Category Archives: सम्‍पादकीय

देश में नये फासीवादी उभार की तैयारी

इतिहास गवाह है कि बुर्जुआ मानवतावादी अपीलों और धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने से साम्प्रदायिक फ़ासीवाद का मुकाबला न तो किया जा सका है और न ही किया जा सकता है। फ़ासीवादी ताकतों और फ़ासीवाद की असलियत को बेपर्दा करके जनता के बीच लाना होगा और जनता की फौलादी एकजुटता कायम करनी होगी। फ़ासीवाद का मुकाबला हमेशा मज़दूर वर्ग ने किया है। क्रान्तिकारी ताक़तों को मज़दूर वर्ग को उनकी आर्थिक माँगों पर तो संगठित करना ही होगा, साथ ही उनके सामने इस पूरी व्यवस्था की सच्चाई को बेपर्द करना होगा और राजनीतिक तौर पर उन्हें जागृत, गोलबन्द और संगठित करना होगा। इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है। हम अपनी आँखों के सामने नये सिरे से फासीवादी उभार देख रहे हैं। न सिर्फ़ भारत में बल्कि वैश्विक पूँजीवादी संकट के इस दौर में यूनान, पुर्तगाल, फ्रांस और स्पेन से लेकर अमेरिका और इंग्लैण्ड तक में। हमारे देश में यह उभार शायद सर्वाधिक वर्चस्वकारी और ताक़तवर ढंग से आ रहा है। जनता के बीच शासन से मोहभंग की स्थिति को पूरी व्यवस्था से मोहभंग में तब्दील किया जा सकता है और हमें करना ही होगा। मौजूदा संकट ने जो दोहरी सम्भावना (क्रान्तिकारी और प्रतिक्रियावादी) पैदा की है, उसका लाभ उठाने में क्रान्तिकारी ताक़तें फिलहाल बहुत पीछे हैं, जबकि फासीवादी ताक़तें योजनाबद्ध ढंग से आगे बढ़ रही हैं। हमें अभी इसी वक़्त इस स्थिति से निपटने की तैयारी युद्धस्तर पर करनी होगी, नहीं तो बहुत देर हो जायेगी।

उत्तराखण्ड त्रासदीः हादसा बनाम हक़ीक़त

आज यह कहना पहले से भी बड़ी वास्तविकता बन गया है कि पूँजीवाद को एक जनक्रान्ति द्वारा इतिहास की कचरा पेटी के हवाले नहीं किया जाता तो मानवता के सामने एक ही विकल्प मौजूद होगा-विनाश! उत्तराखण्ड जैसी पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा जनित त्रासदियाँ मानवता ही नहीं बल्कि पृथ्वी और उस पर रहने वाले तमाम जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों या यूँ कहे कि उसके समूचे पारिस्थितिक तंत्र के अस्तित्व के लिए ख़तरे की घण्टी हैं। ऐसी आपदाएँ इस बात के स्पष्ट संकेत देती हैं कि यदि पूँजीवादी व्यवस्था को समय रहते नष्ट नहीं किया गया तो यह समूची मानवता को ही नहीं बल्कि समूचे भूमण्डल को नष्ट कर देगी। मनुष्य निश्चित तौर पर प्रकृति के साथ सामंजस्य में अस्तित्वमान रह सकता है। लेकिन लूट और मुनाफ़े की अन्धी हवस पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था के तहत नहीं!

बंगलादेश में मुनाफ़े की अन्धी हवस की बलि चढ़े हरेक मज़दूर की मौत पूँजीवादी व्यवस्था के ताबूत की कील साबित होगी!

