Category Archives: राष्‍ट्रीय/अर्न्‍तराष्‍ट्रीय मुद्दे

पेरिस पर आतंकी हमला : आदमखोर साम्राज्यवाद की कीमत चुकाती जनता

फ्रांस वह पहला देश है जिसने फ़िलिस्तीन के समर्थन में होने वाले प्रदर्शनों पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। इस प्रतिबन्ध के बावजूद जनता सड़कों पर उतरती है और उन्हें पुलिस के अत्याचारों को झेलना पड़ता है। कुछ दिनों पहले फिलिस्तीन पर चल रहे इज़राइल के हमले, वहाँ की ज़मीन पर अवैध कब्जे और मासूम बच्चों की मौत के ख़िलाफ़ शान्तिपूर्ण विरोध और बी.डी.एस. (बाईकॉट, डाइवेस्टमेंट और सैंक्शन) का समर्थन कर रहे 12 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। इतना ही नहीं फ्रांस के उच्चतम न्यायालय ने बी.डी.एस. का समर्थन कर रहे इन 12 कार्यकताओं के ख़िलाफ आपराधिक सज़ा को सही ठहराया। इन कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ भेदभाव प्रतिरोध क़ानून लगाया गया। इनका दोष इतना था कि ये टी-शर्ट पहन कर जिस पर बी.डी.एस. और ये लोग “लांग लिव पैलेस्टाइन, बायकॉट इज़रायल!” लिखा था, शान्तिपूर्वक तरीके से ‘सुपरमार्केट’ में लोगों के बीच अपना परचा बाँट रहे थे। परचे में लिखा थाः ‘इजराइल के उत्पादों को खरीदने का अर्थ होगा गाज़ा में अपराधों को वैध करार देना!’ इस अपराध के लिए उनपर मुकदमा चला और उन्हें 50,000 डॉलर जुर्माना भरना पड़ा। इस सज़ा ने बी.डी.एस. को अन्तरनिहित रूप से भेदभावपूर्ण बताया। यह घटना फ्रांस का इज़राइल को खुला समर्थन नहीं तो और क्या दर्शाती है? यदि रूस, ईरान या सूडान के प्रति बहिष्कार का कोई आन्दोलन हो तो वह फ्रांस में मान्य है लेकिन इज़रायल के ख़िलाफ कोई भी आवाज़ भेदभावपूर्ण करार दे दी जाती है जिसकी तुलना यहूदी-विरोध से की जाती है।

युद्ध, शरणार्थी एवं प्रवासन संकट पूँजीवाद की नेमतें हैं

इतने बड़े पैमाने पर विस्थापन की वजह समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि वे कौन से क्षेत्र हैं जहाँ से आज विस्थापन सबसे अधिक हो रहा है। आँकड़े इस बात की ताईद करते हैं कि हाल के वर्षों में जिन देशों में साम्राज्यवादी दख़ल बढ़ी है वो ही वे देश हैं जहाँ सबसे अधिक लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ रहा है, मसलन सीरिया, अफ़गानिस्तान, फ़िलिस्तीन, इराक व लीबिया। पिछले डेढ़ दशक में इन देशों में अमेरिका के नेतृत्व में साम्राज्यवादी दख़ल से पैदा हुई हिंसा और अराजकता ने इन इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। इस हिंसा में भारी संख्या में जानमाल की तबाही हुई है और जो लोग बचे हैं वे भी सुरक्षित जीवन के लिए अपने रिहायशी इलाकों को छोड़ने पर मज़बूर कर दिये गये हैं। अमेरिका ने 2001 में अफ़गानिस्तान पर तथा 2003 में इराक़ पर हमला किया जिसकी वजह से इन दो देशों से लाखों लोग विस्थापित हुए जो आज भी पड़ोसी मुल्कों में शरणार्थी बनकर नारकीय जीवन बिताने को मज़बूर हैं। 2011 में मिस्र में होस्नी मुबारक की सत्ता के पतन के बाद सीरिया में स्वतःस्फूर्त तरीके से एक जनबग़ावत की शुरुआत हुई थी जिसका लाभ उठाकर अमेरिका ने सऊदी अरब की मदद से इस्लामिक स्टेट नामक सुन्नी इस्लामिक कट्टरपन्थी संगठन को वित्तीय एवं सैन्य प्रशिक्षण के ज़रिये मदद पहुँचाकर सीरिया के गृहयुद्ध को और भी ज़्यादा विनाशकारी बनाने में अपनी भूमिका निभायी जिसका नतीजा यह हुआ है कि 2011 के बाद से अकेले सीरिया से ही 1 करोड़ से भी अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं जिनमें से 40 लाख लोग तो वतन तक छोड़ चुके हैं।

