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छात्र-युवा आन्दोलन: अप्रोच और दृष्टिकोण के बारे में कुछ और स्पष्टीकरण

आधुनिक युग के इतिहास के किसी भी दौर में, किसी भी देश में क्रान्तिकारी सामाजिक परिवर्तन में छात्रों-युवाओं की अहम भूमिका रही है। लेकिन इस तथ्य को स्वीकारते हुए, छात्रों-युवाओं की आबादी के प्रति एक ग़ैरवर्गीय नज़रिया अपनाना या केवल मध्यवर्गीय युवा आबादी की भूमिका पर बल देना ग़लत और नुकसानदेह होता है।

मेहनतकश जनसमुदाय से एकता बनाने के लिए क्रान्तिकारी छात्रों-युवाओं को कुछ ठोस क़दम उठाने होंगे!

हमारा यह ठोस सुझाव है कि कैम्पसों से, छुट्टियों के दौरान ऐसे छात्रों की टोलियाँ बनाकर मज़दूर बस्तियों में जाना चाहिये। वहाँ रुककर उत्पादन कार्य में भी कुछ भागीदारी करनी चाहिए। दिहाड़ीकरण-ठेकाकरण के इस समय में कुछ न कुछ मज़दूरी का काम मिल ही जाता है। इसके साथ ही मज़दूरों को, मज़दूर स्त्रियों को और उनके बच्चों को पढ़ाने का और इसी दौरान देश-दुनिया-समाज का ज्ञान देने का काम करना चाहिये, स्वास्थ्य-सफ़ाई आदि के अभियान चलाने चाहिये, युवा मज़दूरों और मज़दूरों के युवा बेटों को खेलकूद और सांस्कृतिक कार्रवाइयों के दौरान शिक्षित और संगठित करना चाहिये। उन्हें क्रान्तिकारियों और क्रान्तियों के इतिहास से परिचित कराना चाहिये। छुट्टियाँ समाप्त होने के बाद भी, बीच-बीच में जाकर इस प्रक्रिया को चलाते रहा जा सकता है। ऐसे उन्नत क्रान्तिकारी चेतना वाले छात्र छात्रवास और किराये की जगहें छोड़कर यदि मज़दूर बस्तियों में ही रह सकें तो और भी अच्छा है। इसी प्रक्रिया में उन्हें मज़दूरों की जीवन स्थितियों की गहरी जानकारी होगी और एक दिन उनकी भूमिका मज़दूर संगठनकर्ता की बनने लगेगी।

कैम्पसों का बदलता वर्ग चरित्र और छात्र-युवा आन्दोलन की चुनौतियाँ

लेकिन हमें कैम्पस को छोड़ नहीं देना होगा। वहाँ हमें आम मध्यवर्ग और निम्न-मध्यवर्ग के उन तमाम युवाओं को संगठित करना होगा जो किसी तरह कैम्पस में पहुँच पा रहे हैं। इसके साथ ही हमें उच्च और खाते-पीते मध्यवर्ग के उन नौजवानों को भी खोजना होगा जो इस हद तक संवेदनशील और न्यायप्रिय हैं कि अपने वर्ग हितों का त्याग करके अपने सपनों और आकांक्षाओं को इस देश की उस बहुसंख्यक आम मेहनतकश आबादी के सपनों और आकांक्षाओं के साथ जोड़ सकते हैं, जो उनके अस्तित्व की भी हर शर्त को पूरा कर रही है लेकिन जो उनकी तरह अपने बच्चों को कॉलेजों-कैम्पसों में नहीं भेज सकती। हमारा मानना है कि हमारे देश ने ऐसे नौजवानों को पैदा करना अभी बन्द नहीं किया है। और भारत में इन्‍क़लाब के किसी भी प्रोजेक्ट की तैयारी में आज शुरुआती दौर में ऐसे नौजवानों की बेहद ज़रूरत है जो सक्षम संगठनकर्ता की भूमिका को निभा सकें; जिनके पास इतिहास, समाज और विज्ञान का ज्ञान हो। ऐसे में कैम्पस से आने वाले, अपने वर्ग से अलग होकर मेहनतक़श वर्गों के पक्ष में आकर खड़े होने वाले इन युवाओं की एक ख़ास भूमिका बन जाती है। ऐसे छात्रों को हमें लगातार कैम्पस में जोड़ना होगा और उन्हें लेकर मज़दूर बस्तियों, निम्न-मध्यवर्गीय कालोनियों, कारख़ाना गेटों आदि पर जाना होगा और शहीदे-आज़म भगतसिह के उसी सन्देश पर अमल करना होगा कि आज देश के छात्रों-युवाओं को क्रान्ति के सन्देश को लेकर इस देश की मज़दूर बस्तियों, गाँव की जर्जर झोंपड़ियों, कारख़ानों आदि में जाना होगा। कैम्पस में और उसके बाहर भी, छात्र-युवा आन्दोलन की केन्द्रीय माँग आज एक ही हो सकती है – ‘सबको समान एवं निःशुल्क शिक्षा और सबको रोज़गार।’ इससे कम हम किसी माँग को भी सुधारवादी और उदारवादी मानते हैं। इस मुद्दे पर होने वाला संघर्ष ही हमें आगे की राह दिखायेगा। इस माँग पर छात्र-युवा आन्दोलन ही हमें और बुनियादी मुद्दों तक लेकर जायेगा। आज के समय का सही संघर्ष इसी माँग को लेकर हो सकता है।