बंगलादेश की यह दुर्घटना इसी बात को सत्यापित कर रही है कि पूँजीवादी समाज में मज़दूर वर्ग मालिकों द्वारा मुनाफा कमाये जाने का साधन मात्र बनकर रह जाता है। यह घटना पूँजीवाद की इस क्षुद्र सच्चाई का प्रातिनिधिक उदाहरण है कि इस व्यवस्था में मज़दूरों की जान कौड़ियों से भी सस्ती है। गुज़रते एक-एक दिन के साथ पूँजीवाद का आदमखोर चरित्र इसी तरह की घटनाओं को अंजाम देकर अपने नग्नतम रूप में खुद को पेश कर रहा है। बंगलादेश में जो कुछ हुआ वह इसी की बानगी है, इसलिए दुनिया भर में मज़दूर वर्ग के जीने की शर्त पूँजीवाद का अन्त ही है।

केजरीवाल एण्ड पार्टी के “आन्दोलन” से किसको क्या मिलेगा?

जो भी ताक़त महज़ भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाती है, मुनाफे पर टिकी पूरी पूँजीवादी व्यवस्था को नहीं, वह जनता को धोखा दे रही है। भ्रष्टाचार-मुक्त पूँजीवाद एक मध्यवर्गीय भ्रम है। पूँजीवाद वैसा ही हो सकता है जैसा कि वह है। केजरीवाल और अण्णा हज़ारे जैसे लोगों का काम जाने-अनजाने इसी पूँजीवादी व्यवस्था की उम्र को लम्बा करना है। इसके लिए वह भ्रष्टाचार को एकमात्र समस्या के रूप में और भ्रष्टाचार के किसी कानून के जरिये या “ईमानदार” पार्टी के सत्ता में आने के जरिये ख़ात्मे को सभी दिक्कतों के समाधान के रूप में पेश करते हैं। भ्रष्टाचार का अपने आपमें कोई अर्थ नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे मानवाधिकारों, तानाशाही, आतंकवाद आदि जैसी श्रेणियों का अपने आपमें कोई अर्थ नहीं हैं। ये खोखले शब्द हैं और अपने आपमें ये कुछ भी नहीं बताते जब तक कि इनके साथ कोई विशेषण नहीं लगता। भ्रष्टाचार को एकमात्र समस्या के तौर पर पेश करना हमारे समाज में मौजूद असली आर्थिक लूट और सामाजिक अन्याय को छिपाता है और ‘सुशासन’ को एकमात्र मसला बना देता है।

कार्टून, पाठ्यपुस्तकें और भयाक्रान्त भारतीय शासक वर्ग

ऐसे में इन देशों का शासक वर्ग डरा हुआ है। वह किसी भी किस्म के प्रतिरोध, विरोध और असहमति को कुचलने पर आमादा है। कहते हैं कि डरे हुए आदमी को रस्सी में भी साँप नज़र आती है। भारतीय शासक वर्ग की मानसिकता भी कमोबेश ऐसी ही है। मौजूदा पाठ्यपुस्तक व कार्टून विवाद और उसके बाद सरकारी पाठ्यपुस्तक समीक्षा समिति की यह सिफ़ारिश कि ऐसी सभी पुस्तकों, कार्टूनों आदि को प्रतिबन्धित कर दिया जाना चाहिए जिसमें राजनीतिक वर्ग, संविधान, सरकार, पुलिस-फ़ौज या नौकरशाही के प्रति कोई भी आलोचना या टिप्पणी हो, यही दिखला रही है कि भारतीय शासक वर्ग को हरेक आहट ख़तरे की आहट लग रही है।

बजट 2012-13 : आम जनता की जेबें झाड़कर पूँजीपतियों की तिजोरियाँ भरने का पूरा बन्दोबस्त

वित्तमन्त्री प्रणब मुखर्जी अपने पूर्ववर्ती पी. चिदम्बरम के अच्छे उत्तराधिकारी सिद्ध हो रहे हैं। पी. चिदम्बरम ने जितने व्यवस्थित तरीके से नवउदारवादी नीतियों को अर्थव्यवस्था में लागू किया था, प्रणब मुखर्जी ने उससे भी ज़्यादा निर्णायक तरीके से उन्हें जारी रखा है। वित्तीय वर्ष 2012-13 में वास्तव में कुछ भी नया नहीं किया गया है, सिवाय एक चीज़ के। इस बार सरकार ने नवउदारवादी लूट के साथ कुछ ‘मानवीय’ और ‘‍कल्याणकारी’ चेहरा दिखलाने का प्रयास छोड़ दिया है! उन तमाम योजनाओं और नीतियों पर इस बजट में आबण्टन को घटा दिया गया है जिसके आधार पर सरकार जनता के हितों की परवाह करने का दावा कर सकती थी। मिसाल के तौर पर, महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारण्टी योजना।

