी प्रकार जैसे उसका एक हिस्सा जाति प्रश्न का समाधान भी है। लेकिन अलग से लैंगिक राजनीति वास्तव में अस्मितावादी राजनीति की ओर ले जाती है। एक बात और भी स्पष्ट नहीं हो पाती है कि लैंगिक राजनीति से प्रो. वर्मा का अर्थ सेक्सुअल पॉलिटिक्स है या फिर जेण्डर पॉलिटिक्स, क्योंकि इन दोनों में फ़र्क़ है। लेकिन यह भ्रम इस पूरे लेख में लगातार मौजूद रहता है। कहीं पर लैंगिक प्रश्न जेण्डर प्रश्न का अर्थ ध्वनित कर रहा है तो कहीं पर यह सेक्सुअल निहितार्थों में प्रकट हो रहा है। बहरहाल, यहाँ पर इन दोनों ही अर्थों में लैंगिक राजनीति का समर्थन करना ग़लत है। इस प्रश्न पर भी प्रो. वर्मा को अपनी अवस्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, कि वे किस प्रकार की लैंगिक राजनीति की वकालत कर रहे हैं, जिससे कि सभी वर्गों की नारियाँ ‘आश्वस्त और सन्तुष्ट’ हो जायें।