Category Archives: इतिहास

अक्टूबर क्रान्ति शतवार्षिकी समिति द्वारा सोवियत समाजवाद और स्त्रियाँ – एक समकालीन पुनरावलोकन विषय पर पटना में व्याख्यान का आयोजन

बेहद कठिन परिस्थिति में सम्पन्न अक्टूबर क्रान्ति के पहले प्रयोग ने मात्र चार दशकों में स्त्री मुक्ति की यात्रा में जो ऊँचाइयाँ तय की वह आगे भी एक आलोकित शिखर के समान चमकता रहेगा और आने वाली क्रान्तियों को भी दिशा दिखाता रहेगा. अक्टूबर क्रान्ति की शिक्षा हमें बताती है कि पूँजीवादी आर्थिक संरचना को नष्ट किये बिना और समाजवादी समाज की स्थापना के बिना स्त्रियों की वास्तविक मुक्ति हासिल नहीं की जा सकती. इसके लिये स्त्री मुक्ति आन्दोलन को सामाजिक मुक्ति से जोड़ना होगा और सामाजिक आन्दोलन के एजेंडे पर स्त्री प्रश्न को प्रमुखता से स्थान देना होगा. 

इतिहास से भयाक्रान्त फासीवादी

भगवे फासीवादी इतिहास से इस कदर डरते हैं कि वे इतिहास को तोड़ -मरोड़ कर पाठ्यक्रमों में बदलाव करके दलितों और औरतों के संघर्षों के इतिहास को भी दबा देना चाहते हैं क्योंकि वह नहीं चाहते कि कोई भी अपने हकों-अधिकारों के प्रति जागरूक हो। यदि ऐसा हो गया तो इन फासीवादियों को कौन बचाएगा ?

‘महान अक्टूबर क्रान्ति और इक्कीसवीं सदी की नयी समाजवादी क्रान्तियाँ : निरन्तरता और परिवर्तन के तत्व’ पर नयी दिल्ली में व्याख्यान

अक्टूबर क्रान्ति न सिर्फ़ सर्वहारा वर्ग की क्रान्तियों का एक मील का पत्थर है बल्कि वो लाइट हाउस है जो आने वाले समय की क्रान्तियों का पथ प्रदर्शक रही। यह एक युगान्तरकारी क्रान्ति थी। सोवियत संघ में कृषि का सामूहिकीकरण, उद्योगों का राष्ट्रीयकरण और पूरे विश्व को फासीवाद के चंगुल से छुड़ाने का श्रेय अक्टूबर क्रान्ति को जाता है। लेकिन उसके बावजूद  सोवियत संघ में पूँजीवादी पुनर्स्थापना होने के पीछे के कारणों की पड़ताल करना आज अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करणों की रचना करने के लिये बेहद ज़रूरी है। मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र के मुताबिक़  उत्पादन सम्बन्ध के तीन पहलू होते हैं – पहला उत्पादन के साधनों का स्वामित्व, दूसरा वितरण की प्रक्रिया, तीसरा श्रम प्रक्रिया और उत्पादन प्रक्रिया। उत्पादन के साधनों के बदलाव में समाजवादी उत्पादन सम्बन्ध कोई स्थिर वस्तु नहीं है, वह एक संक्रमणकालिक व्यवस्था है जिसमेंं समाजवादी उत्पादन सम्बन्ध और पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्ध साथ-साथ मौजूद रहते हैं।

राष्ट्रवाद : एक ऐतिहासिक परिघटना का इतिहास और वर्तमान

उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों, में चाहे आज़ादी जितनी भी कम हो और जनवाद जितना भी सीमित हो, आज राष्ट्रवाद का नारा इन देशों में भी अपनी प्रगतिशीलता और प्रासंगिता पूरी तरह से खो चुका है। अब यह केवल जनता में अन्धराष्ट्रवादी लहर उभारने का हथकण्डा मात्र है। आज राष्ट्रवाद का मतलब ही है अन्धराष्ट्रवाद। चाहे जितना भी द्रविड़ प्राणायाम कर लिया जाये, आज राष्ट्रवाद के किसी प्रगतिशील संस्करण का निर्माण सम्भव नहीं है, और न ही जनता को इसकी कोई ज़रूरत है।

