Category Archives: साम्‍प्रदायिकता

इतिहास से भयाक्रान्त फासीवादी

भगवे फासीवादी इतिहास से इस कदर डरते हैं कि वे इतिहास को तोड़ -मरोड़ कर पाठ्यक्रमों में बदलाव करके दलितों और औरतों के संघर्षों के इतिहास को भी दबा देना चाहते हैं क्योंकि वह नहीं चाहते कि कोई भी अपने हकों-अधिकारों के प्रति जागरूक हो। यदि ऐसा हो गया तो इन फासीवादियों को कौन बचाएगा ?

“गोरक्षा”: फ़ासीवादी उन्मादियों का गोरख धंधा

मोदी लहर के उभार के साथ ही पूरे देश में अपना हिंदुत्ववादी एजेंडा फैलाने के लिये मोदी सरकार ने लव-जिहाद से लेकर बीफ बैन, गोरक्षा जैसे मुद्दों को मुख्यधारा की चर्चा का हिस्सा बनाना शुरू कर दिया। कभी पाकिस्तान को दुश्मन बता कर, तो कभी भारत में रहने वाली मुस्लिम आबादी को दुश्मन ठहराकर हिन्दू धर्म की रक्षा के नाम पर लोगों को भड़काया जाने लगा। केवल मुसलमानों ही नहीं बल्कि दलित आबादी को भी इस कहर का दंश सहना पड़ा, मरे हुए पशुओं की खाल उतारने का काम करने वाले दलितों को भी गोरक्षकों ने नहीं बख्शा।

फासीवादी दमन: तय करो तुम किस ओर हो!

फासीवाद ने आज चुनावी मोर्चे पर जीत ज़मीनी कार्यवाइयों के जरिये हासिल की है। आज फासीवाद को महज कोर्ट कचहरी और संसदीय जनवाद के जरिये परास्त नहीं किया जा सकता है। भारत में इस फासीवादी आन्दोलन ने इन बुर्जुआ उपक्रमों के अनुरूप अपने को ढाला है और आज का फासीवाद संसदीय और कानूनी ठप्पा लेकर काम कर रहा है। गुजरात के बाद उत्तर प्रदेश दंगों की नयी प्रयोग भूमि बन गया है जहाँ राजकीय ढाँचे को उलट-पलट कर बन्द और ब्रेक की नीति पर इसे फासीवादी एजेण्डे के अनुरूप ढलने को बोला जा रहा है। सड़कों पर भगवा गुण्डों का आतंक, गौ रक्षा, राजपूत सेना या एण्टी रोमियो दल के रूप में खुले आम क़त्ल, मारपीट और आगजनी कर सकती है। मीडिया आज योगी के सफलता के गुर, मोदी का हनुमान और 16 घण्टे काम करने वाले नेता के रूप में पेश करने में जुटी हुई है। वहीं योगी अब सामान्यतया कोई भी साम्प्रदायिक बयान देने से बच  रहा है और मोदी की रणनीति को लागू करते हुए “तिलक” और “टोपी” दोनों के विकास की बात कर रहा है। इस विकास का फल पिछले तीन साल के मोदी सरकार के कार्यकाल में हम देख चुके हैं।

क्यों फल-फूल रहा है बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपन्थ?

बांग्लादेश के इतिहास के वाकिफ़ लोग जानते हैं कि इस्लामिक कट्टरपन्थियों द्वारा बांग्लादेश में किया गया यह कोई पहला हमला नहीं था। इससे पहले भी वहाँ ऐसे हमले होते रहे हैं। हाल के वर्षों में बांग्लादेश के इस्लामिक कट्टरपन्थी सेक्युलर व नास्तिक लेखकों और ब्लॉगरों पर हमलों के लिये कुख़्यात रहे हैं। वे सेक्युलर लेखकों और ब्लॉगरों को इस्लाम का दुश्मन बताकर उन्हें मारते रहे हैं और आम मुसलमानों को उनके ख़िलाफ़ हिंसा के लिये उकसाते रहे हैं।

कविता : गुजरात-2002 / कात्यायनी

क्या हम कर रहे हैं आने वाले युद्ध समय की दृढ़निश्चयी तैयारी
क्या हम निर्णायक बन रहे हैं? क्या हम जा रहे हैं अपने लोगों के बीच
या हम वधस्थल के छज्जों पर बसन्तमालती की बेलें चढ़ा रहे हैं
या अपने अध्ययन कक्ष में बैठे हुए अकेले, भविष्य में आस्था का
उद्घोष कर रहे हैं और सुन्दर स्वप्न या कोई जादू रच रहे हैं