खट्टर सरकार का एक साल-जनता का हाल बेहाल

खट्टर सरकार ने नये रोज़गार देना तो दूर उल्टे आशा वर्कर, रोडवेज़, बिजली विभाग आदि सरकारी विभागों में निजीकरण-ठेकाकरण की नीतियों के तहत छँटनी की तैयारी कर दी है। कर्मचारियों के रिटायरमेण्ट की उम्र 60 से 58 कर दी। सरकार ने अपने बजट में मनरेगा के तहत खर्च होने वाली राशि में भारी कटौती की है जो कि ग्रामीण मज़दूर आबादी के हितों पर सीधा हमला है। चुनाव के समय भाजपा द्वारा 12वीं पास नौजवानों को 6,000 रुपये और स्तानक नौजवानों को 9,000 रुपये बेरोज़गारी भात्ता देने का वादा किया गया था। लेकिन अब खट्टर सरकार की कथनी-करनी में ज़मीन-असमान का अन्तर आ चुका है। पिछले एक वर्ष में सरकार ने बेरोज़गारी भत्ते देने की कोई योजना नहीं बनायी जबकि हरियाणा में पढ़े-लिखे बेरोज़गार नौजवानों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ रही है। मौजूदा समय में रोज़गार कार्यालय में 8 लाख नौजवानों के नाम दर्ज हैं। हम सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि असल में बेरोज़गारों की संख्या इससे कहीं अधिक है। नौजवानों की अच्छी-खासी आबादी रोज़गार दफ्तर में अपना नाम दर्ज ही नहीं कराती है क्योंकि उसे अहसास है कि इससे उनकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आने वाला है। कौशल विकास योजना में भारी नौजवान आबादी को प्रशिक्षु बनाकर उसे सस्ते श्रम के रूप में देशी-विदेशी पूँजीपतियों के सामने परोसा जा रहा है। मोदी सरकार ‘अपरेण्टिस एक्ट 1961’ में बदलाव करके इसे प्रबन्धन के हितानुरूप ढाल रही है। असल में इस कानून के तहत काम करने वाली नौजवान आबादी को न तो न्यूनतम मज़दूरी मिलेगी, न स्थायी होने की सुविधा। खट्टर सरकार भी अधिक से अधिक विदेशी पूँजी निवेश को ललचाने के लिए नौजवान आबादी को चारे की तरह इस्तेमाल करना चाहती है।

मुम्बई में 200 से ज़्यादा लोगों की मौत का ज़िम्मेदार कौन

यह भी हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई है कि जब एक मज़दूर को दिन भर हाड़-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है तो साथ ही साथ उसका अमानवीकरण भी होता है और शराब व अन्य व्यसन उसके लिए शौक नहीं बल्कि ज़िन्दगी की भयंकर कठिनाइयों को भुलाने और दुखते शरीर को क्षणिक राहत देने के साधन बन जाते हैं। ऐसे मूर्खों की हमारे समाज में कमी नहीं है जो कहते हैं कि मज़दूरों की समस्याओं का कारण यह है कि वे बचत नहीं करते और सारी कमाई को व्यसनों में उड़ा देते हैं। असल में बात इसके बिल्कुल उलट होती है और वे व्यसन इसलिए करते हैं कि उनकी ज़िन्दगी में पहले ही असंख्य समस्याएँ है। जो लोग कहते हैं कि बचत न करना ग़रीबों-मजदूरों की सभी परेशानियों का कारण होता है उनसे पूछा जाना चाहिए कि जो आदमी 5000-8000 रुपये ही कमा पाता हो वह अव्वलन तो बचत करे कैसे और अगर सारी ज़िन्दगी भी वह चवन्नी-अठन्नी बचायेगा तो कितनी बचत कर लेगा? क्या जो 1000-1500 रुपये एक महीने या कई महीनों में वे व्यसन में उड़ा देते हैं उसकी बचत करने से वे सम्पन्नता का जीवन बिता सकेंगे? यहाँ व्यसनों की अनिवार्यता या फिर उन्हें प्रोत्साहन देने की बात नहीं की जा रही है बल्कि समाज की इस सच्चाई पर ध्यान दिलाया जा रहा है कि एक मानवद्रोही समाज में किस तरह से ग़रीबों के लिए व्यसन दुखों से क्षणिक राहत पाने का साधन बन जाते हैं। इस व्यवस्था में जहाँ हरेक वस्तु को माल बना दिया जाता है वहाँ जिन्दगी की मार झेल रहे गरीबों के व्यसन की जरूरत को भी माल बना दिया जाता है। ग़रीब मज़दूर बस्तियों में सस्ती शराबों का पूरा कारोबार इस जरूरत से मुनाफा कमाने पर ही टिका है। इस मुनाफे की हवस का शिकार भी हर-हमेशा गरीब मज़दूर ही बनते हैं।

अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस: भगवाकरण का एक और प्रयास

एक साथ 35,985 लोगों ने बाबा रामदेव जैसे ‘योग गुरुओं’ की देखरेख में योग किया, हालाँकि इस देखरेख के बावजूद रेल मन्त्री सुरेश प्रभु योग करते-करते सो गये! बहरहाल, संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से केवल यमन को छोड़ 192 देशों में इसी तरह के योग समारोह आयोजित किये गए जहाँ लोगों ने योग किया। योग के इस जश्न को मोदी सरकार भारत के गौरव के रूप में पेश करते हुए यह जता रही है कि पूरे विश्व ने भारत की योग विद्या की महानता को समझा है और इसी के साथ अब भारतीय लोगों को खुद पर गर्व महसूस करना चाहिए । लोगों ने अपने भारतीय होने पर गर्व केवल मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही करना शुरू किया है, ऐसी खुशफहमी के शिकार मोदी जी इस साल सिओल में दिए अपने भाषण में यह बात पहले भी कह चुके हैं (वैसे यह भी सोचने की बात है कि मोदी के पहले या बाद में वाकई कोई गर्व करने वाली चीज़ थी!)। बहरहाल, अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने के लिए राजपथ पर खूब तैयारियाँ की गयीं। प्रधानमंत्री मोदी जर्मन स्पोर्ट्सवेयर बनाने वाली कम्पनी एडिडास द्वारा खास तौर से तैयार की गयी कस्टम पोशाक पहन नीले जापानी योगा मेट पर योग करने के लिए पधारे! साथ ही 35,000 से भी ज़्यादा लोगों की भीड़ में नेता, मंत्री, अभिनेता, वी.वी.आई.पी., स्कूली बच्चों को भी बुलाया गया। इस समारोह की तैयारियों की चर्चा पूरे मीडिया में ज़ोर-शोर से हो रही थी। 15,000 से भी ज़्यादा पुलिसकर्मी राजपथ पर सुरक्षा के लिए तैनात किये गए। 40 एम्बुलेंस के साथ 200 डॉक्टर व चिकत्साकर्मी भी राजपथ पर मौजूद थे। पी.आर. कैम्पेन की दीवानी मोदी सरकार ने आयुष (आयुर्वेद, योग, नेचुरोपैथी, यूनानी, सिद्धा और हैम्योपैथी) मंत्रालय द्वारा गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में सबसे बड़े योग समारोह का खिताब हासिल करने की मंशा से इतने बड़े समारोह का आयोजन करवाया और इसी के साथ मोदी सरकार और संघ अपने भगवाकरण के एजेंडे को बढ़ाने में एक बार फिर कामयाब हो गई।