अमर शहीद करतार सिंह सराभा के 100वें शहादत दिवस (16 नवम्बर) के अवसर पर

16 नवम्बर 1915 को मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में शहादत पाने वाले करतार सिंह सराभा का जन्म लुधियाना जिले के सराभा गाँव में सन् 1896 में हुआ था। माता–पिता का साया बचपन में ही इनके सिर से उठ जाने पर दादा जी ने इनका पालन–पोषण किया। लुधियाना से मैट्रिक पास करने के बाद ये इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए सान फ्रांसिस्को, अमेरिका चले गये। 1907 के बाद से काफी भारतीय विशेषकर पंजाबी लोग अमेरिका और कनाडा में मज़दूरी के लिए जा कर बस चुके थे। इन सभी को वहाँ आये दिन ज़ि‍ल्लत और अपमान का सामना करना पड़ता था। अमेरिकी गोरे इन्हें काले और गन्दे लोग कहकर सम्बोधित करते थे। इनसे अपमानजनक सवाल–जवाब किए जाते और खिल्ली उड़ाई जाती थी कि 33 करोड़ भारतीय लोगों को 4-5 लाख गोरों ने गुलाम बना रखा है! जब इन भारतीयों से पूछा जाता कि तुम्हारा झण्डा कौन–सा है तो वे यूनियन जैक की तरफ इशारा करते, इस पर अमेरिकी गोरे ठहाका मारते हुए कहते कि ये तो अंग्रेज़ों का झण्डा है तुम्हारा कैसे हो गया। प्रवासी भारतीयों को अब खोयी हुई आज़ादी की क़ीमत समझ में आयी। देश को आज़ाद कराने की कसमसाहट पैदा हुई और मीटिंगों के दौर चले।

युद्ध, शरणार्थी एवं प्रवासन संकट पूँजीवाद की नेमतें हैं

इतने बड़े पैमाने पर विस्थापन की वजह समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि वे कौन से क्षेत्र हैं जहाँ से आज विस्थापन सबसे अधिक हो रहा है। आँकड़े इस बात की ताईद करते हैं कि हाल के वर्षों में जिन देशों में साम्राज्यवादी दख़ल बढ़ी है वो ही वे देश हैं जहाँ सबसे अधिक लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ रहा है, मसलन सीरिया, अफ़गानिस्तान, फ़िलिस्तीन, इराक व लीबिया। पिछले डेढ़ दशक में इन देशों में अमेरिका के नेतृत्व में साम्राज्यवादी दख़ल से पैदा हुई हिंसा और अराजकता ने इन इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। इस हिंसा में भारी संख्या में जानमाल की तबाही हुई है और जो लोग बचे हैं वे भी सुरक्षित जीवन के लिए अपने रिहायशी इलाकों को छोड़ने पर मज़बूर कर दिये गये हैं। अमेरिका ने 2001 में अफ़गानिस्तान पर तथा 2003 में इराक़ पर हमला किया जिसकी वजह से इन दो देशों से लाखों लोग विस्थापित हुए जो आज भी पड़ोसी मुल्कों में शरणार्थी बनकर नारकीय जीवन बिताने को मज़बूर हैं। 2011 में मिस्र में होस्नी मुबारक की सत्ता के पतन के बाद सीरिया में स्वतःस्फूर्त तरीके से एक जनबग़ावत की शुरुआत हुई थी जिसका लाभ उठाकर अमेरिका ने सऊदी अरब की मदद से इस्लामिक स्टेट नामक सुन्नी इस्लामिक कट्टरपन्थी संगठन को वित्तीय एवं सैन्य प्रशिक्षण के ज़रिये मदद पहुँचाकर सीरिया के गृहयुद्ध को और भी ज़्यादा विनाशकारी बनाने में अपनी भूमिका निभायी जिसका नतीजा यह हुआ है कि 2011 के बाद से अकेले सीरिया से ही 1 करोड़ से भी अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं जिनमें से 40 लाख लोग तो वतन तक छोड़ चुके हैं।

फ़ासीवाद, जर्मन सिनेमा और असल ज़िन्दगी के बारे में जर्मनी के प्रचार मंत्री, डॉक्टर गोएबल्स को खुला पत्र

आपकी हिम्मत कैसे हुई अपने सिनेमा से जीवन के यथार्थ का सच्चा चित्रण करने का आह्वान करने की जबकि उसका पहला कर्तव्य होना चाहिए चीख-चीख कर पूरी दुनिया को उन हज़ारों-लाखों लोगों के बारे में बताना जो आपकी जेलों की काल-कोठरियों में सड़ रहे हैं जिनका उत्पीड़न कर आपके यातना शिविरों में मौत के घाट उतरा जा रहा है?