छात्रों के जनवादी अधिकारों पर एक ख़तरनाक हमला

कहने के लिए लिंगदोह कमेटी के सुझावों का मक़सद छात्र राजनीति की सफाई करना है और उसे राजनीतिक कुरीतियों से बचाना है। लेकिन दरअसल यह छात्र राजनीति को साफ करने के नाम पर साधारण छात्रों की व्यापक आबादी को राजनीति से दूर करने की साजि“श है। यह छात्रों के जनवादी अधिकारों पर हमला है। जिस तरह लोकसभा और विधानसभा चुनावों में आचार संहिता का तमाम चुनावी पार्टियों और अपराधी उम्मीदवारों के लिए कोई मतलब नहीं है और आचार संहिता के प्रावधानों से बच निकलने के चोर रास्ते तलाश लिये जाते हैं, उसी तरह छात्र संघ चुनावों में भी ये सुझाव छात्र राजनीति को तो साफ नहीं कर पायेंगे, हाँ, छात्रों के वास्तविक प्रतिनिधियों के लिए छात्र संघ के मंच का इस्तेमाल कर पाना जरूर थोड़ा और मुश्किल बना देंगे। और यही इन सिफारिशों का असली मक़सद भी है।

आरक्षण पक्ष, विपक्ष और तीसरा पक्ष

सत्ताधारी वर्ग जब नौकरियों या उच्च शिक्षा में आरक्षण का लुकमा फेंकते हैं तो पहले से नौकरियों पर आश्रित, मध्यवर्गीय, सवर्ण जातियों के छात्रों और बेरोज़गार युवाओं को लगता है कि आरक्षण की बैसाखी के सहारे दलित और पिछड़ी जातियाँ उनके रोज़गार के रहे-सहे अवसरों को भी छीन रही हैं। वे इस ज़मीनी हक़ीक़त को नहीं देख पाते कि वास्तव में रोज़गार के अवसर ही इतने कम हो गये हैं कि यदि आरक्षण को एकदम समाप्त कर दिया जाये तब भी सवर्ण जाति के सभी बेरोज़गारों को रोज़गार नहीं मिल पायेगा। इसी तरह दलित और पिछड़ी जाति के युवा यह नहीं देख पाते कि यदि आरक्षण के प्रतिशत को कुछ और बढ़ा दिया जाये और यदि वह ईमानदार और प्रभावी ढंग से लागू कर दिया जाये, तब भी दलित और पिछड़ी जातियों के पचास प्रतिशत बेरोज़गार युवाओं को भी रोज़गार नसीब न हो सकेगा। उनके लिए रोज़गार के जो थोड़े से नये अवसर उपलब्ध होंगे, उनका भी लाभ मुख्यतः मध्यवर्गीय बन चुके दलितों और आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक रूप से प्रभावशाली पिछड़ी जातियों के लोगों की एक अत्यन्त छोटी-सी आबादी के खाते में ही चला जायेगा तथा गाँवों-शहरों में सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा का जीवन बिताने वाली बहुसंख्यक आबादी को इससे कुछ भी हासिल नहीं होगा।