विकल्प की राह खोजते लोग और नये विकल्प की समस्याएँ

दुनिया को स्पष्ट शब्दों में स्पष्ट विकल्प की ज़रूरत है, जो कि दिया जा सकता है और सम्भव है, बशर्ते कि दुनिया भर में क्रान्तिकारी शक्तियाँ अन्दर और बाहर, दोनों ओर से सामने आ रही चुनौतियों का सही तरीके से मुकाबला करें। आज पूरी दुनिया में जो पूँजीवाद-विरोधी जनान्दोलन चल रहे हैं, वे अराजकतावाद, स्वतःस्फूर्ततावाद और तरह-तरह की विजातीय प्रवृत्तियों का शिकार हैं। इन आन्दोलनों में जनता स्वतःस्फूर्त तरीके से पूँजीवाद-विरोधी घृणा और नफ़रत से उतरी है। लेकिन पूँजीवाद के खि़लाफ़ यह घृणा रखना काफ़ी नहीं है; स्वतःस्फूर्तता काफ़ी नहीं है; एक पंक्ति में कहें तो महज़ पूँजीवाद-विरोध पर्याप्त नहीं है। इन आन्दोलनों में अराजकतावाद और चॉम्स्कीपंथ का जो पुनरुत्थान होता दिख रहा है, वह लघुजीवी सिद्ध होगा; बल्कि कहना चाहिए कि इन स्वतःस्फूर्त आन्दोलनों में बिखराव के साथ यह लघुजीवी सिद्ध होने भी लगा है। अराजकतावाद कोई विकल्प पेश नहीं कर सकता। हमें एक सुस्पष्ट, सुसंगत क्रान्तिकारी विकल्प पेश करना होगा। और उसके लिए दुनिया भर के सर्वहारा क्रान्तिकारियों को अपने भीतर मौजूद कमज़ोरियों, कठमुल्लावाद, धुरी-विहीन चिन्तन और आत्मसमर्पणवाद को त्यागना होगा और मार्क्‍सवाद के उसूलों पर खड़े होकर, द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के विज्ञान पर खड़े होकर इन चुनौतियों का सामना करना होगा। बिना क्रान्तिकारी विचारधारा, क्रान्तिकारी पार्टी और क्रान्तिकारी आन्दोलन के बिना कोई क्रान्ति नहीं हो सकती। आज अपनी विचारधारात्मक कमज़ोरियों और कार्यक्रम-सम्बन्धी कठमुल्लावादी समझदारी से निजात पाकर विश्व भर में सर्वहारा क्रान्तिकारियों को एक नयी क्रान्तिकारी पार्टी को खड़ा करने की तैयारी करनी होगी। आन्दोलन की संकट को दूर करने का यही रास्ता है।

खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेशः समर्थन, विरोध और सही क्रान्तिकारी अवस्थिति

