Category Archives: मीडिया

अर्नब गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी के ख़िलाफ़ दिशा का विरोध प्रदर्शन

खुद को पत्रकारिता का ठेकेदार समझने वाले अर्नब गोस्वामी के नये समाचार चैनल रिपब्लिक टीवी (जिसमेंं सबसे ज्यादा पैसा भाजपा के एम.पी. राजीव चंद्रशेखर ने लगाया है) ने दिल्ली विश्वविद्यालय में दिशा छात्र संगठन द्वारा लगाये गये पोस्टरों को आई.एस.आई.एस. जैसे आतंकवादी समूह का समर्थक बताते हुए 28 मई 2017 को ख़बर प्रसारित की। इस ख़बर में रिपब्लिक टीवी ने बेहद ही ग़ैरजिम्मेदाराना तरीके से दिशा के पोस्टर, जिन पर ‘भगत सिंह के सपनो को साकार करने’, ‘शिक्षा है सब का अधिकार, बन्द करो इसका व्यापार’, ‘दिशा का रास्ता, भगत सिंह का रास्ता’ लिखा था की तस्वीरें अपने टीवी चैनल पर दिखाते हुए उन्हें आई.एस.आई.एस. का बताया।

पोर्नोग्राफ़ी पर प्रतिबन्ध: समर्थन और विरोध के विरोधाभास

महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि वेश्यावृत्ति, अश्लीलता, स्त्रियों व बच्चों की तस्करी या यौन उत्पीड़न पोर्नोग्राफ़ी से पैदा हुआ है या मामला उल्टा है? कुछ लोगों ने इस प्रकार के भी विचार प्रस्तुत किये कि पोर्न साइट्स के कारण स्त्रियों व बच्चों के यौन शोषण व तस्करी को बढ़ावा मिल रहा है। यह भी एक पहलू है, मगर मूल बात यह है कि स्त्रियों व बच्चों की तस्करी व यौन उत्पीड़न के संस्थाबद्ध उद्योग के कारण ही पोर्न साइट्स को बढ़ावा मिल रहा है। बल्कि कह सकते हैं कि पोर्नोग्राफ़ी उस उद्योग के तमाम उपोत्पादों में से महज़ एक उत्पाद है। जैसा कि हमने पहले बताया, पोर्न साइट्स व सीडी-डीवीडी के उद्योगों के पहले से ही वेश्यावृत्ति व मानव तस्करी का उद्योग फलता-फूलता रहा है और वैसे तो पोर्नोग्राफ़ी को ख़त्म करने का कार्य पूँजीवाद कर ही नहीं सकता है, लेकिन यदि इस पर कोई प्रभावी रोक लगा भी दी जाय तो वेश्यावृत्ति व मानव तस्करी का धन्धा ख़त्म या कम हो जायेगा, यह मानना नादानी होगा।

पूँजीवादी व्यवस्था में स्कूली पाठ्यक्रम: शासक वर्गों का बौद्धिक वर्चस्व स्थापित करने का एक उपकरण

यदि कोई व्यक्ति समाज के लिए कुछ करना चाहता है लेकिन समाज-विज्ञान पर उसकी पकड़ नहीं है तो अनजाने में ही उसकी कला उसके मन्तव्य के विपरीत खड़ी हो सकती है। लोगों को मूर्ख बनाने की होड़ में टेलीविज़न पर चलने वाले सीरियलों का तो ज़िक्र ही क्या, ख़बरिया चैनलों पर होने वाली लम्बी-लम्बी बहसों में बड़ी लगन से शिरकत करने वाले बुद्धिजीवी भी मुद्दों को ग़ैर-मुद्दा और गै़र-मुद्दों को मुद्दा बनाने की होड़ में ही लगे रहते हैं। एक तो भारतीय जनमानस अध्ययनशीलता से वैसे ही ख़फ़ा रहता है, बाक़ी रही-सही कसर जनता तक पहुँचने वाला दो कौड़ी का साहित्य पूरी कर देता है। ख़ैर, इन तथाकथित बुद्धिजीवियों के ठाठ तो इसी व्यवस्था की सलामती में हैं। आज के दौर में कूपमण्डूक मध्यमवर्गीय व्यक्ति भी पूँजीवाद के सांस्कृतिक कीचड़ में डुबकी लगाकर फूलकर कुप्पा हो जाता है और मन-ही-मन ख़ुद को बड़ा ही जागरूक और सयाना समझने लगता है।

कारपोरेट पूँजीवादी मीडिया का वर्चस्व और क्रान्तिकारी वैकल्पिक मीडिया की चुनौतियाँ

21वीं सदी की क्रान्तियों के एजेण्डे पर संस्कृति का प्रश्न काफ़ी ऊपर आ गया है। क्योंकि आज के पूँजीपति वर्ग ने संस्कृति और मीडिया का अपने वर्ग शासन के लिए वर्चस्व निर्मित करने के लिए ज़बरदस्त इस्तेमाल किया है। हमें उस वर्चस्व को चुनौती देनी होगी। और इसके लिए एक नये क्रान्तिकारी पुनर्जागरण और प्रबोधन की ज़रूरत है। और ऐसे नये क्रान्तिकारी पुनर्जागरण और प्रबोधन के लिए निश्चित तौर पर हमें ऐसा क्रान्तिकारी वैकल्पिक मीडिया चाहिए!