भगतसिंह की स्मृति के निहितार्थ

अपने कई पत्रों, लेखों और कोर्ट में दिये गये बयानों में भगतसिंह ने यह स्पष्ट किया था कि वह और उनके साथी मात्र औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के लिए नहीं लड़ रहे थे, बल्कि उनकी लड़ाई हर किस्म के पूँजीवादी शोषण के ख़िलाफ़ और एक न्यायपूर्ण, समतामूलक सामाजिक व्यवस्था की स्थापना के लिए जारी दीर्घकालिक महासमर की एक कड़ी थी। हमारे लिए भगतसिंह को याद करने का मतलब सिर्फ़ उनकी वीरता और कुर्बानी को ही नहीं बल्कि उनके लक्ष्य और विचारों को याद करना होना चाहिए।

छात्र-नौजवान नयी शुरुआत कहाँ से करें?

भगतसिंह ने जो भविष्य-स्वप्न देखा था, उसे मुक्ति की परियोजना में ढालने और अमली जामा पहनाने का काम अभी भी हमारे सामने एक यक्ष प्रश्न के रूप में खड़ा है। क्या अब भी हम उस आह्वान की अनसुनी करते रहेंगे? क्रान्तिकारी तूफ़ानों में उड़ान भरने के लिए अपने पंखों को तोलने के वास्ते भविष्य मुक्तिकामी युवा दिलों का आह्वान कर रहा है। गर्वीले गरुड़ और तूफ़ानी पितरेल इस आह्वान की अनसुनी क़तई नहीं कर सकते।

उम्मीद महज़ एक भावना नहीं है!

उम्मीद को महज़ एक भावना के रूप में ज़िन्दा रखना काफ़ी नहीं है। आशावाद को एक वैज्ञानिक आधार देना होगा। जड़सूत्रवाद से बचने के लिए क्रान्ति के विज्ञान को समझना होगा और अपनी वैज्ञानिक समझ के सहारे अपने देश-काल की परिस्थितियों को समझकर नयी क्रान्तियों की राह निकालनी होगी।

किस चीज़ का इन्तज़ार है? और कब तक? दुनिया को तुम्हारी ज़रूरत है!

ज़रूरत है ऐसे बहादुर, विचारसम्पन्न नौजवानों की, जो इस काम को अंजाम देने के लिए आगे आयें। यह तो सभी महसूस करते हैं कि उनके माँ-बाप को उनकी ज़रूरत है। जो लोग यह महसूस करते हैं कि समाज को उनकी ज़रूरत है, वे ही इतिहास बदलने के औज़ार गढ़ते हैं और परिवर्तनकामी जनता के हिरावल बनते हैं। आज एक बार फ़िर सब कुछ नये सिरे से शुरू करना है और इसके लिए कोई मसीहा धरती पर नहीं आयेगा। बदलाव की तैयारी आम जनता के कुछ बहादुर युवा सपूत ही शुरू करेंगे। ऐसे ही लोग सच्चे युवा हैं। उनकी संख्या ही बहुसंख्या है। पर अभी वे निराशा या ‘क्या करें क्या न करें’ की दुविधाग्रस्त मानसिकता से ग्रस्त हैं। सही है, कि हार के समय थोड़ी निराशा आ जाती है। लेकिन कब तक मेरे भाई? अब तो उबरने का समय आ चुका है? इसके संकेतों को पहचानने की कोशिश तो करो! क्या हज़ार ऐसे कारण नहीं है कि हम विद्रोह करें और क्या इनमें से चन्द एक ही काफ़ी नहीं हैं कि हम अपनी तैयारी अभी से शुरू कर दें? क्या एकमात्र रास्ता यही नहीं बचा है कि हम अन्याय के विरुद्ध लड़ें और छिटपुट न लड़ें बल्कि अपनी लड़ाई को सामाजिक क्रान्ति की सीढ़ियाँ बना दें।