पूँजीवादी विकास की नैसर्गिक गति छोटी पूँजी को तबाह करेगी ही करेगी और छोटे उत्पादकों, उद्यमियों और व्यापारियों के एक बड़े हिस्से को बरबाद कर सर्वहारा की कतार में ला खड़ा करेगी। ऐसे में, एक वैज्ञानिक क्रान्तिकारी का काम इस छोटी पूँजी को ज्यों-का-त्यों बचाये रखने की गुहार लगाना नहीं, बल्कि इस टटपुंजिया वर्ग में और ख़ास तौर इसके सबसे निचले हिस्सों में (जिसमें कि वास्तव में अर्द्धसर्वहाराओं की बहुसंख्या है) यह क्रान्तिकारी प्रचार करना है कि पूँजीवादी व्यवस्था में छोटी पूँजी की यही नियति है और पूँजीवादी व्यवस्था और समाज के दायरे में रहते हुए इस तबाही और बरबादी से छोटा निम्न पूँजीपति वर्ग नहीं बच सकता है। अगर उसे इस नियति से बचना है तो उसे इस व्यवस्था की चौहद्दी के पार सोचना होगा; एक ऐसी व्यवस्था के बारे में सोचना होगा जो हरेक नागरिक को रोज़गार, शिक्षा, चिकित्सा, आवास और हर प्रकार की बुनियादी सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा मुहैया करा सके। ऐसी व्यवस्था एक समाजवादी व्यवस्था ही हो सकती है। पूँजीवाद का यही एकमात्र सही, व्यावहारिक और वैज्ञानिक विकल्प है।

वर्तमान संकट और जनता के आन्दोलनः क्या पूँजीवाद- विरोध पर्याप्त है?

ये सभी आन्दोलन पूँजीवाद की अजरता-अमरता के विक्षिप्त दावों को तो वस्तुगत तौर पर रद्द करते हैं, लेकिन ये पूँजीवाद का कोई विकल्प नहीं पेश करते। ये पूँजीवाद के लक्षणों के स्वतःस्फूर्त विरोध पर जाकर ख़त्म हो जाते हैं, जो निश्चित तौर पर आज बहुत बड़ा रूप अख्तियार कर चुका है। लेकिन यह पूँजीवाद-विरोध पर्याप्त नहीं हैं। बिना किसी सुपरिभाषित और सुविचारित लक्ष्य या उद्देश्य के; बिना किसी संगठन के; बिना किसी स्पष्ट विचारधारा के; बिना किसी अनुभवी नेतृत्व के, मौजूदा पूँजीवाद-विरोधी आन्दोलन असली प्रश्न तक पहुँच ही नहीं सकते। कि पूँजीवाद अजर-अमर नहीं है, यह पहले भी साबित हो चुका था। अब इसे फिर से साबित करने की कोई ज़रूरत नहीं है। आज ज़रूरत है कि हम विकल्प का एक कारगर मॉडल पेश करें और उसे लागू करने की कूव्वत रखने वाला एक नेतृत्व और संगठन खड़ा करें।

अण्णा हज़ारे का भ्रष्टाचार-विरोधी धर्मयुद्धः प्रकृति, चरित्र और नियति

अण्णा हज़ारे का पूरा आन्दोलन वास्तव में मध्यम वर्गों के एक आत्मिक उभार के समान है। यह पूरा आन्दोलन व्यवस्था को कहीं भी कठघरे में खड़ा नहीं करता। यह अलग से भ्रष्टाचार को दूर कर देने का एक मसीहावादी, गैर-जनवादी, जन-विरोधी प्रतिक्रियावादी मॉडल पेश करता है, जो जनता से ज़्यादा प्रबुद्ध निरंकुश संरक्षक-नुमा नायकों पर भरोसा करता है। प्रस्तावित जनलोकपाल बिल के प्रावधानों से इसका पूरा चरित्र उजागर हो जाता है। इसमें मध्यम वर्गों की हिस्सेदारी की निश्चित वजहें थीं, और यह हिस्सेदारी भी राजनीतिक रूप से संलग्न, सचेत, संगठित और सक्रिय हिस्सेदारी नहीं थी, बल्कि एक मसीहा की अति-सक्रिय हिस्सेदारी के साथ टटपुंजिया असंलग्न, अचेत और निष्क्रिय हिस्सेदारी थी। यह भागीदारी देशभक्ति और राष्ट्रभक्ति के नाम पर जश्न मनाने का मौका ज़्यादा था और मीडिया इसमें पूरी मुस्तैदी से अपनी भूमिका निभा रहा था।