यमन पर हमला अरब के शेखों और शाहों की मानवद्रोही सत्ताओं की बौखलाहट की निशानी है

ग़ौरतलब है कि 1932 में इब्न सऊद द्वारा सऊदी राजतंत्र स्थापित करने और सऊदी अरब में तेल की खोज के बाद उसके अमेरिका से गँठजोड़ से पहले यमन अरब प्रायद्वीप का सबसे प्रभुत्वशाली देश था। सऊदी राजतंत्र के अस्तित्व में आने के दो वर्ष के भीतर ही सऊदी अरब व यमन में युद्ध छिड़ गया जिसके बाद 1934 में हुए ताईफ़ समझौते के तहत यमन को अपना कुछ हिस्सा सऊदी अरब को लीज़ पर देना पड़ा और यमन के मज़दूरों को सऊदी अरब में काम करने की मंजूरी मिल गई। नाज़रान, असीर, जिज़ान जैसे इलाकों की लीज़ ख़त्म होने के बावजूद सऊदी अरब ने वापस ही नहीं किया जिसको लेकर यमन में अभी तक असंतोष व्याप्त है। ग़ौरतलब है कि ये वही इलाके हैं जहाँ शेखों के निरंकुश शासन के खि़लाफ़ बग़ावत की चिंगारी भी समय-समय पर भड़कती रही हैं। यमन पर सऊदी हमले की वजह से जहाँ एक ओर यमन के भीतर राष्ट्रीय एकता की भावना पैदा हुई है वहीं सऊदी अरब के इलाकों में भी बग़ावत की चिंगारी एक बार फिर भड़कने की सम्भावना बढ़ गई है।

नेपाल त्रासदी

नेपाल को मदद भेजने के पीछे भारत का अपना आर्थिक हित भी निहित है। एशिया की एक क्षेत्रीय साम्राज्यवादी शक्ति होने के नाते भारत अपने ग़रीब पड़ोसी देशों को, फिर चाहे वो भूटान हो, बांग्लादेश हो या नेपाल, अपने हित में इस्तेमाल करने की मंशा से लैस है। इसलिए किसी भी त्रासदी में ऐसे देशों को मदद भेजना उसके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है, क्योंकि आपदाओं के समय दी गयी मदद को एक साम्राज्यवादी देश हमेशा एक निवेश के रूप में ही देखता है जिसे वह आगे जा कर सूद समेत वसूल कर सकता है। नेपाल के संसाधनों और उसके श्रम को लूटने की भाग दौड़ में भारत भी अपना हिस्सा पक्का करना चाहता है। केवल भारत ही एक आदर्श पड़ोसी देश होने का फर्ज नहीं निभा रहा, चीन भी नेपाल को मदद भेजने में पीछे नहीं है। इन दोनों देशों के इतने तत्पर प्रयासों के पीछे का मकसद नेपाल की जनता में अपनी साख़ बनाना हैं। तिब्बत पर चीन का कब्ज़ा हो जाने के बाद से नेपाल को भारत अपने व्यापार के लिए एक नए व्यापारिक रास्ते के रूप में देखता है। नेपाल को भारत और चीन दोनों ही ‘नए सिल्क रूट’ की तरह देखते है और दोनों देशों में से जो भी नेपाल के साथ बेहतर सम्बन्ध बनाने में सफल हो जाता है उसके लिए एशिया से यूरोप तक अपने आर्थिक रिश्ते सशक्त करने के रास्ते खुल जाते है। इस ‘डिज़ास्टर ब्रांड’ राजनीति के चलते ही नेपाल में भूकम्प आने के तुरन्त बाद भारत ने औपचारिक तौर पर ‘ऑपरेशन फ्रेंडशिप’ शुरू करने की घोषणा की जिसके तहत बचाव और राहत कार्य करने के लिए दस्तों को रवाना किया गया। भूकम्प के बाद नेपाल में सबसे बड़ा काम है वहाँ के लोगों का पुर्नवासन करना और बुनियादी सुविधाओं जैसे बिजली, सड़कों का नवर्निमाण आदि।