विज्ञान के विकास का विज्ञान

औज़ार का इस्तेमाल, ख़तरे को भाँपना, कन्द-मूल की पहचान, शिकार की पद्धति से लेकर जादुई परिकल्पना को भी आने वाली पीढ़ी को सिखाया जाता है। इंसान ने औज़ारों और अपने उन्नत दिमाग से ज़िन्दा रहने की बेहतर पद्धति का ईजाद की। इसकी निरन्तरता मनुष्य संस्कृति के ज़रिए बरकरार रखता है। यह इतिहास मानव की संस्कृति का इतिहास है न कि उसके शरीर का! विज्ञान औज़ारों और जादुई परिकल्पना और संस्कृति में गुँथी इंसान की अनन्त कहानी में प्रकृति के नियमों का ज्ञान है। कला, संगीत और भाषा भी निश्चित ही यही रास्ता तय करते हैं। विज्ञान और कला व संगीत सामाजिकता का उत्पाद होते हुए भी अलग होते हैं। लेकिन हर दौर के कला व संगीत पर विज्ञान की छाप होती है। बुनियादी तौर पर देखा जाए तो ये इतिहास की ही छाप होती है।

गाँधी: एक पुनर्मूल्‍यांकन

गाँधी एक विचारक के रूप में पंगु ”भारतीय” बुर्जुआ मानवतावाद के मूर्त रूप थे। वे बुर्जुआ वर्ग के सिद्धान्‍तकार और नीति-निर्माता थे। और इससे भी आगे, बुर्जुआ वर्ग के ‘मास्‍टर स्‍ट्रैटेजिस्‍ट’ और ‘मास्‍टर टैक्टीशियन’ के रूप में वे एक निहायत बेरहम व्‍यावहारवादी (प्रैग्‍मेटिस्‍ट) व्‍यक्ति थे, जो समय-समय पर अपनी उद्देश्‍य-पूर्ति के लिए अपनी सैद्धान्तिक निष्‍ठाओं-प्रतिबद्धताओं के विपरीत भी जा खड़े होता था।

इटली में फ़ासीवाद के उदय से हमारे लिए अहम सबक

इटली में फ़ासीवाद के उभार का एक बहुत बड़ा कारण मज़दूर वर्ग के गद्दार सामाजिक जनवादियों की हरकतें रहीं। जबकि इस देश में क्रान्तिकारी सम्भावना ज़बर्दस्त रूप से मौजूद थी। लेकिन सामाजिक जनवादियों ने मज़दूर आन्दोलन को अर्थवाद, सुधारवाद, संसदवाद और ट्रेड यूनियनवाद की चौहद्दी में ही कैद रखा। और तब ऐसा समय था जब मेहनतकश अवाम पूँजीवाद के संकट के एक व्यवस्थागत विकल्प की तलाश कर रहा था। कोई ठोस विकल्प मौजूद नहीं होने कि वजह से क्रान्तिकारी सम्भावना ने अपना रुख प्रतिक्रियावाद की तरफ कर लिया जिसका भरपूर इस्तेमाल करने के लिए यहाँ कि फ़ासीवादी पार्टी तैयार खड़ी थी। इसलिए कहा जा सकता है कि फ़ासीवादी उभार की सम्भावना विशेष रूप से उन पूँजीवादी देशों में हमेशा पैदा होगी जहाँ पूँजीवाद बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के जरिये नहीं आया बल्कि किसी प्रकार की क्रमिक प्रक्रिया से आया, जहाँ क्रान्तिकारी भूमि सुधार लागू नहीं हुए, जहाँ पूँजीवाद का विकास किसी लम्बी, सुव्यवस्थित, गहरी पैठी प्रक्रिया के ज़रिये नहीं बल्कि असामान्य रूप से अव्यवस्थित, अराजक और द्रुत प्रक्रिया से हुआ, जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में पूँजीवाद इस तरह विकसित हुआ कि सामन्ती अवशेष किसी न किसी मात्रा में बचे रह गए।