सोशल मीडिया के बहाने जनता, विचारधारा और तकनोलॉजी के बारे में कुछ बातें

समाज की एक भारी मध्‍यवर्गीय आबादी इण्‍टरनेट-फेसबुक पर बैठी हुई सामाजिक जीवन के यथार्थ से बाहर एक आभासी यथार्थ में जीने का आदी हो जाती है। वह वस्‍तुत: भीषण सामाजिक अलगाव में जीती है, पर फेसबुक मित्रों का आभासी साहचर्य उसे इस अलगाव के पीड़ादायी अहसास से काफी हद तक निजात दिलाता है। बुर्ज़ुआ समाज की भेड़चाल में वैयक्तिक विशिष्‍टता की मान्‍यता का जो संकट होता है, पहचान-विहीनता या अजनबीपन की जो पीड़ा होती है, उससे फेसबुक-साहचर्य, एक दूसरे को या उनके कृतित्‍व को सराहना, एक दूसरे के प्रति सरोकार दिखाना काफी हद तक राहत दिलाता है। यानी यह भी एक तरह के अफीम की भूमिका ही निभाता है। यह दर्द निवारक का काम करता है और एक नशे का काम करता है, पर दर्द की वास्‍तविक जड़ तक नहीं पहुँचाता। इस तरह अलगाव के विरुद्ध संघर्ष की हमारी सहज सामाजिक चेतना को यह माध्‍यम पूँजीवादी व्‍यवस्‍था-विरोधी सजग चेतना में रूपांतरित हो जाने से रोकता है। साथ ही, फेसबुक, टि्वटर और सोशल मीडिया के ऐसे तमाम अंग-उपांग हमें आदतन अगम्‍भीर और काहिल और ठिठोलीबाज भी बनाते हैं। खुशमिजाजी अच्‍छी चीज है, पर बेहद अंधकारमय और चुनौतीपूर्ण समय में भी अक्‍सर चुहलबाजी के मूड में रहने वाले अगम्‍भीर लोग न केवल अपनी वैचारिक क्षमता, बल्कि अपनी संवेदनशीलता भी खोते चले जाते हैं।

सोशल नेटवर्किंग का विस्तार

मध्यवर्ग से आने वाले 50 फ़ीसदी सोशल नेटवर्किंग यूज़र 24 साल से कम उम्र के हैं और सामान्य रूप से इनकी राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक जानकारी का स्रोत सोशल नेटवर्किग या टीवी है। यह वर्ग बिना कोई ख़ास सोचने का प्रयास किये सभी सूचनाओं को कचरा-पेटी की तरह ग्रहण कर लेता है। जो काम किताबों और संजीदा लेखों के माध्यम से होना चाहिए उसकी जगह इन साइटों पर एक-दो लाइनों की टिप्पणियों ने ले ली है, जोकि आजकल की नयी ‘जेन-जी’ (नवयुवा) पीढ़ी के “ज्ञान” और सूचनाओं का स्रोत माना जा रहा है। एक या दो लाइनों की टिप्पणियों से कोई व्यक्ति अपने व्यावहारिक अनुभव और वर्गीय विश्व-दृष्टि के अनुरूप अनुभवसंगत रूप से सहमत या असहमत तो हो सकता है, लेकिन अपने विचारों का कोई विश्लेषण प्रस्तुत नहीं कर सकता। साथ ही इन छोटी-छोटी टिप्पणियों के माध्यम से किसी को सोचने के लिए मजबूर भी नहीं किया जा सकता, न ही आलोचनात्मक विवेक पैदा किया जा सकता है। पूँजीवादी मीडिया द्वारा किया जाने वाला तथ्यों का चुनाव और सूचनाओं का प्रस्तुतीकरण भी पूँजीवादी वर्ग हित से मुक्त नहीं हो सकता, इसलिए ज़्यादातर सूचनाएँ भी समाज के यथार्थ को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं करतीं। ऐसे में निश्चित है कि सोशल नेटवर्किंग पर मौजूद कई समूहों से आम लोगों को जो सूचनाएँ मिलती हैं, वे समाज को देखने के उनके छिछले और अवैज्ञानिक नज़रिये का निर्माण करने में एक अहम भूमिका निभा रही हैं।

सोप ऑपेरा या तुच्छता और कूपमण्डूकता के अपरिमित भण्डार

ये तमाम सोप ऑपेरा वास्तव में पूँजीवादी समाज की संस्कृति, विचारधारा और मूल्यों का सतत पुनरुत्पादन करने का काम करते हैं; लोगों के विश्व दृष्टिकोण को तुच्छ, स्वार्थी, कूपमण्डूक, दुनियादार और असंवेदनशील बनाते हैं; हर प्रकार की व्यापकता और उदात्तता की हत्या कर दी जाती है। और इस प्रकार भारत के अजीबो-ग़रीब मध्यवर्ग पर मानसिक और मनोवैज्ञानिक नियन्त्रण क़ायम किया जाता है।