“सदाचारी” संघी फ़ासीवादी सत्ताधारियों के ‘चाल-चरित्र-चेहरे’ की सच्चाई

भगवा फ़ासीवादी सत्ताधारियों के असली मंसूबों का पर्दाफाश करना आज हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। क्रांतिकारी ताकतों को जनता के बीच अपनी खन्दकें खोदनी होंगी, और इन हिन्दुत्ववादी धर्मध्वजधारियों की ‘संस्कृति’, ‘सभ्यता’, ‘नैतिकता’, ‘शुचिता’, ‘सदाचार’ आदि की असलियत को बेनकाब करना होगा। इनके न सिर्फ मुसलमान विरोधी चेहरे को बल्कि दलित विरोधी चेहरे को भी जनता के सामने उजागर करना होगा। देशभक्ति पर इनके हर झूठे दावे को ध्वस्त करना होगा। गद्दारियों, माफीनामों, मुखबिरियों से भरे इनके काले शर्मनाक इतिहास को उजागर करना होगा।

विवेकहीनता का मौजूदा दौर और इसके विरोध के मायने

आज जनवादी-नागरिक अधिकारों पर फासीवादी हमला जब लोगों के शयनकक्ष तक में प्रवेश कर गया है, तब तमाम उदारवादी बुद्धिजीवियों ने आजिज आकर आवाज़ उठायी है, और इसकी हिमायत की जानी चाहिए। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि फासीवादी उभार के इस कदर आक्रामक बन पाने में कुछ योगदान उदारवादी बुद्धिजीवी वर्ग का भी है, जो कि, जब फासीवादी नाग अपना फन उठाने की शक्ति संचित कर रहा था तो विचारधारात्मक-राजनीतिक निष्पक्षता के ‘हाई मॉरल ग्राउण्ड’ पर विराजमान थे! आज फासीवादी ताक़तों के ख़िलाफ़ लड़ाई को सड़कों तक ले जाने के लिए व्यापक मेहनतकश जनसमुदायों को इस पूँजीवादी व्यवस्था की सच्चाई से रूबरू कराना होगा और उसे क्रान्तिकारी विचारों व राजनीति पर जीतना होगा। यदि जनमत हमारे पक्ष में नहीं होगा तो वह किसी न किसी रूप में चाहे-अनचाहे फासीवाद के पक्ष में होगा क्योंकि यदि वह तटस्थ भी होगा तो भी वह साम्प्रदायिक शक्तियों का मददगार ही होगा।

आर.एस.एस. का जातिवादी चेहरा एक बार फि़र बेनकाब

हरियाणा में दिन-प्रतिदिन दलितों के उत्पीड़न के मामले सामने आते रहते है। हरियाणा में 2010 में दलित उत्पीड़न के 238 मामले सामने आये थे जो 2013 में बढ़कर 257 हो गये। ऐसी घटनाओं से साबित होता है कि हरियाणा की सरकार में चाहे कांग्रेस आये या इनेलो आए, भाजपा आये या बसपा आये कोई भी चुनावबाज़ पार्टी सरकार में आये फिर भी मेहनतकश दलित आबादी के जीवन में कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है। आये दिन उन्हें दलित विरोधी मानसिकता का सामना करना पड़ता है, अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए दर-दर भटकना पड़ता है। आज हरियाणा में ही नहीं बल्कि पूरे भारत में दलित उत्पीड़न के मामले पहले से कहीं ज़्यादा संख्या में सामने आ रहे हैं। दलित उत्पीड़न की घटनाओं को हम समाज में विभिन्न रूपों में देख सकते हैं। कुछ ही दिनों पहले राजस्थान के डांगावास में भी दलितों पर भयंकर किस्म का हमला किया गया था। इस हमले में तीन जानें गयी और दर्जनों लोग बुरी तरह से घायल हुए थे। इस हमले के पीछे ज़मीन का पुराना मामला था। यहाँ पर भी स्थानीय प्रशासन और नेताशाही पूरी तरह से हमलावर जाटों के पक्ष में दिखायी दिये। पूरे देश भर में भाजपा सरकार के आने के बाद इस तरह के मसलों में बढ़ोत्तरी दर्ज़ की गयी है।