यूनानी त्रासदी के भरतवाक्य के लेखन की तैयारी

अगर हम 2010 से अब तक यूनान को मिले साम्राज्यवादी ऋण के आकार और उसके ख़र्च के मदों पर निगाह डालें तो हम पाते हैं कि इसका बेहद छोटा हिस्सा जनता पर ख़र्च हुआ और अधिकांश पुराने ऋणों की किश्तें चुकाने पर ही ख़र्च हुआ है। दूसरे शब्दों में इस बेलआउट पैकेज से भी तमाम निजी बैंकों, वित्तीय संस्थाओं और यूरोपीय संघ, ईसीबी व आईएमएफ़ में जमकर कमाई की है! मार्च 2010 से लेकर जून 2013 तक साम्राज्यवादी त्रयी ने यूनान को 206.9 अरब यूरो का कर्ज़ दिया। इसमें से 28 प्रतिशत का इस्तेमाल यूनानी बैंकों को तरलता के संकट से उबारने के लिए हुआ, यानी, दीवालिया हो चुके बैंकों को यह पैसा दिया गया। करीब 49 प्रतिशत हिस्सा सीधे यूनान के ऋणदाताओं के पास किश्तों के भुगतान के रूप में चला गया, जिनमें मुख्य तौर पर जर्मन और फ्रांसीसी बैंक शामिल थे। कहने के लिए 22 प्रतिशत राष्ट्रीय बजट में गया, लेकिन अगर इसे भी अलग-अलग करके देखें तो पाते हैं कि इसमें से 16 प्रतिशत कर्ज़ पर ब्याज़ के रूप में साम्राज्यवादी वित्तीय एजेंसियों को चुका दिया गया। बाकी बचा 6 प्रतिशत यानी लगभग 12.1 अरब यूरो। इस 12.1 अरब यूरो में से 10 प्रतिशत सैन्य ख़र्च में चला गया। यानी कि जनता के ऊपर जो ख़र्च हुआ वह नगण्य था! 2008 में यूनान का ऋण उसके सकल घरेलू उत्पाद का 113.9 प्रतिशत था जो 2013 में बढ़कर 161 प्रतिशत हो चुका था! सामाजिक ख़र्चों में कटौती के कारण जनता के उपभोग और माँग में बेहद भारी गिरावट आयी है। इसके कारण पूरे देश की अर्थव्यवस्था का आकार ही सिंकुड़ गया है। 2008 से लेकर 2013 के बीच यूनान के सकल घरेलू उत्पाद में 31 प्रतिशत की गिरावट आयी है, जिस उदार से उदार अर्थशास्त्री महामन्दी क़रार देगा। आज नौजवानों के बीच बेरोज़गारी 60 प्रतिशत के करीब है।

सी.बी.सी.एस. : “च्‍वाइस” के ड्रामे के बहाने विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में पधारने का न्यौता

शिक्षा व्यवस्था में यह बदलाव होना कोई नयी बात नहीं है। जहाँ तमाम क्षेत्रों में निजी पूँजी को बढ़ावा दिया जा रहा है वहीं शिक्षा भी इससे अछूती नहीं रही है। चाहे 2008 में लागू हुई सेमेस्टर प्रणाली की बात कर लें या चार वर्षीय पाठ्यक्रम की बात कर लें या अभी सीबीसीएस का मुद्दा हो, उच्चतर शिक्षा में लाये जा रहे इन बदलावों के कुछ ठोस कारण हैं जो मौजूदा आर्थिक-राजनीतिक ढाँचे के साथ जुड़े हुए हैं। जब तक हम शिक्षा में हो रहे इन बदलावों को इस व्यवस्था से जोड़कर नहीं देखेंगे तब तक परदे के पीछे की सच्चाई को हम नहीं जान पाएँगे।

पोर्नोग्राफ़ी पर प्रतिबन्ध: समर्थन और विरोध के विरोधाभास

महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि वेश्यावृत्ति, अश्लीलता, स्त्रियों व बच्चों की तस्करी या यौन उत्पीड़न पोर्नोग्राफ़ी से पैदा हुआ है या मामला उल्टा है? कुछ लोगों ने इस प्रकार के भी विचार प्रस्तुत किये कि पोर्न साइट्स के कारण स्त्रियों व बच्चों के यौन शोषण व तस्करी को बढ़ावा मिल रहा है। यह भी एक पहलू है, मगर मूल बात यह है कि स्त्रियों व बच्चों की तस्करी व यौन उत्पीड़न के संस्थाबद्ध उद्योग के कारण ही पोर्न साइट्स को बढ़ावा मिल रहा है। बल्कि कह सकते हैं कि पोर्नोग्राफ़ी उस उद्योग के तमाम उपोत्पादों में से महज़ एक उत्पाद है। जैसा कि हमने पहले बताया, पोर्न साइट्स व सीडी-डीवीडी के उद्योगों के पहले से ही वेश्यावृत्ति व मानव तस्करी का उद्योग फलता-फूलता रहा है और वैसे तो पोर्नोग्राफ़ी को ख़त्म करने का कार्य पूँजीवाद कर ही नहीं सकता है, लेकिन यदि इस पर कोई प्रभावी रोक लगा भी दी जाय तो वेश्यावृत्ति व मानव तस्करी का धन्धा ख़त्म या कम हो जायेगा, यह मानना नादानी होगा।