फ़ेसबुक के बारे में चलते-चलाते कुछ ‘इम्प्रेशंस’

दो-दो लाइन के शेरों, घटिया ग़ज़लों से फ़ेसबुक भरा रहता है। सस्ती तुकबन्दियों और कवितानुमा लाइनों की भरमार रहती है। नाम में ही ‘कवि’ जोड़े हुए फ़ेसबुकियों की भरमार है। ये सारे साहित्याकांक्षी गणों को एक अतिविनम्र सुझाव है कि उन्हें विश्व के कुछ प्रसिद्ध कवियों को पढ़ना चाहिए, निराला, प्रसाद, पन्त, मुक्तिबोध, शमशेर, त्रिलोचन, नागार्जुन, केदार आदि को पढ़ना चाहिए, अग्रणी समकालीन कवियों को पढ़ना चाहिए और साहित्य-सैद्धान्तिकी पढ़नी चाहिए। हिन्दी कविता की स्थिति इतनी बुरी भी नहीं है कि चार लाइनें जोड़-तोड़कर कोई भी गण्यमान्य बन जाये। ख़ूब लिखिये, आपको अपने मन की कहने की आज़ादी है, पर उसे डायरी में लिखकर अपने घरवालों और दोस्तों को सुनाइये। फ़ेसबुक एक सार्वजनिक स्पेस है। वहाँ अपनी भँड़ास निकालकर बहुत सारे लोगों का समय खाने और उन्हें बोर करने का काम ठीक नहीं है।

फ़्री एवं ओेपेन सोर्स सॉफ़्टवेयर आन्दोलन: कितना ‘फ़्री’ और कितना ‘ओपेन’

बावजूद इसके कि फ़्री एवं ओपेन सोर्स सॉफ़्टवेयर के विचार को अब कारपोरेट्स का समर्थन मिल रहा है, एक विचार के तौर पर यह अपने आप में एक प्रगतिशील अवधारणा है, क्योंकि यह ज्ञान के एकाधिकार की पूँजीवादी सोच पर कुठाराघात करती है। सॉफ़्टवेयर उत्पादन का यह सहकारितापूर्ण और सामूहिकतापूर्ण तरीक़ा निश्चित ही इस समाजवादी सोच को पुष्ट करता है कि मनुष्य सिर्फ़ भौतिक प्रोत्साहनों और निजी फ़ायदे के लालच में आकर ही श्रम प्रक्रिया में भाग नहीं लेता बल्कि श्रम उसकी नैसर्गिक आभिलाक्षणिकता है। परन्तु फ़्री एवं ओपेन सोर्स सॉफ़्टवेयर आन्दोलन के कुछ अति-उत्साही समर्थक इस तर्क को खींचकर यहाँ तक कहने लगते हैं कि यह एक कम्युनिस्ट प्रोजेक्ट है और यह इतना ‘सबवर्सिव’ है कि साइबर स्पेस में पूँजीवादी उत्पादन-सम्बन्धों को छिन्न-भिन्न कर देगा।

पूँजीवादी विज्ञापन जगत का सन्देश: ‘ख़रीदो और खुश रहो!’

एक सांस्कृतिक उत्पाद के तौर पर भी विज्ञापनों का असर लम्बे समय तक रहता है। क्योंकि लगातार दुहराव के ज़रिये ये लोगों के मस्तिष्क पर लगातार प्रभाव छोड़ते रहते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि हम कब विज्ञापनों में इस्तेमाल किये जाने वाले जिंगल गुनगुनाने लगते हैं या फिर उनके स्लोगन और टैगलाइन ख़ुद दोहराने लगते हैं। पूँजीवाद विज्ञापनों द्वारा माल अन्धभक्ति (कमोडिटी फ़ेटिशिज़्म) को एक नये मुक़ाम पर पहुँचा देता है। बार-बार लगातार विज्ञापनों के ज़रिये हमें यह बताने का प्रयास किया जाता है कि यदि हमारे पास फलाना सामान नहीं है तो हम ज़िन्दगी में कितना कुछ ‘मिस’ कर रहे हैं। हमें बार-बार लगातार यह बताया जाता है कि सुखी-सन्तुष्ट जीवन का एकमात्र रास्ता बाज़ार के ज़रिये वस्तुओं का उपभोग है। केवल माल और सामान ही हमें खुशी और सामाजिक रुतबा प्रदान कर सकते हैं। बिना किसी अपवाद के हर विज्ञापन का यही स्पष्ट सन्देश होता है – चाहे वह विज्ञापन किसी कार कम्पनी का हो या किसी बीमा कम्पनी का, किसी सौन्दर्य प्रसाधन के ब्राण्ड का हो या फिर किसी शराब या मोबाइल फ़ोन की कम्पनी का – यही सन्देश बार-बार रेखांकित किया जाता है। सामानों, वस्तुओं, मालों को प्रसन्नता, स्वतन्त्रता और रुतबे का समतुल्य बना दिया जाता है।