साम्प्रदायिक फासीवादी सत्ताधारियों के गन्दे चेहरे से उतरता नकाब़

दरअसल, पिछले दस साल से भाजपाई सत्ता को तरस गये थे; पूँजीपति वर्ग से गुहारें लगा रहे थे कि एक बार उनके हितों की सेवा करने वाली ‘मैनेजिंग कमेटी’ का काम कांग्रेस के हाथों से लेकर उसके हाथों में दे दिया जाय; वे अम्बानियों-अदानियों को लगातार याद दिला रहे थे कि गुजरात में, मध्य प्रदेश में और छत्तीसगढ़ में उन्होंने मज़दूरों-मेहनतकशों की आवाज़ को किस कदर दबा कर रखा है, उन्होंने किस तरह से कारपोरेट घरानों को मुफ़्त बिजली, पानी, ज़मीन, कर से छूट आदि देकर मालामाल बना दिया है! ये सारी दुहाइयाँ देकर भाजपाई लगातार देश की सत्ता को लपकने की फि़राक़ में थे! वहीं दूसरी ओर 2007 में शुरू हुई वैश्विक मन्दी के बाद पूँजीपति वर्ग को भी किसी ऐसी सरकार की ज़रूरत थी जो उसे लगातार छँटनी, तालाबन्दी के साथ-साथ और भी सस्ती दरों पर श्रम को लूटने की छूट दे और श्रम कानूनों से छुटकारा दिलाये। बिरले ही लागू होने वाले श्रम कानून भी मन्दी की मार से कराह रहे पूँजीपति वर्ग की आँखों में चुभ रहे हैं क्योंकि जहाँ कहीं कोई मज़बूत मज़दूर आन्दोलन संगठित होता है वहाँ कुछ हद तक वह श्रम कानूनों की कार्यान्वयन के लिए सत्ता को बाध्य भी करता है। इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए देश के पूँजीपति वर्ग को भाजपा जैसी फासीवादी पार्टी को सत्ता में पहुँचाना अनिवार्य हो गया। यही कारण था कि 2014 के संसद चुनावों में मोदी के चुनाव प्रचार पर देश के पूँजीपतियों ने अभूतपूर्व रूप से पैसा ख़र्च किया, इस कदर ख़र्च किया कि कांग्रेस भी रो पड़ी कि मोदी को सारे कारपोरेट घरानों का समर्थन प्राप्त है और मोदी उन्हीं का आदमी है! यह दीगर बात है कि कांग्रेस की इस कराह का कारण यह था कि मन्दी के दौर में फासीवादी भाजपा पूँजीपति वर्ग के लिए उससे ज़्यादा प्रासंगिक हो गयी थी। मोदी ने सत्ता में आने के बाद देश-विदेश के कारपोरेट घरानों के जिस अश्लीलता से तलवे चाटे हैं, वह भी एक रिकॉर्ड है। श्रम कानूनों को बरबाद करने, ट्रेड यूनियन बनाने के अधिकार को एक प्रकार से रद्द करने, करों और शुल्कों से पूँजीपति वर्ग को छूट देने, विदेशों में भारतीय कारपोरेट घरानों के विस्तार के लिए मुफ़ीद स्थितियाँ तैयार करने से लेकर हर प्रकार के जनप्रतिरोध को मज़बूती से कुचलने में मोदी ने नये कीर्तिमान स्थापित किये हैं। लेकिन एक दिक्कत भी है

फ़ासीवादियों द्वारा इतिहास का विकृतीकरण

अगर जनता के सामने वर्ग अन्तरविरोध साफ़ नहीं होते और उनमें वर्ग चेतना की कमी होती है तो इतिहास का विकृतिकरण करके व अन्य दुष्प्रचारों के ज़रिये उनके भीतर किसी विशेष धर्म या सम्प्रदाय के लोगों के प्रति अतार्किक प्रतिक्रियावादी गुस्सा भरा जा सकता है और उन्हें इस भ्रम का शिकार बनाया जा सकता है कि उनकी दिक्कतों का कारण उस विशेष सम्प्रदाय, जाति या धर्म के लोग हैं। क्रान्तिकारी शक्तियों को फ़ासीवादियों की इस साज़िश का पर्दाफ़ाश करना होगा और सतत प्रचार के ज़रिये जनता के भीतर वर्ग चेतना पैदा करनी होगी। इतिहास को विकृत करना फ़ासीवादियों का इतिहास रहा है। और यह भी इतिहास रहा है कि फ़ासीवाद को मुँहतोड़ जवाब देने का माद्दा केवल क्रान्तिकारी ताक़तें ही रखती हैं। फ़ासीवाद को इतिहास की कचरा पेटी में पहुँचाने का काम भी क्रान्तिकारी शक्तियाँ ही करेंगी। और तब इतिहास को विकृत करने वाला कोई न बचेगा।